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असमिया संस्कृति की जीत है भाजपा का दोबारा सत्ता में आना

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में असम अकेला राज्य था, जहां भारतीय जनता पार्टी सत्ता बचाने के लिए लड़ रही थी। नागरिकता क़ानून विरोधी प्रदर्शन असम से ही शुरू हुए थे। देशद्रोह के आरोपी शर्जील उस्मानी का असम को देश के दूसरे हिस्सों से काटने के लिए मुसलमानों को उकसाने वाला भाषण देश भर में चर्चा का विषय था। नागरिकता क़ानून लागू करने के विरोध में असम में सबसे पहले और सबसे ज़्यादा हिंसक प्रदर्शन हुए थे। भारतीय जनता पार्टी की सरकार के लिए संकट बढ़ता दिख रहा था और भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्ष नेताओं- मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और कैबिनेट मंत्री हिमंत बिस्व सरमा- के बीच मतभेद की ख़बरें राष्ट्रीय मीडिया में तैर रही थीं और ज़्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों ने असम में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता दोबारा आने को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया था। राष्ट्रीय विमर्श बनाने वालों के लिए वैसे भी 4 प्रदेशों और 1 केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की ख़त्म होती आभा को आँकड़े के साथ बताने के लिए बेहद शानदार ज़मीन तैयार करते दिख रहे थे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सामने भाजपा को उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे थे, केरल में वामपंथी मॉडल के सामने भाजपा नहीं टिकेगी और तमिलनाडु, पुड्डुचेरी में तो भाजपा का कोई नामलेवा ही नहीं है। ऐसे में असम में भाजपा के सत्ता खोने का सीधा सा अर्थ नरेंद्र मोदी के करिश्मे के ख़त्म होने के तौर पर बताया जाने लगा था। इसी विमर्श के उत्साह में राहुल-प्रियंका की कांग्रेस पार्टी ने कोई कसर छोड़ने की रणनीति बनाई और असम में एक क्षेत्र विशेष में मज़बूत प्रभाव रखने वाली ऑल इंडिया यूनिइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट से समझौता कर लिया। अब राष्ट्रीय विमर्श में यह बात मज़बूत हो गई कि राहुल गांधी ने बदरुद्दीन अजमल से हाथ मिलाकर मास्टरस्ट्रोक मार दिया है। काग़ज़ों पर पूरे मुस्लिम और हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का मत जोड़कर इस गठजोड़ पर अजेय मान लिया गया। 

पहले चरण के चुनाव से पहले गुवाहाटी के गोपीनाथ बोरोदोलोई हवाई अड्डे पर जब मैं उतरा तो ऐसे ही समीकरण मेरे मन में थे कि असम के लोग फ़िर से कांग्रेस को चुन लेंगे। पूरे मुस्लिम और काम भर के हिन्दू मतों ने मज़बूत समीकरण बना दिया है और उस पर बोडोलैंड वाली पार्टी भी भाजपा से छिटककर कांग्रेस के ख़ेमे में चली गई है। इतने स्पष्ट समीकरणों के साथ चुनावी नब्ज समझने के लिए हवाई अड्डे से होटल जाने के लिए टैक्सी में बैठा तो वाचाल टैक्सीवाले ने होटल पहुँचते तक मेरे मन में राष्ट्रीय विमर्श के तहत जमे सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया था। हिमंता जैसा नेता नहीं और सर्बानंद सोनोवाल, अतिविनम्र सर्वसुलभ मुख्यमंत्री हैं। टैक्सीवाले ने बताया कि भाजपा के लोगों ने घर-घर जाकर लोगों को नागरिकता क़ानून का मतलब अच्छे से समझा दिया है और सबलोग समझ गया है। गुवाहाटी की व्यस्ततम कारोबारी सड़क जीएस हाइवे पर ही ज्यादातर होटल हैं। अगली सुबह किसी से बात करते पता चला कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो जीएम हाइवे के नाम से प्रचलित गुवाहाटी से शिलांग को जाने वाली सड़क का नाम श्रीमंत शंकरदेव पथ रख दिया गया। कैबिनेट मंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने 4 मई 2017 को श्रीमंत शंकरदेव पथ के साथ ही दूसरी सड़कों के नाम दामोदरदेव पथ, माधवदेव पथ, हरिदेव पथ और लक्ष्मीकांत बेजबरुआ चौक कर दिया था। श्रीमंत शंकरदेव असम के धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक समाज के प्रतीक हैं। गुवाहाटी से क़रीब सवा सौ किलोमीटर दूर नागांव में सबसे बड़े लिंगाकार मंदिर के रास्ते में नामघर के बारे में लोगों से बात करने पर पता चला कि श्रीमंत शंकरदेव ने कैसे समाज के लोगों को जोड़ने के लिए उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए ऐसे नामघर बनाए, जहां शंकरदेव जी की लिखी गीता रखी होती है और गाँव के लोग अपनी मुश्किलों को दूर करने के लिए इकट्ठा होते हैं। अपनी संस्कृति को सहेजते हैं। राज्य के क़रीब एक लाख नामघरों के ढाई लाख रुपये की वार्षिक अनुदान राशि का एलान भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणापत्र में किया है। दिल्ली से दिख रहा हिन्दू-मुसलमान असम में पहुँचकर मुझे मियां-असमिया विमर्श के तौर पर पता चला। हिमंत बिस्व सरमा अपने हर भाषण में यह कह रहे थे कि असम में मियाँ संस्कृति को राज नहीं करने देंगे, यहाँ असमिया संस्कृति राज करेगी। इस असमिया संस्कृति में असमिया मुसलमान भी हिस्सेदार है। बदरुद्दीन अजमल ने असमी गोमोसा (गमछा) को मंच पर फेंककर इस विमर्श को और बड़ा कर दिया।  पाँच वर्ष के भाजपा के शासनकाल में विकास को लेकर हर किसी के पास कुछ कुछ बताने को था। सड़क, सम्पर्क की स्थिति बेहतर हुई थी। स्थानीय विकास, स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय संस्कृति की मज़बूती ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में लाने में मदद की। कांग्रेस के एजेंडे से यह तीनों ही गायब थे।

सोनोवाल और हिमंता के बीच मतभेदों की ख़बर असम के स्थानीय विमर्श से एकदम ग़ायब थी और चुनाव के दौरान एक साक्षात्कार में हिमांता ने इसे और स्पष्ट कर दिया। हिमंता ने कहाकि जो अमित शाह चाहेंगे, वही होगा, इसलिए हमारे बीच में ऐसी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, हम दोनों सुबह एक दूसरे से बात करके दिनभर की योजना बनाते हैं। इतनी स्पष्टता से कम ही नेता बात करते हैं। और, दूसरी तरफ़ कांग्रेस पार्टी में सुष्मिता देव और गौरव गोगोई एक साथ नहीं चल पा रहे थे। सुष्मिता देव ने नो सीएए की गमछा पहनने से इनकार कर दिया, लेकिन राहुल गाँधी और पूरी कांग्रेस कह रही थी कि सत्ता में आए तो नागरिकता क़ानून रद्द कर देंगे। तरुण गोगोई के बाद ख़ाली नेता की जगह कांग्रेस में कोई भर नहीं पा रहा था और भाजपा तरुण गोगोई की उस बात को खूब प्रचारित कर रही थी, जिसमें गोगोई ने 2006 के चुनावों में बदरुद्दीन को कट्टर मुस्लिम पार्टी का नेता बताकर पूछा था कि हू इज बदरुद्दीन, लेकिन इन चुनावों में पूरी कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बदरुद्दीन अजमल ही नज़र रहा था। मुस्लिम मतों को अपने पाले में लाकर बदरुद्दीन ने अपनी स्थिति तो ठीक कर ली, लेकिन मियाँ बनाम असमिया संस्कृति की लड़ाई ज़्यादा तीखी कर दी। और, असम के लोगों को कांग्रेस राज्य की मूल संस्कृति ख़त्म करने वालों के साथ खड़ी दिखाई, परिणाम सामने है। 

(यह लेख नवोदय टाइम्स, पंजाब केसरी और मनीकंट्रोल में छपा है)

Comments

  1. Correct is this statement

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  2. Sir,up Assam ki baat ko sahi se samjha.congress ko lag raha tha CAA se Assam Or Assamese logo ko parishani hai.par waise nehi tha.

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