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Sunday, August 09, 2009

इंडिया ने तो कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है

अब जो बनना चाहते हैं ऊ तो हम बनेंगे ही। भले थोड़ी मुश्किल झेलनी पड़ जाए। आखिर कितना सोच समझकर तो हममें से ज्यादा का मानस इस पर एकमत हुआ है कि ऐसा ही बनने लायक है। वरना तो हम हमेशा ही ढेर सारा कन्फ्यूजियाए रहते हैं कि कैसे बनें कि मजा आ जाए। लेकिन, कुछ बुद्धिमान लोग हैं डरा रहे हैं कि वैसा बनने की कोशिश की तो, जाने कैसा-कैसा हो जाएगा। अरे आप नहीं समझ पाए- कैसा। अरे वही अमेरिका जैसा।


घर खरीदने के लिए करीब-करीब सबसे ज्यादा लोगों को कर्ज देने वाले वाले HDFC के दीपक पारेख साहब पता नहीं क्यों मूडा गए हैं। कह रहे हैं कि अमेरिका के सबप्राइम संकट जैसा खतरा हमें झेलना पड़ सकता है। अब बताइए गजब बात हुई हम हिंदुस्तानी बेचारे अमेरिका जैसे मजे के आसपास भी नहीं पहुंच पा रहे हैं औ ई साहब पहिलवै कहने लगे हैं कि सबप्राइम संकट (अरे वही दुर्दशा जिससे अमेरिका 2 साल से एड़ी-चोटी का जोर लगाकर भी छुटकारा नहीं पा रहा है। ओबामौ क देख लिहे बेचारे)का खतरा झेलना पड़ जाएगा।



पता नहीं क्यों पारेख साहब ओवररिएक्ट कर रहे हैं। बात बस इत्ती सी है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (अरे वही बैंक जो सरकारी है फिर भी ई पारेख-कोचर-कामत टाइप लोग मिलकर भी जिसको पिछाड़ नहीं पा रहे हैं)ने ब्याज दर फिर घटा दी है। अब सबप्राइम के खतरे से ही डरकर तो सबने पारेख-कोचर टाइप के महाउद्यमी लोगों के बैंक से अपना खाता हटाया था। पहिले तो ई लोग दौड़ा-दौडाकर क्रेडिट कार्ड हम सबैका पर्स भर दिए, उधार पे जीने की आदत डाल दी। अब कह रहे हैं कि जो, सैलरी अकाउंट में रखा है उसी से सब उधारी भरवा लेंगे।





शनिवार को जब मैंने पारेख साहब को हेडलाइन बनाया तो, मुझे लगा कि ई बउरा गए हैं का। एक बैंक के ब्याज दर थोड़ा और घटा देने से का हो जाएगा। ऐसे थोड़ी ना सबप्राइम संकट आ जाता है। लेकिन, आज सुबह जब बिग बाजार में बिल की लाइन में लगा था तो, आगे वाले सज्जन के चार्वाक दर्शन पर अटूट भरोसे ने मुझे भी पारेख साहब की लाइन लेने के लिए तैयार कर दिया। मेरे आगे के सज्जन बिल देने के लिए विचार नहीं पा रहे थे कि पर्स में आभूषण और तमगे की तरह सजे क्रेडिट कार्ड में से कउन वाला बिल के लिए दिया जाए। दू ठो कार्ड निकाले फिर झटके में इसमें से एक हजार काट लीजिए और इसमें से बाकी। इस्तेमाल तो भइया ने दुइयै ठो कार्ड किया। लेकिन, उनकी हैसियत बड़ी थी। चाहते तो, 6-8 भी दे सकते थे।


भाईसाहब का फंडा गजब था। मेरे भी एकाध जानने वाले इस फंडे की कहानी बड़े मजे से सुनाते हैं कि कैसे उनके चार क्रेडिट कार्ड एक दूसरे के कर्ज और 45 दिन की समयसीमा के बीच संतुलन बिठाते हुए उनका हर महीना मजे से गुजार देते हैं। ई सब भाईसाहब लोग कर्ज पर चल रहे हैं।


अब मुझे लग रहा है पारेख साहब एकदम सही कह रहे हैं कि सस्ता कर्ज मिलेगा तो, जिसकी हैसियत चवन्नी की है ऊ अठन्नी-रुपय्ये का घर खरीदेगा। औ मुंगेरीलाल की तरह हसीन सपना देखेगा कि जइसनै कीमत दुइ रुपया होए बेचके अढ़ाई रुपया वाला घर खरीदैं। फिर वही सस्ता कर्ज लैके। पारेख साहब की बात में दम दिखता है। फिर से रियल एस्टेट के नए प्रोजेक्ट के विज्ञापन ग्लेज्ड (चमकदार, रंगीन) पेपर पर पूरे-आधे पन्ने में चमकने लगे हैं। पहले प्रोजेक्ट पर काम शुरू होने से पहले ही 100% sold out के दावे के साथ phase 2, 3 की लॉन्चिंग की खबरें दिखने लगती हैं। हम मीडिया वाले भी खबर करते हैं कि रियल एस्टेट सेक्टर में फिर मजबूती लौट रही है। सुनहरा भारत दिखाने का जिम्मा भी तो हमारा है। वैसे भी बहुत दिन तक मंदी-मंदी करेंगे तो, लोग टीवी बंद कर देंगे औ हमारी भी नौकरिया चली जाएगी। लेकिन, भइया पारेख साहब कह सही रहे हैं।


कुल मिलाकर क्रेडिट कार्ड, लाखों की सैलरी, बढ़िया फ्लैट और लंबी कार वाला चमकता इंडिया तो, बहुत पहले से कोई कसर नहीं छोड़ रहा है लेकिन, का करें ई बेवकूफ भारत हर बार रस्ता रोके खड़ा हो जाता है अडियल सांड़ की तरह। बताइए पूरी मंदी गुजर गई औ हम सबप्राइम संकटवा का मजै नहीं ले पाए। थोड़ा तो अमेरिका की तरह बड़े हो पाए होते। चलिए लगे रहते हैं आज नहीं तो, जैसे-जैसे इंडिया बड़ा, भारत छोटा होता जाएगा। अमेरिका के मजे औ अमेरिका के सबप्राइम संकट की चिंता दोनों अनुभव मिलने में आसानी होती जाएगी।

Tuesday, May 20, 2008

अब किसान कर्ज के बोझ से नहीं मरेंगे

किसान अब कर्ज के बोझ से आत्महत्या नहीं करेंगे। अब वो खेती के लिए पैसा न मिलने से आत्महत्या करेंगे। ये सुनने बहुत कड़वा लग रहा है। लेकिन, कड़वी सच्चाई यही है। आज के अखबारों में ये खबर है जो, कल से ही मुझे पता थी क्योंकि, मेरे चैनल पर ये स्टोरी चल रही थी। देश के सबसे बड़े बैंक (ये सरकारी बैंक है) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी SBI ने सर्कुलर जारी करके अपनी शाखाओं को कहा है कि वो, किसानों को नए कर्ज न दें। सर्कुलर साफ कह रहा है कि सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए हैं इसलिए नए कर्ज न दिए जाएं क्योंकि, वो वापस आने की उम्मीद नहीं है।

सूत्रों के मुताबिक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से लिए गए किसानों के कर्ज 7,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के हैं जो, वापस नहीं आने हैं। ये बैंक के कुल NPA यानी वापस न आने वाले कर्ज का 17 प्रतिशत है। लेकिन, मुझे समझ में नहीं आता कि कोई सरकारी बैंक क्या सरकार की बिना मर्जी के इस तरह से किसानों को कर्ज देना रोक सकता है। वो, भी ठीक मॉनसून के पहले। जब किसानों को कर्ज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। बुआई-खेती का ये अहम समय होता है। और अगर माननीय वित्त मंत्री चिदंबरम साहब बैंकों को किसानों की कर्जमाफी का पूरा पैसा दे रहे हैं तो, फिर बैंकों को तो, ऐसा पैसा मिल रहा है जो, वापस नहीं आने वाला था। यानी वो, NPA नहीं रह जाता। फिर, बैंक किसानों को कर्ज क्यों नहीं दे रहे हैं। इसका मतलब कि वित्तमंत्री के बजट भाषण, उसके बाद टीवी चैनलों और अखबारों में दिए गए बयान - कि बैंकों पर कर्जमाफी का कोई बोझ नहीं पड़ेगा उसकी भरपाई सरकार करेगी - में कुछ गड़बड़झाला है।

साफ है कि कांग्रेस चुनाव के ठीक पहले लोकलुभावन बजट पेश करके चार करोड़ किसानों का वोटबैंक पक्का करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कर्जमाफी का एलान कर तो दिया लेकिन, बैंकों को अब तक कर्जमाफी का पैसा बैंकों को नहीं मिला। अब सरकार की आंख इस बात पर क्यों नहीं खुल रही है कि अगर किसानों को मॉनसून के पहले खेती के लिए जरूरी पैसा नहीं मिला तो, वो कर्जमाफ होने के बाद भी बिना खेती के भूखों मर जाएंगे।

दरअसल, ये पूरी तरह से हावी होता बाजारवाद है जो, साफ कहता है कि कर्ज उसको दो जो, उस पर ढेर सारा ब्याज लगाकर उनको लौटाता रहे। ठीक सूदखोर महाजन की तरह उन्हें मूल की नहीं। उस पर आने वाले ब्याज की होती है। इसीलिए बैंक कर्ज भी या तो बहुत बड़े देना पसंद कर रहे हैं। या फिर ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत यावत जीवेत सुखम जीवेत के सिद्धांत वाले कमाऊ खर्चीले कुंवारों या फिर कमाऊ खर्चीले दंपति को ही कर्ज दे रही है।

इसीलिए देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक (देश में बैंकिंग की तसवीर बदलने वाला प्राइवेट बैंक ICICI बैंक ) ने भी चुपचाप स्मॉल टिकट लोन यानी छोटे कर्जे देना बंद कर दिया है। हां, चालाकी ये कि इसके लिए बैंक ने फिलहाल कोई सर्कुलर नहीं जारी किया है। लेकिन, लाख-पचास हजार रुपए का कर्ज अब नहीं दे रही है। इसके पीछे चिदंबरम की कर्जमाफी नहीं है। इसके पीछे है अदालतों का वो आदेश जो, आए दिन रिकवरी एजेंटों के जरिए बैंकों की होने वाली दादागिरी पर लगाम लगाने की बात कहता है। RBI ने भी साफ कहा है कि बैंक दादागिरी नहीं कर सकते। मुंबई के ICICI बैंक से पचास हजार रुपए का लोन लेने वाले प्रकाश सरवंकर को बैंक के रिकवरी एजेंटों ने धमकाया तो, सरवंकर ने आत्महत्या कर ली और मीडिया, अदालत के दबाव में बैंक को सरवंकर के परिवार को 16 लाख रुपए देना पड़ा। बस, अब बैंक छोटे कर्ज नहीं देना चाहता।

बैंकिंग एक्सपर्ट भी कहते हैं कि छोटे कर्ज वसूलना बैंकों के लिए मुश्किल भी होता है और खर्चीला भी। कभी-कभी तो, कर्ज वसूलने में बैंक का खर्च वसूले गए कर्ज से भी ज्यादा हो जाता है। इसी वजह से क्रेडिट कार्ड सबसे ज्यादा बिक रहे हैं। बैंक क्रेडिट कार्ड दिल खोलकर देते हैं। ऑफिसेज के बाहर बैंक के एग्जिक्यूटिव्स क्रेडिट कार्ड के फॉर्म का बंडल लेकर खड़े रहते हैं कि कोई ऑफिस का पट्टा लटकाए निकले और उसे एक कार्ड बेचकर अपना कमीशन पक्का और टार्गेट पूरा कर लें। इसी में एक जमात ऐसी भी पैदा हो गई है जो, क्रेडिट कार्डों के भरोसे जीना सीख गई है।

ये जमात पैसे की मोहताज नहीं है। इसे किसानों की तरह खेती के लिए या सरवंकर की तरह अपना परिवार चलाने के लिए कर्ज की जरूरत नहीं है। इसे मेट्रो में हर रोज खुल रहे मॉल्स के स्टोर्स से नया ब्रांड खरीदना है। गुची का चश्मा, मार्क एंड स्पेंसर के कपड़े, नाइके के जूते पहनने हैं। मल्टीप्लेक्स में पिक्चर देखनी है। और, ये जमात चालाक हो गई है। सरवंकर की आत्महत्या इनको हिम्मत दे गई है। ये बैंक के क्रेडिट कार्ड का कर्ज नहीं चुका रहे हैं। ये बैंक को सरवंकर की तरह आत्महत्या करने की धमकी दे रहे हैं। ये 4-4 क्रेडिट कार्ढ बनवाकर उस पर लिमिट भर का पैसा खर्च करके उसे तोड़कर फेंक रहे हैं। बैंक इनसे सलीके से बात करते हैं। क्योंकि, ये बिना जरूरत वाले कर्जधारी हैं। जरूरत वाले किसान और सरवंकर जैसे कर्जधारी बैंक के लिए NPA बन गए हैं। इसीलिए बैंक किसानों को और सरवंकर जैसे लोगों को कर्ज नहीं देंगे खामखां आत्महत्या करेंगे ये नामुराद और इज्जत जाएगी बैंक और सरकार की। क्रेडिट कार्ड लेने वाले आत्महत्या नहीं करते इसलिए इनके कर्ज अब भी बंट रहे हैं। आखिरकार चिदंबरम साहब की ग्रोथ स्टोरी बढ़ाने में ऐसे खर्च करने वाले कंज्यूमर भी तो शामिल हैं। अच्छा है अब सरवंकर और किसान कर्ज के बोझ से तो आत्महत्या नहीं ही कर पाएंगे। वाह रे चिदंबरम चमत्कार ..


मीडिया का दबाव
मीडिया में ये खबरें आने के दो दिन बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सभी अखबारों-टीवी चैनलों को रिलीज जारी करके सफाई दी कि उन्होंने ट्रैक्टर के लिए लोन न देने का सर्कुलर वापस ले लिया है। लेकिन, अभी भी ये साफ नहीं है कि खेती के लिए दूसरे कर्ज मिलेंगे या नहीं।

Wednesday, March 05, 2008

किसानों की चिंता करने वाले पत्रकार का सम्मान


गांव, किसान और कर्ज की समस्या। ये बाते मीडिया में बमुश्किल ही जगह पाती हैं। ऐसे में किसी अखबार के संपादक का खुद इस तरह की रिपोर्टिंग करना और अपने रिपोर्टर्स को इस तरह की खबरें करने के लिए प्रेरित करना पत्रकारीय मानदंडों को बचाने में मदद करता है। बुंदेलखंड के किसानों की समस्या, भुखमरी और किसानों को कर्ज के जाल में फंसाने वाले कारणों पर सार्थक रिपोर्ट्स के लिए अमर उजाला कानपुर के स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी को के सी कुलिश मेरिट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र समूह ये पुरस्कार दे रहा है।

पहला अवॉर्ड पाकिस्तान के द डॉन और हिंदुस्तान टाइम्स को संयुक्त रूप से दिया गया है। इस अवॉर्ड के लिए दुनिया भर से आई 2286 एंट्रीज में से कुल दस मेरिट अवॉर्ड दिए गए। प्रताप सोमवंशी सातवें नंबर पर रहे। प्रताप सोमवंशी को ये अवॉर्ड 12 मार्च को दिल्ली में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों दिया जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी यहां भी अध्यक्षता करेंगे। अवॉर्ड के निर्णायक मंडल में एन राम( संपादक-द हिंदू), पीयूष पांडे( एड-गुरू) और एचके दुआ(प्रधानमंत्री के पूवॆ सलाहकार) शामिल थे।

बुंदेलखंड में किसानों को कर्ज, सूखा की समस्या, डाकुओं का आतंक, डाकुओं को मिलने वाली राजनीतिक गोलबंदी पर अमर उजाला में प्रताप सोमवंशी की करीब 5 दर्जन रिपोर्ट छपी थीं। इसी आधार पर ही इलाहाबद हाईकोर्ट ने किसानों की मौत पर खुद नोटिस लेते हुए सरकार से जवाब मांगा था। सार्थक रिपोर्टिंग पर मिले इस सम्मान के लिए प्रताप सोमवंशी को बधाई।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...