Skip to main content

तानाशाही विचारधारा के हैं अरविंद केजरीवाल!


अरविंद केजरीवाल मुझे बहुत लुभाते थे। गलत कह रहा हूं सच बात ये है कि अभी भी बहुत लुभाते हैं। बिना किसी बहस के अरविंद केजरीवाल का खुद में भरोसा गजब है। और ऐसा ही भरोसा हम  जैसे लोगों को भी अरविंद में दिखता है लेकिन, उससे भी ज्यादा भरोसा मुझे इस तर्क में दिखता है कि केजरीवाल कांग्रेस का विकल्प हो सकते हैं। या ये कहें कि दिखता था। लेकिन, अब उससे भी ज्यादा भरोसा इस तर्क में कि कांग्रेस की मदद ये मजबूती से करेंगे। ठंडी की एक रात में प्रदर्शन के दौरान जागने के बाद अरविंद केजरीवाल के ज्ञान चक्षु खुल गए हैं। पता नहीं ये दिव्य ज्ञान बीती रात ही हुआ या उससे पहले से ही है। ये दिव्य ज्ञान ये है कि आधा मीडिया नरेंद्र मोदी के साथ है और आधा राहुल गांधी के साथ। शोले फिल्म में अंग्रेजों के जमाने के जेलर असरानी की वो बात मेरे दिमाग में आ गई कि आधे दाएं जाओ, आधे बाएं जाओ- बाकी मेरे पीछे आओ। वो पिक्चर थी। कॉमेडी थी। लेकिन, अरविंद केजरीवाल तो मुख्यमंत्री हैं और प्रधानमंत्री बनने का सपना भी देखने लगे हैं। वो क्यों कॉमेडी कर रहे हैं। मीडिया के बारे में बार-बार बात होती है और ऐसा नहीं है। सोशल मीडिया पर और निजी बातचीत में अकसर राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के समर्थक भी ये आरोप लगाते रहते हैं कि मीडिया उनके खिलाफ काम कर रहा है। देश की और राज्य की सरकारें भी अकसर ये दबे-छिपे कहती रहती हैं कि मीडिया उनकी सरकार अस्थिर करने में लगा हुआ है। लेकिन, श्रीमान अरविंद केजरीवाल का ये बयान कि आधा मीडिया नरेंद्र मोदी का है और आधा राहुल गांधी का थोड़ा चौकाने वाला है। मेरी जानकारी में तो इस तरह से मीडिया को बांटकर आरोप तो कभी खुद नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी ने भी नहीं लगाया। जबकि, ये किसी से छिपी बात तो है नहीं कि मीडिया खासकर टीवी मीडिया नरेंद्र मोदी की कितनी विरोधी रिपोर्ट पेश करता रहा है। 12 सालों से अगर 2002 जिंदा है तो क्या लगता है कि तीस्ता सीतलवाड़ जैसी एनजीओ कार्यकर्ता या कुछ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मोदी विरोध करने वालों की इतनी ताकत है। दरअसल गुजरात दंगा अगर नरेंद्र मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहा है तो इसके पीछे मीडिया का मूलत: निष्पक्ष स्वभाव ही है। वही मीडिया नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे की क्या जमकर तारीफ करता है। वही टीवी चैनल जो गुजरात दंगों पर गंदे से गंदे विश्लेषण के साथ रिपोर्ट चलाते हैं वही टीवी चैनल विकास के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को महानतम विश्लेषणों से विभूषित करते हैं। मीडिया यही है। क्या कभी नरेंद्र मोदी ने ये कहा कि पूरे देश का मीडिया सिर्फ राहुल गांधी का है।


राहुल गांधी को भी मीडिया ने क्या-क्या नहीं कहा। अपनी ही बहन प्रियंका के सामने हर मौके पर ऐसे साबित किया कि राहुल तो सचमुच गली में खेलने वाला बच्चा है और प्रियंका गांधी राजनीति की चतुर खिलाड़ी। जबकि, सच्चाई क्या ये नहीं है कि इंदिरा गांधी की छवि दिखती है, राहुल, सोनिया की चुनावी प्रबंधक हैं इसके अलावा तीसरी सीट पर कभी प्रियंका जिताऊ फैक्टर नहीं साबित हुई हैं। लेकिन, हर कोशिश के बावजूद मीडिया में राहुल गांधी की कड़ी परीक्षा हर रोज होती रहती है। फिर भी क्या कभी राहुल गांधी ने ये कहा कि सारा मीडिया सिर्फ नरेंद्र मोदी का है। दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने में अरविंद केजरीवाल की जबरदस्त मदद पिछले करीब ढाई सालों से टीवी मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज ने की है। इससे भला कौन इंकार कर सकता है। लेकिन, इसके बावजूद मीडिया को इस तरह से खांचे में बांटकर देखने का साहस कौन राजनेता करता है। कार्यकर्ता और छुटभैये नेता कांग्रेस, बीजेपी या किसी पार्टी के हों मीडिया को अपनी सरकार, नेता के खिलाफ लिखने-बोलने पर गाली देते ही हैं। और ये होगा ही। लेकिन, सीधे-सीधे किसी पार्टी का शीर्ष नेता सारे ही मीडिया को विरोधी बता दे, आरोप लगा दे ऐसा कम ही होता है। किसी एक संपादक, अखबार, किसी एक बहस में किसी एक एंकर पर आरोप लगाना होता रहा है। लेकिन, अरविंद क्रांतिकारी हैं, अराजक हैं, खुद को वो ऐसे ही परिभाषित किया जाना पसंद करते हैं। इसलिए अरविंद ने पूरे मीडिया को आधा-आधा नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के पाले में भेज दिया।

श्रीमान अरविंद केजरीवाल "आआपा" की सफलता में मीडिया का कितना योगदान है ये आपको अच्छे से पता है। नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी के लिए इतना योगदान नहीं दिया। मोदी, राहुल पर भी मीडिया जमकर सवाल उठाता है लेकिन इन दोनों ने भी कभी मीडिया पर आरोप नहीं लगाया। आपके विचार तो अजब उत्पाती हैं कि आप पर सवाल उठाने का हक भी मीडिया से छीन लिया जाए। तानाशाही विचारों के असल प्रवर्तक दिख रहे हैं आप। लेकिन, आपकी तानाशाही "आआपा" में जुड़ने वालों पर चल सकती है मीडिया पर नहीं इसीलिए आपको लगता है कि सारा मीडिया अब आपका विरोधी है। अरविंद केजरीवाल खुद को बुद्धि का भंडार समझते हैं लेकिन, ये क्यों नहीं समझ पाते कि मीडिया मोदी, राहुल का होता तो ठंडी में, बारिश में भीगते, पुलिस की लाठियों के बीच से "आआपा" कार्यकर्ताओं को पिटता क्यों दिखाता? मीडिया मूलत: कितना निष्पक्ष है इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि श्रीमान अरविंद केजरीवाल ने सुबह ही आधा-आधा मीडिया मोदी, राहुल का बता दिया फिर भी पूरा मीडिया रेल भवन पर रहा। अरविंद केजरीवाल गलतबयानी में आप माहिर हैं। ये तो अच्छे से समझते हैं कि मीडिया न मोदी का है न राहुल का। हां "आआपा" का भी नहीं इसीलिए मिर्ची लग रही है। और सबसे आखिर में अगर एकाध टीवी संपादकों के पार्टी में जाने से सारा मीडिया किसी पार्टी का हो जाता तो आशुतोष से बहुत बड़े-बड़े संपादक पहले से कांग्रेस-बीजेपी में हैं। श्रीमान अरविंद केजरीवाल गलतफहमी से बाहर निकलिए। लोग बार-बार ये कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी की विचार धारा क्या है। अब मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं अरविंद तानाशाही विचारधारा के असल वाहक हैं।

Comments

  1. जिस सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें आँखों पर बिठाया वही उनका उपहास करने लगी है। मुद्दा विचारणीय होने के बावजूद आज चर्चा मुद्दे पर कम हो रही है और उनके छूठे दंभ, अनावश्यक आक्रामकता, और पदीय दायित्वों से भटक जाने की अधिक हो रही है। जिन लोगों की छाती पर मूंग दलते हुए उनका काफिला सत्ता के गलियारों तक पहुँचकर कुर्सी पर कब्जा जमा बैठा वे ही इस तमाशे को देखकर जैसे दुबारा जिन्दा हो गये हैं। डॉ. हर्षवर्धन की दमित इच्छा भी मानो अब कुलाँचे मारने लगी है। आम आदमी पार्टी की विरुदावली गाने वाले अब इसका उपसंहार लिखने बैठ गये हैं। यह उन करोड़ों लोगों के लिए निराशा का क्षण है जिन्होंने इस बदलाव की बयार से बहुत उम्मीदें लगा ली थीं। कदाचित्‌ मैं भी उनमें सम्मिलित हूँ।

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रस्तुति को आज की सीमान्त गांधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    ReplyDelete
  3. आआपा से उम्मीद पाले बैठे लोगों की लम्बी फेहरिस्त में अपना नाम भी शुमार था| अब लगता है कि जिस हल्केपन के साथ अराजकतावाद जैसी गुरुतर विचारधारा को डील किया जा रहा है, वह बेहद दुखद है| अरविंद को समझना चाहिए, कि लोकतंत्र में ब्लैक एंड ह्वाईट सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता |

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

किसान राजनीति के बीच सरकार आधुनिक किसान नेता बनाने में जुटी है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी दिल्ली की सीमा पर तीन तरफ़ सिंघु , टिकरी और ग़ाज़ीपुर पर कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन बैठे हुए हैं और फ़िलहाल कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। सरकार और किसानों के नाम आंदोलन कर रहे संगठनों के बीच में वार्ता भी पूरी तरह से ठप पड़ गयी है। किसानों के नाम पर संगठन चला रहे नेताओं ने अब दिल्ली सीमाओं पर स्थाई प्रदर्शन के साथ रणनीति में बदलाव करते हुए देश के अलग - अलग हिस्सों में किसान पंचायत , बंद और प्रदर्शन के ज़रिये सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना शुरू किया है , लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार कृषि क़ानूनों को लेकर ज़्यादा दृढ़ होती जा रही है। चुनावी सभाओं से लेकर अलग - अलग कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को आधुनिक कृषि व्यवस्था से जोड़कर उनकी आमदनी दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को बार - बार दोहरा रहे हैं , लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि आख़िर किसानों को यह बात समझाने में सरकार कैसे कामयाब हो पाएगी , जब

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दम तोड़ेगी यूनियनबाज किसानों की “अराजकता”

भारतीय संविधान निर्माताओं ने जब संविधान बनाया था तो स्पष्ट तौर पर उसमें यह व्यवस्था स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि किसी भी हाल में विधायिका , न्यायापालिका और कार्यपालिका के बीच किसी तरह का टकराव न हो। हालाँकि , इसमें लोकतंत्र की मूल भावना का ख्याल रखते हुए विधायिका और न्यायपालिका को एक दूसरे पर इस नज़रिये से नज़र रखने का बंदोबस्त किया गया कि किसी भी हाल में निरंकुश व्यवस्था न हावी हो जाए , लेकिन सबके मूल में लोकतंत्र को ही सर्वोच्च भावना के साथ स्थापित करना था , इसीलिए कई बार भारतीय लोकतंत्र में इस बात की भी चर्चा होने लगती है कि भारत में अतिलोकतंत्र की वजह से सरकारें निर्णय नहीं ले पाती हैं। पहले नागरिकता क़ानून के विरोध में चले शाहीनबाग और अब कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहे सिंघु - टिकरी - गाजीपुर के आंदोलन को लेकर अतिलोकतंत्र की बहस फिर से छिड़ गई है और इसी अतिलोकतंत्र की बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि क़ानूनों को नि

किसान आंदोलन की आड़ ख़त्म हो चुकी है

  हर्ष वर्धन त्रिपाठी किसानों के हितों के नाम पर चल रहे आंदोलन का पाँचवा महीना चल रहा है। दुनिया में किसी भी आंदोलन के इतने समय तक लगातार चलने के कम उदाहरण हैं। ऐसा भी उदाहरण ध्यान में नहीं आता है कि इतने लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं को घेरकर कोई भी वर्ग बैठा हो। इससे दिखता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के इरादे कितने मज़बूत हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही आंदोलन है , उनके जीवन - मरण के प्रश्न जैसा दिख रहा है , लेकिन प्रश्न यह खड़ा होता रहा है कि आख़िर इतने मज़बूत आंदोलन और आंदोलन करने वालों के साथ देश भर का किसान क्यों खड़ा नहीं हो रहा है। इसकी वजह समझने की कोशिश करते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ध्यान में आते हैं किसान नेताओं ने आंदोलन की शुरुआत ही धमकी से की थी और किसानों को भी धमकाकर ही दिल्ली की सीमाओं तक लाया गया था। यहाँ तक कि गाँवों से लोग आ नहीं रहे थे तो पं