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पश्चिम बंगाल में लंबी राजनीतिक लड़ाई के लिए तैयार है भाजपा

हर्ष वर्धन त्रिपाठी



पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गई हैं और पिछले बार के 211 से भी 2 विधायक बढ़कर विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के 213 विधायक हो गए हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति ने इस बार कई बड़े बदलाव देखे हैं। और, पश्चिम बंगाल की राजनीतिक ज़मीन पर सबसे बड़ा बदलाव है, भारतीय जनता पार्टी का विधानसभा में 77 विधायकों के साथ मुख्य विपक्ष की भूमिका में जाना। इसके साथ ही बड़ा बदलाव यह भी हुआ है कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों को विधानसभा में एक भी सीट नहीं मिली है। शायद राहुल गांधी को इसका अहसास रहा होगा, तभी कुछ दिन पहले अपनी एक चर्चा में उन्होंने शून्यता के सिद्धांत की चर्चा की थी। और, इस शून्यता के सिद्धांत का अहसास भी सिर्फ़ राहुल गांधी को ही है, इसीलिए उन्होंने ममता बनर्जी को जीत की बधाई देते हुए कहाकि आपने भारतीय जनता पार्टी को बहुत अच्छे से हराया। इसमें उन्हें इस बात की जरा सा भी शर्म आई कि कांग्रेस पार्टी का कोई प्रतिनिधि अब विधानसभा में देश की सबसे पुरानी पार्टी की बात रखने के लिए भी नहीं होगा। भले ही हिंसा की कुसंस्कृति के लिहाज़ से तृणमूल कांग्रेस के ज़रिये वामपंथी ख़ुद को शून्यता के अहसास से बचा ले जाएँ, लेकिन सच यही है कि राजनीतिक तौर पर अब विधानसभा में वामपंथी दलों की बात करने के लिए भी कोई प्रतिनिधि नहीं है। देश के ज़्यादातर राज्यों की तरह वामपंथी पार्टियों की आवाज़ सिर्फ़ पार्टी कार्यालय से ही सुनाई देगी। लोकतांत्रिक तौर पर वह भी शून्य हो गए हैं। 

2 मई को जब पश्चिम बंगाल के परिणाम आए तो भारतीय जनता पार्टी 100 से नीचे रह गई और ममता बनर्जी को प्रचंड बहुमत तीसरी बार मिल गया, इस विमर्श के सामने बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की शून्यता वाली स्थिति की चर्चा लगभग ना के बराबर हुई। और, बंगाल में भाजपा की शानदार जीत की बात भी इसलिए कम हुई क्योंकि भारतीय जनता पार्टी उस जीत की अनुभूति करता, इससे पहले ही उसे तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का शिकार होना पड़ गया था। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और अब विधानसभा में नेता विपक्ष हो गए, शुभेंदु अधिकारी के मुताबिक़ क़रीब एक लाख भाजपा समर्थक हिंसा के शिकार होकर या डरकर राज्य छोड़कर भाग गए। इस संख्या के कम या ज़्यादा होने पर बहस हो सकती है, लेकिन असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने धुबरी से जो चित्र देश को दिखाया, उससे स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में हिंसा का शिकार लोगों को राज्य छोड़कर भागना पड़ा। वामपंथियों ने राजनीतिक हिंसा को सामान्य कर दिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने वैचारिक बँधुआ होने की वजह से बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर कभी ठीक से चर्चा नहीं की, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लड़ाई में होने और नागरिक मीडिया के होने से इस बार की राजनीतिक हिंसा देश-दुनिया के सामने गई। पहली बार हुआ कि दुनिया भर में फैले मूल रूप से बांग्लाभाषियों ने राज्य की हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ खुलकर नाराज़गी दिखाई हो, यह पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले भी शाहीनबाग और किसान विरोधी आंदोलन से ठीक से निपटने पर खूब नाराज़गी दिखी थी, लेकिन उसमें मोदी-शाह की छवि बचाने की गुंजाइश फिर भी बन जा रही थी, लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के लिए ज़मीन पर लड़ने वालों की जान गई, परिवारों के साथ दुर्व्यवहार हुआ तो भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं का ग़ुस्सा उबाल पर गया। और, इस गुस्से को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को बंगाल दौरे पर जाना पड़ा। जगत प्रकाश नड्डा ने वहाँ जाकर मारे गए भाजपा कार्यकर्ताओं के परिवार से मिलकर उस वामपंथी विमर्श को भी ध्वस्त कर दिया कि, राजनीतिक हिंसा के पुराने चित्र और चलचित्र भेजकर भाजपा अफ़वाह फैला रही है। ममता बनर्जी का झूठ सबके सामने गया। जब राजभवन में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहीं थीं, तो भारतीय जनता पार्टी के 77 विधायक जगत प्रकाश नड्डा के सामने प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के साथ शपथ ले रहे थे कि सदन में लोकतंत्र की लड़ाई लड़ेंगे। यह भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक लड़ाई का लोकतांत्रिक उद्घोष था।

राजभवन में संवैधानिक प्रमुख के तौर पर राज्यपाल जगदीप घनखड़ ने मुख्य सचिव, पुलिस प्रमुख और कोलकाता पुलिस कमिश्नर से इस हिंसा पर रिपोर्ट माँगी, जिसे ममता बनर्जी के इशारे पर राज्यपाल को दिया ही नहीं गया। यह रहस्योद्घाटन भी राज्यपाल ने किया कि उन्होंने हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में जाने के लिए हेलीकॉप्टर माँगा, जिसका कोई लिखित जवाब नहीं मिला, लेकिन मौखिक तौर पर कहा गया कि हेलीकॉप्टर तकनीकी वजहों से नहीं मिल सकता। अब राज्यपाल जगदीप धनखड़ बीएसएफ़ के हेलीकॉप्टर से 13 मई को कूचबिहार के हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का जायज़ा लेने जाएँगे। शपथग्रहण के समय भी राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य में हो रही हिंसा के हवाले से ममता बनर्जी को लोकतंत्र और संवैधानिक दायित्यों का ध्यान दिलाया। राज्यपाल सार्वजनिक तौर पर बता चुके थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में हो रही हिंसा पर कड़ी नाराज़गी जताई है। राज्यपाल को संवैधानिक प्रमुख के तौर पर जब मुख्य सचिव, पुलिस प्रमुख और ममता बनर्जी की सरकार ने कोई भी रिपोर्ट देने से मना कर दिया तो गृह मंत्रालय ने अतिरिक्त सचिव की अगुआई में चार सदस्यीय समिति बंगाल भेज दी जो अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंप चुकी है। ममता बनर्जी भले तीसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बन गई हों, लेकिन यह भी सच है कि ममता बनर्जी चुनाव हारी हैं और शुभेन्दु अधिकारी ने उन्हें उसी नंदीग्राम से हराया है, जहां चुनाव लड़ते हुए शुभेंदु ने कहा था कि ममता को हराएँगे नहीं तो राजनीति छोड़ देंगे। अब ममता को हराने वाले शुभेंदु को भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा में अपना नेता बना दिया है। बंगाल की राजनीतिक हिंसा ने केंद्र सरकार को यह आधार दे दिया कि भाजपा के सभी विधायकों को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की सुरक्षा मिल गई है। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की शून्यता के बीच भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में लंबी राजनीतिक लड़ाई की पक्की योजना को लागू कर चुकी है। जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमि पर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पकड़ मज़बूत बना ली है। भारतीय राजनीति का यह बहुत बड़ा बदलाव हुआ है, जिससे भारतीय राजनीति का भविष्य तय होने वाला है।

(यह लेख https://hindi.moneycontrol.com/news/politics/west-bengal-election-result-bjp-is-ready-for-long-battle_265599.html में छपा है)

Comments

  1. There's some spine left after all !

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  2. सही बात है सर लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीके ही लड़ा जा सकता है आशा करते हैं यह 77 विधायक टीएमसी जैसी गुंडा पार्टी के ताबूत में आखिरी कील साबित होंगे

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  3. बहुत शानदार तर्कपूर्ण और तथ्यपरक ब्लॉग

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  4. जब भी समय मिलता है,आपको वीडियो जरूर देखता हूं,, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ जी की तरह आपके विचार, बात करने व समझाने का प्रयास बहुत अच्छा होता है।।
    आज विपक्ष और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां राजनीति को व्यापार का सबसे सरल, कम खर्चीला अधिक मुनाफा सौदा मानने लगे है।।इसी कारण ये लोग किसी भी प्रकार से राजनीति को छोड़ना नहीं चाहते है,चाहे देश का अहित हो जाए,अपना निजी अहित nhi होना चाहिए,यही इनकी संकीर्ण सोच है

    बहुत बहुत धन्यवाद,,
    जय हिंद

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  5. बिल्कुल सही लिखा है आपने। सटीक एवं सार्थक विश्लेषण। जहा 3 सीट था वहा मजबूत विपक्ष बनकर खड़ा होना बहुत बड़ी बात है। कांगियो और वामियो का कहना ही क्या ऐसा साफ हुए की शून्य हो गए फिर भी खुश है भाजपा की सरकार नही बनी😅

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