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Wednesday, October 17, 2007

बाजार ने दिया सुपरहिट फिल्म का मसाला

बॉलीवुड को आज शेयर बाजार से सुपरहिट फिल्म का एक जोरदार फॉर्मूला मिल गया होगा। जिसके बॉक्स ऑफिस तोड़ देने की पूरी गारंटी है। चिदंबरम जैसा हीरो जिसने खुद ही फिल्म की पटकथा लिखी हो। दामोदरन जैसा बेहतरीन निर्देशक, जिसने पटकथा को परदे पर खूबसूरती से उतार दिया। और, फिल्म में FII कलाकार के रोल में थे तो पी नोट जैसा आइटम सांग भी था। कुछ ऐसा ही आज बाजार में देखने को मिला।
सेंसेक्स फिर 19,000 के करीब पहुंच गया है। करीब 300 प्वाइंट नीचे रह गया है। दरअसल आज सुबह बाजार में जो बरबादी शुरू हुई थी। उससे तो यही लग रहा था कि आज सेंसेक्स-निफ्टी गिरने के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ देंगे। लेकिन, मुस्कुराते हुए चिदंबरम का बयान आया कि शाम तक सब सामान्य हो जाएगा, ठीक वैसा ही हुआ। यानी, सुबह खुलते ही 1,500 प्वाइंट से ज्यादा गिरने वाला सेंसेक्स और करीब 10 प्रतिशत तक गिरने वाला निफ्टी में थोड़ी गिरावट ही बची रह गई। 19,000 पर पहुंचे सेंसेक्स और 5,000 के ऊपर पहुंचे सेंसेक्स निफ्टी के लिए 300 और 100 प्वाइंट के आसपास की गिरावट अब मामूली ही रह गई।
खैर, अगर कल रात से आज यानी मंगलवार रात से बुधवार रात तक का घटनाक्रम देखें तो, सब कुछ फिल्मी ड्रामे जैसा लगता है। चिदंबरम की लिखी पटकथा (स्क्रिप्ट) के मुताबिक ही सब कुछ हुआ। बाजार डरा, FII सहमे, छोटे निवेशक बरबादी के कगार पर खड़े नजर आए, बुधवार को बाजार में बवंडर उठता दिखा लेकिन, अचानक हिंदी फिल्मों की तरह परदे पर फिल्म के नायक यानी चिदंबरम ने एंट्री ली और सब कुछ बढ़िया होने लगा।
फटेहाल दिख रहे सेंसेक्स-निफ्टी के घर की चूती दीवारों पर नेरोलक पेंट लग गया। बढ़िया जेपी सीमेंट की मजबूत दीवार बन गई। निवेशकों का भरोसा लौटा और फिर सें सेंसेक्स-निफ्टी में भेड़ की जगह सांड़ दौड़ने लगे। सेंसेक्स के 11,000 पर पहुंचने के साथ ही ये बात RBI गवर्नर रेड्डी बार-बार कह रहे थे कि ये बिना पहचान बताए शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों पर रोक जरूरी है। लेकिन, तब मनमोहन-चिदंबरम की जादुई जोड़ी के सामने 10 प्रतिशत की विकास दर के नजदीक पहुंचने की चिंता थी। इसलिए बाजार की रफ्तार भी जरूरी थी।
भले ही बाजार में लगने वाले पैसे के बारे में किसी को कुछ पता ही न हो। अब अगर शेयर बाजार में ओसामा बिन लादेन या दाउद इब्राहिम भी पैसा लगाना चाहें तो, धीरे से लगा सकते हैं सरकार को पता भी नहीं चलेगा। हो, सकता है लगा ही हो। शेयर बाजार में ऐसे पैसे से देश की सुरक्षा को खतरे के बारे में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नारायणन पहले कई बार चिंता जता चुके हैं।
दरअसल आज एक इशारे से बाजार को तबाह करने वाले पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए बाजार में पैसा लगाने वाले विदेशी निवेशकों के लिए अपनी पहचान बताना भी जरूरी नहीं होता है। साफ है फिर ये रास्ता काली कमाई के लिए सबसे आसान है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तीन साल पहले FII के जरिए शेयर बाजार में 31,000 करोड़ से कुछ ज्यादा पैसे बाजार में लगे थे। इस समय 3,50,000 करोड़ से भी ज्यादा बाजार में FII’s का है।
अब आप समझ सकते हैं कि शेयर बाजार की इस तेजी में देसी निवेशकों को कितना फायदा हो रहा है। वैसे, एक बात और सामने आ रही है कि देश की काली कमाई FII’s के जरिए शेयर बाजार में लग रही है। ज्यादातर जानकार पी-नोट के जरिए FII’s के बाजार में पैसा लगाने पर लगाम के सेबी के फैसले को बाजार के लिए बेहतर बता रहे थे फिर चिदंबरम को और दामोदरन को सफाई क्यों देनी पड़ी।
मंगलवार देर रात सेबी को ऐसा फैसला लेने की क्या जरूरत थी जिस पर प्रतिक्रिया देने के लिए बाजार के सट्टेबाजों को पूरा समय मिल गया। दामोदरन ने मंगलवार रात को ही ये सफाई क्यों नहीं दी। डेढ़ हजार प्वाइंट से ज्यादा की गिरावट के बाद कहां से इतनी खरीद हुई कि सूख गए सेंसेक्स में फिर हरियाली लौट आई।
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले से ही 10.30 बजे की प्रेस कांफ्रेंस तय कर रखी थी। प्रेस कांफ्रेंस करते समय चिदंबरम के चेहरे पर चिंता के कोई भाव नहीं थे। चिदंबरम ने कहा शाम तक सब ठीक हो जाएगा और ठीक हो गया। इससे क्या संकेत माने जाएं। वैसे, एक और बात जो आज दिन भर सबसे ज्यादा चर्चा में रही कि इस समय बाजार में सीधे और FII’s के जरिए बड़े नेताओं के करोड़ो लगे हुए हैं। यानी फिल्म अभी पूरी नहीं हुई है। इसका पार्ट-2 भी जल्द ही देखने को मिलेगा।

Monday, October 15, 2007

बौराया बाजार किसका भला कर रहा है?

बाजार हम पर बुरी तरह से हावी हो गया है। इतना कि सेंसेक्स की सरपट चाल किसी की समझ में न आने के बाद भी सेंसेक्स सोमवार को 19,000 पार कर गया। देश तरक्की कर रहा है। भारतीय कंपनियां दुनिया भर में नाम कमा रही हैं। भारत के अमीर, दुनिया के अमीरों के नाक-कान काट रहे हैं। आम आदमी सेंसेक्स में पैसा लगाकर खूब कमा रहा है। बाजार के विद्वानों का ज्ञान सुनें तो, लगता है पूरा देश सेंसेक्स की तरक्की से संपन्न हो गया है।
लेकिन, देश क्या सोचता है, इसका अंदाजा एक निजी टेलीविजन चैनल पर पूछे गए सवाल से काफी हद तक पता लग जाता है। टीवी चैनल पर सवाल पूछा गया था कि सेंसेक्स 19,000 के पार, इसे आप क्या मानते हैं। सवाल का जवाब देने वालों में से सिर्फ 15 प्रतिशत लोग इसे देश की तरक्की का आइना मानते हैं। 50 प्रतिशत लोग मानते हैं कि सेंसेक्स और सट्टे में खास फर्क नहीं है, शेयर बाजार सट्टे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। 35 प्रतिशत को सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी में जो दिखता है वो, और भी खतरनाक है। ये 35 प्रतिशत लोग मानते हैं कि शेयर बाजार में आ रहे अनाप-शनाप पैसे से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। यानी बाजार के साथ छेड़छाड़ हो रही है। क्योंकि, इतना पैसा कहां से और क्यों आ रहा है। इसका सही गणित वो भी नहीं बता पाते जो, दिन भर बाजार की ही बकवास करते रहते हैं।

वैसे बड़ी मजेदार बात होती है कि इस सेंसेक्स के बारे में किसी को कोई अंदाजा नहीं होता है। ठीक वैसे ही जैसे लॉटरी या कसिनो में किसी को ये पता नहीं होता कि किस नंबर पर लाखों फोकट में जेब में आ जाएंगे। यहां भी कुछ ऐसा ही है इतनी तेजी के बाद भी कई कंपनियां लाल निशान से उबर नहीं पा रही हैं। फोकट में पैसा आया तो, वो ईमानदारी के पैसे की तरह तो, खर्च होने से रहा। शायद यही वजह है कि एक बार हराम की कमाई यानी लॉटरी, सट्टे और शेयर बाजार से पैसा कमाने की लत लगी तो, फिर मुश्किल से ही जाती है। और, कभी-कभी तो जान भी ले जाती है।

ये सेंसेक्स 17,000 से 18,000 सिर्फ 8 दिनों में पहुंच गया तो, 18,000 से 19,000 सिर्फ 4 दिनों में पहुंच गया। अब क्या उम्मीद करें कि अगले दो दिन में सेंसेक्स 20,000 पर होगा। अभी मैंने कुछ दिन पहले लिखा था कि किसी तरह से अंबानी भाई, डीएलएफ के के पी सिंह, भारती के सुनील भारती मित्तल और दूसरे अमीरों का पैसा बेतहाशा बढ़ गया है। तो, उस पर कई टिप्पणियां जो मिली थीं। उसमें से एक ये भी थी कि क्या आपको पता है ये बदलते भारत की पहचान हैं। टिप्पणी में कुछ लोगों ने कहा कि ये मेहनत से तरक्की कर रहे हैं। अब कोई मुझे ये बताए कि सेंसेक्स के भागने से महीने में 22-25 हजार करोड़ रुपए जो, इनकी जेब में पहुंचे वो, किस मेहनत का नतीजा है।

वैसे बौराए बाजार की तेजी की ये चिंता सिर्फ आम लोगों को ही नहीं है। खुद वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी शुक्रवार को ये बोल पड़े कि मुझे सेंसेक्स की ये तेजी चौंकाती है, कभी-कभी डराती है। ये वो, वित्त मंत्री हैं जो, मानते हैं कि सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी देश की तरक्की का आइना है। साफ है उन्हें भी डर लग रहा है कि कहीं ये पैसा ऐसा तो नहीं है जो, देश को अपने तरीके से चलाने की कोशिश करेगा। वित्त मंत्री ने RBI और SEBI को शेयर बाजार में आने वाले पैसे पर नजर रखने को कहा है। अब महीने भर के बजाए बाजार में आने वाले पैसे के स्रोत का पता लगाने के लिए 15 दिन में बैठक करेंगे। वैसे एक छोटा सा आंकड़ा और है जो, मुझे पता है, अच्छा भी लगता है, डराता भी है। अकेले मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज का देश की GDP में 3 प्रतिशत का हिस्सा है। सरकार पर अंबानी भाइयों के दबाव के किस्से इससे आसानी से जोड़े जा सकते हैं। अब अगर देश के 10 अमीर एक साथ आ जाएं तो, कौन सी सरकार होगी जो, इनके कहे को टाल पाएगी।

इन सब बातों से हो सकता है आपको लग रहा हो कि मैं क्या बेवकूफी कर रहा हूं। लेकिन, ये सोचने की गलती इस समय आम निवेशक भी कर रहा है, उसे बाजार डराने लगा है। उसे ये रफ्तार अलग से तेल-पानी देकर आई लगती है। बिना कोई काम शुरू किए ही अंबानी भाई जैसे लोग बाजार से हजारों करोड़ जुटा लेते हैं।
अब बात ये कि इस व्यवस्था पर सवाल उठाने की वजह क्या है। जब दुनिया के सारे देशों की तरक्की का रास्ता यही है। हम हमेशा कहते हैं कि चीन 10 प्रतिशत की विकास दर पा रहा है और हमें 10 प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए जरूरी है कि हमारे बाजार में ढेर सारा पैसा आए और कंपनियों की तेजी की गवाही देने वाले सूचकांक सेंसेक्स-निफ्टी बस बढ़ते ही जाएं। लेकिन, अगर चीन की तरक्की की बात करें तो, उसकी वजह साफ दिखती है। चीन के बनाए सामान दुनिया में ऐसे बिक रहे हैं कि उनमें खराबी की खबरें बार-बार आने के बाद भी उससे कोई नाता नहीं तोड़ पा रहा। भारत, जापान जैसे देशों की तरक्की की कमाई में से करीब 25 प्रतिशत चीन इसी वजह से झटक ले जा रहा है। हम आईटी, बीपीओ सेक्टर को छोड़ दें तो, जरा याद कर बताइए हमारी कौन सी कंपनी का प्रोडक्ट पूरी दुनिया में धड़ल्ले से बिक रहा है। अब सवाल ये कि इतने बड़े-बड़े विद्वान इस सबकी चिंता के लिए लगे हैं तो, मैं क्यों इसकी चिंता में बौरा रहा हूं। वजह ये कि देश की तरक्की में मैं भी शामिल हूं। मैं एक आम भारतीय हूं। और, मैं भी निवेशक बनना चाहता हूं, डीमैट अकाउंट खोलना चाहता हूं।

Monday, October 08, 2007

सबका सपना मनी-मनी, लेकिन कितना?

अब पैसे का कोई मतलब ही नहीं रहा। पैसा बढ़ना बस प्रतीकों के तौर पर इस्तेमाल करने लायक शब्द रह गया है। पैसे क्या रुपए का भी कोई मतलब नहीं रह गया है। खासकर तब जब इसी देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो, हर मिनट चालीस लाख रुपए कमा रहे हैं। आपको लग रहा होगा मैं मजाक कर रहा हूं। लेकिन, ये मजाक नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की कमाई पिछले तीन महीने से लगातार चालीस लाख रुपए हर मिनट बढ़ी है। हाल ये है कि मुकेश अंबानी आज 2,20,463 करोड़ रुपए के मालिक हो गए हैं। डॉलर में ये कमाई होती है 5580 करोड़ डॉलर। आज तो, शेयर बाजार गिरा है। लेकिन, हो सकता है कि कल सेंसेक्स-निफ्टी की एक और तेज उछाल बड़े अंबानी को ढाई लाख करोड़ रुपए का मालिक बना दे।

अमीरों की जेब में बढ़ते पैसे का आलम ये है कि देश के दस सबसे ज्यादा अमीर लोगों के पास साल भर में 6530 करोड़ डॉलर बढ़ गया है रुपए में ये रकम हो जाती है 2,57,739 करोड़। मुकेश अंबानी को अब तक ज्यादा कमाई के मामले में उनके ही छोटे भाई अनिल अंबानी चुनौती दे रहे थे। लेकिन, अब इन दोनों भाइयों के बीच में आ गए हैं, देश का सबसे बड़ा IPO लाने वाले रियल एस्टेट के दिग्गज DLF के के पी सिंह। कुशल पाल सिंह की हैसियत है 3290 करोड़ डॉलर यानी 1,29,856 करोड़ रुपए। इसके बाद अनिल अंबानी की हैसियत है 3240 करोड़ डॉलर यानी 1,27,882 करोड़ रुपए की।
इन लोगों के बाद हैं, देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी के मालिक सुनील भारती मित्तल। इनके पास 2090 करोड़ डॉलर यानी 82,493 करोड़ रुपए की संपत्ति है। और, विप्रो के मालिक अजीम प्रेमजी कुल कमाई है 1360 करोड़ डॉलर जो, रुपए में होगी 53,679 करोड़ रुपए। करोड़ो की कमाई करने वाले ऐसे लोगों की भारत में कमाई करोड़ो में ही बढ़ती जा रही है। इन लोगों की संपत्ति देखने के बाद मैं तो, बस इतना ही सोच पाता हूं कि सबका सपना मनी-मनी लेकिन, कितना।

Thursday, August 30, 2007

बदलते बाजार के साथ बदलते शहर

बाजार अब लोगों को नए जमाने के साथ रहने की तमीज सिखा रहा है। छोटे शहरों में पहुंचते बड़े बाजार ये सिखा-बता रहे हैं कि अब कैसे रहना है, कैसे खाना है, क्या खरीदना है, कहां से खरीदना है, कितना खरीदना है और क्या किसके लिए खरीदना जरूरी है। बस एक बार बाजार तक पहुंचने की जरूरत है। छोटे शहरों के लोग बाजार पहुंचने में लेट न हो जाएं। इसके लिए छोटे शहरों तक खुद ही बड़ा बाजार पहुंच रहा है। घर की जरूरत का हर सामान करीने से वहां लगा है। इतने करीने से कि, काफी ऐसा भी सामान वहां जाने के बाद जरूरी लगने लगता है जो, अब तक घर में किसी जरूरत का नहीं था। हमारे शहर इलाहाबाद में भी बड़ा बाजार पहुंच गया है।
अब इलाहाबाद छोटा शहर तो नहीं है लेकिन, बाजार के मामले में तो, छोटा ही है। कम से कम मैं तो, ऐसा ही मानता हूं। लेकिन, बड़ा बाजार वालों को यहां के बड़ा बाजार की समझ हो गई। इससे सस्ता और कहां का नारा लेकर बड़ा बाजार ने अपनी दुकान इलाहाबाद में खोल ली। बड़ा बाजार पहुंचा तो, 40 रुपए के खादी आश्रम के तौलिए से हाथ-मुंह पोंछने वाले इलाहाबादियों को एक बड़ा तौलिया, महिलाओं के लिए एक नहाने का तौलिया, दो हाथ पोंछने के तौलिए और दो मुंह पोंछने के छोटे तौलिए का सेट बेचने के लिए। गिनती के लिहाज से ये 6 तौलिए का पूरा सेट है 599 रुपए का, जिसकी बड़ा बाजार में कीमत है सिर्फ 299, ऐसा वो लिखकर रखते हैं। इलाहाबादी खरीद रहे हैं महिलाओं के नहाने वाले तौलिये से भी पुरुष ही हाथ मुंह पोंछ रहे हैं क्योंकि, अभी भी इलाहाबाद में महिलाएं बाथ टॉवल लपेटकर बाथरूम से बाहर आने के बजाए पूरे कपड़े पहनकर ही बाहर आती हैं। लेकिन, बड़ा बाजार इलाहाबादियों के घर में बाथ टॉवल तो पहुंचा ही चुका है।

इलाहाबादी परिवार का कोई सदस्य सुबह उठकर गंगा नहाने गया तो, घाट के पास दारागंज मंडी से हरी सब्जी, आलू-मिर्च सब लादे घर आया। गंगा नहाने नहीं भी गया तो, अल्लापुर, बैरहना, फाफामऊ, तेलियरगंज, कीडगंज, मुट्ठीगंज, सलोरी, चौक जैसे नजदीक की सब्जी मंडी से दो-चार दिन की सब्जी एक साथ ही उठा लाता था। चार बार मोलभाव करता था। झोला लेकर जाता था। सब एक साथ भरता जाता था। सुबह सब्जी लेने गया तो, साथ में जलेबी-दही भी बंधवा लिया। लेकिन, अब बड़ा बाजार आया तो, सब सलीके से होने लगा। आलू भी धोई पोंछी और पॉलिथीन में पैक करके उसके ऊपर कीमत का स्टीकर लगाकर मिलने लगी है। बाजार ने नाश्ते का भी अंदाज बदल दिया है। नाश्ते में इलाहाबादी दही-जलेबी, खस्ता-दमालू की जगह सॉस के साथ सैंडविच खाने लगा है।

बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर बनी टॉफी के लिए भी इलाहाबादी बड़ा बाजार जाने लगा है। टॉफी का बिल देने के लिए लाइन में लगा है। पीछे से किसी ने मजे से बोला क्या एक टॉफी के लिए इतनी देर लाइन में लगे हो- ऐसही लेकर निकल जाओ। लाइन में ठीक पीछे खड़ा आलू की पॉलिथीन वाला जो, शायद मजबूरी में सलीके में था, खीस निपोरकर बोला-- चेकिंग बिना किए नए जाए देतेन, पकड़ जाबो। और नए तो, अइसे जाइ दें तो, सब भर लइ चलें।

इलाहाबाद का बिग बाजार तीन मंजिल के कॉम्प्लेक्स में खुला है। तीसरी मंजिल से खरीदारी के लिए जाते हैं। पहली मंजिल पर बिल जमा करके जेब हल्की करके और हाथ में बिग बाजार का भारी थैला लेकर बाहर निकलते हैं। इन तीन मंजिलों के चढ़ने-उतरने में और बिग बाजार की लाइन में लगे-लगे इलाहाबादी बदल रहा है। इलाहाबादी लाइन में लगने लगा है। सलीके से अपनी बारी आने का इंतजार कर रहा है। 55 साल का एक इलाहाबादी बाजार के साथ सलीका सीखती-बदलती अपनी 18-19 साल की बिटिया के साथ सॉफ्टी खा रहा है, बड़ा बाजार के भीतर ही। बड़ा बाजार जिस कॉम्प्लेक्स में खुला है उसके ठीक सामने शान्ती कुल्फी की दुकान है। शांती की कुल्फी-फालूदा इलाहाबादियों के लिए कूल होने की एक पसंद की जगह थी (जब तक कूल शब्द शायद ईजाद नहीं हुआ रहा होगा)। लेकिन, कुल्फी-फालूदा अब इलाहाबादियों को कम अच्छा लग रहा है, होंठ पर लगती सॉफ्टी का स्वाद ज्यादा मजा दे रहा है।

बड़ा बाजार के ही कॉम्प्लेक्स में मैकडॉनल्ड भी है, हैपी प्राइस मेन्यू के साथ। सिर्फ 20 रुपए वाले बर्गर का विज्ञापन देखकर इलाहाबादी अंदर जा रहा है और 100-150 का फटका खाकर मुस्कुराते हुए बाहर आ रहा है। इलाहाबादी पैकेट का आटा लाने लगा है, पैकेट वाले ही चावल-चीनी की भी आदत पड़ रही है। सलीके से रहने-खाने-पहनने को बाजार तैयार कर रहा है। घर का आटा-दाल-चावल खरीदकर बिल काउंटर पर आते-आते इलाहाबादी फिर ठिठक रहा है, अमूल कूल कैफे का टिन भूल गया था। लाइन लंबी थी, नंबर आते तक अमूल कूल कैफे के 2 चिल टिन भी बिल में शामिल हो चुके हैं।

बाजार सलीका सिखा रहा है! बाजार में सलीके से रहने के लिए ब्रांड का सबसे अहम रोल है। जितनी ज्यादा ब्रांडेड चीजें, उतना ही ज्यादा सलीका (अब माना तो ऐसे ही जाता है)। किसी भी बड़े से बड़े बाजार में मिल रहे ब्रांड का नाम लीजिए। इलाहाबादी उस ब्रांड से सजा हुआ है। बाजार आया तो, अपने साथ बिकने की गुंजाइश भी बनाता जा रहा है। होली-दीवाली, कपड़े-जूते और साल भर-महीने भर का राशन एक साथ खरीदने वाला इलाहाबादी भी हफ्ते के सबसे सस्ते दिन का इंतजार कर रहा है। और, सबसे सस्ता बुधवार आते ही बड़ा बाजार में लाइन में लग जाता है।

मुझे याद है 5-7 साल पहले वुडलैंड का कोई खास मॉडल का जूता सिविल लाइंस के कपूर शूज, खन्ना शूज और ऐसी ही कुछ और बड़ी दुकानों के चक्कर लगाने पर भी मिल जाए तो, मजा आ जाता था। अब वुडलैंड के हर मॉडल से बाजार सजा हुआ है। दूसरे बदलते इलाहाबादियों की ही तरह मैकडॉनल्ड, बिग बाजार और दूसरे ऐसे ही खास ब्रांड्स को समेटने वाले मॉल में गया तो, छोटे भाई ने कहा गाड़ी आगे लगाइए, यहां पार्किंग मना है। सिविल लाइंस में जहां कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देने का सुख था। कार की खिड़की से झांकते रास्ते में लोगों से नमस्कारी-नमस्कारा करते निकलने वाले इलाहाबादियों का ये सुख बाजार ने उनसे छीन लिया है। अब इलाहाबादी सिविल लाइंस में पार्किंग खोजता है। पार्किंग खाली नहीं दिख रही थी तो, छोटा भाई गाड़ी में ही बैठा, मैं इलाहाबाद को बदल रहे बाजार के दर्शनों के लिए चल पड़ा। खैर अच्छा-बुरा जैसा भी सही बाजार उन शहरों के लोगों को बदल रहा है जो, बाजार के नाम से ही बिदक जाते हैं। बाजार लोगों को चलने-दौड़ने के लिए तैयार कर रहा है।

Friday, August 24, 2007

हमारा इंडिया मेड इन चाइना हो गया है!

नोकिया की BL-5C बैटरी की खराबी ने एक बार फिर चीनी माल की घटिया क्वालिटी के बारे में दुनिया को बता दिया। नोकिया जैसी बड़ी कंपनी थी, उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह थी इसलिए 8 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च झेलकर भी नोकिया ने इस सिरीज की 30 करोड़ बैटरियों में से 4 करोड़ 60 लाख वो बैटरियां वापस ले लीं। जो, नोकिया को जापानी कंपनी मात्सुशिता ने बनाकर दी थीं। आपको लगता होगा कि जापानी कंपनियां तो क्वालिटी के मामले में समझौता नहीं करतीं। फिर ये कैसे हो गया। दरअसल ये सारी बैटरियां मात्सुशिता के चीन के प्लांट में लगी हुई थीं। भारत में इन बैटरियों ने बिना फटे ही खूब हल्ला किया। दूसरा एक मामला है अमेरिकी खिलौना कंपनी मटेल टॉयज के जहरीले खिलौनों का। इन खिलौनों से बच्चों को तरह-तरह की बीमारियां होने के खतरे की बात सामने आई तो, कंपनी ने अपने कई खिलौने बाजार से वापस ले लिए। ये कंपनी भले ही अमेरिकी थी लेकिन, ये खिलौने कंपनी के चीन के प्लांट में ही बन रहे थे।
चीन के घटिया सामानों के ये उदाहरण भर हैं। चीन हमसे तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और, कई मामलों हमारे देश के नीति-नियंता भी चीन का ही उदाहरण देकर विकास की गाड़ी चीन से भी तेज रफ्तार से दौड़ाना चाहते हैं। तेज रफ्तार से विकास करते चीन का यही हल्ला आज भारत के विकास को बट्टा लगा रहा है। अब आप सोच रहे होंगे, इससे भारत के विकास पर कैसे असर पड़ सकता है। दरअसल चीनी सामानों ने कुछ इस तरह से हमारे आसपास घर कर लिया है कि अब तो, मेड इन चाइना के ठप्पे पर नजर भी नहीं जाती। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी के बारे में जानने के बाद भी लोग जाने-अनजाने भारत के लोग इसे खरीद रहे हैं और चीन के विकास की रफ्तार और तेज कर रहे हैं।
भारत में कंज्यूमर नाम का प्राणी सबसे तेजी से बढ़ा है। यानी वो खर्च करने वाले जिनकी जेब में पैसा है जो, मॉल में शॉपिंग करता है, मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। कंज्यूमर नाम का ये प्राणी कंज्यूम करना जानता है, इसे इस बात की ज्यादा परवाह नहीं होती कि खरीदा हुआ सामान कितना चलेगा। कंज्यूमर के पास पैसे हैं तो, उस पैसे को खींचने के लिए हर मॉल में माल ही माल भरा पड़ा है। देश में ऑर्गनाइज्ड रिटेल क्रांति की बात जोर-शोर से सुनाई दे रही है। और, ये भी कहा जा रहा है कि यही रिटेल देश में लाखों लोगों को रोजगार के नए मौके देगा। भारतीय कंपनियों की तरक्की का भी रास्ता खुलेगा। लेकिन, कुछ छोटे आंकड़े हैं जिससे साफ होता है कि भारत में हो रही रिटेल क्रांति के फायदे से चीन के विकास की गाड़ी भारत के ही विकास को मात देगी।
भारत के जितने भी बड़े ऑर्गनाइज्ड रिटेल स्टोर आ रहे हैं उसमें जिन सामानों को आप ये समझकर खरीदते हैं कि ये पैसे भारतीय कंपनियों के पास जा रहे हैं वो, पैसे चीन की कंपनियों के पास जाते हैं। ग्रॉसरी और फर्नीचर आइटम्स का 65 प्रतिशत चीनी कंपनियों का ही माल भरा पड़ा है। फैशन-कॉस्मेटिक्स-बनावटी गहने इसके 75 प्रतिशत पर चीनी कंपनियों का ही कब्जा है। मॉल से खिलौने खरीदने वाले करीब 15 प्रतिशत बच्चे ही देसी खिलौने के साथ अपना बचपन बिता पाते हैं।
चीनी सामानों का ये कब्जा सिर्फ भारत के मॉल के माल में ही नहीं है। सड़कों पर होने वाला व्यापार जिसे अनऑर्गनाइज्ड रिटेल कहा जा रहा है। वहां चीन का कब्जा और मजबूत है। सड़क किनारे बिकने वाले अजीब-अजीब से खिलौने, टॉर्च, बैटरी, कॉस्मेटिक्स, कैलकुलेटर, डिजिटल डायरी- सब कुछ चाइनीज है। सामान बेचने वाला चिल्ला-चिल्लाकर पहले ही बता देता है कि सामान मेड इन चाइना है कोई गारंटी नहीं है। फिर भी मोलभाव कर खरीदने वाले की लाइन लगी है। सड़क किनारे लगे इस बाजार में तो, 90 प्रतिशत सामान मेड इन चाइना ही है। और, देश के रिटेल बाजार में अनऑर्गनाइज्ड रिटेल का हिस्सा 95 प्रतिशत है।
अभी जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत में हैं। भारत-जापान के साथ अरबों डॉलर के व्यापार की बात हो रही है। दोनों देश हर मसले पर एक दूसरे के साथ खड़े हैं। लेकिन, जापानी प्रधानमंत्री के भारत आने से पहले अखबारों-टीवी चैनलों पर जो स्टोरीज सामने आईं उससे ये साफ था कि जापान में भारतीय कंपनियों को पकड़ बनाने में पसीने छूटेंगे। भारत की तरह जापान के हर मॉल में जापानी में मेड इन चाइना लिखे सामान भरे पड़े हैं। मेड इन इंडिया का एक भी ब्रांड अब तक वहां के बाजार में जगह नहीं बना पाया है।
चीनी सामान किस तरह से हमारे घरों में जगह बना लेता है और हमें पता ही नहीं चलता। मैं चाइनीज सामान जाबूझकर तो, नहीं ही खरीदना चाहता। लेकिन, जिस लेनोवो के लैपटॉप पर मैं ये लिख रहा हूं वो, चीन में बना है। मैंने रिलायंस से नेट कनेक्शन लिया। लेकिन, जब मैं कनेक्शन की डिवाइस लेकर लौटा तो, USB मोडम पर असेंबल्ड इन चाइना की मोहर लगी थी। CAS नोटीफाइड एरिया में रहने की वजह से मुझे सेट टॉप बॉक्स लेना पड़ा। देसी कंपनी WWIL का कनेक्शन लिया। लेकिन, एक दिन रिमोट पर नजर गई तो, वो मेड इन चाइन था। सेट टॉप बॉक्स भी वहीं का बना था। यानी हमारी तरक्की को दिखाने वाले सारे प्रतीक चिन्हों पर चीन ने कब्जा कर रखा है।
चीन की तरक्की की वजह भी साफ पता चल जाती है। दुनिया जिन सामानों को आगे इस्तेमाल करने वाली हो, उसे बनाने में आगे निकलो। दुनिया के बाजार को अपने माल से पाट दो, जब तक दुनिया को ये समझ में आएगा कि ये सामान कहां से आ रहा है तब तक दुनिया उन्हीं सामानों की आदी हो जाएगी। ये बात भारतीय कंपनियों के लिए समझने की है। भारतीय कंपनियां दुनिया में झंडे गाड़ रही हैं। लेकिन, देश की जरूरत के सामान बनाने में पीछे हैं। वीडियोकॉन के अलावा दूसरी भारतीय टेलीविजन बनाने वाली कंपनी का नाम भी याद नहीं आता। टाटा का वोल्टास का एसी बढ़िया होने के बावजूद मार्केटिंग और समय के साथ न बदल पाने की वजह से सैमसंग और एलजी से रफ्तार में पीछे छूट रहा है वैसे, अभी दूसरा सबसे ज्यादा बिकने वाला एसी वोल्टास का ही है। कार-मोटरसाइकिल के मामले में भारतीय कंपनियां अभी आगे हैं लेकिन, विदेशी कंपनियां तेजी से ये हिस्सा कम कर रही हैं।
दुनिया भर के लोगों को सॉफ्टवेयर ज्ञान भारतीय दे रहे हैं लेकिन, एक भी ऐसी भारतीय कंपनी लैपटॉप या कंप्यूटर नहीं बना रही है जो, डेल और लेनोवो को थोड़ा भी मुकाबला दे सके। हाल ये है कि कभी-कभी तो, पूरे इंडिया पर ही मेड इन चाइना का ठप्पा सा लगा दिखने लगता है। अच्छा ये है कि अभी पूरा देश इंडिया नहीं बना है, भारत का बड़ा हिस्सा इंडिया बनने से बचा हुआ है, इसीलिए मेड इन चाइना के ठप्पे से अभी देश का बड़ा हिस्सा बचा है। यही बचा हुआ भारत का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा बाजार बन सकता है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...