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Thursday, July 13, 2017

जीएसटी से जरूरी सामान सस्ते होंगे

जीएसटी को लेकर सबसे बड़ा खतरा यही बताया जा रहा था कि इससे महंगाई बढ़ेगी। इस महंगाई के बढ़ने की डर दिखाकर उन कारोबारियों ने भी जमकर प्री जीएसटी सेल लगा रखी थी, जो जीएसटी को कारोबारियों के लिए मुश्किल बताकर इसके विरोध में सांकेतिक दुकान भी बन्द कर चुके थे। कार कम्पनियों ने भी ग्राहकों को डराकर प्री जीएसटी सेल में काफी गाड़ियां बेच लीं। लेकिन, अब समझ में आ रहा है कि प्री जीएसटी सेल में खरीद करने वाले ज्यादातर लोग घाटे में रहे होंगे। क्योंकि, ज्यादातर जरूरी सामान जीएसटी के बाद सस्ते हो गए हैं। फोन और कार भी आज के मध्यवर्ग के लिए जरूरी सामानों में ही आता है। इसके अलावा भी जरूरी सामान कैसे सस्ते हुए हैं, इसका अन्दाजा 30 जून की रात 12 बजे से शुरू हुई बिग बाजार जीएसटी सेल से ही पता चल गया। इलाहाबाद जैसे देर शाम उनींदे हो जाने वाले शहर से सारी रात जागने वाली मुम्बई तक में लोग बिग बाजार की जीएसटी सेल में कतार में लगे थे। 1 जुलाई की सुबह वही कार कम्पनियां जो एक दिन पहले तक जीएसटी का डर दिखाकर कारें बेच लेना चाह रही थीं, अब बता रही थीं कि जीएसटी के बाद उनकी कम्पनी की कार कितनी सस्ती हुई है। आईफोन भी सस्ता हो गया।
एक भ्रम ये भी था कि ज्यादा महंगी कारों को जीएसटी सस्ता करेगा लेकिन, छोटी और मध्यवर्ग की पहुंच वाली कारें सस्ती नहीं होंगी। ये भ्रम भी टूटा है। हाइब्रिड कारों को छोड़कर सभी कारें सस्ती हुई हैं। हाइब्रिड कार खरीदने वाले जीएसटी के बाद घाटे में हैं। उदाहरण के लिए टोयोटा की हाइब्रिड कैमरी की जीएसटी के पहले दिल्ली में कीमत 31.98 लाख थी जो, जीएसटी के बाद करीब 17 प्रतिशत ज्यादा हो गई है। अब ये कार दिल्ली में 37.23 लाख की मिलेगी। लेकिन, हाइब्रिड कार खरीदने वाले देश में बहुत कम लोग हैं। टोयोटटा कम्पनी की ही एसयूवी फॉर्च्यूनर करीब 9 प्रतिशत सस्ती हो गई है। दिल्ली में जो टोयोटा फॉर्च्यूनर 31.86 लाख की थी, अब वही गाड़ी 29.18 लाख में ही मिल जाएगी। इस उदाहरण से ये भ्रम भी हो सकता है कि सिर्फ बड़ी गाड़ियां ही सस्ती हुई हैं। लेकिन, ऐसा नहीं है। मारुति की डिजायर कार करीब 2000 रुपये सस्ती हुई है और मारुति की छोटी कार ऑल्टो भी 1000 रुपये सस्ती हुई है। मारुति की कारें अधिकतम 3 प्रतिशत तक सस्ती हुई हैं। ह्युंदई और निसान ने भी अपना कारों की कीमत घटा दी है। फोर्ड ने करीब 4.5 प्रतिशत दाम घटाए हैं और रेनो ने तो 7 प्रतिशत तक अपनी गाड़ियां सस्ती कर दी है। होन्डा की भी कारें सस्ती हो गई है। कुल मिलाकर पूरे ऑटो सेक्टर के लिए और कार खरीदने वाले ग्राहकों के लिए जीएसटी खुशखबरी लेकर आया है।
फोन खरीदने वालों के लिए भी जीएसटी अच्छी खबर लेकर आया है। आईफोन खरीदने वालों के लिए बेहद अच्छी खबर है। क्योंकि, एप्पल ने आईफोन के साथ अपने लैपटॉप और टैब की कीमत भी काफी कम कर दी है। दूसरी मोबाइल कम्पनियों ने भी 5-10 प्रतिशत तक की कटौती की है।
रियल एस्टेट को अभी इससे बाहर रखा गया है। हालांकि, बहुत से बिल्डर जीएसटी के नाम पर ग्राहकों से ज्यादा वसूलने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि, इस मामले में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों से ज्यादा रकम वसूलने वाले बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। अभी जो घर बन रहे हैं, उसमें ज्यादा टैक्स लगेगा। क्योंकि, जीएसटी लागू होने के बाद करीब 1 प्रतिशत टैक्स बढ़ गया है। लेकिन, बिल्डर इसका इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल कर सकते हैं। कुल मिलाकर जीएसटी लागू होने के बाद बिल्डर के घर बनाने की लागत कम होगी। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या बिल्डर इनपुट टैक्स क्रेडिट से मिला फायदा ग्राहक को देते हैं या नहीं।
घर, गाड़ी फोन की कीमतों पर जीएसटी के बाद क्या असर पड़ रहा है, ये समझ में आया। लेकिन, सबसे जरूरी ये समझना है कि रोजाना की जरूरतों का सामान सस्ता हो रहा है या महंगा। इसका जवाब खोजने के लिए 2 जरूरी तथ्य हैं। पहला राजस्व सचिव हंसमुख अधिया के मुताबिक, 81 प्रतिशत सामान पर 18 प्रतिशत या उससे कम टैक्स लगेगा। अभी तक ऐसे ज्यादातर सामानों पर 19 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स लगता था। दूसरा सब्जी, दूध, अंडा, आटा और ऐसे 149 श्रेणी के सामानों पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। 149 श्रेणी में आने वाले सारे सामानों को जीएसटी में शून्य कर के दायरे में रखा गया है। फल, सब्जी, अनाज सब इसी श्रेणी में आते हैं। इससे किचन के बजट पर बुरा असर पड़ने वाली आशंका लगभग खत्म हो गई है। चाय की पत्ती, खाने का तेल, कपड़ा और बच्चों के उपयोग के सामान पर 5 प्रतिशत टैक्स रखा गया है। घी, मक्खन, बादाम और फ्रूट जूस पर जीएसटी में 12 प्रतिशत कर लगेगा। जबकि, हेयर ऑयल, टूथपेस्ट, साबुन, आइसक्रीम और प्रिन्टर पर 18 प्रतिशत कर लग रहा है।

जीएसटी को लेकर व्यापारियों की तरफ से विरोध की खबरें आ रही हैं। लेकिन, जीएसटी को लेकर सरकार जिस तरह से तैयार दिख रही है और जितनी पारदर्शिता से सभी सामानों पर लगने वाले जीएसटी के बारे में हर किसी को बता दिया जा रहा है, ऐसा भारत में पहले कभी नहीं हुआ। हां, इतना जरूर है कि भारत में व्यापारियों को अब हर खरीद-बिक्री को पारदर्शी रखना होगा। उस पर कर चुकाना होगा। लम्बे समय से भारत के व्यापारियों को इस तरह से पारदर्शी तरीके से काम करने की आदत नहीं रही है और इसीलिए व्यापारी पहली नजर में इसका विरोध करते दिखते हैं। कुछ जानकार इसे भारतीय जनता पार्टी के सबसे मजबूत आधार मतदाता वर्ग यानी व्यापारी के नाराज होने के तौर पर भी देख रहे हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने जितने भी फैसले लिए हैं, वो पहली नजर में लोगों के खिलाफ दिखते हैं। लेकिन, ज्यादातर मामलों में अन्त में लोगों की बेहतरी ही हुई है। और मैं निजी तौर पर मानता हूं कि जीएसटी के मामले में भी ऐसा ही होगा। क्योंकि, जब व्यापारी पर कर चुराकर मुनाफा बढ़ाने के बजाय कर चुकाकर मुनाफा बढ़ाने का आसान रास्ता होगा, तो वो भला कठिन और अपमानजनक रास्ता क्यों चुनेगा। कुल मिलाकर जीएसटी आजाद भारत का सबसे बड़ा सुधार साबित होने जा रहा है। और इसके परिणाम भी सभी के लिए बेहतर होंगे। ग्राहक, व्यापारी, टैक्स विभाग से लेकर देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीएसटी अच्छे दिन लाने वाला दिख रहा है। हर बार प्रधानमंत्री के फैसलों को लेकर विपक्षी इस भरोसे में रहते हैं कि इससे जनता मोदी के खिलाफ होगी लेकिन, हर बार मोदी अपने फैसलों से जनता का भरोसा और ज्यादा जीत लेते हैं। जीएसटी भी ऐसा ही एक फैसला साबित होता दिख रहा है। 
(ये लेख SPMRF के eJournal में छपा है। )

Thursday, April 06, 2017

सेंसेक्स 30000 पहुंचा, रफ्तार की वजहें भी जान लीजिए

बांबे स्टॉक एक्सचेंज की रामनवमी शुभकामना
शेयर बाजार में जश्न का माहौल है। माहौल कुछ वैसा ही है, जैसा नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीदों से था। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 3 साल होने जा रहे हैं। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि शेयर बाजार में अच्छी तेजी देखने को मिल रही है। Sensex सेंसेक्स बुधवार को कारोबार में 30000 के पार चला गया। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे भी इसकी एक बड़ी वजह है। लेकिन, दूसरी कई वजहें हैं, जिस पर आपका ध्यान नहीं गया होगा।
1 जुलाई से लागू हो जाएगा जीएसटी
लम्बे समय से किन्तु-परन्तु के फेर में फंसा जीएसटी कानून अब 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसे लागू कराने के लिए जरूरी चारों बिलों को लोकसभा से पास करा लिया है। राजस्व सचिव हंसमुख अधिया का साफ कहना है कि कारोबारियों को जीएसटी के लिए तैयार होने का बहुत वक्त दिया गया है। सरकार इसे जुलाई से लागू करने जा रही है। कानून तैयार है और नियम सबको बता दिया गया है। तकनीकी बुनियादी ढांचा भी तैयार है।
कारोबार करना आसान होने की उम्मीद
जीएसटी लागू होने के बाद देश में कारोबारियों के लिए राहत की उम्मीद की जा रही है। खासकर कारोबारियों को तमाम तरह के टैक्स की वजह से अलग-अलग विभागों के चक्कर काटने से मुक्ति मिल सकती है। माना जा रहा है कि इससे देश में कारोबार करना आसान होगा।
बजट प्रक्रिया का समय से पहले पूरा होना
इस साल नरेंद्र मोदी की सरकार ने बजट करीब एक महीने पहले पेश कर दिया। चुनाव के समय बजट पेश करने को लेकर सरकार की जमकर आलोचना भी हुई। लेकिन, अब उसके सार्थक परिणाम दिख रहे हैं। सरकार ने एक अप्रैल से पहले ही बजट प्रावधान की प्रक्रिया पूरी कर ली है। सभी विभागों और मंत्रालयों का बजट अलॉट कर दिया है। अब सभी विभागों के पास बजट खर्च करने के लिए पूरे एक साल का समय होगा। साथ ही राज्यों को भी अपना बजट बनाने में आसानी होगी।
5 महीने के ऊंचे स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग
मार्च महीने में देश की फैक्ट्रियों में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि 5 महीने में सबसे ज्यादा रही है। मार्च महीने में नए ऑर्डर और बेहतर मांग की वजह से मैन्युफैक्चरिंग तेजी से बढ़ी है। उत्पादन तेजी से बढ़ने की उम्मीद दिख रही है। साल के तीनों शुरुआती महीनों जनवरी, फरवरी और मार्च में मैन्युफैक्चरिंग में लगातार तेजी देखने को मिली है।
सर्विस क्षेत्र में भी आई तेजी
लगातार दूसरे महीने सर्विस सेक्टर में तेजी देखने को मिली है। नए ऑर्डर जमकर मिले हैं। Pollyanna De Lima, economist कहते हैं कि भारत के निजी क्षेत्र के कारोबार में मार्च महीने में तेज उछाल देखने को मिल रही है। मांग और उत्पादन दोनों ही बढ़ा है। विमुद्रीकरण से आई कमजोरी से बहुत तेज वापसी हुई है। रोजगार के नए मौके बन रहे हैं।
सरकारी खजाने में बढ़ी रकम
इस साल सरकार ने जबर्दस्त कर वसूली की है। सरकार की कर वसूली 18% ज्यादा रही है। ये पिछले 6 सालों में सबसे ज्यादा है। सरकार के खजाने में टैक्स के जरिए 17.10 लाख करोड़ रुपये आए हैं। प्रत्यक्ष कर 14.2% और अप्रत्त्यक्ष कर 22% बढ़ा है। पिछले साल के मुकाबले इस साल इनकम टैक्स ग्रोथ 21% रही है।
रिकॉर्ड अनाज उत्पादन
इस साल रिकॉर्ड अनाज का उत्पादन होने का अनुमान है। गेहूं, दाल और चावल की पैदावार इस साल अब तक सबसे ज्यादा होती दिख रही है। 2016-17 में कुल 27.20 करोड़ टन अनाज उत्पादन का अनुमान लगाया जा रहा है। पिछले साल से ये 8% ज्यादा है। पिछले साल 25.16 करोड़ टन अनाज की पैदावार हुई थी। इससे पहले 2013-14 में रिकॉर्ड 26.50 करोड़ टन अनाज की पैदावार हुई थी।
5 में से 4 राज्य में बीजेपी की सरकार

हाल में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को जबर्दस्त सफलता मिली है। 5 में 4 राज्यों में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है लेकिन, लम्बे समय से उत्तर प्रदेश का देश की जीडीपी में योगदान बहुत कम रहा है। उम्मीद की जा रही है कि केंद्र और राज्य में बीजेपी की ही सरकार होने से उत्तर प्रदेश केंद्र की नीतियों को आगे बढ़ाने का काम करेगा। 

Monday, December 05, 2016

1 अप्रैल 2017 से विमुद्रीकरण का सार्थक आर्थिक परिणाम दिखने लगेगा

बैंकों में लंबी कतारें और खाली एटीएम डराने लगे हैं। लेकिन, लालू प्रसाद यादव भी सरकार के बड़ी नोटों को बंद करके नई नोटों को लाने के फैसले के विरोध में नहीं हैं। ये सबसे बड़ी खबर है। और ये खबर इसके बाद बनी जब नीतीश कुमार के बीजेपी से नजदीकी बनाने की खबरों के बीच नीतीश ने लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। इसी से समझ में आ जाता है कि देश के जनमानस को समझने वाला कोई भी नेता या राजनीतिक दल इस फैसले का विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पा रही है। दरअसल सच भी यही है कि इस फैसले के विरोध की पुख्ता वजह भी नहीं है। विमुद्रीकरण के सरकार के फैसले ने एक नई बहस खड़ी कर दी है। कमाल की बात ये है कि विशुद्ध आर्थिक फैसले पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया राजनीतिक नजरिये से आ रही है। और इससे भी कमाल की बात ये कि राजनीतिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया के दबाव में आर्थिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया की चर्चा तक नहीं हो रही है। सबसे बड़ी आलोचना सरकार के इस फैसले की 2 मूल वजहों से हो रही है। पहली, देश कतार में खड़ा है, आम लोगों को बहुत परेशानी हो रही है। सरकार को पहले से बेहतर इंतजाम करना चाहिए था। दूसरी वजह ये कि काला धन रखने वालों पर सिर्फ पुराने नोट बंद कर देने से बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है। सरकार काला धन रखने वालों पर और कड़ाई क्यों नहीं कर रही है। विशुद्ध राजनीतिक नजरिये से इसकी समीक्षा करना, समझना देश के इतने बड़े फैसले के समय और ज्यादा जरूरी हो जाता है। अब इसमें तो किसी को भी एतराज नहीं है कि बड़े नोटों को बंद करने का फैसला समय की जरूरत के लिहाज से बेहद जरूरी था। क्योंकि, भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी हो गई है। कितनी बड़ी इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की है। और एक सामान्य अनुमान के मुताबिक, कम से कम 20 प्रतिशत भारत की समानांतर काले धन की अर्थव्यवस्था चल रही है। विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था जीडीपी के 27 प्रतिशत से ज्यादा है। और कई लोग ये भी मानते हैं कि भारत में पिछले एक डेढ़ दशक में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था जीडीपी के करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की। इसका आधार भी है कि यूपीए सरकार के समय 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले सामने आए। जाहिर है घोटाले की रकम अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सफेद धन के तौर पर तो आने से रही। इस आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी का 50 प्रतिशत की एक काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। लेकिन, सबसे कम यानी 20 प्रतिशत के आंकड़े को ही लेते हैं। इस आधार पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में 460 बिलियन डॉलर यानी 30 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की काले धन की अर्थव्यवस्था है। भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, इसे समझने के लिए ये थाईलैंड और अर्जेंटीना जैसे देशों की पूरी अर्थव्यवस्था से ज्यादा है। इतना ही नहीं भारत सरकार का कुल बजट यानी साल भर खर्च करने की रकम 16 लाख करोड़ रुपये की ही है। इस पर एक तर्क बार-बार आता है कि अर्थव्यवस्था में नकद के रूप में काला धन बहुत कम है। ज्यादातर काला धन सोना, रियल एस्टेट और विदेशों में लगा हुआ है। लेकिन, इस तर्क को रखते समय जानकार इस बात का जिक्र करना भूल जाते हैं कि दरअसल सोना, रियल एस्टेट या विदेशों में जाकर काला धन होने वाली रकम पहले नकद के रूप में ही सफेद से काला धन बनती है। इसको और बेहतर तरीके से समझें तो अकाउंटेड से अनअकाउंटेड मनी हो जाती है। यानी सरकार की रकम लोग इस्तेमाल तो कर रहे होते हैं लेकिन, उस रकम पर किसी तरह की उत्पादकता नहीं होती है। और इसका उससे भी बुरा असर ये होता है कि ईमानदारी से कमाई करने वाले पीछे छूटते जाते हैं। हर साल भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ने की खबर के साथ एक और खबर आती है कि भारत में अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। उसकी सबसे बड़ी वजह यही काला धन है। इन तथ्यों के बाद इसक कदम की जरूरत पर सवाल खड़ा करना बेहद कठिन हो जाता है।
इतना तो तय है कि इससे सबसे ज्यादा फायदा गरीब और मध्यमवर्ग के लोगों को ही होने जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली जब ये कहते हैं कि इससे अमीर-गरीब के बीच की खाई कम होगी, तो ये तथ्यों के साथ जुड़ता है। लेकिन, इस पर विरोध में एक बड़ा तर्क आता है कि काला धन रखने वाले नकद से आगे दूसरे तरीके खोज रहे हैं या चुके हैं, जिससे कि काले धन को खपाया जा सके। साथ ही ये भी सरकार सिर्फ इसी फैसले से काला धन खत्म नहीं कर सकती। इस विरोध को तो खुद प्रधानमंत्री भी मान रहे हैं। विमुद्रीकरण पर बीजेपी संसदीय समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ किया है कि बड़े नोटों को खत्म करने का फैसला काला धन को खत्म करने के लिए शुरुआत भर है। और ये काला धन खत्म करने की सरकार की प्रतिबद्धता के लिए उठाए गए दूसरे कदमों के साथ एक बड़ा कदम है। अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। इसलिए ये विरोध भी सिर्फ विरोध के लिए ही किया गया लगता है। एक बात और जो कतार में लगे लोगों को देखते हुए कही जाती है कि सरकार की सही तैयारी न होने से ये कतार अभी अगले कम से कम 6 महीने खत्म नहीं होने वाली है। इसकी वजह बताई जाती है कि 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के 500 और 1000 के नोट बंद हुए हैं। इनकी जगह नए नोट लाए जाने हैं। क्योंकि, सरकार की महीने की नोट छापने की क्षमता 2 लाख करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा ही नोट छापने की है। इस लिहाज से 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के नोट छापने में कम से कम 6 महीने लगेंगे, वो भी पूरी क्षमता के साथ भारत सरकार के छापेखाने काम करेंगे तब। लेकिन, इस तर्क में भी काफी गड़बड़ है। गड़बड़ कहां है मैं बताता हूं भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड, जो अब तक 1000 के नोट छापता रहा है, अभी 2000 के नोट छाप रहा है। 2 शिफ्ट में काम होने पर 133 करोड़ नोट छापा जा सकता है। और अगर 3 शिफ्ट में ये काम करे, तो 200 करोड़ नोट छापे जा सकते हैं। यानी करीब साढ़े छे लाख करोड़ रुपये के 2000 के नोट 2 महीने में छापे जा सकते हैं। सरकार ये काम इसलिए कर सकती है क्योंकि, सरकार ने नोट बैंक तक पहुंचाने का पहले का 21 दिन का समय घटाकर 6 दिन कर दिया है। इससे इस सरकार के किसी काम को करने की तेजी आसानी से समझा जा सकता है। यहां एक तथ्य ये भी समझना जरूरी है कि 2000 के नोट इस फैसले को लागू करने की तारीख यानी 8 नवंबर से भी पहले से छापे जा रहे थे। इसलिए प्रधानमंत्री के बार-बार 50 दिन मांगने के पीछे सरकार की तैयारी साफ नजर आती है। हां, ये जरूर है कि 500 के नोट बाद में छापना शुरू करने की वजह से 500 मूल्य की नकदी में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है। इन तथ्यों से इतना तो तय है कि प्रधानमंत्री ने देश के इतिहास का ये सबसे बड़ा फैसला पूरी तैयारी के साथ लिया है। हां, इसकी वजह से आम जनता को होने वाली दिक्कतों से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन, जनता इसीलिए सरकार के फैसले के साथ खड़ी दिखती है क्योंकि, उसे लम्बे समय में अपना ज्यादा फायदा दिख रहा है।
इतनी परेशानी भरा फैसला सरकार ने क्यों लिया, इसकी वजहें हमनें समझने की कोशिश की है। अब ये समझते हैं कि आखिर इससे आम लोगों को, अर्थव्यवस्था को और सरकार को किस तरह से फायदा होने वाला है। मोटे तौर पर 3 बड़े फायदे साफ दिख रहे हैं। काला धन बाहर आएगा या पूरी तरह से अर्थव्यवस्था से ही बाहर हो जाएगा। जिससे असल अर्थव्यवस्था की मजबूती होगी। दूसरा काला धन बनने पर तत्काल प्रभाव से बड़ी रोक लगेगी। हालांकि, इसका रुकना पूरी तरह से सरकार के इस फैसले को लागू करने के तरीके से तय होगा। तीसरी बड़ी बात ये होगी कि सरकार के पास कर के रूप में बड़ी रकम आएगी। इसे विस्तार में समझें तो कर चोरी करके कमाई गई बड़ी रकम फिर से अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेगी और इस पर लोगों को कर देना होगा। जिससे सरकारी खाते में रकम बढ़ेगी और इसी कर की रकम से ही देश के सारे तरक्की के काम होते हैं। और इसी आधार पर जीडीपी में भी बढ़त होगी। आधुनिक अर्थव्यवस्था के मानकों पर एक देश के आगे बढ़ने की सबसे जरूरी शर्तों में यही है कि देश के लोग बेहतर कमा सकें और उस पर ईमानदारी से कर दें। जिससे उस कर को सरकार फिर से देश की तरक्की में लगाए और लोगों को नया रोजगार मिले। इस प्रक्रिया में ही देश की संपत्ति बनती है और इस पूरी प्रक्रिया से जीडीपी तय होता है। माना जा रहा है कि विमुद्रीकरण की इस प्रक्रिया से एक राष्ट्र के तौर पर भारत के मजबूत होने की कहानी एक जनवरी से काफी हद तक नजर आने लगेगी। सरकार का पूरा जोर ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकिंग के दायरे में लाना है। जनधन योजना और हर तरह की सब्सिडी सीधे खाते में देने के पीछे भी यही मूल विचार है। उसे आधार से जोड़कर ज्यादातर रकम को नकदी हस्तांतरण से बाहर निकालने की कोशिश है। ये होता भी दिख रहा है। तेजी से लोग इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट की तरफ बढ़ रहे हैं। एसोचैम के मुताबिक, 2022 तक भारत में 30 हजार करोड़ रुपये का कारोबार मोबाइल वॉलेट के जरिये होगा। ये अगर हुआ तो आने वाले दिनों में सरकार को कम नकदी छापने की जरूरत पड़ेगी। लम्बे समय में ये भी एक बड़ी सफलता होगी। एक और लक्षण साफ दिख रहा है कि आने वाले समय में ब्याज दरें घटने वाली हैं। लोगों को और उद्योगपतियों को आसानी से सस्ता कर्ज देने के लिए बैंकों के पास ढेर सारी रकम आ गई है। साथ ही काले धन की अर्थव्यवस्था पर चोट पड़ने से जरूरी सामानों के दाम की कीमत भी सही स्तर पर आएगी। यानी महंगाई में भी कमी देखने को मिलेगी। महंगाई सिर्फ खाने-पीने के सामानों में ही नहीं कम होगी। आम लोगों का घर खरीदने का सपना भी पूरा हो सकता है। सबसे ज्यादा काला धन रियल एस्टेट क्षेत्र में ही लगा हुआ है। वो काला धन कम होगा तो इससे घरों का सस्ता होना तय है। बैंकिंग और रियल एस्टेट पर देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति दीपक पारेख का कहना है कि ये बहुत ही शानदार फैसला है। इससे कम से कम आधा से एक प्रतिशत ब्याज दरें घटेंगी। पारेख का ये भी कहना है कि भारत ऐसी मजबूत स्थिति में कभी नहीं रहा है। महंगाई कम होने और आसानी से कर्ज मिलने से उद्योगों को भी नए प्रोजेक्ट शुरू करने में आसानी होगी। और इसका सीधा असर लोगों को मिलने वाले नए रोजगार के तौर पर होगा। भ्रष्टाचार में बड़ी कमी तुरंत आती दिख रही है और अगर आगे सरकार ने इस मामले में कड़ाई बरती तो भ्रष्टाचार करने वालों को डर लगेगा। भ्रष्टाचार में आई कमी से विदेशी कंपनियां भी भारत में निवेश के लिए तैयार होंगी। साथ ही सरकारी दफ्तरों से चलने वाली फाइलों की रफ्तार में तेजी आएगी। कुल मिलाकर भारत में कारोबार करना आसान हो जाएगा। एक बहुत बड़ा फायदा नकली नोट पर रोक लगाने और आतंकवादियों को इसका इस्तेमाल करने से रोकने में होगा।

नरेंद्र मोदी पर सबसे बड़ा आरोप यही लग रहा है कि बिना तैयारी के इतना बड़ा, जनता को परेशानी में डालने वाला फैसला थोप दिया गया। सरकार की किसी तरह की तैयारी नहीं थी। एटीएम मशीनों को पूरी तरह से दुरुस्त न करने और अब इतने दिन बीतने के बाद भी एटीएम में रकम न होने से इस आरोप को मजबूत किया जा सकता है। लेकिन, नोटों को ले जाने में लगने वाला समय घटाने, हर कुछ दिन में फैसले में लगातार होने वाले संशोधन को इस नजरिये से देखा जा सकता है कि सरकार जनता की परेशानी कम करने के साथ ही काले धन को सफेद बनाने की नई व्यवस्था पर रोक लगाने की भी हर सम्भव कोशिश कर रही है। फिर वो कर कानून में संशोधन हो या फिर जनधन खाते से 10 हजार रुपये से ज्यादा रकम निकालने पर रोक लगाना हो। देश की आर्थिक नीति, नजरिये के साथ सामाजिक नीति, नजरिये में भी बदलाव की ये पक्की बुनियाद है। जिसके बेहतर आर्थिक परिणाम 1 अप्रैल 2017 से शुरू होने वाली तिमाही से दिखने लगेंगे। संयोगवश यही वो तारीख है जब सरकार अब तक का सबसे बड़ा कर सुधार जीएसटी लागू करने जा रही है।


Tuesday, November 22, 2016

महंगाई पर काबू रखने के लिए जीएसटी की 5 दरें

आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों पर सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जीएसटी परिषद की बैठक में चार कर दरें लागू करने पर सहमति बनी है। जीएसटी को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसी बात की जताई जा रही थी कि जीएसटी लागू होने के बाद उसके अच्छे परिणाम तो देर से दिखेंगे लेकिन, बुरे परिणाम पहले नजर आने लगेंगे। और उन बुरे परिणामों में सबसे बड़ा महंगाई का तुरंत बढ़ना था। अब अच्छी बात ये है कि जीएसटी परिषद की हुई बैठक ने जिस तरह से जीएसटी की दरों को 4 श्रेणी में बांटा है, उससे जरूरी सामानों की महंगाई तो कतई नहीं बढ़ने वाली। सेवाओं पर कर बढ़ेगा। जिससे सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, इसे लेकर सरकार बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती। क्योंकि, सरकार ने जरूरी कई सामानों को तो करमुक्त तक कर दिया है। इस लिहाज से जीएसटी परिषद ने 5 दरें तय की हैं। शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की कर दरें समझने से साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई पर काबू रखना कितना ऊपर है। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह संभवत: ये भी होगी कि बड़ी मुश्किल से कर्ज पर ब्याज दरें काफी नीचे आई हैं। और इस बात पर सरकार और रिजर्व बैंक के बीच सहमति सी बनती दिखी है कि ब्याज दरें कम रहनी चाहिए, जिससे लोगों और कॉर्पोरेट को आसानी से सस्ता कर्ज मिल सके। रघुराम राजन पर रिजर्व बैंक का गवर्नर रहते सबसे बड़ा आरोप यही लगता रहा कि महंगाई दर को लेकर वो इतने ज्यादा सशंकित रहे कि ब्याज दरों को उस अनुपात में नहीं घटाया जितना उसे घटाया जाना चाहिए था। इसीलिए केंद्र सरकार जीएसटी की दरों को तय करने में इस बात पर खास ध्यान दे रही है कि किसी भी तरह से महंगाई के बढ़ने के संकेत नहीं मिलने चाहिए। और जीएसटी परिषद के दरें तय करने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली की बातों से इसकी गंभीरता आसानी से समझी जा सकती है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली जीरो टैक्स रेट के बारे में बताते हैं कि जीरो टैक्स रेट उन सामानों पर रखा गया है, जिनकी कीमत बढ़ने-घटने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बास्केट का पचास प्रतिशत तय होता है। जेटली जोर देकर कहते हैं कि हम इनके मुक्त कर वाले सामान नहीं कह रहे हैं। हम इनको जीरो टैक्स आइटम कह रहे हैं।
दरअसल सरकार की मल्टिपल जीएसटी रेट तय करने में अगर कोई एक सबसे बड़ी बात ध्यान में रही है, तो वो है महंगाई। अनाज और दूसरे आम लोगों पर सीधे असर डालने वाले सामानों की कीमतों पर जीरो टैक्स लगेगा। इतना ही नहीं लोगों की रोज की जरूरत चीजों पर 5 प्रतिशत टैक्स लगेगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ये बताया कि प्रस्ताव 6 प्रतिशत का था। लेकिन, अंत में 5 प्रतिशत पर ही सहमति बनी। दरअसल जीरो और 5 प्रतिशत टैक्स रेट जिन सामानों पर लगने वाला है, वही सामान हैं, जिनसे महंगाई दर के घटने-बढ़ने पर सबसे ज्यादा असर होता है। यही वो सामान हैं जिससे सीधे रसोई से लेकर आम लोगों के घर का खर्च बढ़ता-घटता है। इसीलिए केंद्र सरकार ने देश के सबसे बड़े टैक्स सुधार को लागू करते वक्त दरें तय करने में इस बात का ध्यान रखा है कि गलती से भी इसका दुष्परिणाम महंगाई बढ़ाने के तौर पर न दिखे। सरकार ने इसके बाद दो स्टैंडर्ड रेट तय किए हैं। 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। केंद्र सरकार ने दो स्टैंडर्ड दरें तय करके कांग्रेस की 18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट रखने की मांग को खारिज कर दिया है। इसके पीछे वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क बड़ा साफ है। उनका कहना है कि कई अनाज और रोजमर्रा के जरूरी सामानों के अलावा के सामानों में कई सामान ऐसे हैं, जिस पर अभी 11 प्रतिशत का टैक्स लग रहा है। सीधे 18 प्रतिशत का कर उन सामानों पर लगाने पर महंगाई के बढ़ने का खतरा होगा। इसलिए ऐसे आइटम पर 12 प्रतिशत का कर लगेगा। और जिन सामानों पर पहले से ही 18 प्रतिशत के आसपास या उससे ऊपर का टैक्स लग रहा है, उन पर 18 प्रतिशत का टैक्स लगेगा। इस तरह 18 प्रतिशत के स्टैंडर्ड रेट की जगह 12-18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट तय हुआ है।      
रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन जैसे ज्यादातर होम अप्लायंसेज की श्रेणी में आने वाले सामानों पर कर की दरों को 28 प्रतिशत रखा गया है। उद्योग जगत कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर 28 प्रतिशत की टैक्स दरों से खुश नहीं है। उद्योग को उम्मीद है कि ऐसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जो लोगों की रोज की जरूरत का हिस्सा बन गए हैं, उन्हें 18 प्रतिशत कर की श्रेणी में रखा जाएगा। 4 श्रेणियां तय होने के बाद भी अभी सामान विशेष पर लगने वाले टैक्स को लेकर सफाई नहीं आ पाई है। वो श्रेणियों के लिहाज से सामानों की सूची आने के बाद ही पक्का हो पाएगा। लेकिन, इतना तो तय दिख रहा है कि सरकार हर हाल में ऐसे सामानों पर ज्यादा कर लगाने के पक्ष में नहीं है, जिससे महंगाई दर बढ़े। खासकर आम लोगों के रोज के इस्तेमाल में आने वाले सामानों पर महंगाई। यही वजह रही कि राज्यों को उनके राजस्व की भरपाई के लिए दी जाने वाली रकम का इंतजाम करने के लिए जीएसटी परिषद ने सेस लगाने को मंजूरी दी है। हालांकि, जानकार कह रहे हैं कि सेस लगने से जीएसटी पर टैक्स के ऊपर टैक्स लगता ही रहेगा। इस पर सरकार का साफ कहना है कि सेस जीएसटी लागू होने के बाद से 5 साल तक के लिए ही है। महंगी लग्जरी कारों और तंबाकू-पान मसाला जैसे उत्पादों पर ही सेस लगाने की बात है। इससे इन उत्पादों पर कर की दर 40 प्रतिशत 65 प्रतिशत तक होगी।
वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानें, तो किसी भी उत्पाद पर पहले से ज्यादा कर या सेस नहीं लगने वाला है। उन्होंने कहाकि राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पहले साल होगी, जो सेस के जरिए वसूला जाएगा। कुल मिलाकर सरकार तेजी से अप्रैल 2017 की समयसीमा तक जीएसटी लागू करने के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रही है। शायद यही वजह है कि सरकार ज्यादातर मसलों पर आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, अभी भारत जैसे विशाल देश में जीएसटी लागू होने के बाद सामानों पर अलग-अलग राज्य में किस सामान पर कितना कर लगेगा, इसे बता पाना बेहद मुश्किल है। इसके पीछे सिर्फ कर की 4 श्रेणियां होना ही नहीं है। बल्कि, सबसे बड़ी बात ये भी है कि कहां, कौन सा सामान बिक रहा है। साथ ही अभी जीएसटी परिषद को सामान विशेष के लिहाज से श्रेणी तय करके सूची बनानी होगी। इसके बाद ही पूरी तरह से समझा जा सकेगा कि देश के इस सबसे बड़े सुधार से कर ढांचे में कितना सुधार होने वाला है। और इससे आम लोगों से लेकर उद्योगों तक को कितनी सहूलियत मिलने वाली है। लेकिन, प्रथम दृष्टया जीरो टैक्स और 4 टैक्स स्लैब को देखकर ये पक्की टिप्पणी है कि सरकार किसी भी हाल में महंगाई दर बढ़ाने वाली दरों को नहीं लागू करेगी, खासकर आम लोगों के रोज के सामान की महंगाई।

अभी भी आशंकित है उद्योग जगत
जीएसटी लागू करने में सरकार जिस तेजी से आगे बढ़ रही है, उस पर उद्योग जगत खुश नजर आ रहा है। हालांकि, मल्टिपल जीएसटी दरों को लेकर उद्योग जगत थोड़ा आशंकित दिखता है। लेकिन, ज्यादातर लोग जीएसटी लागू करने के सरकार के तरीके की तारीफ करते नजर आ रहे हैं। हां, ये सलाह जरूर है कि ज्यादातर कंज्यूमर गुड्स पर 18 प्रतिशत का ही कर लगना चाहिए।
उद्योग संगठन फिक्की के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन नेवतिया ने जीएसटी की 4 दरों पर सहमति बनाने के लिए जीएसटी परिषद की तारीफ की है।
सीआईआई अध्यक्ष नौशाद फोर्ब्स का कहना है कि मॉडल जीएसटी कानून हर राज्य में सामान और सेवाओं की आपूर्ति पर अलग-अलग कर की बात कर रहा है, इससे कर संरचना के और कठिन होने की आशंका है। फोर्ब्स का सुझाव है कि सरकार को अधिकतम 2 दरें रखनी चाहिए। 


Friday, November 11, 2016

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

दुनिया में 193 देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। और दुनिया के 160 देश हैं, जो कर कानून के तौर पर जीएसटी लागू कर चुके हैं। 160 में से 8 देश ऐसे भी हैं, जो भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने भी अपने देश में कर सुधारों के तौर पर जीएसटी कानून को लागू किया है। दरअसल इस जानकारी से शुरुआत करने से ये आसानी से समझ आ जाता है कि जीएसटी कर सुधार के तौर पर कितना बड़ा और जरूरी है। और साथ ही ये भी हिन्दुस्तान के राजनीतिक दलों ने सारी सहमति होने के बाद भी सिर्फ श्रेय दूसरे को न मिल जाए, इस लड़ाई में जरूरी कर सुधार लागू करने में कितना पीछे कर दिया। ये कहना सही होगा कि दुनिया भर में जीएसटी आसान कर प्रक्रिया के तौर पर लागू किया जा चुका है। फ्रांस ने सबसे पहले 1954 में जीएसटी लागू किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले कर की वजह से ज्यादातर लोग करों से बचने की कोशिश करते थे। एक विकसित अर्थव्यवस्था होने की वजह से फ्रांस के लिए कर वसूली में आने वाली मुश्किलों को खत्म करने के लिए जीएसटी की जरूरत हुई। जिससे हर स्तर पर किसी सामान या सेवा को लेने वाले को उसी आधार पर कर देना होता है। इसीलिए इसे दुनिया भर में सबसे बड़े कर सुधारों के तौर पर देखा जाता है। जिन देशों में कर वसूली का दायरा बढ़ाने की कोशिश हुई और औद्योगीकरण तेजी से बढ़ा, उन सभी देशों ने एक-एक करके जीएसटी को अपनाया है। यही वजह है कि आज दुनिया के 160 देशों में जीएसटी कर सुधार के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन की भी स्थिति बनी है। भारत में जीएसटी के सर्वसहमति से लागे होने के बावजूद राज्यों को अपने अधिकार और राजस्व में हिस्सेदारी को लेकर आशंका बनी हुई है।
जीएसटी कर प्रक्रिया में सुधार कैसे है?
जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स वसूलने की प्रक्रिया पारदर्शी है। और सबसे बड़ी बात ये कि कर किसी भी सामान या सेवा पर होने वाले वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन के आधार पर ही लिया जाता है। वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन पर लगने वाले कर की ही वजह से दुनिया के कई देशों में इसे वैट यानी वैल्यू ऐडेड टैक्स के तौर पर भी जाना जाता है। यानी इसका सीधा सा मतलब हुआ कि किसी भी सामान या सेवा में हर स्तर पर जैसे ही उसमें कोई मूल्यवर्धन होता है, उस पर कर लग जाता है। इससे आसानी से कर वसलूने वाले अधिकारियों के साथ ही कारोबारियों को भी पता होता है कि कहां, कब और कितना कर लगना है या वसूला जाना है। जीएसटी को अंतिम पड़ाव पर लगने वाले रिटेल टैक्स के तौर पर भी समझा जा सकता है। ग्राहक जब कोई सामान या सेवा लेता है, तो उसी आधार पर उसे कर देना होता है।

भारत में जीएसटी कैसे काम करेगा?
दुनिया के ज्यादातर देशों में जीएसटी एक कर के तौर पर लागू है। लेकिन, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन को रोकने के लिए दोहरी जीएसटी प्रणाली लागू की गई है। इससे राज्यों के पास भी कर वसूलने का अधिकार बना रहता है। कनाडा और ब्राजील जैसे देशों ने डुअल जीएसटी ही लागू किया है। भारत जैसे बड़े देश में जटिल लोकतांत्रिक प्रक्रिया और केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजस्व और अधिकारों की जटिलता की वजह से दोहरी जीएटी पर ही सहमति बनी है। दोहरी जीएसटी में मूल रूप से सीजीएसटी यानी सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स और एसजीएसटी यानी स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स है। सामान या सेवा पर केंद्रीय सरकार के हिस्से के वसूले जाने वाले कर को सीजीएसटी कहा जाएगा। और जब सम्बन्धित राज्य सरकारें अपने राज्य में किसी सेवा या सामान पर कर वसूलेंगी, तो वो एसजीएसटी होगा। लेकिन, इस व्यवस्था में ही एक और कर व्यवस्था की गई है। जिसे आईजीएसटी यानी इंटर स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स कहा गया है। ये कर केंद्र सरकार वसूलेगी जहां कर वसूली में दो राज्यों के बीच कारोबार हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा वसूले गए आईजीएसटी को जीएसटी परिषद की तय व्यवस्था के आधार पर दोनों या जितने भी राज्यों के बीच वो कारोबार हुआ है, उनके बीच बांटा जाएगा।
दुनिया के दूसरे देशों से भारत के लिए जीएसटी के सबक
भारतीय संविधान के 122वें संशोधन के साथ ही भारत भी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब जीएसटी काउंसिल इस सबसे बड़े कर सुधार की बारीकियों के नियम तैयार कर रही है। ढेर सारे कर अब भारत में इतिहास की बात हो जाएंगे। सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है कि जीएसटी 1 अप्रैल 2017 से लागू कर दिया जाए। दुनिया के जिन देशों में पहले से जीएसटी लागू हैं, उनको भी ध्यान में रखा जा रहा है। अभी हाल में मलेशिया ने जीएसटी लागू किया है। 2009 में मलेशिया ने जीएसटी लागू करने की बात कही थी। लेकिन, इसे मलेशिया में पिछले साल यानी 2015 में लागू किया जा सका है। ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का उदाहरण भारत के लिए एक पक्का सबक हो सकता है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये कि इतने बड़े कर सुधार को लागू करने के लिए लोगों में जानकारी और सरकारी मशीनरी के पूरी तरह से तैयार न होने से मलेशिया में कारोबारियों को बड़ी मुश्किलें हुईं और इसकी वजह से कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों के बीच बड़े विवाद हुए। मलेशिया की सरकार को छोटे कारोबारियों के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। क्योंकि, छोटे कारोबारियों को जीएसटी की बारीकियां समझने में जबर्दस्त मुश्किलें हुई थीं। खासकर कौन कर वसूलने का अधिकारी होगा। किस स्तर पर किस तरह से जीएसटी लगेगा। इसकी वजह से किसी भी सेवा या सामान पर लगने वाले कर की गणना सबसे कठिन काम हो गया था। साथ ही कारोबारियों को रिफंड में बहुत सी मुश्किलें हुईं थीं। उस पर मलेशिया में विपक्षी दलों ने भी इस मौके पर आग में घी डालने का काम किया था। अच्छी बात ये है कि ढेर सारी मुश्किलों के बाद हिन्दुस्तान में अब कम से कम सभी राजनीतिक दलों के बीच पूरी तरह से सहमति बनी है। राज्यों की विधानसभा में रिकॉर्ड समय में जीएसटी बिल पारित हुआ। लेकिन, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि अगर केंद्र सरकार, जीएसटी परिषद जीएसटी की बारीकियों को कारोबारियों खासकर, छोटे कारोबारियों को समझा न सकी, तो यहां भी ढेर सारे विवाद की स्थिति बन सकती है। ताजा-ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का सबक भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, लगभग मलेशिया जैसा ही मल्टिपल जीएसटी भारत भी लागू करने जा रहा है। हालांकि, मलेशिया में दुनिया का सबसे कम जीएसटी रेट 6% लगाया गया है।
मलेशिया से सबक लेते हुए सरकार को जीएसटी लागू करने में हड़बड़ी दिखाने से बचना ठीक रहेगा। क्योंकि, राजस्व सचिव हसमुख अधिया के मुताबिक, इसके लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के 60000 से ज्यादा अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। दरअसल जीएसटी पूरी तरह से कर वसूलने और देने की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक बदलाव है, जिसमें कर उत्पादक की बजाए ग्राहक के स्तर पर लगेगा। इसके अलावा देशभर में तकनीकी तौर पर भी कर वसूली का तंत्र पूरी तरह से दुरुस्त करने की जरूरत है। क्योंकि, इतना बड़ा कर सुधार बिना मजबूत तकनीकी जमीन तैयार किए सलीके से लागू करना संभव नहीं होगा। मलेशिया के उदाहरण से भारत को एक और जरूरी सबक ये मिलता है कि जीएसटी परिषद को अलग-अलग कारोबार के लिए बाकायदा अलग गाइडेंस पेपर तैयार करना होगा। जिससे हर अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की मुश्किलों को उनके लिहाज से समझा जा सके और उसी आधार पर कर वसूलने की व्यवस्था तैयार की जा सके। पहले से अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की समस्या के लिहाज से समाधान तैयार न कर पाने की वजह से जीएसटी लागू होने के 2 साल तक मलेशिया सरकार को कारोबारियों को होने वाली अलग-अलग तरह की समस्या का समाधान लगातार खोजने में जूझना पडा। भारत में ये समस्या इसलिए भी हो सकती है क्योंकि, भारत एक विशाल देश है। नए-नए कारोबार बन रहे हैं, खड़े हो रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू करने का मन बनाया है। इससे काफी कम समय में केंद्र और राज्य सरकारों के कर वसूलने वाले अधिकारियों को तैयार करना होगा।
भारत के लिए सिंगापुर का सबक भी महत्वपूर्ण हो सकता है। क्योंकि, सिंगापुर का उदाहरण दिखाता है कि जीएसटी लागू करने के बाद वहां शुरुआती सालों में तेजी से महंगाई बढ़ी थी। हालांकि, सिंगापुर पूरी तरह से शहरी देश हैं। इसलिए वहां महंगाई उतना बड़ा मुद्दा नहीं बन सकी। साथ ही कुछ वर्षों में धीरे-धीरे महंगाई पर काबू भी पा लिया गया। लेकिन, भारत जैसे देश में महंगाई को लेकर सरकार को खास सतर्क रहना होगा। उसकी सबसे बड़ी वजह ये कि भारत में खेती के उत्पादों पर कर है नहीं या ना के बराबर है। इसलिए जीएसटी लागू होने से कई खेती के उत्पाद मूल्यवर्धन के बाद महंगे होंगे। और खाने-पीने की सामानों की महंगाई भारत में बेहद संवेदनशील मुद्दा है। हालांकि, अच्छी बात ये है कि भारत में अभी तक टैक्स रेट बहुत ज्यादा है। माना जा रहा है कि 18-19 प्रतिशत के जीएसटी के बाद ढेर सारे सामान और सेवा पर कर घटेगा। इससे कई सेवा, सामान सस्ते भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर इस मोर्चे पर केंद्र सरकार को राज्यों के साथ बेहतर समन्वय करके महंगाई असंतुलन को रोकना होगा। सिंगापुर के अनुभव से भारत ये भी सबक ले सकता है कि खुदरा बाजार में कारोबारियों को बहुत ज्यादा लाभ लेने से हतोत्साहित किया जाए, जिससे ग्राहकों पर महंगाई का ज्यादा असर न पड़े। सिंगापुर ने एक और काम किया, जिससे भारत सबक ले सकता है। सिंगापुर ने जीएसटी दर 1994 में 3% से धीरे-धीरे 7% तक कर दी है। लेकिन, साथ ही साथ सरकार ने आयकर में कटौती भी की। आम करदाता और कॉर्पोरेट को सीधे आयकर में बड़ी छूट दी गई। भारत सरकार को इसके साथ कम आमदनी वाले वर्ग और पेंशन पर आश्रित लोगों के लिए भी एक बेहतर व्यवस्था बनाने की तरफ गंभीरता से सोचना होगा।
भारत जिस तरह की जीएसटी कर व्यवस्था लागू करने जा रहा है। लगभग वैसी ही जीएसटी कर व्यवस्था कनाडा में भी लागू है। कनाडा ने 1991 में ही इस सबसे बड़े कर सुधार को लागू कर दिया था। जब भारत, दुनिया के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल ही रहा था। कनाडा में उस समय जीएसटी का काफी विरोध हुआ था। और इसकी सबसे बड़ी वजह राज्यों के राजस्व को होने वाला नुकसान था। भारत में भी इसी मसले पर ढेर सारा विरोध हुआ है। तमिलनाडु तो अंतिम समय तक इस कर सुधार के विरोध में रहा। और सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं ज्यादातर ऐसे राज्य जहां मैन्युफैक्चरिंग होती है, उनको जहां बिक रहा है, वहां कर लगने वाली इस व्यवस्था से नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को अगले 5 सालों तक होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया है।

इसीलिए जरूरी है कि जीएसटी परिषद राज्यों के हितों का ख्याल रखे। कनाडा में तो तीन राज्य- अलबर्टा, ओन्टारियो और ब्रिटिश कोलंबिया- संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ कनाडा की संघीय सरकार के खिलाफ अदालत में चले गए थे। लेकिन, समय के साथ कनाडा ने कई तरह की जीएसटी व्यवस्था को लागू किया। इसमें राज्यों को संघीय जीएसटी के साथ अपना भी मूल्यवर्धन कर वसूलने का अधिकार दिया गया। साथ ही राज्य के अधिकारियों को ढेर सारे अधिकार भी दिए गए। जिसमें अपना कर वसूलने के साथ संघीय जीएसटी वसूलने के लिए एक निश्चित फीस का भी प्रावधान किया गया। 

Thursday, September 15, 2016

छोटे किसानों का बड़ा भला कर सकता है GST

GST को देश के सबसे बड़े आर्थिक सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। करों में पारदर्शिता से कर घटने और ज्यादा कर वसूली का भी अनुमान है। लेकिन, एक बड़ा खतरा बार-बार बताया जा रहा है कि इससे महंगाई शुरुआती दौर में बढ़ सकती है और उससे भी बड़ी खतरनाक स्थिति ये बताई जा रही है कि इससे किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। उसके पीछे भारतीय किसान संघ तर्क दे रहा है कि किसान को हर तरफ से घाटा होगा। क्योंकि, किसान अपनी उपज के लिए कम कीमत हासिल कर पाएगा। जबकि, उसे बाजार में जरूरी चीजों के लिए ज्यादा कीमत देनी होगी। भारतीय किसान संघ के इस तर्क के पीछे तथ्य ये है कि अभी कृषि जिंस से बने खाद्य उत्पादों पर कम कर है। लेकिन, जीएसटी के बाद लगभग एक जैसा कर ही लगेगा और इसकी वजह से किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन होने के नाते कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह भी भारतीय किसान संघ की बात को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन, कृषि मंत्री का ये मानना है कि जीएसटी सभी के भले के लिए है। भारतीय किसान संघ ये भी चाहता है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इस पर चर्चा हो और अगर सरकार ये कर सके तो सरकार एक पंथ दो काज कर सकती है। इस चर्चा से सरकार राज्यों को और देश के लोगों को दरअसल जीएसटी के बहाने होने वाली सहूलियत से राष्ट्रीय कृषि बाजार की बात भी ठीक से कर सकती है। राष्ट्रीय कृषि बाजार ही वो योजना है, जिसके भरोसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आमदनी दोगुना करने का दावा करते दिखते हैं। लेकिन, ये भी एक कड़वी सच्चाई है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना के राह की सबसे बड़ी बाधा दो राज्यों के बीच करों को लेकर होने वाली उलझन है। इसीलिए अगर सरकार जल्दी से जल्दी जीएसटी लागू कर सके, तो इसी बहाने राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भी उतनी ही तेजी से लागू कर सकेगी।


गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स के लागू होने से किसी भी तरह के उत्पाद पर कर के ऊपर कर लगने की अभी तक चली आ रही परंपरा खत्म होगी। इससे कर लगने में होने वाली पारदर्शिता से खेती-किसानी का बड़ा भला हो सकता है। खासकर अगर जीएसटी के साथ-साथ राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भी लागू हो सके। दोनों को लागू करने में सबसे बड़ी मुश्किल राज्यों के बीच के सम्बंध, केंद्र और राज्य के सम्बंध और उससे भी आगे आसानी शब्दों में कहें, तो सम्वैधानिक संघीय ढांचे की उलझन है। अब अच्छी बात ये है कि सैद्धांतिक तौर पर संसद ने इसे कानून बनाने के लिए आगे बढ़ा दिया है। अब राज्यों में इसे मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। अच्छी बात ये है कि असम ने इसकी शुरुआत कर दी है और तेजी से दूसरे राज्य भी इसे अपनी विधानसभा में मंजूर करते दिख रहे हैं। यहीं से किसानों के भले वाली राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना का भी आसानी से लागू होना दिखने लगेगा। दरअसल जब केंद्र सरकार बार-बार ये कह रही है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार का सीधा सा उद्देश्य देश के हर किसान को देशभर का बाजार एक साथ देना है। इसमें भी समझने की बात ये है कि छोटे किसान को राष्ट्रीय कृषि बाजार की ज्यादा जरूरत है। क्योंकि, बड़ा किसान तो पहले से ही देश के हर बाजार तक पारंपरिक तरीकों से पहुंच बनाए हुए है। लेकिन, छोटे किसान की पहुंच अपनी नजदीकी मंडी तक भी बमुश्किल हो पाती है। इसीलिए राष्ट्रीय कृषि बाजार के जीएसटी के साथ-साथ लागू होने से छोटे किसान का बड़ा होता दिख रहा है। किसानों को या खती से जुड़े उत्पादों का कारोबार करने वालों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल चुंगी, एंट्री-एग्जिट टैक्स, मंडी टैक्स हैं। और, जीएसटी इन सभी करों को खत्म करेगा। खेती के उत्पाद के खेती उद्योग में पहुंचने तक चूंकि वैल्यू एडेड टैक्स ही देना होगा। इससे कर के ऊपर कर वाली स्थिति भी नहीं बनेगी। और, खाद्य उत्पादों के मामले में ये बहुत जरूरी है। इसके लाभ लंबे समय में महंगाई की असल स्थिति पता लगाने में दिखेंगे। किसी भी अनाज, खाद्य सामग्री के किसान के खेत से मंडी तक पहुंचने तक किस तरह का कितना कर लगा और उससे उस अनाज या खाद्य सामग्री का भाव कितना हुआ, ये भी पारदर्शी तरीके से पता चलेगा। खेत से मंडी तक की मुनाफाखोरी का पता भी सरकार ज्यादा आसानी से कर सकेगी। इससे किसान से सही कीमत पर खरीदने और ग्राहक को भी सही कीमत पर बेचने की व्यवस्था भी बनाई जा सकेगी। जीएसटी लागू होने से कृषि क्षेत्र को कई फायदे होंगे और उसमें सबसे बड़ा फायदा यही है कि देश भर में अलग-अलग करों का एक हो जाना देश में एक राष्ट्रीय कृषि बाजार का निर्माण करेगा। इससे देश भर में एक राज्य से दूसरे राज्य में कृषि उत्पाद आसानी से आ जा सकेंगे। चेक पोस्ट, बैरियर जैसी व्यवस्था खत्म होगी। राज्यों के बिना किसी बाधा के कृषि उत्पादों के परिवहन से कृषि बाजार में निजी क्षेत्रों की रुचि बढ़ेगी। इससे आधुनिक गोदाम सुविधा से लेकर आधुनिक बाजार के लागू होने में तेजी आएगी। जीएसटी और राष्ट्रीय कृषि बाजार का साझा मंच किसानों के लिए गजब फायदे का साबित हो सकता है। उसकी वजह है कि कृषि और उससे सम्बंधित उत्पादों के ही सबसे तेजी से खराब होने का खतरा होता है और अभी तक का अनुभव, शोध ये साफ बताता है कि भारत में तरह-तरह के करों और एक मंडी से दूसरी मंडी के बीच की बाधाओं की वजह से फल, सब्जियां और दूसरे अनाज खराब होकर देश के सकल घरेलू उत्पाद का सीधे तौर पर नुकसान करते हैं। इससे राज्यों के बीच खेती के उत्पादों का कारोबार भी बेहतर होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय कृषि बाजार के साथ जीएसटी का मंजूर होना देश के किसानों की आमदनी दोगुना करने के लक्ष्य को पूरा करने का साधन बनता दिख रहा है।  

Sunday, August 14, 2016

GST के शुद्ध राजनीतिक मायने

(GST पर ऑस्ट्रेलिया के SBS RADIO से बातचीत भी आप सुन सकते हैं।)
आर्थिक सुधारों की बुनियाद पर कर सुधार के साथ देश की एक शानदार आर्थिक इमारत तैयार करने की कहानी को आगे बढ़ाने का नाम है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स। जीएसटी मंजूरी पर और इसके लंबी प्रक्रिया के बाद कानून बन जाने के बाद तक ढेर सारे आर्थिक विद्वान इसके अच्छे और अच्छे की राह में आने वाली बाधाओं पर बहुत कुछ बताएंगे। लेकिन, राज्यसभा में जीएसटी बिल पर हुए संशोधनों के लोकसभा में मंजूरी की बहस सुनते मुझे इसके विशुद्ध राजनीतिक मायने दिखे। और इसीलिए मैं जीएसटी बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों से बिना किसी विरोध के मंजूर होने को विशुद्ध रूप से राजनीतिक संदर्भों में ही देख रहा हूं। दिल्ली दरबार यानी दिल्ली के उच्चवर्ग वाले क्लब को सीधे चुनौती देकर प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए इस जीएसटी के मंजूर होने के गजब के संदर्भ हैं। इसलिए ये संदर्भ ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि इसी बिल को मुख्यमंत्री रहते खुद नरेंद्र मोदी ने किसी भी कीमत पर मंजूर न होने देने की बात की थी। शायद यही वजह रही होगी कि राज्यसभा में प्रधानमंत्री जीएसटी पर चर्चा के समय नहीं रहे। और जब लोकसभा में इस पर चर्चा हुआ, तो सारे सवालों का जवाब देते समय उन्हें इस बात का खूब ख्याल था कि जीएसटी मंजूर होने का मतलब कितना बड़ा है। और इसीलिए जब प्रधानमंत्री ने कहा कि जीएसटी का संदेश साफ है कि कंज्यूमर इज किंग। लेकिन, ये आर्थिक भाषा थी, इसका राजनीतिक तर्जुमा ये हुआ कि नाउ नरेंद्र मोदी इज किंग। और ये साफ दिखा जब पूरी बहस में कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दलों के लोग कोई भी तीखी टिप्पणी करने से बचते दिखे। नतीजा ये रहा कि लोकसभा में 434 हां के मुकाबले कोई ना नहीं थी। राज्यसभा में भी 203 हां के सामने कोई ना नहीं रही। दरअसल देश के नए राजनीतिक मानस के मजबूत होने के संकेत है।

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद देश के राजनीतिक चिंतन में हमेशा ये द्वंद रहा कि क्या आर्थिक सुधारों से ही देश की तरक्की हो सकती है। और इन आर्थिक सुधारों का सीधा सा मतलब था, देश की आर्थिक गतिविधियां दुनिया में चल रहे व्यवहार के लिहाज बनें, बदलें। उदारीकरण या सुधार जब कहा जाता था तो इसका सीधा सा मतलब यही होता था कि भले ही 1991 में देश के प्रधानमंत्री पामुलवर्ती वेंकटपति नरसिंहा राव ने देश में आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा कदम उठाया और वित्त मंत्री के तौर पर डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भारत की आर्थिक नीतियों को दुनिया के लिहाज से व्यवहारिक बनाने की हरसंभव कोशिश की हो, सच्चाई यही थी कि भारतीय राजनीतिक मानस पूरी तरह से सुधार के खिलाफ था। उदारीकरण को भारतीय संसाधनों पर दुनिया के कब्जे के तौर पर देखा जा रहा था। और उसी तरह देश में टैक्स सुधार के सबसे बड़े कदम जीएसटी को लंबे समय तक राज्यों पर केंद्र के बढ़ते अधिकार के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन, जीएसटी कानून के बनने की तरफ बढ़ते कदम ये साबित कर रहे हैं कि आर्थिक सुधार के साथ देश का राजनेता भी दुनिया के व्यवहार के लिहाज से सुधरें हैं, परिपक्व हुए हैं। ये कह सकते हैं कि जीएसटी बिल का इस तरह से मंजूर होना देश के राजनीतिक चिंतन ने आर्थिक सुधारों को आत्मसात कर लिया है। भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे गिने-चुने मौके रहे हैं, जब किसी मौके पर खासकर किसी आर्थिक कानून पर सभी राजनीतिक पार्टियां एक सुर में बोल रही हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 1991 से शुरू हुए आर्थिक सुधारों पर अब देश के राजनेताओं की समझ बेहतर हुआ है। क्या भाजपा और क्या वामपंथी इस मुद्दे पर सब एक रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये अच्छे से पता है कि ये कितना महत्वपूर्ण और नाजुक वक्त है। क्योंकि, पहले मुख्यमंत्री के तौर पर और अब प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि आर्थिक सुधारों के साथ या कहें कि एक कदम आगे चलने वाले राजनेता के तौर पर विकसित कर ली है। और इसीलिए जीएसटी का इस तरह से मंजूर होना दरअसल नरेंद्र मोदी की राजनीति की भी मंजूरी है। हालांकि, पूरी तरह से सावधान मोदी इसीलिए ये कहना नहीं भूले कि ये किसी एक दल की जीत नहीं है, ये सबकी विजय है। उन्होंने बड़े सलीके से इसे धार्मिक दृष्टांत के जरिये समझाने की कोशिश की। मोदी ने कहाकि जन्म कोई दे, पालन कोई करे। कृष्ण को जन्म किसी ने दिया और बड़ा किसी ने किया। हालांकि, भगवान कृष्ण के साथ मां देवकी को कितने लोग याद करते हैं और मां यशोदा को कितने लोग याद करते हैं, इसी से समझ में आ जाता है कि दरअसल नरेंद्र मोदी क्या कह रहे हैं।


भले ही कर सुधारों के लिए कांग्रेस ने बहुत प्रयास किया हो। लेकिन, जीएसटी जैसा ऐतिहासिक कर सुधार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते ही मंजूर हो रहा है। प्रधानमंत्री ने कहाकि दरअसल देश की संसद ने टैक्स आतंकवाद से मुक्ति के लिए ये बड़ा कदम उठाया है। योजना आयोग को नीति आयोग बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी के भी नए मायने देश को बताने का प्रयास किया। जीएसटी को ग्रेट स्टेप बाई टीम इंडिया, ग्रेट स्टेप टुवर्ड्स ट्रांसफॉर्मेशन और ग्रेट स्टेप टुवर्ड्स ट्रांसपैरेंसी बताया। उन्होंने कहा यही जीएसटी है। ऐसा नहीं है कि जीएसटी के पहले सरकार ने कोई बड़ा आर्थिक सुधार नहीं किया। मोदी सरकार लगातार ढेर सारे आर्थिक सुधारों का एलान कर चुकी है। रक्षा क्षेत्र तक विदेशी निवेश की मंजूरी दे दी। जो हर लिहाज से मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी। कारोबार में आसानी करने को नरेंद्र मोदी ने इतना ब्रांड किया कि दुनिया की रेटिंग एजेंसियां इसी आधार पर भारत की रेटिंग बेहतर कर देती हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी विपक्ष को साथ न लेकर चल पाने वाले नेता के तौर पर देखे जा रहे थे। यही उनकी सबसे बड़ी आलोचना भी रही। GST के राज्यसभा और लोकसभा से बिना किसी विरोध के मंजूर होने और लोकसभा में नरेंद्र मोदी के बोले से उन पर लगने वाले इस आरोप में अब दम नहीं रह जाएगा। प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता सभी दलों में बढ़ने का संकेत है। सबसे बड़ी बात ये भी कह सकते हैं कि कांग्रेस और पूरे विपक्ष ने ढाई साल बाद आखिरकार नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मान लिया है। अब भाजपा सरकार की तरह और कांग्रेस विपक्ष की तरह व्यवहार कर रही है। जीएसटी के विशुद्ध राजनीतिक मायने कितने बड़े हैं, इसी से समझा जा सकता है। 

Thursday, August 04, 2016

मंजूर GST हुआ, प्रतिष्ठा इन नेताओं की बढ़ गई

GST बिल राज्यसभा में मंजूर हो गया। हालांकि, इसके कानून में बनने में अभी लंबी प्रक्रिया है। लेकिन, इतना तो तय दिख रहा है GST के कानून बनने से देश की आर्थिक तरक्की की रफ्तार सुधरेगी। देश दुनिया में आर्थिक तौर पर और ताकतवर होगा। ये इसका आर्थिक पहलू हुआ। लेकिन, इसका एक राजनीतिक पहलू भी है। इस GST बिल के मंजूर होने से भाजपा और कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं का कद और बड़ा हो गया है। साथ ही खुद प्रधानमंत्री भी स्वीकार्य हुए हैं। देखिए और कौन से नेता हैं जिनकी प्रतिष्ठा GST बिल राज्यसभा में मंजूर होने से और बढ़ गई।

नरेंद्र मोदी- ढेर सारे आर्थिक सुधारों का इस सरकार ने एलान किया। कारोबार में आसानी से लेकर बहुत सी उपलब्धियां प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के माथे सज सकती हैं। लेकिन, अभी तक यही माना जाता था कि नरेंद्र मोदी अपनी जिद में विपक्ष को साथ लेकर नहीं चलना चाहते। GST के राज्यसभा से मंजूर होने के बाद नरेंद्र मोदी पर ये आरोप हल्का होगा। साथ ही प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता सभी दलों में बढ़ने का संकेत है। ये भी कह सकते हैं कि कांग्रेस ने ढाई साल बाद आखिरकार नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मान लिया है।

अरुण जेटली- ये सवाल बार-बार और मजबूती से उठने लगा था कि आखिर क्या वजह है कि अरुण जेटली के रहते हुए भी GST बिल मंजूर नहीं हो पा रहा है। दबी जुबान से लोग ये चर्चा भी करने लगे थे कि क्या अरुण जेटली चाहते ही नहीं हैं कि GST बिल मंजूर हो। वित्त मंत्री के तौर पर अरुण जेटली के माथे पर पर ये सबसे बड़ी असफलता थी। GST बिल मंजूर होने के बाद अब अरुण जेटली को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तक बधाई मिली है। संकट मोचक की छवि बरकरार है।

अनंत कुमार- लगातार 6 बार से बंगलुरू दक्षिण सीट से सांसद चुनकर आ रहे अनंत कुमार की छवि बेहद विनम्र स्वभाव वाले नेता की है। लालकृष्ण आडवाणी के नजदीक होने के वजह से लंबे समय तक नरेंद्र मोदी की नजदीकी हासिल नहीं कर सके थे। रसायन एवं उर्वरक मंत्री होने के नाते मीडिया की नजरों से दूर रहे। ताजा बदलाव में संसदीय कार्यमंत्री बन जाने से मोदी की गुडबुक में शामिल होने का अहसास पक्का हुआ। GST बिल मंजूर कराने में विपक्षी दलों के सांसदों के साथ अच्छे संबंधों का फायदा मिला। पार्टी, सरकार में स्थिति बेहतर होगी।

गुलाम नबी आजाद- कश्मीर से आने वाले गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जो सदाबहार हैं। लेकिन, बहुत लो प्रोफाइल रहते हैं। गांधी परिवार के नजदीकी हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं। GST बिल पर सरकार के साथ मध्यस्थता करने में कांग्रेस की ओर से अगुवा नेता रहे। उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनने  से पहले ही कांग्रेस में उनकी बढ़ती अहमियत का संकेत मिला है। अब GST बिल के राज्यसभा में पास होने के बाद दूसरे मोर्चों पर भी आजाद की अहमियत बढ़ सकती है।

पी चिदंबरम- पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने राज्यसभा में GST बिल मंजूर होने के पहले आम जनता तक ये संदेश पहुंचाने की काफी हद तक सफल कोशिश की कि कांग्रेस GST के विरोध में कभी नहीं रही। चिदंबरम ने सफलतापूर्वक ये बताया कि कांग्रेस की वजह से GST बिल में क्या-क्या जोड़ा-घटाया गया। तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने की कोशिश में राहुल गांधी के अड़ंगा लगाने वाली खबरों के बीच GST बिल पर चिदंबरम की महत्वपूर्ण भूमिका से फिर से दिल्ली के पावर कॉरीडोर में वापसी हुई।

आनंद शर्मा- राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता के तौर पर आनंद शर्मा ने GST बिल पर कांग्रेस का पक्ष तो रखा ही, साथ ही सरकार को कई बार उलझन में भी डाला। आनंद शर्मा का पूरा जोर इसी बात पर रहा कि सरकार ये माने कि GST बिल में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। और माना जा सकता है आनंद शर्मा काफी हद तक सफल रहे।
ये लेख QuintHindi पर छपा है

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...