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Friday, November 11, 2016

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

दुनिया में 193 देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। और दुनिया के 160 देश हैं, जो कर कानून के तौर पर जीएसटी लागू कर चुके हैं। 160 में से 8 देश ऐसे भी हैं, जो भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने भी अपने देश में कर सुधारों के तौर पर जीएसटी कानून को लागू किया है। दरअसल इस जानकारी से शुरुआत करने से ये आसानी से समझ आ जाता है कि जीएसटी कर सुधार के तौर पर कितना बड़ा और जरूरी है। और साथ ही ये भी हिन्दुस्तान के राजनीतिक दलों ने सारी सहमति होने के बाद भी सिर्फ श्रेय दूसरे को न मिल जाए, इस लड़ाई में जरूरी कर सुधार लागू करने में कितना पीछे कर दिया। ये कहना सही होगा कि दुनिया भर में जीएसटी आसान कर प्रक्रिया के तौर पर लागू किया जा चुका है। फ्रांस ने सबसे पहले 1954 में जीएसटी लागू किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले कर की वजह से ज्यादातर लोग करों से बचने की कोशिश करते थे। एक विकसित अर्थव्यवस्था होने की वजह से फ्रांस के लिए कर वसूली में आने वाली मुश्किलों को खत्म करने के लिए जीएसटी की जरूरत हुई। जिससे हर स्तर पर किसी सामान या सेवा को लेने वाले को उसी आधार पर कर देना होता है। इसीलिए इसे दुनिया भर में सबसे बड़े कर सुधारों के तौर पर देखा जाता है। जिन देशों में कर वसूली का दायरा बढ़ाने की कोशिश हुई और औद्योगीकरण तेजी से बढ़ा, उन सभी देशों ने एक-एक करके जीएसटी को अपनाया है। यही वजह है कि आज दुनिया के 160 देशों में जीएसटी कर सुधार के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन की भी स्थिति बनी है। भारत में जीएसटी के सर्वसहमति से लागे होने के बावजूद राज्यों को अपने अधिकार और राजस्व में हिस्सेदारी को लेकर आशंका बनी हुई है।
जीएसटी कर प्रक्रिया में सुधार कैसे है?
जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स वसूलने की प्रक्रिया पारदर्शी है। और सबसे बड़ी बात ये कि कर किसी भी सामान या सेवा पर होने वाले वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन के आधार पर ही लिया जाता है। वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन पर लगने वाले कर की ही वजह से दुनिया के कई देशों में इसे वैट यानी वैल्यू ऐडेड टैक्स के तौर पर भी जाना जाता है। यानी इसका सीधा सा मतलब हुआ कि किसी भी सामान या सेवा में हर स्तर पर जैसे ही उसमें कोई मूल्यवर्धन होता है, उस पर कर लग जाता है। इससे आसानी से कर वसलूने वाले अधिकारियों के साथ ही कारोबारियों को भी पता होता है कि कहां, कब और कितना कर लगना है या वसूला जाना है। जीएसटी को अंतिम पड़ाव पर लगने वाले रिटेल टैक्स के तौर पर भी समझा जा सकता है। ग्राहक जब कोई सामान या सेवा लेता है, तो उसी आधार पर उसे कर देना होता है।

भारत में जीएसटी कैसे काम करेगा?
दुनिया के ज्यादातर देशों में जीएसटी एक कर के तौर पर लागू है। लेकिन, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन को रोकने के लिए दोहरी जीएसटी प्रणाली लागू की गई है। इससे राज्यों के पास भी कर वसूलने का अधिकार बना रहता है। कनाडा और ब्राजील जैसे देशों ने डुअल जीएसटी ही लागू किया है। भारत जैसे बड़े देश में जटिल लोकतांत्रिक प्रक्रिया और केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजस्व और अधिकारों की जटिलता की वजह से दोहरी जीएटी पर ही सहमति बनी है। दोहरी जीएसटी में मूल रूप से सीजीएसटी यानी सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स और एसजीएसटी यानी स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स है। सामान या सेवा पर केंद्रीय सरकार के हिस्से के वसूले जाने वाले कर को सीजीएसटी कहा जाएगा। और जब सम्बन्धित राज्य सरकारें अपने राज्य में किसी सेवा या सामान पर कर वसूलेंगी, तो वो एसजीएसटी होगा। लेकिन, इस व्यवस्था में ही एक और कर व्यवस्था की गई है। जिसे आईजीएसटी यानी इंटर स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स कहा गया है। ये कर केंद्र सरकार वसूलेगी जहां कर वसूली में दो राज्यों के बीच कारोबार हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा वसूले गए आईजीएसटी को जीएसटी परिषद की तय व्यवस्था के आधार पर दोनों या जितने भी राज्यों के बीच वो कारोबार हुआ है, उनके बीच बांटा जाएगा।
दुनिया के दूसरे देशों से भारत के लिए जीएसटी के सबक
भारतीय संविधान के 122वें संशोधन के साथ ही भारत भी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब जीएसटी काउंसिल इस सबसे बड़े कर सुधार की बारीकियों के नियम तैयार कर रही है। ढेर सारे कर अब भारत में इतिहास की बात हो जाएंगे। सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है कि जीएसटी 1 अप्रैल 2017 से लागू कर दिया जाए। दुनिया के जिन देशों में पहले से जीएसटी लागू हैं, उनको भी ध्यान में रखा जा रहा है। अभी हाल में मलेशिया ने जीएसटी लागू किया है। 2009 में मलेशिया ने जीएसटी लागू करने की बात कही थी। लेकिन, इसे मलेशिया में पिछले साल यानी 2015 में लागू किया जा सका है। ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का उदाहरण भारत के लिए एक पक्का सबक हो सकता है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये कि इतने बड़े कर सुधार को लागू करने के लिए लोगों में जानकारी और सरकारी मशीनरी के पूरी तरह से तैयार न होने से मलेशिया में कारोबारियों को बड़ी मुश्किलें हुईं और इसकी वजह से कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों के बीच बड़े विवाद हुए। मलेशिया की सरकार को छोटे कारोबारियों के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। क्योंकि, छोटे कारोबारियों को जीएसटी की बारीकियां समझने में जबर्दस्त मुश्किलें हुई थीं। खासकर कौन कर वसूलने का अधिकारी होगा। किस स्तर पर किस तरह से जीएसटी लगेगा। इसकी वजह से किसी भी सेवा या सामान पर लगने वाले कर की गणना सबसे कठिन काम हो गया था। साथ ही कारोबारियों को रिफंड में बहुत सी मुश्किलें हुईं थीं। उस पर मलेशिया में विपक्षी दलों ने भी इस मौके पर आग में घी डालने का काम किया था। अच्छी बात ये है कि ढेर सारी मुश्किलों के बाद हिन्दुस्तान में अब कम से कम सभी राजनीतिक दलों के बीच पूरी तरह से सहमति बनी है। राज्यों की विधानसभा में रिकॉर्ड समय में जीएसटी बिल पारित हुआ। लेकिन, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि अगर केंद्र सरकार, जीएसटी परिषद जीएसटी की बारीकियों को कारोबारियों खासकर, छोटे कारोबारियों को समझा न सकी, तो यहां भी ढेर सारे विवाद की स्थिति बन सकती है। ताजा-ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का सबक भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, लगभग मलेशिया जैसा ही मल्टिपल जीएसटी भारत भी लागू करने जा रहा है। हालांकि, मलेशिया में दुनिया का सबसे कम जीएसटी रेट 6% लगाया गया है।
मलेशिया से सबक लेते हुए सरकार को जीएसटी लागू करने में हड़बड़ी दिखाने से बचना ठीक रहेगा। क्योंकि, राजस्व सचिव हसमुख अधिया के मुताबिक, इसके लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के 60000 से ज्यादा अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। दरअसल जीएसटी पूरी तरह से कर वसूलने और देने की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक बदलाव है, जिसमें कर उत्पादक की बजाए ग्राहक के स्तर पर लगेगा। इसके अलावा देशभर में तकनीकी तौर पर भी कर वसूली का तंत्र पूरी तरह से दुरुस्त करने की जरूरत है। क्योंकि, इतना बड़ा कर सुधार बिना मजबूत तकनीकी जमीन तैयार किए सलीके से लागू करना संभव नहीं होगा। मलेशिया के उदाहरण से भारत को एक और जरूरी सबक ये मिलता है कि जीएसटी परिषद को अलग-अलग कारोबार के लिए बाकायदा अलग गाइडेंस पेपर तैयार करना होगा। जिससे हर अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की मुश्किलों को उनके लिहाज से समझा जा सके और उसी आधार पर कर वसूलने की व्यवस्था तैयार की जा सके। पहले से अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की समस्या के लिहाज से समाधान तैयार न कर पाने की वजह से जीएसटी लागू होने के 2 साल तक मलेशिया सरकार को कारोबारियों को होने वाली अलग-अलग तरह की समस्या का समाधान लगातार खोजने में जूझना पडा। भारत में ये समस्या इसलिए भी हो सकती है क्योंकि, भारत एक विशाल देश है। नए-नए कारोबार बन रहे हैं, खड़े हो रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू करने का मन बनाया है। इससे काफी कम समय में केंद्र और राज्य सरकारों के कर वसूलने वाले अधिकारियों को तैयार करना होगा।
भारत के लिए सिंगापुर का सबक भी महत्वपूर्ण हो सकता है। क्योंकि, सिंगापुर का उदाहरण दिखाता है कि जीएसटी लागू करने के बाद वहां शुरुआती सालों में तेजी से महंगाई बढ़ी थी। हालांकि, सिंगापुर पूरी तरह से शहरी देश हैं। इसलिए वहां महंगाई उतना बड़ा मुद्दा नहीं बन सकी। साथ ही कुछ वर्षों में धीरे-धीरे महंगाई पर काबू भी पा लिया गया। लेकिन, भारत जैसे देश में महंगाई को लेकर सरकार को खास सतर्क रहना होगा। उसकी सबसे बड़ी वजह ये कि भारत में खेती के उत्पादों पर कर है नहीं या ना के बराबर है। इसलिए जीएसटी लागू होने से कई खेती के उत्पाद मूल्यवर्धन के बाद महंगे होंगे। और खाने-पीने की सामानों की महंगाई भारत में बेहद संवेदनशील मुद्दा है। हालांकि, अच्छी बात ये है कि भारत में अभी तक टैक्स रेट बहुत ज्यादा है। माना जा रहा है कि 18-19 प्रतिशत के जीएसटी के बाद ढेर सारे सामान और सेवा पर कर घटेगा। इससे कई सेवा, सामान सस्ते भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर इस मोर्चे पर केंद्र सरकार को राज्यों के साथ बेहतर समन्वय करके महंगाई असंतुलन को रोकना होगा। सिंगापुर के अनुभव से भारत ये भी सबक ले सकता है कि खुदरा बाजार में कारोबारियों को बहुत ज्यादा लाभ लेने से हतोत्साहित किया जाए, जिससे ग्राहकों पर महंगाई का ज्यादा असर न पड़े। सिंगापुर ने एक और काम किया, जिससे भारत सबक ले सकता है। सिंगापुर ने जीएसटी दर 1994 में 3% से धीरे-धीरे 7% तक कर दी है। लेकिन, साथ ही साथ सरकार ने आयकर में कटौती भी की। आम करदाता और कॉर्पोरेट को सीधे आयकर में बड़ी छूट दी गई। भारत सरकार को इसके साथ कम आमदनी वाले वर्ग और पेंशन पर आश्रित लोगों के लिए भी एक बेहतर व्यवस्था बनाने की तरफ गंभीरता से सोचना होगा।
भारत जिस तरह की जीएसटी कर व्यवस्था लागू करने जा रहा है। लगभग वैसी ही जीएसटी कर व्यवस्था कनाडा में भी लागू है। कनाडा ने 1991 में ही इस सबसे बड़े कर सुधार को लागू कर दिया था। जब भारत, दुनिया के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल ही रहा था। कनाडा में उस समय जीएसटी का काफी विरोध हुआ था। और इसकी सबसे बड़ी वजह राज्यों के राजस्व को होने वाला नुकसान था। भारत में भी इसी मसले पर ढेर सारा विरोध हुआ है। तमिलनाडु तो अंतिम समय तक इस कर सुधार के विरोध में रहा। और सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं ज्यादातर ऐसे राज्य जहां मैन्युफैक्चरिंग होती है, उनको जहां बिक रहा है, वहां कर लगने वाली इस व्यवस्था से नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को अगले 5 सालों तक होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया है।

इसीलिए जरूरी है कि जीएसटी परिषद राज्यों के हितों का ख्याल रखे। कनाडा में तो तीन राज्य- अलबर्टा, ओन्टारियो और ब्रिटिश कोलंबिया- संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ कनाडा की संघीय सरकार के खिलाफ अदालत में चले गए थे। लेकिन, समय के साथ कनाडा ने कई तरह की जीएसटी व्यवस्था को लागू किया। इसमें राज्यों को संघीय जीएसटी के साथ अपना भी मूल्यवर्धन कर वसूलने का अधिकार दिया गया। साथ ही राज्य के अधिकारियों को ढेर सारे अधिकार भी दिए गए। जिसमें अपना कर वसूलने के साथ संघीय जीएसटी वसूलने के लिए एक निश्चित फीस का भी प्रावधान किया गया। 

Friday, May 29, 2015

दस प्रतिशत की तरक्की के सपने की मजबूत बनी बुनियाद



नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की आहट भर से भारतीय शेयर बाजार में जबर्दस्त तेजी देखने को मिली थी। पिछले तीन साल से लगातार सत्ताइस से अट्ठाइस हजार के बीच घूमने वाले सेंसेक्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में भरोसा दिखाते हुए तीस हजार का जादुई आंकड़ा पार कर लिया। लेकिन, संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में कई अहम बिलों के पास न हो पाने और टैक्स संबंधी मामलों पर अनिश्चितता से ये सवाल खड़ा होता है कि शेयर बाजार के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार कितनी अहम है। और क्या शेयर बाजार की अभी की गिरावट या प्रधानमंत्री बनने की आहट के समय की तेजी से सरकार के एक साल के कामकाज का आंकलन किया जा सकता है। इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर यही है कि भारत पी वी नरसिंहाराव के समय में जिस ग्लोबल विलेज में शामिल हुआ। उससे निश्चित तौर पर शेयर बाजार के संकेत अर्थव्यवस्था की मजबूती या कमजोरी का संकेत देते हैं। लेकिन, यहां एक बात समझनी होगी कि शेयर बाजार के एक दो दिन के कारोबार या एक दो महीने की गिरावट या तेजी से अर्थव्यवस्था में मजबूती या गिरावट का अंदाजा लगाना समझदारी नहीं होगी। नई सरकार के एक साल पूरे होने पर अगर हम शेयर बाजार के अभी के सूचकांकों के जरिये अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत तलाशने की कोशिश करेंगे तो हमें यूपीए के समय से भी ज्यादा निराशा हाथ लग सकती है। उसकी बड़ी वजह पिछले कुछ समय में बाजार में आई जबर्दस्त गिरावट है और इसकी वजह से शेयर बाजार की आशा भरी चमकती कहानी निराशा के बादल में छिपती दिखने लगती है। मोदी सरकार के एक साल के आखिरी एक महीने में शेयर बाजार में जो गिरावट आई है उसने पहले की सारी मजबूती को निगल लिया है। और अब अगर साल भर के शेयर बाजार के आंकड़े को देखें तो, सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही करीब ग्यारह प्रतिशत गिरे हुए नजर आ रहे हैं। तो क्या इंडिया ग्रोथ स्टोरी को मेक इन इंडिया की कहानी समर्थन नहीं दे रही है। मेक इन इंडिया में भरोसा जताने वाले, इंडिया ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा जताने वाले खत्म हो गए हैं। इसका जवाब पूरी तरह से ना में है। इंडिया ग्रोथ स्टोरी की चमक अभी भी बनी हुई है। बावजूद इसके कि ढेर सारे आशंका के बादल इस पर मंडरा रहे हैं। और इस इंडिया ग्रोथ स्टोरी पर सबसे बड़ी खतरा तब होता है, जब संसद चल रही होती है। क्योंकि, राजनीतिक नफा-नुकसान का गुणा गणित विपक्ष को सरकार के उन फैसलों के भी खिलाफ खड़ा कर देता है। जिस पर खुद विपक्षी पार्टियां सरकार में होते हुए पूरी तरह आश्वस्त थीं। जीएसटी बिल का सेलेक्ट पैनल को भेजा जाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भूमि अधिग्रहण बिल को भी इसी नजर से देखा जा सकता है। हालांकि, जिस तरह से संकेत मिल रहे हैं उसमें इन दोनों बिलों के कानून बनने में अड़चन तो होगी लेकिन, इसका पास होना तय है। शेयर बाजार के आंकड़े की बात करें तो भले ही साल भर में भारतीय बाजार का प्रदर्शन बेहतर नहीं दिख रहा है। लेकिन, सच्चाई ये है कि शेयर बाजार को मजबूती देने वाले जो बुनियादी तथ्य हैं वो बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले महीने भर में इतनी गिरावट के बाद भी भारतीय शेयर बाजार के कारोबार अगर डॉलर के लिहाज से देखें तो ये दुनिया भर में तीसरा सबसे बेहतर बाजार है। सिर्फ ब्राजील और चीन के बाजार ही हैं जो भारतीय शेयर बाजार से बेहतर मुनाफा देने में कामयाब रहे हैं।

नरेंद्र मोदी की सरकार के एक साल के कामकाज की समीक्षा करें तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दस प्रतिशत की तरक्की का जो सपना भारतीयों ने देखा था। उसकी बुनियाद पिछले एक साल में बनी है या नहीं। ये वो सपना था जिसे मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के तौर पर दिखाया था और मनमोहन सिंह के ही प्रधानमंत्री रहते वो सपना ध्वस्त भी हो गया। दस प्रतिशत की तरक्की का सपना देखने वाले भारत की तरक्की की रफ्तार साढ़े पांच प्रतिशत पर आकर अंटक गई थी। अब एकबार फिर से वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दस प्रतिशत की तरक्की का सपना दिखाया है। भारत सरकार ने 2015-16 के लिए आठ से साढ़े आठ प्रतिशत की तरक्की का लक्ष्य रखा है। दस प्रतिशत की तरक्की का ये सपना भारतीयों के लिए इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि, इस सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते गुजरात ने 2003 से 2012 के दौरान लगातार दस प्रतिशत से ज्यादा की तरक्की की थी। जबकि, उस दौरान भारत की औसत तरक्की की रफ्तार आठ प्रतिशत के नीचे ही थी। और शायद ये नरेंद्र मोदी के पुराने कामों का भरोसा ही है कि दुनिया की महत्वपूर्ण संस्थाओं को ये भरोसा भारत में दिख रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के अनुमान साफ कर चुके हैं कि इसी वित्तीय वर्ष में भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन जाएगा। ज्यादातर अनुमानों में भारत की तरक्की की रफ्तार इस वित्तीय वर्ष में साढ़े सात प्रतिशत या उससे ज्यादा रहने वाली है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनों का ही अनुमान है कि वित्त वर्ष 2016 में भारत की जीडीपी ग्रोथ साढ़े सात प्रतिशत से ज्यादा की होगी। हालांकि, सरकार ने साढ़े आठ प्रतिशत की तरक्की का अनुमान जताया है। जबकि, चीन पीछे छूटता दिख रहा है। चीन की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत या उससे भी कम रहने का अनुमान है। अनुमानों में चमकती इंडिया ग्रोथ स्टोरी को धरातल पर देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ होगी। धरातल पर भी हालात यही है कि सबसे तेजी से तरक्की करने वाले देश में दुनिया के सारे निवेशक रकम लगाने को आतुर हैं। इमर्जिंग मार्केट्स में भारत में ही सबसे ज्यादा विदेशी संस्थागत निवेशक आ रहे हैं। इस साल अब तक एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशक भारत में करीब साढ़े छे बिलियन डॉलर का निवेश कर चुके हैं। इसके बाद मेक्सिको, ब्राजील, साउथ कोरिया और ताइवान का नंबर आता है। और ये भरोसा सिर्फ एफआईआई के मामले में ही नहीं है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई के आंकड़े इंडिया ग्रोथ स्टोरी पर ज्यादा भरोसा साबित करते हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले दस महीने में कुल 25.25 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। वित्तीय वर्ष 2013-14 में कुल 19 बिलियन डॉलर से कम का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ था।

दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए बहुत बड़े विदेशी निवेश की जरूरत है। फिर वो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हो या फिर संस्थागत विदेशी निवेश। इसलिए किसी भी तरह का विदेशी निवेश अगर भारत में इस तेजी से आ रहा है तो इसका सीधा सा मतलब है कि दुनिया के निवेशकों को इंडिया ग्रोथ स्टोरी भरोसे लायक दिख रही है। इसमें बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि भारत में नीतियों में भ्रम की स्थिति अब नहीं रही है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार नीतियों के मामले में यूपीए सरकार बहुत ज्यादा साफ और दृढ़ दिखती है। यही वजह है कि दुनिया की रेटिंग एजेंसियां लगातार भारत की रेटिंग बेहतर कर रही हैं। मूडीज ने भारत की क्रेडिट रेटिंग स्टेबल से पॉजिटिव कर दी है। रेटिंग बेहतर करने पर मूडीज का कहना है कि भारत में रुके पड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तेजी से पूरे होते दिख रहे हैं। और वो अगले साल भर में फिर रेटिंग बढ़ा सकता है। हालांकि, दूसरी रेटिंग एजेंसियों की नजर में अभी भी भारत स्टेबल ही है। एस एंड पी और फिच ने अभी तक भारत को पॉजिटिव रेटिंग नहीं दी है। हां, निगेटिव आउटलुक स्टेबल में बदला है।

नई सरकार के काम का असर साफ-साफ नजर आ रहा है। फरवरी महीने में औद्योगिक रफ्तार पांच प्रतिशत रही है जो पिछले तीन महीने में सबसे ज्यादा है। फरवरी महीने में कैपिटल गुड्स के उत्पादन की रफ्तार आठ प्रतिशत बढ़ी है। इसका सीधा सा मतलब अगर समझें तो, बड़ी मशीनों का ज्यादा उत्पादन हो रहा है। मतलब निर्माण और दूसरी गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। मार्च महीने में कमर्शियल गाड़ियों की बिक्री में भी तेजी आई है। किसी अर्थव्यवस्था में कारोबारी इस्तेमाल के वाहनों की बिक्री बढ़ने का सीधा सा मतलब अर्थव्यवस्था में तेजी के अच्छे लक्षणों की तरह देखा जाता है। सर्विस सेक्टर में भी बेहतरी के संकेत मिल रहे हैं। सर्विस सेक्टर में इस वित्तीय वर्ष के पहले दस महीने में 2.64 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। कुल मिलाकर निर्माण हो या सेवा क्षेत्र, दोनों ही क्षेत्रों में फिलहाल बेहतरी के संकेत मिल रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के एक साल के कामकाज में एक बात जो बेहतर हुई है वो है काम करने की आसानी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कारोबारियों को ढेर सारे कागजी चक्करों से मुक्त करने का। अभी तक कारोबार शुरू करने के लिए आठ अलग-अलग फॉर्म भरने पड़ते थे। एक मई से किसी भी कारोबार को शुरू करने के लिए सिर्फ एक फॉर्म की ही जरूरत होगी। कारोबार की राहत के लिए डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रोमोशन की तरफ से तीन हजार करोड़ रुपये तक के विदेशी निवेश प्रस्तावों को कैबिनेट की मंजूरी से छूट देने की भी मांग की है। अभी ये सीमा बारह सौ करोड़ रुपये ही है। भारत सरकार का खजाना नई सरकार में ज्यादा समृद्ध हुआ है। सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार 344 बिलियन डॉलर का हो गया है। ये अब तक का रिकॉर्ड है। जिस देश की सरकार को किसी समय सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई हो, उस देश के लोगों को ये जानकार राहत होगी कि देश के खजाने में इतनी बड़ी रकम सुरक्षित रखी है।

यूपीए की सरकार में एक बड़ी समस्या नीतियों को लेकर रही। जिसकी वजह से नए प्रोजेक्ट शुरू करने में कारोबारी डरने लगे थे। उनको डर ये था कि प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद उससे संबंधित नीतियां बदल न जाएं। और इसका असर पुराने प्रोजेक्ट पर भी पड़ रहा था। ढेर सारे प्रोजेक्ट इसी वजह से शुरू हो ही नहीं पाए थे। अच्छी बात है कि मोदी सरकार में पुराने रुके पड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने में तेजी आई है। 2014-15 में करीब दो लाख करोड़ रुपये की रुकी योजनाएं शुरू हुई हैं। जबकि, इससे पहले के साल में सिर्फ सत्ताइस हजार करोड़ रुपये की ही रुकी योजनाएं शुरू की जा सकी थीं। सिर्फ निर्माण क्षेत्र की शुरू हुई योजनाओं की लागत करीब साठ हजार करोड़ है। जो, यूपीए के शासन से साढ़े पांच गुना ज्यादा है। यही बुनियादी परियोजनाओं की बात करें तो करीब छिहत्तर हजार करोड़ रुपये की रुकी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं शुरू हुई हैं। जो, 2013-14 से छे गुना ज्यादा है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि रुकी परियोजनाएं तेजी से शुरू हो रही हैं। साथ में नए प्रोजेक्ट भी तेजी से शुरू हो रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि लोगों को रोजगार के नए मौके मिलने वाले हैं। मोदी सरकार के पहले दस महीने में करीब 1900 प्रोजेक्ट शुरू करने का एलान हुआ है। इन योजनाओं में करीब दस लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। पिछले साल के मुकाबले यानी यूपीए दो शासन के आखिरी साल के लिहाज से देखें तो ये अस्सी प्रतिशत ज्यादा है। सरकार नए भारत के निर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। देश के नौ शहरों में मेट्रो के विस्तार के लिए तिरासी हजार करोड़ रुपये का प्रावधान केंद्रीय सरकार ने किया है। लखनऊ, पुणे, नागपुर, अहमदाबाद, विजयवाड़ा जैसे शहरों के लोगों को जल्द ही दिल्ली-एनसीआर और मुंबई की तरह विश्वस्तरीय मेट्रो सेवा का आनंद मिल सकेगा। ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि दुनिया को ऐसे ही नहीं भारत के भरोसे अर्थव्यवस्था में तेजी की उम्मीद नजर आ रही है।

किसी भी सरकार के बेहतर काम में सबसे बड़ी बात होती है कि आखिर सरकार के अच्छे कामों से उनके अच्छे दिन आ रहे हैं या नहीं। लोगों के लिए अच्छे दिन का सबसे बड़ा पैमाना होता है जरूरी सामानों की महंगाई। पेट्रोल-डीजल के मामलें में लोगों को जबर्दस्त राहत मिली है। दूसरे जरूरी सामानों की महंगाई के मामले में लोगों को बड़ी राहत मिली है। हर पैमाने पर महंगाई घटी है। मार्च 2014 में कंज्यूमर प्राइस इंफ्लेशन करीब साढ़े आठ प्रतिशत था जो, मार्च 2015 में घटकर सवा पांच प्रतिशत के आसपास रह गया है। ये रिटेल महंगाई के आंकड़े हैं। यानी वो महंगाई दर जो हर बाजार में सामान खरीदने पर हमें महसूस होती है। लेकिन, अगर थोक मंडी की बात करें तो, एक साल की इस सरकार में थोक महंगाई दर चमत्कारिक तरीके से घटी है। होलसेल प्राइस इंडेक्स मार्च 2014 में 6 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ता दिख रहा था। जबकि, मार्च 2015 में होलसेल प्राइस इंडेक्स बढ़ने की बजाय घटता दिख रहा है। मार्च 2015 में होलसेल प्राइस इंडेक्स निगेटिव 2 प्रतिशत रह गया है।

महंगाई दर
मार्च 2014
मार्च 2015
CPI
8.31%
5.17%
WPI
6%
-2.06%

महंगाई घटी है और लोगों की जेब में पैसे भी आ रहे हैं। इसका एक अंदाजा कार-मोटरसाइकिल की खरीद से मिलता है। दो साल से कम बिक्री से जूझ रही ऑटो इंडस्ट्री को इस साल राहत मिली है। ऑटो बिक्री में चार प्रतिशत से ज्यादा की तेजी देखी गई है। मारुति ने अप्रैल 2015 में पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले सत्ताइस प्रतिशत ज्यादा कारें बेची हैं। टोयोटा ने तिरसठ प्रतिशत, होंडा ने चौदह प्रतिशत, ह्युंदई ने दस प्रतिशत ज्यादा कारें बेची हैं। ये दिखा रहा है कि फिर से भारतीयों की जेब में आने वाली रकम बढ़ी है।

गर्मियों के समय ही नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई थी। और अब गर्मियों में एक साल बाद इस सरकार की समीक्षा हो रही है। ऐसे में बिजली की समस्या कितनी सुधरी, इसकी चर्चा के बिना सरकार के कामकाज की सही समीक्षा नहीं हो सकती। ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, सरकार ने पिछले साल भर में साढ़े बाइस हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन का काम शुरू किया है। जिससे 2019 तक आपूर्ति होने लगेगी। ये बड़ी उपलब्धि है। सरकार के तौर पर गैस कीमतों को  कुछ इसी तरह की उपलब्धि नितिन गडकरी का परिवहन मंत्रालय भी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। परिवहन मंत्रालय ने अगले दो साल में हर दिन तीस किलोमीटर सड़कें बनाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, अभी सरकार इसके आधे लक्ष्य को भी हासिल नहीं कर सकी है। लेकिन, यूपीए सरकार के प्रतिदिन 3-4 किलोमीटर आसत सड़क बनाने से इस सरकार का एक साल काफी बेहतर रहा है। बिना सड़क और बिजली के प्रधानमंत्री का मेक इन इंडिया धरातल पर नहीं उतर सकता। इसलिए इन दोनों क्षेत्रों में हो रहे काम से ये माना जा सकता है कि नरेंद्र मोदी सरकार के पहले साल में दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार हासिल करने की बुनियाद मजबूत रखने में कामयाब रहे हैं। पक्की बुनियाद रखने का भरोसा नरेंद्र मोदी के विदेश दौर पर साफ नजर आता है। जर्मनी के हनोवर व्यापार मेले में एक तस्वीर की चर्चा भारतीय मीडिया में कम ही हुई। वो तस्वीर थी हनोवर मेले में फॉक्सवैगन की वेंटो कार। वो वेंटो कार जिसको कंपनी भारत के पुणे में बनी कार के तौर पर शोकेस कर रही थी। फॉक्सवैगन अगर जर्मनी के मेले में दुनिया को बता रहा है कि ये भारत में बनी कार है तो ये मेक इन इंडिया की ताकत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भारत में बनी वेंटो कार की खूबियां जर्मनी की चांसलर भी समझ रही थीं। यही मेक इन इंडिया की ताकत है कि बॉम्बार्डियर 450 मेट्रो कोच भारत से तैयार करके ऑस्ट्रेलिया भेज रहा है। दूसरी कंपनी एल्सटॉम ने भी 132 मेट्रो कोच के लिए ऑस्ट्रेलिया से समझौता किया है। ये सभी मेट्रो कोच भारत में ही बनेंगे।

आईएमएफ चीफ क्रिस्टीन लागार्ड ने ऐसे ही नहीं कहा कि भारत काले घने बादलों के बीच चमकता सितारा है। दरअसल भारत में ये ताकत है कि वो दुनिया की अर्थव्यवस्था के घने बादलों को साफ कर सके। लेकिन, इसके लिए एक जो सबसे जरूरी बात है कि सरकारी नीतियों में भ्रम या बार-बार बदलाव की स्थिति न बने। वो देसी और विदेशी दोनों ही निवेशकों, कारोबारियों के लिए जरूरी शर्त है। अभी तक के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले देखें तो ये भरोसा बनता है। और अगर ये भरोसा बना रहा तो दस प्रतिशत की तरक्की का मनमोहिनी सपना नरेंद्र मोदी की सरकार में पूरा होता दिख सकता है। हालांकि, सरकार के एक साल के आखिरी दो महीने में जो बाधाएं दिखीं वो साफ करती हैं कि इस सरकार का दूसरा साल ज्यादा मुश्किल होगा।
(ये लेख योजना पत्रिका के जून अंक में छपा है।)

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