Tuesday, October 30, 2012

चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी होगी


ये बात हमेशा सच साबित होती है कि और एक बार फिर तथ्यों के साथ साबित हो रही है कि किसी भी घटना का बीज कभी न कभी पड़ता है तभी आगे जाकर वो बड़ा पौधा बन जाता है। पार्टी विद् डिफ्रेंस का दावा करती रही भारतीय जनता पार्टी आजकल अजीब स्थिति में है। सबसे ज्यादा ईमानदारी, चरित्र, शुचिता के दावे वाली इस पार्टी की मुश्किल ये हो रही है कि जब देश में लंबे अर्से के बाद आंदोलन का माहौल है और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ताकतवर हो रही है तो, इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं। बड़ी मुश्किल की बात ये है कि ये राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी को शुचिता, चरित्र, त्याग और ईमानदारी की शिक्षा देने वाले मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय होने की वजह से पद पर आसीन हुआ माना जाता है।

जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बागडोर संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले मोहनराव भागवत ने संभाली थी तो, लगा था कि पार्टी नई उर्जा से पुराने आदर्शों को फिर से लौटा पाएगी। पार्टी बुजुर्ग हो चुकी भारत मां की तीन धरोहर अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की तिकड़ी के सहारे आगे बढ़ती नहीं दिख रही थी। अटल बिहारी बाजपेयी बीमार थे, मुरली मनोहर संगठन में अलग-थलग थे क्योंकि, आडवाणी बुजुर्गियत के बावजूद अपनी तैयार की हुई पौध के जरिए पार्टी चला रहे थे। उस समय पहली बार किसी सरसंघचालक ने बीजेपी से जुड़े मुद्दों पर मीडिया में उतने खुले तौर पर अपनी बात रखी थी। बीजेपी को हम निर्देश नहीं देते हैं ये कहने के बावजूद बार-बार मोहन भागवत पार्टी को ये बताते रहे कि बीजेपी अब बुजुर्ग हो चुके आडवाणी के भरोसे नहीं चलने वाली। जिन्ना पर बयान देकर आडवाणी संघ की अच्छी सूची से ऐसे ही बाहर हो चुके थे। ऐसे में उम्र और ऊर्जा का हवाला देकर उन्हें अभिभावक की भूमिका में लाकर संघ के निर्देशों के आधार पर काम करने वाले अध्यक्ष की तलाश संघ की महाराष्ट्र के रोड, फ्लाईओवरमैन टाइप कहे जाने वाले नितिन गडकरी पर जाकर खत्म हुई। शुरू में लगा संघ का काम पूरा हो गया है। गडकरी की एक कमी उनकी काया की थी तो, वो गडकरी ने ऑपरेशन के जरिए ठीक कराने की कोशिश भी कर ली जो, काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन, कारोबारी गडकरी पार्टी को भी कारोबार की तरह चलाने लगे जिसके दुष्परिणाम अब साफ-साफ दिखने लगे हैं।

गडकरी के पहले भी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते कैमरे पर देश ने देखा लेकिन, पार्टी के खिलाफ कोई माहौल नहीं बना। बंगारू लक्ष्मण की एक लाख रुपए की रिश्वत की रकम और बंगारू को पार्टी ने अध्यक्ष पद से हटाकर उसे काफी हद तक मुक्ति पा ली। और, बंगारू सिर्फ नागपुर के आशीर्वाद से अध्यक्ष पद पर नहीं थे। लेकिन, इस बार मामला जरा अलग है। नितिन गडकरी सिर्फ नागपुर के ही आशीर्वाद से अध्यक्ष हैं इसमें अब जरा सा भी बहस की गुंजाइश नहीं दिखती। और, इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि बीजेपी में उसके मूल संगठन संघ के आशीर्वाद के बिना किसी का खड़े, लड़े रह पाना संभव भी नहीं है और शायद होना भी नहीं चाहिए। अटल-आडवाणी की ताकत भी संघ ही था। और, ये ताकतवर आशीर्वाद बना रहे इसके लिए नितिन गडकरी ने हरसंभव कोशिश भी की। दिल्ली में पार्टी कार्यालय नए सिरे से संवर रहा है। आडवाणी की दिल्ली दरबार की मंडली को काफी हद तक किनारे कर दिया। जो, शायद जरूरी भी हो गया था। लेकिन, इस मंडली के मुख्य प्रभावी भूमिका से हटने के बाद जो, नई ऊर्जा, कार्यकर्ताओं को मुख्य प्रभावी भूमिका में आना था वो, भी नहीं आ पाए। नितिन गडकरी ने संघ के प्रचारक और मोदी विरोध की वजह से हाशिए पर पड़े अच्छे संगठनकर्ता संजय जोशी को मुख्य भूमिका में लाकर संघ को और खुश कर दिया। उत्तर प्रदेश में उमा भारती की वापसी और बड़ी-बड़ी बातों से ये माहौल पैदा कर दिया कि अब यूपी में संघ/बीजेपी कैडर वापस आ रहा है। उमा की वापसी तो, कराई लेकिन, उमा को अधिकार नहीं दिए। गडकरी खुश थे कि उत्तर प्रदेश के सारे बड़े नेता अपनी सीटों के चुनाव में फंस गए। और, हुआ भी यही इन सारे नेताओं ने येनकेन बस अपनी सीट जीतने तक ही अपने कर्तव्य की इतश्री समझ ली। और, नितिन गडकरी ने इन बातों के बीच यूपी में चुनाव जीतने की रणनीति ठेकेदारों जैसी बना ली। यूपी को कई हिस्सों में बांटा और छोटे-छोटे ठेके सीट जिताने का भरोसा लेकर बांट दिए। फिर क्या अपराधी, क्या भ्रष्टाचारी सब ठेका हासिल कर चुके थे। यहीं आकर समझ में आ गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नितिन गडकरी पर लगाया दांव सही नहीं है। उत्तर प्रदेश के नतीजों ने इस पर मुहर लगा दी। भारतीय जनता पार्टी को मतदाताओं ने लड़ाई में कहीं देखा ही नहीं। अलग होने का दावा तो, पहले से ही भोथरा हो चुका था। सीटों का अर्धशतक तक नहीं लग पाया।

यही उत्तर प्रदेश था जहां से पार्टी केंद्र की राजनीति साधने का भरोसा पा चुकी थी। यही उत्तर प्रदेश था जहां से अटल बिहारी बाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी केंद्रीय राजनीति में कद्दावर थे। इसी उत्तर प्रदेश से बीजेपी के उत्थान के बीज पड़े थे। और, इसी उत्तर प्रदेश की एक घटना याद करने पर मुझे आज की बीजेपी की समस्या की जड़ समझ में आ जाती है। मुझे कुछ लोगों ने नब्बे के दशक की ये घटना बताई थी। ये कितनी सच है पता नहीं लेकिन, इसके बहाने इस मूल समस्या की समझ भले आ जाती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर प्रमोद महाजन आए हुए थे। प्रमोद महाजन उस समय भारतीय जनता पार्टी के तेजस्वी नेताओं में थे। जाहिर है ऐसे तेजस्वी नेता से जल्द से जल्द हर कोई संबंध बना लेना चाहेगा। बीजेपी की एक महिला पदाधिकारी ने प्रमोद महाजन से अपना परिचय दिया। उन्होंने पूछा आप क्या करती हैं। महिला पदाधिकारी ने कहा- पार्टी में इस दायित्व पर हूं। प्रमोद महाजन ने फिर से पूछा- वही जवाब। तो, उन्होंने पूछा राजनीति के अलावा क्या कारोबार करती हैं। उन्होंने कहा फुलटाइम पार्टी की सेवा करती हूं। तो, प्रमोद महाजन ने कहा- अगर खाने-कमाने का अलग से इंतजाम नहीं है तो, आप पार्टी से ही खाएंगी। उस समय प्रमोद महाजन का ये उद्बोधन असर कर गया था। लगता था कि इसीलिए ये नेता इतना ऊपर है। लेकिन, ये सच है कि प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने एक ऐसी पौध तैयार की जिसमें संसाधन के जरिए जनता को साधने की रणनीति तैयार की गई। और, संसाधन के जरिए जनता को साधने की ये रणनीति तो, बीजेपी को शाइन नहीं दे पाई है ये सबने देखा है।

प्रमोद महाजन दुनिया में नहीं हैं इसलिए उनकी आलोचना करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन, प्रमोद महाजन जैसे नेता तभी तेजस्वी थे जब मुख्य भूमिका में घोर राजनीतिक तपस्या वाले स्वयंसेवक थे। अगर कारोबारी स्वयंसेवक सत्ता के केंद्र में आए तो, समाज सुधारने का संकट खड़ा हो जाएगा। बीजेपी में दरअसल ज्यादातर लोगों को करीने से सजे प्रमोद महाजन और उनकी फंड के जरिए पार्टी चलाने की कला इतनी पसंद आई कि वो, प्रमोद महाजन के दूसरे राजनीतिक संघर्षों, कार्यों को भूल गए। हर कोई प्रमोद महाजन बनने चला और प्रमोद महाजन नीचे से नीचे वाला संस्करण तैयार होता रहा। राजनीतिक प्रमोद महाजन तो, कोई तैयार ही नहीं हो पाया। और, अटल-आडवाणी-जोशी तो, भला कहां से तैयार हो पाते। जाहिर है ऐसे में पार्टी तो, बहुत पीछे छूट जाएगी।

आडवाणी जी बुजुर्ग हो गए हैं लेकिन, सत्ता मोह नहीं छूट रहा। आडवाणी जी खुद प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी डी 4 मंडली के आगे अच्छे कार्यकर्ताओं की जायज मांग, इच्छा को भी पीछे कर देते हैं। आडवाणी जी बहुत कुछ किए लेकिन, अब पार्टी का नुकसान कर रहे हैं। यही सब तो, वजह थी न जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नितिन गडकरी को राज्य से उठाकर राष्ट्रीय नेता बना दिया था। तो, आखिर जब पार्टी ही गलत राजनीतिक रास्ते पर चल पड़ी है तो, किसी ऐसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक को संघ क्यों नहीं बढ़ा पा रहा। जो, पार्टी ठीक कर सके। जरूरी ये है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नए सिरे से चरित्र निर्माण की शाखा लगाना शुरू करे। 2012-14 जैसे सालों की समयसीमा रखकर लक्ष्य न बनाए।

Tuesday, October 23, 2012

एक विचार

अटल-आडवाणी-जोशी दरअसल संघ के स्वयंसेवक पहले थे। बीजेपी नेता बाद में। शुरुआती विरोध के बाद सर्वस्वीकार्य हो गए। क्या संघ अपने किसी ऐसे स्वयंसेवक को प्रचारक के तौर पर बीजेपी में नहीं निकाल सकता जिसने दरअसल त्याग का जीवन जिया हो। बेदाग हो और कम से कम 2 पीढ़ियों से जिसका ठीक संवाद हो और आगे की एक पीढ़ी से तरीके से संवाद करने लायक हो। रकम से राजनीति होती है इसे ध्वस्त करने वाला हो। ये स्थापित कर सके कि राजनीति ठीक रही तो, रकम तो, आती ही रहती है।

Sunday, October 14, 2012

ये है किराया या घर की कीमत न घटने का गणित

18000 रुपए महीने की नौकरी है और 18000 रुपए का 3 बेडरूम फ्लैट लेकर रहता हूं। सवाल- अरे, कैसे? जवाब- सर, नोएडा में 3 दोस्त मिलकर रहते हैं। बैचलर हैं ना। कोई लाइबिलिटी नहीं है। ये एक हैं जो, रहेंगे और दिल्ली-एनसीआर में फ्लैट-घर का किराया बढ़ाते रहेंगे।


यही नहीं हैं। एक और हैं सैनी जी। सेक्टर 55 में जनरल स्टोर, पानी की दुकान चलाते हैं। बताते हैं कि वो, क्लास 1 राजपत्रित अधिकारी रहे हैं। तब सस्ते में दुकान खरीद ली थी। अब 50 लाख से कम की क्या होगी एक बेटा विदेश में बसने के आखिरी पायदान पर है, दूसरा यहीं नोएडा में कारोबार कर रहा है। घर बैठे बोर हो जाते हैं इसलिए दुकान पर आकर बैठ जाते हैं। एक कोठी 56 में, एक कोठी, वही सस्ते दाम वाली, सेक्टर 40 या 41 में है। और, फिर निवेश करना था तो, एक फ्लैट क्रॉसिंग रिपब्लिक में भी ले लिया। अब बताइए सैनी जी और 18000 रुपए महीने कमाने वाले ये बैचलर रहेंगे तो, कोई भी आफत आकर भला घरों को सस्ता कैसे कर पाएगी। और, ये हुआ तो, 60-70% मुनाफा बनाने वाले बिल्डर 6 महीने पुराने मुनाफे पर रोते हुए घर की कीमत बढ़ाए रहेंगे। अब बताओ कोई है सस्ता घर के इंतजार में।

Tuesday, September 25, 2012

विरोध FDI का नहीं सरकार शून्यता का करिए

गजब का भ्रमित भारत है। किसी को कुछ पता नहीं। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा। एक FDI किसी को सभी रोगों का इलाज लग रहा है तो, वही FDI किसी को सभी नई बीमारियों की वजह बन रहा है। सरकार में रहते ये FDI सब अच्छा, सरकार से बाहर जाते ही यही FDI सबसे खराब। FDI के विरोध में सब वॉलमार्ट को अभी से गरिया रहे हैं। जबकि, सच्चाई ये है कि उससे भी गंभीर समस्या ये है कि यही काम बिग बाजार भी पिछले काफी समय से कर रहा है। वॉलमार्ट अगर सही-सही आ गया तो, भी कम से कम डेढ़ साल लग जाएगा। और, मेरा खुद का शोध है कि 2004 में जब मुझे मुंबई में रहने के दौरान बिग बाजार की आदत लगी थी और अब- जब बिल देखता हूं तो, साफ दिखता है कि बेवजह का ज्यादा, कभी-कभी बिना जरूरत का सामान ले लेता हूं और बचत शून्य है। तो, ये दिक्कत वॉलमार्ट के आने भर से नहीं होगी। बिग बाजार भी यही कर रहा है। मूल समस्या FDI आने की नहीं है, मूल समस्या है कि ये सरकार शून्य देश होता जा रहा है। किसी पर कोई नियंत्रण नहीं है। सब मुक्त है।

Saturday, September 22, 2012

सरकार! नंगा होने के अलावा कोई विकल्प बचा है क्या?

 
आर्थिक विकास पर प्रधानमंत्री के भाषण के समय विरोध प्रदर्शन
संतरी लूटे तो, जाए जेल-प्रधानमंत्री लूटे तो, कानून फेल
 
ये लिखा है प्रधानमंत्री के खिलाफ शर्ट उतारकर विरोध प्रदर्शन करने वाले वकील संतोष कुमार सुमन के फेसबुक प्रोफाइल पर।
 
( इस विरोध प्रदर्शन के तुरंत बाद ये लाइनें लिखी हैं। दिल से निकली हैं इसलिए इसे लिखने भर का समय लगा। दिमाग नहीं लगाना पड़ा)
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों इराकियों के मरने पर भी इराकी कुछ कर नहीं पाते हैं
 
तो, दुनिया के सर्वशक्तिमान अमेरिका के राष्ट्रपति पर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों सिखों की जान की कीमत किसी नेता की मौत के बदले में जायज हो जाती है
 
जब सालों के बाद भी देश की न्याय प्रक्रिया गुनहगारों को खुला छोड़े रहती है
तो, एक सिख को गृहमंत्री से डर लगना बंद हो जाता है
 
फिर जूता चल जाता है
 
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब सरकारी प्रवक्ता कुछ भी बोलकर चला जाता है
 
जब उसकी बात को जायज ठहराना ही नियति बनने लगती है
 
तो, फिर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब देश के प्रधानमंत्री बताने लगते हैं कि पेड़ों पर पैसे नहीं उगते
 
जब प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार, महंगाई को जायज ठहराने लगते हैं
जब प्रधानमंत्री देश की हर समस्या का इलाज विदेशी नुस्खे से करने को जायज ठहराने लगते हैं
जब न बोलने वाले प्रधानमंत्री ऐसा बोलते हैं कि आम आदमी जख्म पर मिर्ची जैसा लगता है
तो, जूता नहीं चलता, आम आदमी नंगा हो जाता है
देश का हाल तो, प्रधानमंत्री जानें, बता ही चुके हैं कि सोना गिरनी रखने की नौबत आ चुकी है
लेकिन, अगर ऐसे ही देश सुधारते रहे
तो, आम आदमी के तन बदन पर कपड़ा भी नहीं बचने वाला
लोकतंत्र में क्या आम आदमी अपना असल हाल भी देश के मुखिया के सामने बता नहीं सकता
फिर बताइए विरोध का और तरीका क्या होगा

Tuesday, August 21, 2012

बेशर्म होता संसदीय लोकतंत्र

संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। हुआ भी तो, सामने कभी नहीं आया। संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर राजीव शुक्ला ने उपसभापति के कान में जाकर बोला। शोर बहुत होगा। पूरे दिन के लिए कार्यवाही adjourn (स्थगित) कर देना।

लेकिन, एक बात जो, इससे भी ज्यादा चुभ रही है कि मीडिया में ये खबरें आईं। एकाध चैनलों को छोड़कर किसी ने इसे बड़ा सवाल नहीं बनाया। इस तरह से मीडिया से जरूरी खबरें गायब होने पर सवाल तो, मन में उठता ही है कि क्या ये सरकार के दबाव में खबर गायब हुई।
अब कल सुबह के अखबारों का इंतजार है। साथ ही कल विपक्ष के एतराज के तरीके का भी।

Monday, August 20, 2012

भोपाल चौपाल

विस्फोटक संजय तिवारी से बात हो रही थी तो, उन्होंने कहाकि भोपाल चलेंगे क्या। हमने कहा बताइए, कुछ खास हो तो, जरूर चलेंगे। उन्होंने कहा- नए मीडिया पर कुछ चर्चा होनी है। मैंने कहा अच्छा है, जरूर चलेंगे। भोपाल शहर इतना पसंद आता है कि वहां से आया निमंत्रण लपकने में देर क्या करना। उसके अनिल सौमित्र का फोन आया। आभासी दुनिया में पहले से परिचित थे। सोचा चलो अच्छा है भौतिक परिचय/मिलन भी हो जाएगा। अनिल जी ने मेल पर सारा विवरण भेजा। शानदार चर्चा की चुनौती वाली मेल आई थी।
चर्चा के मुख्य विषय
न्यू मीडिया : समस्याएं, अवसर और चुनौतियांविज्ञान के लोकव्यापीकरण में न्यू मीडिया की भूमिकाइसके अंतर्गत निम्न बिन्दु हो सकते हैं, इसे एक मित्र ने सुझाया है- 1. क्या अब नया मीडिया ही मुख्यधारा है? मीडिया बनाम न्यू मीडिया, 2. न्यू मीडिया पहुच और प्रभाव, 3. राजीनति के झरोखे से वेब मीडिया. 4. जय किसान जय विज्ञान. 5. जय किसान, जय विज्ञान. 6. भाषाई शिष्टता बनाम वेब, 6. अंतर्राष्ट्रीय वेब जगत में हिन्दी., 7. ब्लॉग बनाम माइक्रो ब्लोगिंग साईट, 8. जनांदोलन और वेब, 9. मिस्र, लीबिया और भारत?, 10. वेब जगत का आर्थिक मॉडल., 11. सरकारी अंकुश : ज़रूरत या सनक, 12. स्व नियमन की ज़रूरत, 13. अभिव्यक्ति की आज़ादी, नेट के साथ, 14. कैसी हो वेब की आचार संहिता. 15. वेब : भूगोल अब इतिहास की वस्तु, 16. फॉण्ट की समस्या और यूनिकोड समाधान, 17. सर्न, गौड पार्टिकल और WWW, 18. वैज्ञानिक संचार ज़रूरतें, 19.संस्कृति और संवाद वाया वेब, 20. कोपीराईट का सवाल और न्यू मीडिया 21. इन्टरनेट गांव तक : खयाली पुलाव या सच्चाई, 22. राष्ट्रीय चुनौतियों में नेट की भूमिका, 23 आतंक के विरुद्ध लड़ाई में चुनौती या सहायक वेब? 24. क्या नेट दुधारी तलवार है? 25. राष्ट्रीय अखंडता और वेब सम्प्रेषण. 26. राज कि रहहि वेब बिनु जाने  27. साम्प्रदायिक सद्भाव में वेब : साधक या बाधक.
इस मेल के बाद उत्साह और बढ़ गया। लेकिन, उसी समय ये अंदेशा था कि एक दिन की चौपाल में इतने विषयों पर चर्चा कैसे हो पाएगी। फिर भी नए मीडिया पर चर्चा, भोपाल, अनिल सौमित्र और नए लोगों से मिलने की इच्छा ने ऐसा जोर मारा कि जाना तय कर लिया। शनिवार रात 9 बजे की भोपाल एक्सप्रेस से पक्का टिकट था। उसी ट्रेन से पुराने साथी भुवन भाष्कर (डीएनई, इकोनॉमिक टाइम्स) भी जाने वाले थे।
ये आगरा से लौटते समय की तस्वीर है
रात 9 की ट्रेन थी तो, मैंने सोचा चलो यमुना एक्सप्रेस वे पर सपरिवार आनंद ले लेते हैं। और, ताजमहल भी देख लेते हैं। सुबह साढ़े दस बजे दिल्ली में गाजीपुर वाले पेट्रोल पंप से टैंक फुल करा लिया। और, निकल पड़े। 11 बजे यमुना एक्सप्रेस वे पर प्रवेश और 12.30 पर आगरा नेशनल हाइवे पर। लगा ये शानदार है। 2 बजे तक भी ताज देखकर वापसी कर लेंगे तो, 5 बजे तक घर पहुंच जाएंगे।





आगरा नेशनल हाईवे से ताजमहल तक का जाम
लेकिन, यहीं गणित गड़बड़ा गया। तूफानी चाल वाले एक्सप्रेस वे से आती हजारों गाड़ियां आगरा नेशनल हाईवे पर पहुंचते ही कछुए की चाल में चलने लगीं। और, सिर्फ 14 किलोमीटर की ताज की दूरी तय करने में तीन घंटे से ज्यादा का समय लग गया। पीछे-पीछे भुवन भी आ रहे थे। आखिरकार भोपाल जाने की बलवती इच्छा लिए पत्नी को अगली बार ताज के अंदर ले जाने का वादा करके बाहर से कुछ तस्वीरें लीं और वापस गाड़ी मोड़ दी। फिर से ताज से यमुना एक्सप्रेस वे के मुहाने तक पहुंचने में वही पीड़ा झेली। शाम 6.20 पर यमुना एक्सप्रेस वे पर प्रवेश हुआ और बहुत कम संभावना रह गई थी कि भोपाल जाना हो पाएगा।



लेकिन, इच्छा बलवती थी तो, अपने जीवन की अधिकतम रफ्तार पर एक्सप्रेस वे पर अपनी कार चलाई। साथ ही ये भी तय किया कि दोबारा इतनी तेज गाड़ी कभी नहीं चलाउंगा। खैर, 8.25 पर वसुंधरा अपने घर पहुंचा। रास्ते में ही टैक्सी के लिए फोन कर दिया था। जल्दी से दो जोड़े कपड़े डाले और निकल लिया। टैक्सी वाले ने भी एक्सप्रेस वे वाली तूफानी चाल न सही लेकिन, 7 मिनट पहले निजामुद्दीन पहुंचा दिया और 8.57 पर मैं अपनी सीट पर था। अनिल जी को आगरा में आशंकित करने के बाद ट्रेन में बैठने के बाद पक्का कर दिया कि सुबह मुलाकात होती है।



भोपाल चौपाल में यहीं रहना हुआ
दिल्ली के सड़ियल मौसम से भोपाल की खुशनुमा सुबह में पहुंचकर मजा आ गया। अनिल जी स्टेशन पर हल्की फुहारों के साथ स्वागत के लिए तैयार थे। शहर से थोड़ा हटकर कार्यक्रम स्थल बेहद शानदार था। संजय बेंगाणी, सुरेश चिपलूणकर, रवि शंकर रतलामी, बीएस पाबला, संजीत त्रिपाठी (कुछ नाम छूट रहे हैं) जैसे पुराने ब्लॉगरों के साथ मिलकर लगा कि चौपाल बढ़िया ही रहेगी। अनिल पांडेय से भी लंबे अर्से के बाद मुलाकात हुई। अनुराग अन्वेषी दिल्ली से साथ आए थे लेकिन, उनका साथ मिला भोपाल पहुंचकर। बढ़िया व्यक्ति से संपर्क हुआ। और, 4 साल से ज्यादा समय मुंबई रहने के बाद भी दैनिक सामना के संपादक प्रेम शुक्ला का सिर्फ नाम ही सुनता रहा और विस्फोट पर उनका लिखना पढ़ता रहा। भोपाल चौपाल ने प्रेम जी के व्यक्तित्व से परिचय कराया, मस्त रहा।
सबसे बड़ी बात इस चौपाल की ये थी कि नए मीडिया के मूल तत्व तकनीक से वास्ता रखने वाले मध्य प्रदेश सरकार के विज्ञान और प्रोद्योगिक विभाग ने इसे प्रायोजित किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता रहे राम माधव ने शानदार शुरुआत की। एक बात जो, नए मीडिया के साथ जुड़े ज्यादातर लोग मानते हैं उसे उन्होंने भी पुष्ट किया। राम माधव जी ने कहा कि नया मीडिया, मीडिया का लोकतंत्रीकरण है और इसे किसी भी नियमावली में बांधना गलत होगा। चौपाल का पहला निष्कर्ष निकल चुका था। लेकिन, इसके बाद चौपाल की गाड़ी पटरी से उतर गई। अनिल जी की मेल में आए सारे विषय धरे के धरे रह गए। के जी सुरेश के लंबे भाषण के बाद सिर्फ हल्ला-गुल्ला रह गया। और, उसके बाद के सत्र में भी विषय पर सलीके से बात नहीं ही हो पाई। वेब जगत के आर्थिक मॉडल का कोई ठोस तरीका सूझे इस पर भी कोई मॉडल सामने नहीं आ पाया। जो, बातें चर्चा में आने से छूटीं उस पर अनिल सौमित्र जी से बात हुई है कि वो, उसे आगे बढ़ाएंगे। और, मुझे पूरा भरोसा है कि वो, निश्चित तौर पर एक बार फिर से चौपाल कराकर इस कमी को जरूर पूरा करेंगे। कम से कम विषय, सत्र और सत्र में कौन-कौन विषय रखेगा ये पहले से तय रहेगा। एक सत्र मंचासीन विद्वान अतिथियों के लिए रख सकते हैं। और, एक बात कि अनिल सौमित्र को वादा करना होगा कि इस चौपाल जैसा ही शानदार आतिथ्य होगा और, जगह भोपाल ही होगी।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...