Monday, February 10, 2014

हिंदी की मजबूती के लिए ये नायाब तरीका है


चाचा नेहरू की जीवन पर आधारित कार्यक्रम में शामिल अमोली
किसी एक दिन भारत में हिंदी दिवस होता है। हालांकि, ये बेहद शर्मनाक है कि हिंदुस्तान में हिंदी दिवस मनाया जाता है। लेकिन, मनाया जाता है क्या करिएगा। खैर, दिवसों में रिश्ते हों, प्यार हो या फिर भाषा, उसकी अहमियत कितनी होती है ये सब साबित हो चला है। हम सब हिंदी के लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि आखिर किस तरह से तेज दौड़ती भाषा के साथ अपनी हिंदी को भी मजबूत बनाए रखें। अकसर इसे लेकर कई तरह के भाव आते रहते हैं। कभी गर्व, कभी पिछड़ने के खतरे का डर। ये भी लगता है कि हिंदी को मजबूत करने का तरीका क्या कोई निकाल पाएगा या सिर्फ चिंता करते रहेंगे और सचमुच सिर्फ दिवस में ही हिंदी न रह जाए। खैर, मैं ये भी मानता हूं कि ये डर निर्मूल है और हिंदी की इज्जत बनी रहेगी। लेकिन, एक तरीका भी अभी दिखा है हिंदी की इज्जत बढ़ाने का। बिटिया के स्कूल का सालाना दिवस था। एनुअल डे को लेकर बिटिया भी उत्साहित थी। हम भी। क्योंकि, अमोली इसमें चाचा नेहरू वाले कार्यक्रम में शामिल भी हो रही थी। एपीजे स्कूल नोएडा के अच्छे स्कूलों में है। कई बार बेटी की टीचरों से अंग्रेजी की वजह से बात करने में असुविधा भी होती है। लेकिन, समय के साथ तो चलना ही होगा।

एपीजे स्कूल के साथ अच्छी बात ये है कि पूरी तरह से आधुनिक शिक्षा के साथ परंपरा भी जुड़ी रहती है। अतिआधुनिकता से ग्रसित नहीं लगता ये विद्यालय। ऑडीटोरियम में हम पहुंचे तो खचाखच भरा हुआ था। एपीजे के फाउंडर डॉक्टर सत्य पॉल की बेटी जो, अब प्रेसिडेंट हैं उनकी सफलता की कहानी के वृत्तचित्र से मैं थोड़ा परेशान हुआ। फिर लगा कि जब इतनी बड़ी संस्था बनाई है तो उसका श्रेय लेना तो बनता ही है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे अथॉरिटी के चेयरमैन रमारमण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे और जाने माने कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग विशिष्ट अतिथि। इसके अलावा एपीजे स्कूल के ही तीन बच्चे जो इस समय अपनी कामयाबी साबित कर चुके हैं, उन्हें भी स्कूल बुलाकर सम्मानित कर रहा था। 

एपीजे स्कूल के सालाना कार्यक्रम की शुरुआत शिव नृत्य के साथ
कार्यक्रम की शुरुआत शिव नृत्य के साथ हुई। उसके बाद शानदार कव्वाली और फिर महात्मा गांधी, रवींद्र नाथ टैगोर और चाचा नेहरू के जीवन पर प्रस्तुत बच्चों का कार्यक्रम। सब शानदार था। अच्छी बात ये भी पता चली कि स्कूल के हाउस- रेड, ग्रीन, यलो टाइप न होकर गांधी, टैगोर जैसे सचमुच के बड़े और अनुकरणीय लोगों के नाम पर हैं। एपीजे स्कूल की प्रेसिडेंट सुषमा बर्लिया ने अच्छी बातें लेकिन, पूरी तरह से पहले से तैयार अंग्रेजी में पढ़ीं। मुख्य अतिथि रमारमण की बारी आई तो उन्होंने सलीके से हिंदी में अपनी पूरी बात रखी। और पूरा प्रेक्षागृह रमारमण की बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था। हो ये भी सकता है कि रमारमण जी की अंग्रेजी बहुत अच्छी न हो इसलिए वो हिंदी में बोले हों। लेकिन, इतने सालों का एक आईएएस अधिकारी इतनी अंग्रेजी तो सीख ही लेता है। और नहीं तो वो लिखी अंग्रेजी पढ़कर तो काम चला ही सकते थे। लेकिन, जिस तरह से उन्होंने हिंदी भाषा का विस्तार उन लोगों के बीच में किया जो, अपने बच्चों को अंग्रेजी में पारंगत देखना चाहते हैं, वो काबिले तारीफ है। उसी जमात में मैं भी शामिल हूं। तीन बच्चे जो एपीजे के पढ़े हुए थे। आशीष खन्ना, शिवम तेवतिया और सौम्या पांडेय। उन्हें भी स्कूल ने सम्मामित किया। आशीष विश्व बैंक में और शिवम आईएएस है। दोनों ने अंग्रेजी भाषा में ही अपनी बात रखी। सौम्या पांडेय भी आईआरएस हैं। और सौम्या ने जितनी अंग्रेजी बोली उससे साफ समझ में आया कि सौम्या की अंग्रेजी काफी अच्छी है। फिर वो एपीजे की ही पढ़ी-लिखी है तो अंग्रेजी कम आने जैसी बात तो हो ही नहीं सकती। लेकिन, सौम्या ने ज्यादातर बातचीत दिल से की। तो जाहिर है भारतीयों के दिल की भाषा तो हिंदी ही हो सकती है। यही तरीका है हिंदी को स्थापित करने का। जो भी ऊंची जगहों पर पहुंचें वो, अंग्रेजी में भी विद्वान हों लेकिन, जहां बच्चों-देश के भविष्य को भाषाबोध कराना है हिंदी में बोलें। ये प्रयास सारे हिंदी दिवसों, सरकारी योजनाओं, हिंदी की चिंताओं से ज्यादा बेहतर प्रयास होगा। अनुकरणीय लोगों को सोचना चाहिए कि बच्चों को अनुकरण करने के लिए वो अपना रुतबा, प्रभाव, प्रयास ही दे रहे हैं या फिर अपनी भाषा भी। बस बात बन जाएगी। रमारमण जी और सौम्या पांडेय दोनों को मेरी तरफ से बधाई।

Wednesday, February 05, 2014

बढ़ती भीड़, बढ़ता भाजपा का संकट!


सात लाख अस्सी हजार। मेरठ में रैली खत्म होने के बाद भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रभारी मनीष शुक्ला पत्रकारों को बता रहे थे कि जिस मैदान में नरेंद्र मोदी की रैली हुई। उसकी क्षमता सात लाख अस्सी हजार की थी। जाहिर है सारे पत्रकार मुस्कुरा रहे थे। क्योंकि, हम पत्रकारों को आसानी से इतनी बड़ी भीड़ का आंकड़ा हजम नहीं होता। एक पत्रकार ने कहा- तो डेढ़ दो लाख तो रही ही होगी ये मान लें। फिर जवाब आया- हमारी पिछली गोरखपुर की रैली ही 6 लाख से ज्यादा की थी। और ये तो उससे बहुत बड़ा मैदान है। इस मैदान की क्षमता ही करीब आठ लाख की है। अगर मंच, बैरीकेडिंग वगैरह हटा दें तो लगभग इतने लोग कम से कम माने जा सकते हैं। उस पर भी सबसे बड़ी बात ये कि रैली खत्म होने के बाद भी आने वालों को तांता लगा हुआ था। मेरठ भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी की कर्मभूमि भी है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी के लिए ये चुनौती थी कि अध्यक्ष के गृह जिले में नरेंद्र मोदी की होने वाली रैली पिछली सभी रैलियों से ज्यादा बड़ी हो। खुद नरेंद्र मोदी ने भी मंच से किसी रैली में कहा कि हमारी हर रैली पहले की रैली से बड़ी होती है। ये दबाव था जो लक्ष्मीकांत बाजपेयी के ऊपर रहा होगा। साढ़े दस बजे के आसपास मैं भी रैली स्थल पर पहुंचा और मीडिया के लिए बने सबसे आगे के इलाके में जाकर स्थापित हो गया। खास कोहरा था। मीडिया के कैमरे लग चुके थे। हर जगह की तरह दो सटे मंच भगवा रंग में रंगे हुए थे। सिर्फ मीडिया के पीछे बना ब्लॉक पूरी तरह से भरा हुआ था। उसके अलावा पूरा मैदान खाली था। हम मीडिया के लोगों को लग रहा था कि क्या आज कोहरा नरेंद्र मोदी की सभा चौपट करेगा। लेकिन, मजे की बात ये थी कि कोई भी भाजपा नेता चिंता में, भीड़ कहां से कितनी आ रही है। कितने बजे तक आएगी। ये सब पूछता चिल्लाता नजर नहीं आ रहा था। ये समझना मुश्किल हो रहा था कि रैली से तीन घंटे पहले लगभग खाली मैदान होने के बावजूद भाजपा नेताओं को चिंता क्यों नहीं हो रही है। टीवी मीडिया के लोग इस बात को लेकर ज्यादा तफ्तीश करते दिख रहे थे कि आखिर सत्यपाल सिंह मेरठ रैली में बीजेपी में शामिल हो रहे हैं या नहीं। भाजपा के नेता इसका जवाब ये दे रहे थे कि ये नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की रैली है। जिसको भाजपा में आना हो वो आए। हुआ भी यही सत्यपाल सिंह सहित कई लोग भाजपा में बेहद सामान्य तरीके से शामिल हो गए। वो भी नरेंद्र मोदी के आने से पहले ही। दरअसल भारतीय जनता पार्टी इस समय किसी को भी नरेंद्र मोदी के सामने शामिल कराकर उसका कद बहुत ऊंचा नहीं करना चाहती। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को ये पता है कि ये नरेंद्र मोदी की हवा है इसलिए सिर्फ नरेंद्र मोदी की ही चर्चा होनी चाहिए।

दोपहर के बारह बजते-बजते सूर्यदेवता कोहरे के कोप से बाहर निकलते दिखे और साथ ही रैली स्थल के हर प्रवेश द्वार से लोगों की भीड़ भगवा-हरे कमल निशान वाले झंडे लहराती नजर आने लगी। लेकिन, लग यही रहा था कि मेरठ में एकाध ब्लॉक खाली ही रह जाएंगे। लेकिन, जब एक बजे के बाद नरेंद्र मोदी की हेलीकॉप्टर सभा स्थल के ऊपर दिखा तो लगा जैसे हर कोई मेरठ के शताब्दी नगर मैदान (जिसे भाजपा ने शहीद मातादीन सभा स्थल का नाम दिया था) में पहुंच जाने के लिए हर कोशिश कर लेना चाहता है। टीवी कैमरों के लिए बने ऊंचे मंच से ये हलचल आसानी से देखी-महसूस की जा सकती थी। चार चक्कर लगाने के बाद नरेंद्र मोदी की हेलीकॉप्टर जब तक मैदान के पीछे बने हेलीपैड पर उतरता। तब तक मैदान में भीड़ का दबाव विशाल मैदान को छोटा साबित करने पर आमादा हो चुका था। लाउडस्पीकर टांगने के लिए बने लोहे के खंभों पर भाजपा के कार्यकर्ता चढ़े हुए थे। तीन-चार कार्यकर्ता तो एक ऐसे खंभे पर चढ़ गए जिसमें लाउडस्पीकर बंधा था और बिजली के तार भी उससे जा रहे थे। डबल बैरीकेडिंग होने के बाद भी लगातार दबाव इस तरह बढ़ रहा था कि डर लग रहा था कि कहीं भगदड़ न मच जाए। ये डर नरेंद्र मोदी को भी लग रहा था इसीलिए मोदी ने माइक संभालते ही हाथ जोड़कर कहा कि मेरठ के वीर पुरुषों को मेरा नमन। लेकिन, कृपया आप लोग खंभों से नीचे उतर आएं वरना कुछ अनर्थ हुआ तो हमारे लिए जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। नरेंद्र मोदी का भी प्रयास थोड़े समय बाद ही उन उत्साही वीर पुरुषों पर असर कर सका।

जिस तरह से नरेंद्र मोदी की रैलियों में भीड़ बढ़ रही है और बढ़ती भीड़ के लिहाज से सही संख्या का अनुमान लगाना और उससे भी बड़ा संकट पत्रकारों को बताना हो जाता है। ये संकट इतना बड़ा है कि पिछली कुछ रैलियों से पत्रकार भारतीय जनता पार्टी के लोगों से संख्या पूछते जरूर हैं लेकिन, इतनी भारी संख्या सुनकर उसका जिक्र करने का साहस नहीं कर पाते हैं। यानी अब किसी टीवी न्यूज चैनल या फिर अखबार में ये नहीं लिखा जाता कि नरेंद्र मोदी की सभा में कितनी अनुमानित भीड़ रही। अब एक लाख, दो लाख, तीन, पांच लाख तक तो चल गया लेकिन, उसके आगे संकट बढ़ता है। अब यही संकट मेरठ की रैली में दिखा था। इसलिए किसी भी मीडिया ने आठ लाख वाली भारतीय जनता पार्टी की भीड़ बताने का जोखिम नहीं उठाया। वैसे नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी तथ्यों और तैयारी के साथ ज्यादातर बातें करने लगी है। भाजपा नेता जोड़कर यही बता रहे थे कि दो लाख वर्ग मीटर से बड़ा मैदान था और पूरा मैदान भरा था। साथ ही अंतिम समय तक मैदान में किसी तरह पहुंच जाने के लिए लंबी लाइन लगी थी। अब ये तो था भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का दावा। लेकिन, मेरा खुद को जो कष्टप्रद अनुभव रहा उसे भी बताना जरूरी है। मैं मेरठ में नरेंद्र मोदी की भीषड़ भीड़ वाली रैली में शामिल था। मीडिया गैलरी में होने से किसी प्रकार के देहमर्दन कार्यक्रम से मैं बचा रहा। लेकिन, हर पल ये डर तो लग ही रहा था कि कहीं किसी ओर से बेहद उत्साही ये भीड़ बैरीकेडिंग तोड़कर हमारी गैलरी में भी न घुस जाए। सवा तीन बजे के बाद रैली खत्म हुई। हम लोग तेजी से निकलकर होटल पहुंचे। लेकिन, होटल से निकलकर तुरंत दिल्ली लौटने का साहस नहीं जुटा सके। मेरठ से दिल्ली का रास्ता पूरी तरह जाम दिख रहा था। होटल में करीब डेढ़ घंटे और बिताए। छे बजकर आठ मिनट पर होटल से निकले और पहले एक घंटे में चार किलोमीटर, दूसरे एक घंटे में पांच किलोमीटर और तीसरे एक घंटे में भी करीब पांच किलोमीटर ही दिल्ली की तरफ बढ़ पाए। कुल मिलाकर दिल्ली से मेरठ की करीब सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करने में पूरे पांच घंटे लग गए। और इस सबकी वजह नरेंद्र मोदी की रैली थी। अब इस उत्साही भीड़ को रैलियों से संभालकर मतदान स्थल तक पहुंचाना बड़ी चुनौती है लेकिन, अगर नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी इसमें कामयाब हो गए तो सचमुच 2014 में भारतीय राजनीति का नया अध्याय शुरू होगा।

यूपीए 2 का आर्थिक शीर्षासन !


राजनीति अर्थनीति पर हमेशा भारी पड़ती है ये तो समय-समय पर साबित होता रहा है। लेकिन, खुद को सुधारवाद की सबसे बड़ी अगुवा घोषित करने वाली सरकार  5 साल बीतते-बीतते अगर अपने सारे सिद्धांतों को उलट दे तो क्या कहेंगे। यूपीए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में कुछ ऐसा ही कर रही है। मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तो लगा था कि देश-दुनिया में अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, अध्यापक रहते जो कुछ भी उन्होंने सीखा, समझा है उसे ठीक से लागू करेंगे और देश की अर्थव्यवस्था कुछ ऐसी हो जाएगी कि दुनिया के विकसित देशों के साथ हम कंधे से कंधा मिला सकेंगे। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए जो कमाल किया था, वो भारत के लोगों को अच्छे से याद है। इसीलिए मजबूरी में ही सही जब ऐसा आदमी प्रधानमंत्री बनता दिखा तो नौजवान भारत को लगा कि अब तक सब्सिडी से सरकार और देश चलाने के आदी नेताओं का वक्त खत्म हो गया। क्योंकि, पी वी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्री रहते वित्त मंत्री बने मनमोहन सिंह ने वो कर दिखाया था जो, होना संभव ही नहीं था। मनमोहन सिंह ने इस देश को काफी हद तक लालफीताशाही से मुक्ति दिला दी थी। भारत का 1991 दुनिया के लिए मिसाल बना और मौका भी। मनमोहन सिंह की नीतियों का ही असर था कि ये देश दुनिया के लिए खुले मन से बांहे खोलकर खड़ा हो गया था। दुनिया को अनछुआ बाजार दिखा और दुनिया दौड़ पड़ी भारत के बाजार में अपने को सिद्ध करने के लिए। इससे दबाव भारतीय कंपनियों पर भी पड़ा जो, भारत सिर्फ टाटा, बिड़ला का नाम और पंरपराएं लेकर जी रहा था। वो भारत टाटा, बिड़ला का नाम सम्मान से लेने के साथ ये भी पूछने, समझने लगा था कि आखिर दुनिया की दूसरी कंपनियों के साथ मुकाबले में हमारे उद्योगपति कहां हैं। हमारी कंपनियां बनाती क्या हैं, कहां बेचती हैं और दुनिया में इनकी स्थिति क्या है। ये बड़ा परिवर्तन था। लालफीताशाही टूटने का असर था। इंस्पेक्टर राज खत्म होने का असर था। और ये सब किया प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव की खुली छूट के साथ अर्थशास्त्री वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने।

2004 आया। विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया को देश जब स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखा तो सोनिया को मनमोहन सिंह याद आए। बेहद विनम्र व्यवहार के मनमोहन सिंह ने विनम्रता से देश को सपना ये दिखाया कि आर्थिक सुधार ही आज के समय में सारे सुखों की वजह बन सकता है। हालांकि, ये बहस का विषय है कि आर्थिक सुधार क्या है। यूपीए एक के समय शुरू हुआ आर्थिक सुधार के कार्यक्रम में मोटे तौर पर दो बातें शामिल थीं। पहला सबकुछ विदेशियों के लिए खोलना। मतलब साफ था कि अपने बाजार की ताकत दिखाकर विदेशियों को भारत में नए जमाने का विकसित भारत तैयार करने वाला बुनियादी ढांचा तैयार करवाना। साथ ही सब्सिडी देकर समाज के कमजोर तबके को संतुलित करने की जो राजनीतिक प्रक्रिया थी उसे धीरे-धीरे खत्म करना। मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार का कार्यक्रम ये सपना दिखाता था कि दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार होगी। हर भारतीय की जेब में इतनी रकम होगी कि वो सबकुछ बाजार की कीमत पर खरीद सकेगा। फिर भला सब्सिडी की जरूरत क्यों होगी। और कमाल की बात ये यूपीए एक से यूपीए दो बना तो इसमें जरा सा भी जिक्र सोनिया गांधी की अगुवाई वाली यूपीए एक ने इस बात का नहीं करना जरूरी समझा कि ये चमकते भारत के मनमोहिनी सपने पर वोट मिला। सोनिया गांधी के मनरेगा यानी 100 दिन 100 रुपये की न्यूनतम मजदूरी वाले कार्यक्रम को ही यूपीए दो लाने का पूरा श्रेय दे दिया गया। फिर यूपीए दो भी आया। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश को इसी पर खुश करते रहे कि दुनिया मुसीबत में हैं हम कम मुसीबत में हैं। और वो फिर से सपना दिखाने लगे कि चिंता मत करो अब सब ठीक हो जाएगा। ये अलग बात थी कि भारत सरकार की लुंजपुंज आर्थिक नीतियों की वजह से दुनिया की बाजारू नीति भारत की साख घटाना शुरू कर चुकी थी। फिर बहुप्रतीक्षित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का फैसला भी ले लिया गया। इस भरोसे कि एक वॉलमार्ट या टेस्को आएगा और देश के हर नागरिक को विकसिक देशों के लोगों जैसा अहसास कम से कम खरीदारी करते समय तो देने ही लगेगा। हुआ उल्टा। भारत के संवैधानिक संघीय ढांचे की वजह से दिल्ली, महाराष्ट्र छोड़ कहीं भी दुकान खोलने की इजाजत सलीके से नहीं मिली। हर राज्य की अपनी शर्तें थीं। इतनी शर्तें देखकर विदेशी रिटेलर ऐसे घबड़ाए कि अबतक कोई भी विदेशी मल्टीबांड रिटेलर की दुकान का बोर्ड चमकता नहीं दिख रहा है। खबरें तो ये भी आ रही हैं कि जो अकेला रिटेलर भारत आ भी रहा है टाटा के साथ समझौता करके वो भी सरकार की नाक बचाने के लिए बड़ी लॉबीइंग का नतीजा है। ये तो हुआ मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार के कार्यक्रम का। देश की तरक्की की रफ्तार अब तक घटकर साढ़े चार तक लुढ़क चुकी है।

ये तो था विदेशों से पैसे लाने के सरकारी नीतियों का हाल। लेकिन, बात और बुरी हो गई जब घरेलू हालात दुनिया के बाजार के मुताबिक करने के लिए चल रही योजना भी उलटती दिखने लगी। वो योजना थी धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म करने और भारत के लोगों को बाजार की कीमत पर पेट्रोलियम उत्पादों के मिलने का। एकबारगी तो ऐसा लगा कि सरकार कलेजा कड़ा कर चुकी है। उसे देश की तरक्की की चिंता सबसे पहले है वोटबैंक की बाद में। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस सबकी कीमत बाजार तय करने लगा। कहीं पूरी तरह से कहीं आंशिक तौर पर। लेकिन, ये सब तब हो रहा था जब लोकसभा चुनाव में काफी वक्त था। लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए। चार राज्यों में कांग्रेस का खाता बंद हो गया। हर सर्वे यूपीए की किसी भी संभावना तक को दूर-दूर तक नकारने लगा। बस मनमोहन सिंह को प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ गई। ये तक कहना पड़ गया कि मैं नहीं बनूंगा प्रधानमंत्री। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की तालकटोर स्टेडियम की बैठक में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सब्सिडी, कालाबाजारी घटाने की महत्वाकांक्षी 9 सिलिंडर की गैस को 12 सिलिंडर की गैस में बदलने की बात कह दी। तीन बढ़े सिलिंडर से निकली गैस से मनमोहन सिंह और यूपीए की सुधारवादी आर्थिक नीतियों का दम घुटना शुरू हो चुका था। शीर्षासन लोगों की सेहत ठीक करता है। लेकिन, अगर कोई सरकार अपनी आर्थिक नीतियों का शीर्षासन करने लगे तो क्या होगा। कुछ ऐसा ही हुआ है जब देश को सुधारों की पटरी पर दौड़ाते-दौड़ाते यूपीए की सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों में उल्टी दौड़ लगा रही है। लेकिन, मामला यहीं नहीं रुका। अचानक बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने सीएनजी, पीएनजी के दाम करीब एक तिहाई घटा दिए। लौट के बुद्धू घर को आए की तर्ज पर लौटकर सुधारों से सब्सिडी पर आए। अब जिस रास्ते लौट आए हैं उसे जायज तो ठहराना ही है। दरअसल नेताओं को लगता है कि जनता की याददाश्त बड़ी छोटी होती है। लोकसभा चुनावनजदीक हैं और पिछले साढ़े चार सालों से महंगाई से त्रस्त जनता को 15 रुपए सस्ती सीएनजी और 5 रुपये सस्ती पीएनजी मिलेगी तो वो पिछली महंगाई भला कहां याद रख पाएगी।  मोइली जी कल तक सारे बाजारू फॉर्मूले गिनाकर हर पेट्रोलियम पोडक्ट महंगा कर रहे थे। अचानक उन्होंने सीएनजी-पीएनजी सस्ता करने का फॉर्मूला निकाल दिया। आम लोग बमुश्किल ही समझ पाएंगे कैसे। तरक्की की रफ्तार बढ़ाने वाले उद्योगों के हिस्से की गैस रोक दी गई है और उसे सिटी गैस वितरण कंपनियों को दे दिया गया। अब 100 प्रतिशत सस्ती गैस सिटी गैस वितरण कंपनियों को मिलेगी। उन्हें घरेलू गैस फील्ड वाली सस्ती गैस मिलेगी। महंगी गैस आयात करने से उनको मुक्ति मिली और इसका लाभ जनता को सस्ती सीएनजी-पीएनजी के तौर पर मिलेगा। यूपीए सरकार को उम्मीद यही कि देश की जनता यूपीए 2 के आखिरी दिनों में मिली इस सस्ती गैस का कर्ज यूपीए 3 बनाकर उतार देगा। अब सवाल यही है कि क्या इस जमाने में भी साढ़े चार साल की नीति को साढ़े चार महीने के लिए उल्टा करके सरकार बनाई जा सकेगी। इस प्रयोग का परिणाम मई 2014 में पता चलेगा कि ये प्रयोग सफल हुआ या नहीं।

Tuesday, January 28, 2014

मनमोहिनी सिद्धांतों की कब्र पर होगी राहुल की ताजपोशी!


भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर कहाकि दिल्ली आए थे कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रधानमंत्री लेने और लेकर लौटे तीन गैस के बॉटल। नरेंद्र मोदी के मुंह से ये बात भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में निकली तो इस पर चर्चा भी शुरू हो गई। हालांकि, ये जुमला नरेंद्र मोदी के श्रीमुख से निकला था तो इसे सिर्फ कांग्रेस भाजपा के बीच के विरोधी बयान के तौर पर देखा जाना भी स्वाभाविक है। कुछ लोग इसे भाषण की तुकबंदी की तरह ही देख रहे हैं कि अच्छा लगता है इस तरह से अपने कार्यकर्ताओं के बीच में तुकबंदियां उछालना। और खुद राहुल गांधी 17 जनवरी की तालकटोरा वाली एआईसीसी बैठक में मान चुके हैं कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की मार्केटिंग रणनीति इतनी अच्छी है कि वो गंजों को कंघी बेच देते हैं और अब तो उनका हेयर स्टाइल भी बनाने लगे हैं। बड़ा हिट हुआ था राहुल गांधी का ये वाला बयान और इतना ही हिट हुआ था राहुल गांधी का वो वाला बयान जिसमें वो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से चहकते हुए कह रहे थे कि प्रधानमंत्री जी 9 सिलिंडर से घर नहीं चलता। हमें 12 सिलिंडर चाहिए। जिन्होंने उस समय टीवी स्क्रीन देखा होगा उन्हें बगल में अतिप्रसन्न हो रही सोनिया गांधी की शक्ल भी दिखी होगी। हो भी क्यों ना। सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष और एक बेटे की मां, दोनों ही रिश्तों से खुश होने की वजह दिख रही थी। बेटा और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पूरे फॉर्म में था। प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने के लिए रुदन करते कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के सामने भाषणों के चौके-छक्के लगा रहा था। पहली बार लगा कि राहुल गांधी नेता हो गए हैं। और इस नेता होने वही दोनों लाइनें सबसे मददगार रहीं। अब नरेंद्र मोदी और भाजपा की मार्केटिंग रणनीति की राहुल गांधी बात करते हैं, काट निकालते हैं तो उसमें मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। लेकिन, अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते राहुल गांधी का दूसरा बयान मुझे बेहद तकलीफ दे रहा है।


राहुल गांधी ने तो अपनी राजनीतिक इमारत की बुलंदी के लिए उछलकर कह दिया कि प्रधानमंत्री जी 9 सिलिंडर से काम नहीं चलेगा। 12 सिलिंडर चाहिए। प्रधानमंत्री न तो ऐसे बड़े मुद्दों पर बोलते हैं और न बोलने लायक बचे हैं। क्योंकि, अध्यादेश पर राहुल के बगावती तेवर ने उन्हें अंदर तक हिला दिया है। इसीलिए उन्होंने सत्ता के दो ध्रुवों के सफलतापूर्वक चलने की बात भी कह डाली। और अब अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में मनमोहन सिंह ये भी देख रहे हैं कि किस तरह से उनके सारे अर्थशास्त्री सिद्धांतों को बलि देकर एक मां अपने बेटे की राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते राहुल गांधी का 9 की बजाय सब्सिडी वाले 12 सिलिंडर देने की जरूरत वाला बयान और उस पर तुरंत पेट्रोलियम मंत्री की प्रतिक्रिया की हम कैबिनेट में इस पर विचार करेंगे, बेहद खतरनाक संकेत दे रहा है। 2004 में जब आठ प्रतिशत से ज्यादा की तरक्की की रफ्तार विरासत में लेकर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो हर कोई ये आसानी से मान ले रहा था कि भले ये एनडीए ने काम किया लेकिन, इसकी बुनियाद नरसिंहा राव-मनमोहन की जोड़ी के देश को दुनिया के साथ जोड़ने वाले सुधारवादी फैसलों ने किया था। इसीलिए जब 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो देश ही नहीं दुनिया के लोगों को लगा कि अब हम बड़ी आसानी से दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार हासिल कर लेंगे। नई पीढ़ी ये सपना देखने लगी थी कि अब हमारा भी जीवन अमेरिका-लंदन में रहने वालों जैसा होगा यानी हम विकासशील से विकसित देशों की कतार में पहुंच जाएंगे। लेकिन, हुआ क्या। हुआ ये कि 2004-2009 यानी यूपीए के पहले शासनकाल में तो तरक्की की रफ्तार आठ प्रतिशत पर बनी रही लेकिन, उस तरक्की की मजबूत बुनियाद में सीलन डाल दी सोनिया गांधी के प्रिय महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना ने। सब्सिडी से हटकर देश के लोगों को बाजार के सिद्धांतों के अनुकूल बनाकर तरक्की की मनमोहिनी योजना में ये पहला बड़ा छेद था। भ्रम ये फैलाया गया कि 2009 में लोगों ने इसी मनरेगा से मिलने 100 रुपये रोज की गारंटी पर यूपीए 2 के लिए वोट कर दिया। जबकि, सच्चाई ये थी कि दरअसल नौजवान वोटर, शहरों में कमाने निकला मध्यमवर्गीय परिवार यूपीए 2 के लिए इस गलतफहमी में वोट कर गया था कि मनमोहन सिंह हैं तो 10 प्रतिशत की तरक्की हम हासिल कर ही लेंगे। अर्थव्यवस्था की खराब हालत के लिए ठीकरा दुनिया की मंदी पर मनमोहन सिंह ने आसानी से फोड़ दिया। लोग भूलते जल्दी हैं इसलिए याद दिलाता हूं कि किस तरह से पी चिदंबरम ने और फिर प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्री रहते हुए यूपीए सरकार की सब्सिडी का बोझ करने वाली योजना अमल में लाने की बात बजट भाषण के दौरान लगातार देश को बताई थी। उस भाषण पर ज्यादा नहीं लेकिन, सिर्फ एक महत्वपूर्ण बात कि धीरे-धीरे पेट्रोलियम उत्पादों से सब्सिडी कम कर दी जाएगी। और उसी योजना के तहत पेट्रोल को पूरी तरह बाजार के हवाले, डीजल को आंशिक तौर पर बाजार के हवाले और एलपीजी यानी रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या कम करने के ऐलान किए गए।

हालांकि, इस सब्सिडी खत्म करने के फैसले का राजनीतिक तौर पर कई बार इस्तेमाल भी किया गया। लेकिन, धीरे-धीरे इस सब्सिडी खत्म करके बाजार के सिद्धांतों पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत तय करने के सरकार के फैसले के अच्छे असर भी दिखने शुरू हो गए थे। पेट्रोलियम मंत्रालय से आने वाली साधारण प्रेस विज्ञप्तियों में से एक के आंकड़े असाधारण हैं। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी DBTL योजना से जोरदार फायदा हो रहा था। लीकेज पर रोक लग रही थी। रसोई गैस की सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में जाने की योजना अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है लेकिन,जितनी भी लागू हुई है उसका असर दिखना शुरू हो चुका है। 1 जून 2013 को ये योजना शुरू हुई थी। देश में कुल 15 करोड़ रसोई गैस ग्राहक परिवार हैं। इनमें से दो करोड़ तीस लाख ग्राहक परिवार आधार, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना के दायरे में आ चुके हैं। इसका मतलब ये हुआ कि 2000 करोड़ रु सीधे ग्राहकों के खाते में जा रहे हैं। देश के 54 जिलों में ये योजना पूरी तरह लागू है। अब इस योजना के फायदे देखिए 84 लाख मल्टीपल कनेक्शन बंद किए गए हैं। सालाना 2500 करोड़ रुपये की बचत की बात की जा रही है। ये सुधार के सिद्धांतों का असर था। लोग रसोई गैस की बचत करना सीख रहे हैं। लोगों को लग रहा है कि ठीक से एक कनेक्शन ही घर में होना चाहिए। वजह ये कि अब सब्सिडी सीधे खाते में आएगी और बिना आधार कार्ड के नहीं मिलेगी। डुप्लिकेट रसोई गैस खाते बंद होंगे। इसके साथ एक और तथ्य समझना जरूरी है। वो तथ्य ये है कि किसी भी परिवार में रसोई गैस की जो खपत होती है लगभग वही पहले भी होती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसके एक ही वैध कनेक्शन पर वो खपत है। पहले उसके 2-3 कनेक्शनों में उसकी खपत के अलावा सब कालाबाजारी का जरिया बन जाता था। और यही लीकेज है, भ्रष्टाचार है जो सुधारवादी सिद्धांतों से सुधर रहा था। 9 सिलिंडर एक परिवार के लिए पर्याप्त होते हैं। हां बड़े परिवारों में शायद जरूरत ज्यादा की होती हो। लेकिन, अच्छा था कि धीरे-धीरे लोग 80 प्रतिशत आयातक पेट्रोलियम उत्पाद वाले देश के लिहाज से संयमित भी हो रहे थे। कालाबाजारी पर रोक भी लग रही थी। लेकिन, अचानक एक युवराज की ताजपोशी का संकट देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के सामने आ खड़ा हुआ। और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार युवराज को बनाने की चाहत लेकर आए देश भर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और देश के दूसरे लोगों को भी 9 से 12 सस्ते सिलिंडर देकर ही युवराज को बिना घोषित किए प्रधानमंत्री बनाने का रास्ता तैयार करने की कोशिश हुई है। लेकिन, ये सबकुछ मनमोहन सिंह के सारे अर्थशास्त्री सिद्धांतों को कब्र में डालकर हो रहा है। सब्सिडी पर देश के लोगों का मत बन चुका था। अब देखना ये होगा कि 2009 में मनरेगा से चुनाव जीतने का भ्रम फैलाने वाली कांग्रेस क्या 2014 की लड़ाई तीन सस्ते सिलिंडर के भ्रम से जीत पाती है। 

(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है।)

Tuesday, January 21, 2014

तानाशाही विचारधारा के हैं अरविंद केजरीवाल!


अरविंद केजरीवाल मुझे बहुत लुभाते थे। गलत कह रहा हूं सच बात ये है कि अभी भी बहुत लुभाते हैं। बिना किसी बहस के अरविंद केजरीवाल का खुद में भरोसा गजब है। और ऐसा ही भरोसा हम  जैसे लोगों को भी अरविंद में दिखता है लेकिन, उससे भी ज्यादा भरोसा मुझे इस तर्क में दिखता है कि केजरीवाल कांग्रेस का विकल्प हो सकते हैं। या ये कहें कि दिखता था। लेकिन, अब उससे भी ज्यादा भरोसा इस तर्क में कि कांग्रेस की मदद ये मजबूती से करेंगे। ठंडी की एक रात में प्रदर्शन के दौरान जागने के बाद अरविंद केजरीवाल के ज्ञान चक्षु खुल गए हैं। पता नहीं ये दिव्य ज्ञान बीती रात ही हुआ या उससे पहले से ही है। ये दिव्य ज्ञान ये है कि आधा मीडिया नरेंद्र मोदी के साथ है और आधा राहुल गांधी के साथ। शोले फिल्म में अंग्रेजों के जमाने के जेलर असरानी की वो बात मेरे दिमाग में आ गई कि आधे दाएं जाओ, आधे बाएं जाओ- बाकी मेरे पीछे आओ। वो पिक्चर थी। कॉमेडी थी। लेकिन, अरविंद केजरीवाल तो मुख्यमंत्री हैं और प्रधानमंत्री बनने का सपना भी देखने लगे हैं। वो क्यों कॉमेडी कर रहे हैं। मीडिया के बारे में बार-बार बात होती है और ऐसा नहीं है। सोशल मीडिया पर और निजी बातचीत में अकसर राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के समर्थक भी ये आरोप लगाते रहते हैं कि मीडिया उनके खिलाफ काम कर रहा है। देश की और राज्य की सरकारें भी अकसर ये दबे-छिपे कहती रहती हैं कि मीडिया उनकी सरकार अस्थिर करने में लगा हुआ है। लेकिन, श्रीमान अरविंद केजरीवाल का ये बयान कि आधा मीडिया नरेंद्र मोदी का है और आधा राहुल गांधी का थोड़ा चौकाने वाला है। मेरी जानकारी में तो इस तरह से मीडिया को बांटकर आरोप तो कभी खुद नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी ने भी नहीं लगाया। जबकि, ये किसी से छिपी बात तो है नहीं कि मीडिया खासकर टीवी मीडिया नरेंद्र मोदी की कितनी विरोधी रिपोर्ट पेश करता रहा है। 12 सालों से अगर 2002 जिंदा है तो क्या लगता है कि तीस्ता सीतलवाड़ जैसी एनजीओ कार्यकर्ता या कुछ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मोदी विरोध करने वालों की इतनी ताकत है। दरअसल गुजरात दंगा अगर नरेंद्र मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहा है तो इसके पीछे मीडिया का मूलत: निष्पक्ष स्वभाव ही है। वही मीडिया नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे की क्या जमकर तारीफ करता है। वही टीवी चैनल जो गुजरात दंगों पर गंदे से गंदे विश्लेषण के साथ रिपोर्ट चलाते हैं वही टीवी चैनल विकास के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को महानतम विश्लेषणों से विभूषित करते हैं। मीडिया यही है। क्या कभी नरेंद्र मोदी ने ये कहा कि पूरे देश का मीडिया सिर्फ राहुल गांधी का है।


राहुल गांधी को भी मीडिया ने क्या-क्या नहीं कहा। अपनी ही बहन प्रियंका के सामने हर मौके पर ऐसे साबित किया कि राहुल तो सचमुच गली में खेलने वाला बच्चा है और प्रियंका गांधी राजनीति की चतुर खिलाड़ी। जबकि, सच्चाई क्या ये नहीं है कि इंदिरा गांधी की छवि दिखती है, राहुल, सोनिया की चुनावी प्रबंधक हैं इसके अलावा तीसरी सीट पर कभी प्रियंका जिताऊ फैक्टर नहीं साबित हुई हैं। लेकिन, हर कोशिश के बावजूद मीडिया में राहुल गांधी की कड़ी परीक्षा हर रोज होती रहती है। फिर भी क्या कभी राहुल गांधी ने ये कहा कि सारा मीडिया सिर्फ नरेंद्र मोदी का है। दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने में अरविंद केजरीवाल की जबरदस्त मदद पिछले करीब ढाई सालों से टीवी मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज ने की है। इससे भला कौन इंकार कर सकता है। लेकिन, इसके बावजूद मीडिया को इस तरह से खांचे में बांटकर देखने का साहस कौन राजनेता करता है। कार्यकर्ता और छुटभैये नेता कांग्रेस, बीजेपी या किसी पार्टी के हों मीडिया को अपनी सरकार, नेता के खिलाफ लिखने-बोलने पर गाली देते ही हैं। और ये होगा ही। लेकिन, सीधे-सीधे किसी पार्टी का शीर्ष नेता सारे ही मीडिया को विरोधी बता दे, आरोप लगा दे ऐसा कम ही होता है। किसी एक संपादक, अखबार, किसी एक बहस में किसी एक एंकर पर आरोप लगाना होता रहा है। लेकिन, अरविंद क्रांतिकारी हैं, अराजक हैं, खुद को वो ऐसे ही परिभाषित किया जाना पसंद करते हैं। इसलिए अरविंद ने पूरे मीडिया को आधा-आधा नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के पाले में भेज दिया।

श्रीमान अरविंद केजरीवाल "आआपा" की सफलता में मीडिया का कितना योगदान है ये आपको अच्छे से पता है। नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी के लिए इतना योगदान नहीं दिया। मोदी, राहुल पर भी मीडिया जमकर सवाल उठाता है लेकिन इन दोनों ने भी कभी मीडिया पर आरोप नहीं लगाया। आपके विचार तो अजब उत्पाती हैं कि आप पर सवाल उठाने का हक भी मीडिया से छीन लिया जाए। तानाशाही विचारों के असल प्रवर्तक दिख रहे हैं आप। लेकिन, आपकी तानाशाही "आआपा" में जुड़ने वालों पर चल सकती है मीडिया पर नहीं इसीलिए आपको लगता है कि सारा मीडिया अब आपका विरोधी है। अरविंद केजरीवाल खुद को बुद्धि का भंडार समझते हैं लेकिन, ये क्यों नहीं समझ पाते कि मीडिया मोदी, राहुल का होता तो ठंडी में, बारिश में भीगते, पुलिस की लाठियों के बीच से "आआपा" कार्यकर्ताओं को पिटता क्यों दिखाता? मीडिया मूलत: कितना निष्पक्ष है इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि श्रीमान अरविंद केजरीवाल ने सुबह ही आधा-आधा मीडिया मोदी, राहुल का बता दिया फिर भी पूरा मीडिया रेल भवन पर रहा। अरविंद केजरीवाल गलतबयानी में आप माहिर हैं। ये तो अच्छे से समझते हैं कि मीडिया न मोदी का है न राहुल का। हां "आआपा" का भी नहीं इसीलिए मिर्ची लग रही है। और सबसे आखिर में अगर एकाध टीवी संपादकों के पार्टी में जाने से सारा मीडिया किसी पार्टी का हो जाता तो आशुतोष से बहुत बड़े-बड़े संपादक पहले से कांग्रेस-बीजेपी में हैं। श्रीमान अरविंद केजरीवाल गलतफहमी से बाहर निकलिए। लोग बार-बार ये कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी की विचार धारा क्या है। अब मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं अरविंद तानाशाही विचारधारा के असल वाहक हैं।

Friday, January 17, 2014

सीधे राहुल के दिल से लाइव

तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी
आज सुबह से देश में बड़ी बेचैनी थी। बेचैनी इस बात की नहीं थी कि  राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनेंगे या नहीं। बेचैनी इस बात को लेकर थी कि क्या-क्या नौटंकी होगी तालकटोरा स्टेडियम में। जिस तरह से कल से देश को ये दिखाने की कोशिश हो रही थी कि लोकतंत्र मतलब कांग्रेस है उसे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ तालकटोरा स्टेडियम से देश की जनता को लाइव देखने की बेचैनी थी। सुबह जब सोनिया गांधी के बोलते समय कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने राहुल-राहुल के नारे लगाने शुरू किए तो लगा कि क्रिकेट के स्टेडियम है, तालकटोरा स्टेडियम नहीं। राहुल गांधी को उठकर आना पड़ा और कहना पड़ा कि दोपहर 3.30 बजे वो अपने दिल की बात बोलेंगे। उस समय कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी को देखकर, सुनकर लगा कि वो कांग्रेस अध्यक्ष नहीं, मां की तरह व्यवहार कर रही हैं जिसके लिए बेटा कभी बड़ा नहीं होता। या यूं कहें कि बेटे को वो तब तक घर से बाहर नहीं निकलने देती जब तक तय न हो जाए कि बाहर सब ठीक है। सोनिया गांधी चाहती हैं कि किसी तरह से कांग्रेस या यूपीए की तीसरी बार सरकार बनने की नौबत आ जाए और वो सीधे युवराज को राजा बना दें। खैर राहुल के साढ़े तीन बजे के भरोसे मैं भी दिल  लगाकर बैठ गया। साढ़े तीन क्या चार बज गया। बड़ी देर से प्रयास में हूं कि राहुल जी के दिल की बात सुनूं अभी तो दिमाग वाली वो चिल्लाकर बता रहे हैं। इंतजार कर रहा हूं। 

फिर राहुल गांधी के दिल से आवाज आई 15 सीटों पर जनता से पूछकर उम्मीदवार, जनता से पूछकर घोषणापत्र। तुरंत समझ में आ गया कि अरविंद केजरीवाल क्यों कांग्रेस से आगे निकल गया। सोचिए अरविंद केजरीवाल के पास न गुलाम कार्यकर्ताओं की फौज थी ना तो राहुल गांधी की तरह कांग्रेस ने देश बनाया, 21वी सदी में पहुंचाया दुहाई देने वाले तर्क थे। अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस सरकार से लड़ाई लड़ी अब नरेंद्र मोदी से भी लड़ने का हौसला बना लिया लेकिन, अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी से लड़ने के लिए अपना तरीका अपनाया। सही गलत जो भी हो। राहुल गांधी केजरीवाल की नकल कर रहे हैं। यही है दिल की बात। अब सोचिए जब केजरीवाल की ही नकल कर रहे हैं तो केजरीवाल के पीछे ही चलेंगे ना। जब अरविंद केजरीवाल आम आदमी तक पहुंच जाएगा उसी रास्ते से ये भी बाद में पहुंचेंगे। 

तालकटोरा में  अद्भुत दृष्य था। राहुल गांधी दिल की बात बता रहे थे। राहुल गांधी पोडियम से दिल की बात बता रहे हैं। तालकटोरा स्टेडियम में नीचे कांग्रेसी कार्यकर्ता रुदन कर रहे थे। और पुराने कांग्रेसी नेता मंच पर बैठकर इस नौटंकी रुदन पर मंच पर मुस्कुरा रहे हैं। राहुल गांधी दिल से कह रहे थे लोकतंत्र एक व्यक्ति से नहीं चलता। मेरे सामने महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी सबकी तस्वीर एक झटके से घूम गई। राहल गांधी के दिल की बात सुनकर मेरे दिल ने सवाल किया कि क्या ये सारे कांग्रेसी नेता लोकतंत्र विरोधी थे। लोकतंत्र के हत्यारे थे। ये सारे नेता एक व्यक्ति थे जिनके पीछे देश खड़ा था।

मैं इससे उबर पाता कि फिर चीखती से मेरे काम में आ गई राहुल गांधी के दिल की बात। 12 सिलिंडर निकले राहुल गांधी के दिल से। मेरे मन में सवाल आया कि काश इस समय मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शक्ल देख पाता। मनमोहन जी बोलते कम है। खुले में रो भी नहीं सकते। उनके अर्थशास्त्री सिद्धांत 10 साल में कब्र में चले गए। 2004 का सुधारवादी प्रधानमंत्री आज तालकटोरा में 2014 की शुरुआत में अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों की बलि एक युवराज की ताजपोशी की वजह से चढ़ते हुए देख रहा था। राहुल गांधी का दिल दरिया हुआ जा रहा था और सामने भावनाओं का समंदर बह रहा था। मुझे तो लगा कि वो रोने भी वाले हैं लेकिन, शायद जो 500 करोड़ वाली एजेंसी थी उसने रुलाने के लिए रकम नहीं ली थी। लेकिन, इस सबके बीच मंच पर किलकारी मारती सोनिया गांधी को देखकर लगा मां ... मां ही होती है। राहुल जब दिल से पूरे उत्साह से भाषण दे रहे थे तो 12 सिलिंडर वाली लाइन पर लगा कि सोनिया अब उछलकर ताली बजा देंगी।
राहुल गांधी दिल से लगातार बोल रहे थे। दिल से वो बोले कि लोकतंत्र, संसदीय परंपरा के लिए वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बने। जो भी कांग्रेसी सांसद चुनकर आएंगे वो उन्हें चुनेंगे। इससे एक बार तो मेरे दिल को ऐसा लगा कि दूसरे दलों के लोग प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें उनके सांसद नहीं कोई और चुनता है। हां, ये बात अलग है कि कांग्रेस में सांसद बनेंगे ही तभी जब राहुल गांधी दिल से चाहेंगे और दिल हो या न हो कांग्रेसी सांसद बन गए तो उन्हें राहुल गांधी को ही चुनना पड़ेगा। संविधान ने भी सांस रोककर राहुल के दिल की ये सारी बातें सुनी। कांग्रेसी सांसद बनेंगे तो टिकट राहुल गांधी तय करेंगे, सांसद बन जाएंगे तो उन्हें राहुल गांधी को ही प्रधानमंत्री चुनना है लेकिन, राहुल गांधी पहले दावेदार नहीं बनेंगे। संविधान का सम्मान बचा रहे इसके लिए चुने कांग्रेसी सांसदों को बाध्यता होगी कि उनके नेता राहुल गांधी ही हों। बाबा साहब भी क्या सोच रहे होंगे।  

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...