Tuesday, October 30, 2007

वाह क्या आइडिया है!

मैं सोच रहा था आजकल के विज्ञापनों जैसी दुनिया हो जाए तो क्या बात हो। ऐसे-ऐसे विज्ञापन दिखते हैं कि लगता है कि शायद इसीलिए विज्ञापन बनाने वाले बेहद क्रिएटिव माने जाते हैं। कुछ दिनों पहले तक विज्ञापन बनाने वाले इतने क्रिएटिव हो जाते थे कि विज्ञापन का आम लोगों की दुनिया से कोई वास्ता ही नहीं रह जाता था। लेकिन, अब विज्ञापन हमारे-आपके बीच के आदर्श समाज की खाली जगह भरते नजर आते हैं।
सबसे जोरदार विज्ञापन है आइडिया का। पहले दिन ये विज्ञापन तेजी में आया और निकल गया मुझे समझ में ही नहीं आया। शायद इस तरह के किसी समाज की हममें कोई सोच ही नहीं बची है। शुरुआत ध्यान से देखा तो, लगा कि विज्ञापन कांग्रेस पार्टी ने गुजरात चुनाव में बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाया है। विज्ञापन थोड़ा आगे बढ़ा तो, लगा यूपी के कुर्मियों और भूमिहारों की लड़ाई हो रही है। बाद में जब अभिषेक बच्चन कमाल का आइडिया लेकर आए कि अब यहां कोई अपनी जाति, धर्म और यहां तक कि नाम से भी नहीं जाना जाएगा। तब समझ में आया क्या विज्ञापन हैं। काश हमारा समाज ऐसा हो पाता।

समाज में जो बातें बन नहीं पा रही हैं, उन पर चोट करने वाले विज्ञापन भी हैं। ग्रीनप्लाई का, मुजरिम जीवनदास को सजा दिलाने में बूढ़े होते वकील, आरोपी और जज को दिखाने वाला विज्ञापन अदालतों में घिस-घिसकर मिलते न्याय पर की गई चोट है। हमसे आपसे जुड़ते दूसरे विज्ञापन भी हैं। ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस की जीते रहो सीरीज भी कुछ ऐसी है। पति-पत्नी की मीठी नोंक-झोंक में भविष्य बच्चे का करियर सुरक्षित रखने का संदेश बेहद खूबसूरती से दिया गया है। ऐसा ही एक और विज्ञापन है बैंक ऑफ बड़ौदा में सीनियर सिटिजंस के ख्याल रखने से जुड़ा। इसमें बहुत दिनों तक जब एक बुजुर्ग अपने अकाउंट का पता करने नहीं आता तो, बैंक का कर्मचारी खुद ही उनके घर पहुंच जाता है। ये लाइन की बैंक की सुविधाएं बढ़ जाने का ये मतलब थोड़े ना है कि आप ब्रांच में हमारा हालचाल लेने भी न आएं।

एमडीएच मसाले के विज्ञापन में युवा जोड़े मस्ती में झूम रहे होते हैं कि बुजुर्ग सामने आ जाते हैं। लड़की तुरंत सिर पर दुपट्टा डालकर बुजुर्ग का पैर छूती है। पीछे से आवाज आती है, हमारे संस्कार ही हमारी पहचान हैं। भारतीय संस्कारों को ही दिखाने वाला हमारा बजाज का विज्ञापन आजकल कुछ कम दिखता है। लेकिन, इसकी भी जबरदस्त अपील थी। बाइक पर घूमता नौजवान रास्ते में धार्मिक निशान देखकर बाइक उस पर जाने से बचाने में कामयाब होता है तो, खुश हो जाता है। बाइक पर लड़के से सटकर बैठी लड़की एक अधेड़ उम्र दंपति को देखकर लड़के की कमर से अपना हाथ हटा लेती है। रिलायंस का बोल इंडिया बोल सीरीज तो, कमाल की है ही। हम भारतीयों की आदत कुछ ज्यादा बोलने की, दूसरों को मौका मिलते ही ज्ञान देने की होती है। लेकिन, पैसा फूंकना अब भी हम भारतीयों की आदत में कम ही है। इसे रिलायंस के विज्ञापन में अच्छे से पकड़ा गया है। एयरटेल में दादाजी और पोते की मोबाइल के जरिए शतरंजबाजी भी कुछ ऐसी ही है। गहनों के तो, सारे ब्रांड गहने बेचने से ज्यादा जोर भावनाएं दिखाने में करते हैं।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का सिर्फ बैंकिंग और कुछ नहीं। स्प्राइट का सिर्फ प्यास बुझाए यार, बाकी सब बकवास। अपनी खास खूबी को बताने वाले विज्ञापन हैं। ये दोनों विज्ञापन ज्यादा समझ में इसलिए आते हैं कि अगर आपमें कोई खूबी तो उसी का इस्तेमाल कीजिए फालतू की हवा-हवाई बातों से बात बनती कम है, बिगड़ती ज्यादा है। ऐसे ढेर सारे विज्ञापन हैं। मुझे तो, बस यही सूझता है काश ऐसे आइडिए हमारी जिंदगी में भी काम कर पाते। हमारी दुनिया भी विज्ञापनों जितनी हसीन हो पाती।

महाराष्ट्र में महा "माया" की आहट

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के कब्जे के बाद मुंबई में जगह-जगह नीले निशान नजर आने लगे। फ्लाईओवर और चौराहों पर नीले रंग से उत्तर प्रदेश के बाद अब दिल्ली-महाराष्ट्र की बारी है, लिखा दिखने लगा। वैसे तो, ये अकसर होता है कि किसी राज्य में पार्टी का मुख्यमंत्री बनने पर दूसरे राज्यों में भी उस पार्टी के कार्यकर्ता अपनी थोड़ी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। लेकिन, इस बार मामला थोड़ा अलग है। उत्तर प्रदेश से सटे होने की वजह से दिल्ली मे बसपा के झंडे लगी गाड़ियां अब घूमती हुई मिल भी जाती हैं। लेकिन, मायावती की असल नजर महाराष्ट्र पर है और मायावती ने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है।

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद से मायावती ने महाराष्ट्र के लिए अपनी जमीन मजबूत करनी शुरू कर दी थी। यही वजह थी कि रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडाय यानी RPI के अध्यक्ष रामदास अठावले के बुलाने पर भी मायावती उनके सम्मेलन में नहीं आईं। मायावती का इरादा साफ है दलित नेता के तौर पर देश में वो किसी और के साथ मंच साझा नहीं करना चाहतीं। सत्ता के लिए दूसरी जातियों के साथ समीकरण बिठाने का उत्तर प्रदेश का आजमाया दांव वो महाराष्ट्र में भी खेलने जा रही हैं। फर्क सिर्फ इतना होगा कि महाराष्ट्र में मायावती ब्राह्मण-दलित के साथ अन्य पिछड़ी जातियों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेंगी। यहां मुलायम जैसा पिछड़ों का कोई एक नेता न होने का लाभ मायावती लेना चाहती हैं। और, मायावती पिछड़ी जातियों में भी जो ज्यादा दबी हुई जातियां हैं, उन्हें पटाने की है। क्योंकि, पिछड़ी जातियां शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस में बंटी हुई हैं। खैरलांजी हत्याकांड जैसे मामले मायावती के राज्य में आने की अच्छी जमीन तैयार कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अंबेडकर की मूर्ति का सिर टूटने के बाद उत्तर प्रदेश से ज्यादा तगड़ी प्रतिक्रिया महाराष्ट्र में हुई थी। जिससे एक बात तो, साफ है दलितों को नेता मिलने भर की देर है जो, शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के क्षत्रपों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे सके। और, मायावती इस काम में माहिर हैं, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए।

साथ ही मायावती के खेल में बिहार-उत्तर प्रदेश से आकर महाराष्ट्र में आकर बस गए लोग भी अच्छे से फिट हो रहे हैं। मराठियों के अलावा बाहर से आकर राज्य में बसने वाले करीब 10 प्रतिशत हैं। उत्तर प्रदेश में सत्ता आने के बाद वहां से आए हुए परिवारों में आसानी से बसपा की वकालत करने वाले लोग भी मिल जाएंगे। बाहर से आए लोग जिस तरह से शिवसेना-महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के निशाने पर रहते हैं, उससे मायावती को इन्हें इकट्ठा करने में आसानी होगी। मायावती अपनी शुरुआत उन दस लाख दलितों-बौद्धों से करना चाह रही हैं। जो, अभी उहापोह की स्थिति में हैं। रामदास अठावले की RPI का कैडर मायावती के लिए ही मजबूत आधार बनता दिख रहा है। पंचायत चनावों में बसपा के पक्ष में ये बदलाव साफ दिखा। कई जिला परिषद और पंचायत समितियों में भी लाल झंडा लहरा रहा है। बसपा अकेले लड़कर म्युनिसिपल काउंसिल की 24 सीटें जीतने में कामयाब हुई है। म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में भी उसे 20 सीटें मिली हैं। हालांकि, सीटों के लिहाज से ये कोई खास संख्या नहीं हैं। लेकिन, शून्य से मायावती के लिए विधानसभा चुनाव के लिए अच्छे संकेत माने जा सकते हैं।

मायावती ने सामाजिक जोड़तोड़ भी शुरू कर दी है। महाराष्ट्र में ब्राह्मण और ऊंची जातियां चार प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही हैं लेकिन, मायावती ने इनके बड़े हिस्से को पटाने की मुहिम शुरू कर दी है। मायावती ब्राह्मणों की एक बड़ी रैली दिसंबर में करने वाली हैं। नासिक के एक प्रभावी ब्राह्मण महंत सुधीरदास बसपा के लिए रणनीति तैयार करने में लगे हैं। कुल मिलाकर मायावती ने अपनी तरफ से महाराष्ट्र में एक नए ध्रुवीकरण की मजबूत तैयारी कर ली है। लेकिन, मायावती के लिए महाराष्ट्र में आने वाले विधानसभा चुनाव में बहुत अच्छे परिणाम की उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि, यहां उत्तर प्रदेश की तरह ध्रुवीकरण नहीं है। सामाजिक समीकरण भी वहां से बहुत अलग हैं। लेकिन, इतना तो तय है कि ये चुनाव महाराष्ट्र में ‘माया’ के आने वाले समय के संकेत तो दे ही जाएंगे।

Monday, October 29, 2007

सिगरेट पीने वाले कुंआरे रह जाएंगे!

अभी जॉन अब्राहम और आयशा टाकिया की एक फिल्म आई है नो स्मोकिंग। फिल्म में जॉन अब्राहम को जबरदस्त सिगरेटबाज दिखाया गया है। जिसकी कोई भी बात सिगरेट के बिना पूरी नहीं होती। फिल्म का मकसद सिगरेट के खिलाफ मुहिम में शामिल होना है। फिल्म के विज्ञापन में भी वैधानिक चेतावनी दी गई है कि सिगरेट पीना कान, उंगली, परिवार, दिमाग और आत्मा के लिए नुकसान देह है।
फिल्म की नसीहत कितने लोगों को समझ में आई होगी ये पता नहीं। लेकिन, तिरुवनंतपुरम के कॉलेज की लड़कियों के दिखाए रास्ते पर अगर दूसरी लड़कियां भी चल पड़ी तो, सिगरेट के धुंए में जिंदगी का मजा तलाशने वालों को जिंदगी अकेले ही बितानी पड़ेगी। तिरुवनंतपुरम के सेंट थेरस वूमेन्स कॉलेज की सभी लड़कियों ने रविवार को ये शपथ ली कि वो किसी सिगरट पीने वाले से शादी नहीं करेंगी।
साफ है कि 1,500 सिगरेट न पीने वाले लड़के ही यहां की लड़कियों से शादी कर पाएंगे। शपथ भी सुनेंगे तो, सिगरेट पीने वालों की तो आत्मा ही कांप जाएगी। प्रसिद्ध गायक येशुदास ने ये शपथ दिलाई। लड़कियों ने शपथ दिलाई कि सिगरेट पीने वाले शैतान हैं। उनसे मानवता को बड़ा खतरा है। इसलिए हम ऐसे लोगों के साथ अपनी जिंदगी नहीं जोड़ेंगे।
सेंट थेरस कॉलेज की प्रिंसिपल को जब एक एनजीओ ने इसके लिए संपर्क किया तो, समाज में सिगरेट पीने वालों को एक कड़ा संदेश देने के लिए वो मान गईं। और, अच्छी बात ये रही कि सभी 1,500 लड़कियां इसमें उत्साह से शामिल हुईं। अब अगर इन लड़कियों का रास्ता कुछ और लड़कियों को पसंद आ गया तो, लड़कों को कुछ और ही रास्ता तलाशना होगा।

सरकारी देरी की कीमत देश भर चुका है 24,000 करोड़ रु, आगे कितना भगवान जाने?

मैं मुंबई से इलाहाबाद के सफर में रेलगाड़ी की 2-3 घंटे की देरी पर गुस्साता हूं। चिढ़ भी आती है, जब अच्छी भली चली आ रही रेलगाड़ी अचानक किसी आउटर पर लाल सिगनल के आगे बेबस खड़ी हो जाती है और देरी पर देरी होने लगती है। मुझे लगता था मेरे जैसे इस रेलगाड़ी में बैठे कितने लोगों का समय बरबाद हो रहा है। लेकिन, सिर्फ समय बरबाद हो रहा है ऐसा नहीं है। इस तरह की सरकारी देरी की वजह से देश के लोगों का 24,000 करोड़ रुपया अब तक बरबाद हो रहा है। और, सरकारी प्रोजेक्ट में देरी कितनी बढ़ेगी और आपकी जेब पर कितना बोझ बढ़ेगा, इसका सही-सही अंदाजा लगा पाना कौन बनेगा करोड़पति के सवाल के जवाब देने जैसा ही है।
मुझे अकसर अपनी रेलगाड़ी की देरी की चिंता सताती रहती है। लेकिन, आज मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेश की एक रिपोर्ट देखने के बाद समझ में आया कि इस तरह की छोटी-छोटी सरकारी देरियों की हमें कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे के 32 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। यानी इनकी शुरुआत मे जो, समयसीमा तय की गई थी वो, पूरी नहीं हो पा रही है। शायद यही वजह है कि लालू के चमत्कारी मैनेजरों! ने 178 प्रोजेक्ट की कोई समयसीमा ही नहीं तय की है। साफ है जब समयसीमा ही नहीं होगी तो, रेल बजट में लालू को कोई देरी पर उंगली नहीं उठा पाएगा। और, ये नुस्खा सिर्फ लालू का ही मंत्रालय नहीं आजमा रहा है। दूसरे मंत्रालयों ने 218 से ज्यादा प्रोजेक्ट की कोई समयसीमा नहीं रखी है।
रेलवे जैसे देश के लोगों की दूसरी जरूरी जरूरतों के प्रोजेक्ट भी लगातार पिछड़ रहे हैं। रोड ट्रांसपोर्ट यानी सड़क-पुल-फ्लाईओवर के 93 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। रेलवे, सड़क देरी से बन रही हैं तो, तेजी से बढ़ते एविएशन सेक्टर की बुनियाद की शुरू में ही बुरा हाल है। अभी एविएशन के 12 प्रोजेक्ट देर हो चुके हैं। बुनियादी जरूरतों में जगह बना चुके टेलीकॉम का भी यही हाल है। टेलीकम्युनिकेशन के 36 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। बिजली जैसी दूसरी बड़ी जरूरत के 27 प्रोजेक्ट समय से बहुत पीछे चल रहे हैं। हर गरमी में बिजली पर सरकारें राजनीति खूब कर लेती हैं। लेकिन, समय से प्रोजेक्ट पूरा कराने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठा पाती।
पेट्रोलियम और कोयला के 25 और शिपिंग के 22 प्रोजेक्ट अपने तय समय से काफी पीछे चल रहे हैं। शहरी विकास मंत्रालय का भी हाल अच्छा नहीं है। शहरी विकास के 11 प्रोजेक्ट समय से पूरे होते नहीं दिख रहे। और यही हाल स्टील मंत्रालय का भी है।
हाल ये है कि 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के 63 से ज्यादा प्रोजेक्ट देरी से पूरे हो रहे हैं। 100 करोड़ रुपए से कम वाले तो, 426 प्रोजेक्ट पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं। ये प्रोजेक्ट एक महीने से 16 साल तक की देरी से चल रहे हैं। यही वजह है कि अटल बिहारी बाजपेयी की एनडीए सरकार के समय में शुरू हुई स्वर्णिम चुतुर्भुज योजना अभी कई जगह आपस में जुड़ ही नहीं सकी है।
अब जब इतने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में देरी पर सरकार को कोई चिंता नहीं होती है। तो, मेरे जैसे कुछेक हजार खर्च कर रेलगाड़ी से घर जाने वालों के समय की चिंता सरकार को भला क्यों होगी।

18 घंटे का सफर 26 घंटे में क्यों पूरा होता है?

अक्सर लालू पुराण चर्चा में रहता है। सब कह रहे हैं कि लालू ने कमाल कर दिया है। लालू ने रेलवे को पटरी पर ला दिया है। घाटा कम कर दिया है, मुनाफा ही मुनाफा हो रहा है। रेलवे आधुनिक होती जा रही है। रेलगाड़ियां, एयर लाइंस से टक्कर लेने लगी हैं। अभी मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया पर हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हो कर लौटा तो, ये सब लालू की पब्लिक रिलेशन एक्सरसाइज भर लगी। जाते और आते दोनों समय रेलगाड़ी दो घंटे से ज्यादा की देरी से पहुंच पाई।

मुंबई से इलाहाबाद मैं महानगरी एक्सप्रेस से गया। महानगरी एक्सप्रेस में नए बने डिब्बे लगे हैं। तृतीय श्रेणी की वातानुकूलित बोगियों में भी बढ़िया चार्जिंग प्वाइंट लगे थे। लेकिन, अब तक इस गाड़ी में पैंट्री कार नहीं लग पाई है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से चली गाड़ी जबलपुर तक बड़े मजे से सफर तय करती रही लगा कि गाड़ी समय से कुछ पहले ही पहुंच जाएगी। लेकिन, मानिकपुर पहुंचते-पहुंचते उम्मीदें धूमिल होने लगी। मानिकपुर तक समय से कुछ पहले ही पहुंची गाड़ी ने इलाहाबाद स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते 2 घंटे की देरी कर दी।

मानिकपुर और नैनी के बीच गाड़ी करीब चार जगह 20-20 मिनट के लिए रुकी। नैनी पर भी गाड़ी को ज्यादा समय तक रुकना पड़ा। नैनी पार करने के बाद भी बात बनी नहीं और गाड़ी को 5 मिनट तक प्लेटफॉर्म खाली होने का इंतजार करना पड़ा। 12 बजे पहुंचने वाली महानगरी इलाहाबाद 1.45 बजे पहुंची।
इलाहाबाद से वापसी का टिकट बनारस सुपरफास्ट एक्सप्रेस में था। गाड़ी इलाहाबाद स्टेशन से एकदम सही समय पर छूटी। लेकिन, मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल यानी कुर्ला स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते फिर 2 घंटे देर हो गई। बनारस सुपरफास्ट की रफ्तार भुसावल से पहले ही टांय-टांय फिस्स हो गई थी। रही-सही कसर नासिक के बाद पूरी हो गई। इगतपुरी से कुर्ला पहुंचने में करीब ढाई घंटे लग गए। गाड़ी जब-जब रुकी ज्यादातर बार यही होता था किसी गाड़ी के पास होने का इंतजार किया जा रहा है। अब सवाल ये है कि अगर लालू यादव की रेल ने 20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का मुनाफा कमाया है तो, पटरी इतनी क्यों नहीं लग पा रही है कि गाड़ी उस पर अपनी रफ्तार से दौड़ सके।

बार-बार बुलेट ट्रेन और तेज रफ्तार वाली रेलगाड़ियों की योजना बनती-बिगड़ती रहती है। लेकिन, पहले अपनी रेलगाड़ियों की अभी जो ताकत है, उसी पर उनको पूरी रफ्तार से दौड़ाने की कोशिश क्यों नहीं हो पा रही। मेरे जैसे लोग जिनको बड़ी मुश्किल से इलाहाबाद (घऱ) जाने की छुट्टी मिल पाती है। अगर, सफर में दोनों तरफ 26 की बजाए 20 या 18 घंटे लगें तो, इतना लंबा सफर शायद कुछ कम पीड़ादायक लगे। ये गाड़ियां आसानी से 4-6 घंटे दोनों तरफ बचा सकती हैं। बस इन्हें पटरियां खाली मिलें। तभी ये कहना सही होगा कि लालू की रेल पटरी पर आ गई है। वैसे ये सिगनल न मिलने वाली रुकावट सिर्फ मुंबई-इलाहाबाद रूट पर ही नहीं है। मैं दिल्ली से इलाहाबाद एक बार प्रयागराज एक्सप्रेस से आ रहा था। सुबह 6.45 बजे आने वाली प्रयागराज समय से आधे घंटे पहले ही सूबेदारगंज के आउटर पर आकर खड़ी हो गई। मतलब दिल्ली से इलाहाबाद से प्रयागराज एक्सप्रेस के समय में भी आधे-आधे घंटे दोनों तरफ से हर रोज बचाए जा सकते हैं।
अभी बहुत सी एक्सप्रेस रेलगाड़ियां हैं जो, 24 घंटे से ज्यादा की दूरी तय करती हैं लेकिन, उनमें बमुश्किल ही मोबाइल या लैपटॉप के चार्जिंग प्वाइंट लग पाए हैं। साफ-सफाई का ठेका यूरेका फोर्ब्स को देने के बाद भी 27 अक्टूबर को मुंबई आ रही बनारस सुपरफास्ट एक्सप्रेस की सफाई के लिए 2 बार अनाउंसमेंट कराने पर भी कोई सफाई कर्मचारी नहीं आ पाया। इस ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे घुटन का सा अहसास देते रहते हैं। और, लालू यादव इसको बेहतर करने के बजाए उन्हीं डिब्बों में और सीटें जोड़ने की जुगत बना रहे हैं।
मुझे खबर पढ़ने को मिली थी कि इलाहाबाद से मानिकपुर एक ही ट्रैक की वजह से देरी होती है। और, 2 ट्रैक करने के इसके एक हिस्से का काम पूरा हो गया है, दूसरे हिस्से का काम दिसंबर तक पूरा हो जाएगा तो, डेढ़ से दो घंटे बचाए जा सकेंगे। लेकिन, भुसावल से कुर्ला पहुंचने में हुई देरी की वजह मैं नहीं समझ पाया। उम्मीद करता हूं की अगली बार इलाहाबाद के लिए टिकट बुक कराऊंगा तो, टाइम टेबल में 24 घंटे का समय घटकर 22 घंटे तो, हो ही जाएगा और इतने समय में ट्रेन पहुंच भी जाएगी। मेरा भरोसा कितना पूरा होगा इस पर कुछ प्रकाश तो, ज्ञानदत्तजी डाल ही सकते हैं। और, मेरे जैसे लोगों की पीड़ा कुछ ऊपर तक पहुंचा भी सकते हैं।

Friday, October 26, 2007

कौन बनाएगा मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट

(मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के फोटो जर्नलिज्म और विजुअल कम्युनिकेशंस डिपार्टमेंट की ओर से कराई गई राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हुआ था। उसमें मुझे पहले सत्र में कौन बनाएगा मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट विषय पर बोलने के लिए बुलाया गया था। ये लेख उसी भाषण का हिस्सा है)
मीडिया के लोग इस समय सबसे ज्यादा किसी बात से परेशान हैं तो, वो ये कि सरकार उनकी स्वायत्तता या यूं कह लें कि स्वतंत्र सत्ता पर हमला करने की तैयारी में है। हफ्ते भर में एक बार तो किसी न किसी बहाने सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी मीडिया के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट की बात कर ही देते हैं। मुंशीजी का प्रस्तावित कोड ऑफ कंडक्ट ऐसा है कि आज की तारीख में काम कर रहे ज्यादातर न्यूज चैनलों पर कभी भी किसी जिलाधिकारी के डंडे की चोट पड़ सकती है।

अभी चुनावों की आहट से मुंशीजी का मीडिया को काबू करने का प्रिय प्रोजेक्ट भले ही पीछे चला गया हो। लेकिन, देर-सबेर ये होना ही है। अब सवाल ये है कि क्या मीडिया को सरकारी कोड ऑफ कंडक्ट से चलाया जा सकता है। लेकिन, साथ ही जुड़ा हुआ सवाल ये है कि क्या मीडिया इतनी जिम्मेदारी से अपना काम कर पा रहा है कि उसे किसी कोड ऑफ कंडक्ट की जरूरत न पड़े या कोड ऑफ कंडक्ट बने तो, उसे कौन तय करेगा।

हाल के दिनों की दिल्ली की दो घटनाएं- एक दिल्ली की स्कूल टीचर के खिलाफ जनमत से लाइव इंडिया बने चैनल का स्टिंग ऑपरेशन। और, दूसरा कुछ तथाकथित पत्रकारों का एक सांसद से स्टिंग की धमकी देकर वसूली की कोशिश- ये दोनों ऐसी घटनाएं हैं, जिसके बाद मीडिया के लिए कोड ऑफ कंडक्ट की वकालत करने वालों का पक्ष मजबूत होता है। लाइव इंडिया को इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की वजह से ऑफ एयर भी कर दिया गया था। और, ये सिर्फ इत्तफाक नहीं है कि इस बार देश के प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड के मौके पर हुए पैनल डिस्कशन में सबने एक-दूसरे से यही सवाल पूछा या यूं कहें कि खुद को कसौटी पर कसने की कोशिश की।

उस मंच पर एक साथ बड़े-बड़े पत्रकार बैठे हुए थे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों को चलाने वाले लोग थे। कुछ ऐसे थे जो, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों में ही अपनी अच्छी छाप छोड़ चुके हैं। अखबारों-टीवी चैनलों की सुर्खियां बनने वाले बड़े-बड़े नेता बहस को सुनने वालों में थे। बहस की शुरुआत ही इसी से हुई कि क्या बाजार टीवी चैनलों या पूरे मीडिया को ही इस तरह से चला रहा है कि उसमें इस बात की कोई जगह ही नहीं बची है कि एक्सलेंट जर्नलिज्म किया जा सके। या फिर बदलते जमाने के साथ जर्नलिज्म के पैमाने भी बदल रहे हैं और इसी दौर की वजह से मीडिया भटका हुआ दिख रहा है।

यही भटकाव है कि टीवी चैनल शुरू करने के साथ चैनल का नया-नया एडिटर पहला काम जो सोचता है वो, टीआरपी बढ़ाने के लिए किसी बढ़िया स्टिंग ऑपरेशन का। स्टिंग ऑपरेशन में सेक्स स्कैंडल या फिर कहीं किसी को पैसे लेते-देते दिखाने को मिल जाए तो, फिर तो मजे ही आ जाते हैं। लेकिन, इस स्टिंग ने अगर टीवी के जरिए कई बड़े खुलासे देश के लोगों के सामने रखे तो, यही स्टिंग ऑपरेशन अब मीडिया को कोड ऑफ कंडक्ट में बांधने की बात मजबूत करते हैं।

वैसे रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड के पैनल से उस समय के राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने एक सवाल पूछा जो, कोड ऑफ कंडक्ट लागू करने की वजह तो बता ही देता है। कलाम ने मीडिया के दिग्गजों से सिर्फ एक ही सवाल पूछा कि क्या वो देश के लोगों को ऊपर उठाने में कोई मदद कर रहे हैं। क्या वो गरीब रेखा के नीचे बसने वाले देश के बाइस करोड़ लोगों को ऊपर उठाने के लिए भी कोई खबर दिखाते हैं। कलाम ने A+B+C पर मीडिया को काम करने की सलाह दी। A यानी देश की जीडीपी, देश के विकास में मीडिया का योगदान, B यानी देश की बाइस करोड़ जनता जो, गरीबी रेखा से नीचे है, उनके लिए मीडिया क्या कर सकता है और C जो, कलाम ने सबसे जरूरी बताया वो, ये कि देश में वैल्यू सिस्टम को बनाए रखने में मीडिया की भूमिका।

सवाल जायज था लेकिन, मीडिया के दिग्गजों में से किसी से भी इस बात का जवाब देते नहीं बना। अब अगर हम कलाम साहब की इस बात को समझ सकें तो, ये भी समझ में आ जाएगा कि मीडिया में किस तरह के कोड ऑफ कंडक्ट की जरूरत है। मीडिया समाज को आगे बढ़ाने में मदद करता है तो, मीडिया की विश्वसनीयता और मीडिया का सम्मान बढ़ता है और इस सम्मान पर खरा उतरने का दबाव ही मीडिया के लिए सबसे बढ़िया कोड ऑफ कंडक्ट हो सकता है।

कोड ऑफ कंडक्ट का सवाल सिर्फ स्टिंग ऑपरेशन से ही नहीं आ रहा है। भूत-प्रेत-ओझा-बाबा-अजब-गजब दिखाने की टीवी चैनलों की होड़ ने भी मीडिया को कोड ऑफ कंडक्ट के दायरे में बांधने की राय मजबूत की है। हाल ये है कि गाल में भाला घुसेड़ने वाला आधे घंटे तक लगातार टीवी की टीआरपी बढ़ाता रहता है। टीआरपी के भय से ही कभी भी कोई भी हिंदी चैनल लगातार चार-पांच घंटे तक या शायद फिर दिन भर भूत-प्रेत-आत्मा-हवेली में घुंघरू की झनकार-हत्यारा प्रेमी/प्रेमिका-हिला देना वाला खुलासा-टीवी की अब तक की सबसे सनसनीखेज खबर-टेलीविजन इतिहास में पहली बार-14 साल के गांव के बच्चे में अमेरिकी वैज्ञानिक की आत्मा, जैसे शीर्षकों से खुद को बेचने की कोशिश करता रहता है।

इसी टीआरपी की वजह से टीवी इस्तेमाल भी हो रहा है। कोई राखी सावंत और मीका कई हफ्तों तक टीवी की सबसे बड़ी सुर्खी बने रहते हैं। और, साफ है कि दोनों ने पब्लिसिटी के लिए ये काम किया नहीं तो, एक दूसरे के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाए हर सार्वजनिक मंच पर उसी बात को उछालने की कोशिश क्यों करते। उदाहरण एक नहीं है। ताजा उदाहरण है टीवी एक्ट्रेस श्वेता तिवारी और उसके पति राजा का। दोनॆ ने मारपीट की और मीडिया में खूब दिखने के बाद कहा- मीडिया को उल्लू बन दिया। हमें तो, सिर्फ पब्लिसिटी चाहिए थी।

मीडिया का इस्तेमाल और इसके प्रति लोगों की राय का अंदाजा सुपर स्टार शाहरुख खान के एक बयान से अच्छे से लगाया जा सकता है। शाहरुख मानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुतों को नहीं पता कि उन्हें क्या करना चाहिए। उनका कहना है कि उनका रिश्ता मीडिया के सिनर्जी का है वो, मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और मीडिया उनका।

वैसे कुछ इस्तेमाल करने के चक्कर में टीवी पत्रकार बेकार भी बन रहे हैं। किसी भी बिकाऊ वीडियो पर न्यूजरूम में सिर्फ एक ही आवाज आती है सीधे चला दो। इसमें करना ही क्या है। चैनलों पर तो, आधे-एक घंटे तक देश के किसी भी हिस्से में लोगों को हंसा रहे राजू श्रीवास्तव या फिर कोई दूसरा कॉमेडी कलाकार लाइव कटा रहता है। उससे छूटे तो, कहीं कोई सुंदर बाला देह दर्शना नृत्य या कृत्य कर रही हो तो, उसे लाइव काट दीजिए।

कुछ एक न्यूज चैनल में तो, कुछ प्रोड्यूसर इसीलिए रखे जाते हैं कि उन्होंने एंटरटेनमेंट चैनलों को ध्यान से देखा उसको रिकॉर्ड कराया। उसके बीच-बीच में तीस-चालीस सेकेंड के कुछ लच्छेदार एंकर लिंक डाले और 9 मिनट का ब्रेक मिलाकर तीस मिनट का बढ़िया टीआरपी वाला बुलेटिन तैयार कर डाला। शायद इसके लिए भी किसी न किसी कोड ऑफ कंडक्ट की जरूरत है।

लेकिन, क्या मीडिया में सरकारी कोड ऑफ कंडक्ट के दबाव में एक्सलेंट जर्नलिज्म हो पाएगा। जाहिर है अखबार या टीवी चैनल ऐसा होना चाहिए जिसमें रोटी-दाल-चावल-सब्जी-अचार-मसाला सबकुछ हो। लेकिन, क्या कभी भी किसी खाने की थाली में अचार या मसाला सबसे ज्यादा हो सकता है। तीखा से तीखा खाने वाले भी दो-तीन मिर्च या छोटी कटोरी में अचार से ज्यादा नहीं पचा पाते। लेकिन, रोटी-दाल-चावल तो सबको पेट भरके चाहिए ही।

एक्सलेंस जर्नलिज्म के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया सचमुच एक बड़ा उदाहरण है जो, बाजार और पढ़ने वालों की जरूरतों के लिहाज से खुद को लगातार एक्सलेंट बनाता जा रहा है। लेकिन, अंग्रेजी और अग्रेजी बिजनेस जर्नलिज्म (द इकोनॉमिक टाइम्स) में बेहतर काम करने वाला टाइम्स ग्रुप भी हिंदी (नवभारत टाइम्स) में ये काम नहीं कर पा रहा है।

देश के सबसे बड़े हिंदी अखबारों दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर को अग्रेजी के टाइम्स ऑफ इंडिया से सबक लेना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया भी ज्यादातर इसी बात के लिए चर्चा में रहता है कि उसके दिल्ली या मुंबई टाइम्स या फिर सप्लीमेंट के रंगीन पन्नों पर सुंदर फोटो होते हैं। लेकिन, इसी के बीच जैसे-जैसे अखबार मजबूत(सर्कुलेशन के लिहाज से) और कमाऊ (विज्ञापनों के लिहाज से) बनता गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबरों की गुणवत्ता बेहतर होती गई। अब तो, शनिवार-रविवार के टाइम्स के अतिरिक्त पन्ने इंडियन एक्सप्रेस को भी कई बार मात देते दिखते हैं।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि हिंदी में भी टीवी न्यूज चैनल और अखबार इस दबाव से बाहर निकलें कि टीआरपी के लिए अपना मन मारकर शो चलाना ही पडेगा नहीं तो, मुकाबले में नहीं रह पाएंगे। क्योंकि, अगर टीआरपी और सर्कुलेशन के दबाव में टीवी-अखबार कुछ भी भौंडा सा चलाकर ये तर्क देकर बचते रहे कि लोग यही पसंद करते हैं। तो, फिर मीडिया में काम करने वालों को लोकतंत्र का चौथा खंभा समझने की गलती कोई क्यों करे। कोई क्यों मीडिया के लोगों का सम्मान करे। प्रियरंजन दासमुंशी जैसे लोग क्यों मीडिया को कोड ऑफ कंडक्ट के सरकारी डंडे से हांकने का मन न बना लें।

वैसे, भूत-प्रेत और टीआरपी की खबरें दिखाने वाले टीवी चैनलों को चलाने वाले और उसमें काम करने वाले भी इससे ऊब चुके हैं और इस वजह से टीवी चैनलों में आई एक बड़ी जमात इससे भागने की भी तैयारी में है। 100 करोड़ से ज्यादा का देश है। टीवी चैनल और अखबार हिम्मत तो, करें देश में भूत-प्रेत-अपराध, स्टिंग ऑपरेशन पसंद करने वाले टीवी देखने और अखबार पढ़ने वालों से कई गुना ज्यादा लोग अभी एक्सलेंट जर्नलिज्म को गुड बिजनेस बनाने के लिए तैयार हैं।

मीडिया पर भरोसा रखने वाले और इसे गाली देने वाले दोनों ही वर्गों के लोग ये मानते हैं कि मीडिया में किसी को भी आदर्श और भ्रष्ट बना देने की ताकत है। इसलिए कोड ऑफ कंडक्ट तो जरूरी है। लेकिन, मीडिया के लिए कोड ऑफ कंडक्ट जनता का भरोसा बचाए रखने के दबाव से आना चाहिए। इस्तेमाल होने और इस्तेमाल करने की मानसिकता से बाहर निकलने से।

Wednesday, October 17, 2007

बाजार ने दिया सुपरहिट फिल्म का मसाला

बॉलीवुड को आज शेयर बाजार से सुपरहिट फिल्म का एक जोरदार फॉर्मूला मिल गया होगा। जिसके बॉक्स ऑफिस तोड़ देने की पूरी गारंटी है। चिदंबरम जैसा हीरो जिसने खुद ही फिल्म की पटकथा लिखी हो। दामोदरन जैसा बेहतरीन निर्देशक, जिसने पटकथा को परदे पर खूबसूरती से उतार दिया। और, फिल्म में FII कलाकार के रोल में थे तो पी नोट जैसा आइटम सांग भी था। कुछ ऐसा ही आज बाजार में देखने को मिला।
सेंसेक्स फिर 19,000 के करीब पहुंच गया है। करीब 300 प्वाइंट नीचे रह गया है। दरअसल आज सुबह बाजार में जो बरबादी शुरू हुई थी। उससे तो यही लग रहा था कि आज सेंसेक्स-निफ्टी गिरने के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ देंगे। लेकिन, मुस्कुराते हुए चिदंबरम का बयान आया कि शाम तक सब सामान्य हो जाएगा, ठीक वैसा ही हुआ। यानी, सुबह खुलते ही 1,500 प्वाइंट से ज्यादा गिरने वाला सेंसेक्स और करीब 10 प्रतिशत तक गिरने वाला निफ्टी में थोड़ी गिरावट ही बची रह गई। 19,000 पर पहुंचे सेंसेक्स और 5,000 के ऊपर पहुंचे सेंसेक्स निफ्टी के लिए 300 और 100 प्वाइंट के आसपास की गिरावट अब मामूली ही रह गई।
खैर, अगर कल रात से आज यानी मंगलवार रात से बुधवार रात तक का घटनाक्रम देखें तो, सब कुछ फिल्मी ड्रामे जैसा लगता है। चिदंबरम की लिखी पटकथा (स्क्रिप्ट) के मुताबिक ही सब कुछ हुआ। बाजार डरा, FII सहमे, छोटे निवेशक बरबादी के कगार पर खड़े नजर आए, बुधवार को बाजार में बवंडर उठता दिखा लेकिन, अचानक हिंदी फिल्मों की तरह परदे पर फिल्म के नायक यानी चिदंबरम ने एंट्री ली और सब कुछ बढ़िया होने लगा।
फटेहाल दिख रहे सेंसेक्स-निफ्टी के घर की चूती दीवारों पर नेरोलक पेंट लग गया। बढ़िया जेपी सीमेंट की मजबूत दीवार बन गई। निवेशकों का भरोसा लौटा और फिर सें सेंसेक्स-निफ्टी में भेड़ की जगह सांड़ दौड़ने लगे। सेंसेक्स के 11,000 पर पहुंचने के साथ ही ये बात RBI गवर्नर रेड्डी बार-बार कह रहे थे कि ये बिना पहचान बताए शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों पर रोक जरूरी है। लेकिन, तब मनमोहन-चिदंबरम की जादुई जोड़ी के सामने 10 प्रतिशत की विकास दर के नजदीक पहुंचने की चिंता थी। इसलिए बाजार की रफ्तार भी जरूरी थी।
भले ही बाजार में लगने वाले पैसे के बारे में किसी को कुछ पता ही न हो। अब अगर शेयर बाजार में ओसामा बिन लादेन या दाउद इब्राहिम भी पैसा लगाना चाहें तो, धीरे से लगा सकते हैं सरकार को पता भी नहीं चलेगा। हो, सकता है लगा ही हो। शेयर बाजार में ऐसे पैसे से देश की सुरक्षा को खतरे के बारे में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नारायणन पहले कई बार चिंता जता चुके हैं।
दरअसल आज एक इशारे से बाजार को तबाह करने वाले पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए बाजार में पैसा लगाने वाले विदेशी निवेशकों के लिए अपनी पहचान बताना भी जरूरी नहीं होता है। साफ है फिर ये रास्ता काली कमाई के लिए सबसे आसान है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तीन साल पहले FII के जरिए शेयर बाजार में 31,000 करोड़ से कुछ ज्यादा पैसे बाजार में लगे थे। इस समय 3,50,000 करोड़ से भी ज्यादा बाजार में FII’s का है।
अब आप समझ सकते हैं कि शेयर बाजार की इस तेजी में देसी निवेशकों को कितना फायदा हो रहा है। वैसे, एक बात और सामने आ रही है कि देश की काली कमाई FII’s के जरिए शेयर बाजार में लग रही है। ज्यादातर जानकार पी-नोट के जरिए FII’s के बाजार में पैसा लगाने पर लगाम के सेबी के फैसले को बाजार के लिए बेहतर बता रहे थे फिर चिदंबरम को और दामोदरन को सफाई क्यों देनी पड़ी।
मंगलवार देर रात सेबी को ऐसा फैसला लेने की क्या जरूरत थी जिस पर प्रतिक्रिया देने के लिए बाजार के सट्टेबाजों को पूरा समय मिल गया। दामोदरन ने मंगलवार रात को ही ये सफाई क्यों नहीं दी। डेढ़ हजार प्वाइंट से ज्यादा की गिरावट के बाद कहां से इतनी खरीद हुई कि सूख गए सेंसेक्स में फिर हरियाली लौट आई।
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले से ही 10.30 बजे की प्रेस कांफ्रेंस तय कर रखी थी। प्रेस कांफ्रेंस करते समय चिदंबरम के चेहरे पर चिंता के कोई भाव नहीं थे। चिदंबरम ने कहा शाम तक सब ठीक हो जाएगा और ठीक हो गया। इससे क्या संकेत माने जाएं। वैसे, एक और बात जो आज दिन भर सबसे ज्यादा चर्चा में रही कि इस समय बाजार में सीधे और FII’s के जरिए बड़े नेताओं के करोड़ो लगे हुए हैं। यानी फिल्म अभी पूरी नहीं हुई है। इसका पार्ट-2 भी जल्द ही देखने को मिलेगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...