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रक्तरंजित राजनीति और फर्जी सरोकारी विमर्श में कराहता बंगाल

हर्ष वर्धन त्रिपाठी



पश्चिम बंगाल में हिंसा के 55 वर्ष

देश में कुल 4 राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश के नतीजे 2 मई को रहे थे, लेकिन सबसे ज़्यादा नज़र पश्चिम बंगाल पर ही लगी हुईं थीं। 2 मई 2021 को जब मतगणना शुरू हुई तो जब तक भारतीय जनता पार्टी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पार्टी को चुनौती देते नज़र आई, तब तक शांति बनी रही, लेकिन जैसे ही रुझानों में तृणमूल कांग्रेस पार्टी भारी अंतर से भारतीय जनता पार्टी को हराते हुए दिखने लगी, पूरे परिणाम आने से पहले ही खेला होबे पर मदमस्त तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मारकाट, आगज़नी, हत्या, दुर्व्यवहार शुरू कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त करने भाजपा 18 सांसद जिताने में कामयाब हो गई थी और उसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी लगातार ममता बनर्जी को पूरी ताक़त से चुनौती देती दिख रही थी, इसीलिए राष्ट्रीय मीडिया की दिलचस्पी बंगाल में बहुत ज़्यादा थी। और, यही वजह रही कि बंगाल में परिवर्तन की उम्मीद से नज़र गड़ाए बैठे राष्ट्रीय मीडिया के ज़रिये पश्चिम बंगाल में हिंसा की ख़बरों ने देश को हिलाकर रख दिया। राष्ट्रीय मीडिया के अलावा सोशल मीडिया के ज़रिये भी पश्चिम बंगाल का हिंसक राजनीतिक परिदृष्य देश को पीड़ा दे रहा था। पश्चिम बंगाल में नारे, नेता, राजनीतिक दल और सत्ता बदलती रही, लेकिन राजनीतिक हिंसा रक्तरंजित बंगाल का स्थाई भाव बन गया है। जब तक पूरे चुनावी नतीजे आते, पश्चिम बंगाल से क़रीब एक दर्जन लोगों का जीवन राजनीतिक हिंसा में ख़त्म होने की ख़बर गई। कई ज़िलों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोगों के पलायन की ख़बरें आने लगीं। बंगाल से लगे असम के धुबरी में सैकड़ों लोगों के पहुँचने की बात चित्रों के साथ असम के कैबिनेट मंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने ख़ुद बताई। और, यह सब तब हो रहा था, जब राज्य में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी बनी हुई थी। आठ चरणों में चुनाव कराने के चुनाव आयोग के निर्णय को राजनीति से प्रेरित बताने वालों के लिए यह करारा तमाचा पड़ने जैसा था। पश्चिम बंगाल के अलावा कहीं से कोई सामान्य विवाद की भी ख़बर नहीं रही थी। इस सबके बावजूद राष्ट्रीय मीडिया, विशेषकर अंग्रेज़ी मीडिया बंगाल में लोगों के जानमाल के नुक़सान को ख़बर मानने को भी तैयार नहीं था। कोलकाता से छपने वाले एक बड़े अंग्रेज़ी अख़बार ( टेलीग्राफ) के सत्ता विरोधी रुख़ को लेकर देश में बहुत चर्चा होती है, लेकिन बंगाल में हुई हिंसा की ख़बरों को दबाने से यह स्पष्ट हो गया कि सारी रचनात्मकता सिर्फ़ मोदी विरोध तक सीमित है। 

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने पश्चिम बंगाल में 1967 में नक्सलबाड़ी से हिंसक राजनीतिक विरोध की शुरुआत की थी। तत्कालीन सरकार ने हिंसक हो चुके नक्सलबाड़ी आंदोलन पर पुलिस बल का प्रयोग करके उसे कुचलने का प्रयास किया और, उसके बाद कांग्रेस और सीपीएम के बीच शुरू हुई राजनीतिक हिंसा की बेहद ख़राब परंपरा पश्चिम बंगाल में आज और ज़्यादा वीभत्स रूप में बनी हुई है। 1972-77 की कांग्रेस सरकार के दौरान नक्सलियों और सरकार के बीच संघर्ष बहुत बढ़ गया। सीपीएम की अगुआई में वामपंथी पार्टियों ने हिंसक राजनीति को सत्ता परिवर्तन का ज़रिया बना लिया और 1977 में वामपंथी पार्टियाँ सत्ता में आईं तो साढ़े तीन दशक तक उनका क़ब्ज़ा बना रहा और सत्ता पर क़ब्ज़े का तरीक़ा वही राजनीतिक हिंसा बनी, जिसका इस्तेमाल करके वामपंथी दल सत्ता में आए थे। वामपंथियों ने राजनीतिक हिंसा को सत्ता में रहते संस्थागत तरीक़े से संरक्षण देना शुरू किया, नक्सलबाड़ी अब सिंडीकेट बन चुका था और राजनीतिक हिंसा का शिकार सबसे ज़्यादा कांग्रेस और बाद में कांग्रेस अलग हटकर वामपंथियों का उग्र विरोध करने वाली ममता बनर्जी बनीं। सिंगूर और नंदीग्राम, दो ऐसी तारीख़ें बन गईं, जिसने पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के साढ़े तीन दशक के हिंसक शासन को ख़त्म कर दिया, लेकिन पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य ख़त्म नहीं हुआ और हिंसक राजनीति के ठेकेदार सिंडीकेट बनाकर सत्ता से लाभ लेने और उसे लाभ देने की कला में पारंगत हो चुके थे। इसीलिए 2011 में भले ही वामपंथी पार्टियाँ सत्ता से बाहर हो गईं और 2021 में विधानसभा में उनका कोई प्रतिनिधि नहीं रह गया, लेकिन 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हिंसा राजनीतिक लाभ के साथ पश्चिम बंगाल के हर क्षेत्र में मज़बूत हो गई। वामपंथी राजनीतिक हिंसा से पीड़ित रहने वाली ममता बनर्जी ने राजनीतिक हिंसा के इस चरित्र को पहचानकर उसे लाभ का व्यवसाय बना दिया और राजनीतिक हिंसा के ठेकेदारों को भारतीय जनता पार्टी के साथ सीपीएम, कांग्रेस और दूसरे दलों का जरा सा भी प्रतिनिधित्व उनके लाभ में हिस्सेदारी लेने की कोशिश जैसा दिख रहा था। 

यह महज़ संयोग नहीं है कि 60 के दशक के आख़िर में रक्तरंजित हुआ बंगाल राजनीतिक हिंसा के संस्थागत होने के साथ ही प्रति व्यक्ति औसत आय के मामले में सबसे ज़्यादा कमाने वाले राज्य से गरीब राज्यों में शुमार होता चला गया, लेकिन रक्तरंजित बंगाल को सरोकारी विमर्श का फ़र्ज़ी जामा पहना दिया गया था। यही फ़र्ज़ी विमर्श उसी तरह का था, जैसे नक्सल प्रभावित इलाक़ों में जनता को सुविधाएँ मिलने का हवाला देकर नक्सल गतिविधियों को सही ठहराने की कोशिश शहरों में बैठा एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग करता रहा है जबकि, सच्चाई यही है कि नक्सलियों की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत ज़रूरतें तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को नहीं मिल पाती हैं, लेकिन फ़र्ज़ी विमर्श ने लंबे समय तक इस नज़रिये से देश में चर्चा नहीं होने दी और अब जाकर लोग यह कह रहे हैं कि नक्सलियों और आतंकवादियों में कोई फ़र्क़ नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल के लिए अभी भी सरोकारी विमर्श भारतीय जनता पार्टी विरोध के आधार पर ममता बनर्जी के हक़ में चला गया था। राजभवन में शपथ ग्रहण के तुरन्त बाद राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहाकि उम्मीद है कि ममता बंदोपाध्याय संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करेंगी। संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए राज्यपाल ने राज्य में तीन दिनों से जारी हिंसा पर तीखी टिप्पणी की थी और जब बाहर पत्रकारों ने पूछा को उन्होंने कहाकि, पत्रकारों को इस समय सच दिखाने का साहस करने की जरूरत है। 

राज्यपाल के इस कहे को थोड़ा ठीक से समझने की ज़रूरत है क्योंकि जिस समय सभी राजनीतिक दलों को इस राजनीतिक हिंसा के ख़िलाफ़ एकसाथ खड़ा होना था, सब अपनी सहूलियत देखकर ज़्यादा बड़ा दुश्मन कौन, के आधार प्रतिक्रिया दे रहे हैं। राहुल गांधी ने ममता बनर्जी को जीत की बधाई देते हुए कहाकि, आपने शानदार तरीक़े से भाजपा को हराया, उन्होंने बेहद शातिर तरीक़े से कांग्रेस के शून्य हो जाने को पचा लिया, लेकिन ख़तरनाक बात यह है कि कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के साथ हुई हिंसा पर भी राहुल गांधी कुछ नहीं बोले। हिंसा एक बार शुरू हुई तो उसका शिकार कोई भी हो सकता है, इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि, राजनीतिक हिंसा में भाजपा के कार्यकर्ता सबसे ज़्यादा निशाने पर भले रहे हों, लेकिन भाजपा के साथ सीपीएम, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी जानमाल का नुक़सान उठाना पड़ा है। जवाहर लाल नेहरू छात्रसंघ की अध्यक्ष आयशी घोष लगातार बता रही हैं कि वामपंथी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मारा गया, कार्यकर्ता की बूढ़ी दादी के साथ हुई हिंसा हृदयविदारक है, लेकिन आयशी घोष ने सीपीएम का रुख़ स्पष्ट करते हुए बताया कि हमारे साथ भले हिंसा हो रही है, हम किसी भी हाल में भाजपा का विभाजक एजेंडा नहीं चलने देंगे। संघ और भाजपा की विभाजनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ने का संकल्प आयशी घोष सहित हर वामपंथी कैडर के ज़रिये सुना जा सकता है। कमाल की बात है कि वामपंथी पार्टियों के नेताओं की ही तरह मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी कह रहा है कि बंगाल में हिंसा हुई, लोगों की जान गई, बम फोड़े जा रहे, गोलियाँ चल रहीं, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोक लिया है। यह ख़ुशी कुछ उसी तरह की है, जैसे रथयात्रा लेकर निकले लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोक दिया था। रक्तरंजित बंगाल को सरोकारी विमर्श में छिपाने-ढंकने की कोशिश ठीक उसी तरह से हो रही है, जैसे बिहार में जंगलराज को सामाजिक न्याय के आवरण में ढँकने की कोशिश की गई थी। इसका ख़ामियाज़ा आज तक बिहार भुगत रहा है। और, राजनीतिक विचार अलग होने भर से हत्या, हिंसा, लूटपाट को सरोकारी विमर्श का जामा पहनाने का ख़ामियाज़ा बंगाल भुगत रहा है। 

शीतलकूची में अर्धसैनिक बलों पर हमला करते तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता उसी भाव में थे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पुलिस पर हमला कर रहे हैं। दुर्भाग्य से मीडिया में एक बड़ा वर्ग इसी प्रवृत्ति को बढ़ाने में लगा है। जनवरी 2016 में मालदा के कलियाचक में एक लाख से ज़्यादा मुसलमानों ने हिंदू नेता कमलेश तिवारी के बयान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और पुलिस चौकी में आग लगी दी। हिंसा, आगज़नी की इस घटना पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बयान बताता है कि बंगाल में ममता किस तरह की राजनीति कर रही हैं। ममता ने कहाकि, यह पूरी तरह से स्थानीय लोगों और बीएसएफ़ के बीच का मसला है। इसमें सांप्रदायिकता खोजना ग़लत होगा। ममता ने जैसे कहा, ठीक वैसा ही विमर्श मीडिया के एक बड़े वर्ग ने बनाया। इस बार भी ममता ने चुनाव की शुरूआत से पहले से ही बीएसएफ़ सहित सभी अर्धसैनिक बलों को मोदी-शाह की पुलिस के तौर पर ही संबोधित किया। चुनाव आयोग को भी नरेंद्र मोदी की मशीनरी बताया। ममता ने मंच से कहाकि, केंद्रीय बल कितने दिन रहेंगे, फिर देखेंगे। तृणमूल के मंत्रियों, नेताओं ने भी ऐसे ही बयान दिए, लेकिन जब ममता यह सब कर रहीं थीं तो रक्तरंजित बंगाल का चेहरा और कुरुप करने की इस कोशिश को मीडिया का एक बड़ा वर्ग सांप्रदायिकता से लड़ने की ममता बनर्जी की कोशिश बताते कह रहा था कि अकेली महिला मोदी सरकार से लड़ रही है। वामपंथी प्रवृत्ति के पत्रकारों और मीडिया घरानों ने पहले वामपंथी पार्टियों की सत्ता बचाने के लिए और 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए रक्तरंजित होते बंगाल को सरोकारी विमर्श के आवरण में पेश करने का घिनौना काम करके पत्रकारिता की साख, मूल्यों को चोट पहुँचाई है। 

(यह लेख 8 मई 2021 दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

Comments

  1. अच्छी जानकारी

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  2. Good work ..keep it up

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  3. Good effort,but same time what is solution of Bangal.

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  4. यह सच पूरे देश को पता है और केंद्र ने चुनाव पूर्व तैयारी भी की। लेकिन चुनाव के पश्चात सबकुछ छोड़ कर कड़ी निंदा करने मैं लगी रही। ऐसा क्यों हुआ।

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  5. बिंदुवार चरचा जानकारी प्राप्त करने के लिहाज से भी पठनीय है.
    धन्यवाद
    सौरभ

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  6. बहुत सुंदर लेख ।बधाई त्रिपाठी जी

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  7. Bengal violence showing failure of central government..if government can't maintain law and order then Bengal need bamkim patha...today..

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  8. बढ़िया विश्लेषण अब तो महाराष्ट्र की शिव सेना भी नेहरू इंदिरा की उपलब्धि गिना रही है

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  9. निडर, स्वाभिमान , हिन्दी पत्रकारिता जगत के " हस्ताक्षर " श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी" @MediaHarshVT जी' आज़ राष्ट्र को शहरी नक्सलियों,टुकड़े-टुकड़े गैंग, तथाकथित लिबरल और क्रांतिकारी स्क्रिप्ट, रायटर्स, आंकड़ों के बाज़ीगर के विरुद्ध आप जैसे लोगों को इन देशविरोधी सैकुलर जिहादियों को राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने अपनी क़लम को गर्म रखना होगा !! 🤌🤌🤌अभिवादन !! 🙏🙏

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  10. मैं राजस्थान से हूं , मेरे सभी दोस्त कह रहे हैं की अमित शाह और नरेन्द्र मोदी ने अपनी छवि बनाने और 2024 में बंगाल में अच्छी खासी सीटें जीतने के लिए बंगाल में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया और हिन्दूओं को मरने के लिए छोड़ दिया, लेकिन अब हम 2024 में इसका बदला भाजपा से उसे राजस्थान में हराकर लेंगे।

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    1. मैं पश्चिम बंगाल से हूँ और विस्वास कीजिये राष्ट्रपति शासन लगाने से भी ये हिँसा रुकने वाली नही थी। भाजपा के जीतने से भी ये हिँसा तय थी।

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