Tuesday, August 04, 2015

बजरंगी भाईजान से सबक

सलमान खान ने अभी दो कमाल किए हैं। एक कमाल ये कि फिल्म में पाकिस्तानी मुसलमान बच्ची के मुंह से जय श्रीराम कहलवा दिया। पूरे पाकिस्तान को हिंदुस्तानी पवन चतुर्वेदी को वापस हिंदुस्तान अवैध तरीके से पहुंचाने के लिए सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया। और दूसरा कमाल ये कि लगे हाथ ये भी सवाल खड़ा कर दिया कि टाइगर मेमन की गलती के लिए उसके भाई याकूब मेमन को फांसी क्यों दी जा रही है। हालांकि, दूसरे कमाल के साथ ही उनके पिता सलीम खान ने तुरंत उससे भी बड़ा कमाल करके तुरंत ये कह दिया कि सलमान को मामले की जानकारी नहीं है। इसलिए सलमान खान के याकूब मेमन पर दिए गए बयान को गंभीरता से न लिया जाए। सलमान खान ने भी संस्कारी पुत्र की तरह पिता का हवाला देते हुए अपनी गलती स्वीकार करके बयान वापस ले लिया। ये कमाल ही था कि जिस दौर में साफ-साफ हिंदू-मुसलमान की रेखा खिंच गई थी। उस समय भी सलमान खान यानी बजरंगी भाईजान के लिए उतनी कटुता हिंदू-मुसलमान दोनों तरफ से नहीं दिखी। न तो बजरंगी भाईजान फिल्म में पाकिस्तानी मुसलमान बच्ची के मुंह से जय श्रीराम कहलाने पर बहुतायत मुसलमानों ने लाहौल विला कुव्वत कहकर भारत में उनकी फिल्म के कारोबार में जरा सा भी कमी आने दी। न ही बहुतायत हिंदुओं ने याकूब पर उनके बयान के बाद भी उनको देश के दूसरे हिंदू धर्मनिरपेक्षों की तरह गालियां दीं। दरअसल ये बहुत बड़ा उदाहरण है। ये सलमान खान की अपनी छवि, प्रतिष्ठा है कि सलमान खान और उनके पिता सलीम खान को बहुतायत हिंदू भी अच्छी नजर से देखता है। सलमान खान भी फिल्मी अभिनेता हैं। हर तरह की पिक्चरें करते हैं। हिंदू-मुसलमान सब बनते हैं। ये फर्क अपने बयानों, व्यवहारों से बनाई छवि भर का ही है। ये फर्क है मौके की संवेदनशीलता को समझने का। किसी को फांसी दिए जाने से कुछ लोगों को छोड़कर ज्यादातर संवेदनशील हिंदुस्तानी दुखी ही होता है। लेकिन, इस समय देश के खिलाफ युद्ध जैसी स्थिति बना देने वाला एक शख्स फांसी पर चढ़ रहा हो तो, विचार व्यक्त करने में थोड़ा तो सोचना चाहिए। और वो बात कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने बोल देने के बाद समझ में आई। शशि थरूर ने ट्वीट किया कि एक मनुष्य को फांसी पर चढ़ाया जा रहा है। और सरकार हत्यारी हो गई है। इस पर शशि थरूर को जमकर विरोध झेलना पड़ा। हालांकि, बाद में मौके की नजाकत के लिहाज से शशि थरूर ने अपने बयान को गलत माना। उन्होंने कहाकि किसी को भी फांसी की सजा देने के वो सिद्धांत रूप से खिलाफ हैं। लेकिन, उन्हें याकूब की फांसी के समय ये मांग नहीं उठानी चाहिए थी। पता नहीं ये शशि थरूर ने स्वत: स्फूर्त किया या बजरंगी भाईजान यानी सलमान खान की समझदारी से समझ बनाई। लेकिन, ये बेहतर सबक था जो, उन्होंने तुरंत अमल में लिया।

सलमान खान यानी बजरंगी भाईजान से इस वक्त देश के लिए और देश में बहुतों के लिए सीखने को बहुत कुछ है। सचमुच ये फिल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधाननमंत्री नवाज शरीफ को देखनी चाहिए। हालांकि, मैं ये भी मानता हूं ये दोनों रिश्ते बेहतर करने के लिए काफी कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान के फौजियों को ये फिल्म जरूर देखकर सबक लेना चाहिए। इस फिल्म का सबसे बड़ा सबक दोनों देशों के लिए यही है कि दोनों देशों के बच्चों को ज्यादा से ज्यादा मिलने का इंतजाम करना होगा। भले ही ये फिल्म थी। जिसमें एक प्यारी सी बच्ची शाहिदा, जो पाकिस्तानी मुसलमान है। जमकर मांसाहार स्वाभाविक तरीके से करती है। एक हिंदुस्तानी हिंदू ब्राह्मण पवन चतुर्वेदी, जिसके लिए मांस छूना भी धर्म भ्रष्ट होने जैसा है। उसके लिए बंधन बन जाती है। लेकिन, सच्चाई भी यही है कि नफरत कम करने का काम सबसे आसानी से बच्चे ही कर सकते हैं। क्या इस तरह का कार्यक्रम दोनों देशों की सरकारें तैयार कर सकती हैं कि दोनों देशों के सर्वोच्च फौजी अफसर मिलें न मिलें। सचिव स्तर के अधिकारी मिलें न मिलें। हर महीने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के स्कूली बच्चे एक दूसरे के स्कूल में जाकर कुछ समय बिताएं। ये गुरुमंत्र रामबाण साबित होगा।

मीडिया सिर्फ निगेटिव खबरों को ही दिखाता है। सिर्फ भारत-पाकिस्तान के बीच नफरत ही बेचता है। ये कहकर कि बिकती ही नफरत है। पाकिस्तानी संवाददाता चांद नवाब के पाकिस्तानी चैनल के मुखिया को बजरंगी भाईजान की खबर चलाने के लिए कहने पर संपादक का बयान कि हम खबर बेचते हैं, अनाथालय नहीं चलाते। ये हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों के मीडिया के लिए बराबर लागू होता है। दिल्ली-मुंबई या फिर इस्लामाबाद में बैठा मीडिया असल पत्रकारिता का जरिया बन सकता है। अगर वो देश भर में फैले पत्रकारों को उचित सम्मान दे। टीवी न्यूज चैनल में सबसे ज्यादा बुरे हाल में अगर कोई है तो वो चांद नवाब जैसे छोटे शहरों, दूर दराज के इलाकों में काम कर रहे स्ट्रिंगर ही हैं। स्ट्रिंगर या संवाद सूत्र यानी वो जो चैनल की नौकरी पर नहीं है। खबर के लिहाज से भुगतान पाता है। उनकी पत्रकारिता को धार देने की जरूरत है। ज्यादातर चैनलों के संपादक या चैनल की रीति नीति तय करने की स्थिति में बैठे पत्रकार बजरंगी भाईजान फिल्म की ही तरह अच्छी, समाज को जोड़ने वाली नफरत कम करने वाली खबरों को नकार देते हैं। उसकी बुनियाद में पत्रकारिता की शुरुआती शिक्षा - कुत्ता आदमी को काटे ये खबर नहीं। आदमी कुत्ते को काटे ये खबर- की बड़ी भयानक भूमिका है। इससे मीडिया की खुद की प्रतिष्ठा भी बेहतर होगी। और समाज भी बेहतर होगा।

दोनों देशों की फौज भी बजरंगी भाईजान से काफी कुछ सबक ले सकती है। इस फिल्म में तो पवन चतुर्वेदी पाकिस्तानी शाहिदा को छोड़ने के इरादे से पाकिस्तान अवैध तरीके से घुसता है। लेकिन, भारत-पाकिस्तान की सीमाएं कई जगह ऐसी हैं। जहां इस तरह की दुर्घटनाएं अनजाने में हो जाती हैं। वो रास्ता जमीनी भी है, समुद्री भी। निश्चित तौर पर अपनी सीमा सुरक्षित रखने और दुश्मनी, आतंकवाद और गलत इरादे से घुसे लोगों को सबक देने के लिए फौज को अपना काम करना ही चाहिए। लेकिन, ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि गलती से सीमा के संकट में कोई न फंस जाए।

सबसे आखिरी सबक वही सबसे पहला वाला ही है। जो, याकूब के मामले में सलमान खान ने असल जीवन में दिया है। वो सबक है। किसी की संवेदनशीलता का सम्मान करना। और जब मामला देश का हो तो, ये संवेदनशीलता ज्यादा ही सम्मान मांगती है। इसलिए असल जीवन के सलमान खान और फिल्मी चरित्र बजरंगी भाईजान से अगर हम ये सबक ले सके तो काफी कुछ बेहतर हो सकेगा। धरती के जन्नत कश्मीर को लेकर जो कुछ हो रहा है। वो ठीक नहीं है। जन्नत का ज्यादा हिस्सा हम हिंदुस्तानियों के पास है तो थोड़ी जन्नत पाकिस्तान के पास भी है। अपनी जन्नत बनाए रखने के लिए हमें ये सबक लेना होगा। 

Thursday, July 30, 2015

हे टीवी मीडिया के असहाय मित्रों। अब नरक मत करो।

हे टीवी मीडिया के असहाय मित्रों। अब नरक मत करो। #YakoobMemon #YakoobHanged के बाद अब उसकी शवयात्रा मत दिखाने लगना। नरक के भागी इतना भी न बनो। देश के सर्वप्रिय सबके राष्ट्रपति और सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं सबके साथी, शिक्षक डॉक्टर अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन का अंतिम संस्कार भी आज हो रहा है। टीवी के संपादक बार-बार ये बहस करते हैं कि टीवी पर हम वही दिखाते हैं। जो, जनता चाहती है। जनता के दबाव के बहाने सारी गलतियों को छिपा लेने वाले संपादकों थोड़ा तो शर्म करो। कौन सी जनता का दबाव था कि याकूब की फांसी पर इतनी बहस हो ये तो अब पूरी तरह से साफ हो गया है। हा इतना जरूर हुआ है कि इस जनता के दबाव की आड़ में आप संपादकों ने पिछले एक हफ्ते से संपूर्ण विश्राम किया है। न किसी विचार पर काम करने की जरूरत रही। न ही सुबह की मीटिंग में ये तय करने की जरूरत कि आखिर चौबीस घंटे के टीवी न्यूज चैनल पर बारह घंटे की लाइव रिपोर्टिंग में क्या दिखाएंगे। वैसे भी याकूब मेमन के भावनात्मक पक्ष पर तो बहुतायत कहानियां पहले से ही मीडिया में थी हीं। बस उन्हें नई तारीख के साथ छापना, दिखाना था। सुबह से ही सारे संपादकों ने अपने रिपोर्टरों को दिल्ली, मुंबई से लेकर नागपुर जेल तक लगा दिया है। हां, ये अभी तक नहीं पता चल पाया है कि कितने संपादकों के आदेश पर कितने टीवी चैनलों के रिपोर्टर रामेश्वरम पहुंचे हैं। शर्म करो नहीं तो जनता के दबाव की आड़ में हर कुकर्म को छिपा लेने वाली बेशर्म पर जनता की प्रतिक्रिया का दबाव आया तो, क्या करोगे। वैसे भी काले धन के प्रवाह में आई रोक ने बहुतायत बी, सी, डी ... ग्रेड चैनलों पर ताला लगा दिया है। कुछ शर्म करो।


याकूब मेमन की कहानियां किसी भी तरह से किसके हित में हैं। सिवाय मेमन परिवार के। समाज के निर्माण में कौन सी कहानियां मदद करने वाली हैं। रस्मी तौर पर सिर्फ कलाम साहब के अंतिम संस्कार की एजेंसियों से मिली तस्वीरों से काम मत चलाओ। एपीजे अब्दुल कलाम साहब का जीवन दिखाओ। टीवी बड़ा पावरफुल मीडियम है। इस ताकतवर जनता के माध्यम का इस्तेमाल जनता की भलाई के लिए करो। जनता के दबाव की बात बहुतायत करते हो। कभी जनता की भलाई का भी सोचो। मैं खुद टीवी पत्रकार हूं। जानता हूं बड़ा दबाव होता है। सचमुच कठिन है। चौबीस घंटे की दर्शकों को बांधने वाली प्रोग्रामिंग करना। लेकिन, जब एपीजे अब्दुल कलाम जैसी शख्सियत की कहानी सुनानी हो तो, इतना कठिन मुझे तो नहीं लगता। सात दिन के राष्ट्रीय शोक का वक्त है। इस देश को प्रेरणा देने वाले सात दिन में बदलने की ताकत टीवी में ही है। लेकिन, आधा वक्त तो आप फांसी में ही खा गए। आधा वक्त फांसी के बाद की पीड़ा में मत खा जाना। प्रायश्चित इस एक घटना से तो न हो पाएगा। लेकिन, करिए शायद कुछ मन का बोझ हल्का हो जाए। कलाम साहब साहब रहने लायक धरती की बात करते दुनिया से गए। वो कहते थे कि माता-पिता और शिक्षक- ये तीनों ही मिलकर किसी देश का मन मिजाज स्वस्थ कर सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त कर सकते हैं। टीवी भी बड़ा शिक्षक है। टीवी से जनता जाने-अनजाने सीखती है। सीख रही है। सीखने वाला छात्र होता है। कलाम साहब ने ये भी कहा था कि छात्र को सवाल पूछने से कभी नहीं रोकना चाहिए। सवाल पूछना ही छात्र का, सीखने वाले का मूल होता है। ये खत्म तो, सब खत्म। शिक्षक टीवी की जनता ही छात्र है। जनता को सवाल पूछने दीजिए। कलाम साहब बच्चों के सवालों का जवाब देते रहे, आखिरी क्षण तक। खुद सीखते रहे, दूसरों को सीखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस देश में फांसी पर बहस फिर हो सकती है। ऐसे बहुतायत मौके पहले भी मिले। आगे ईश्वर न करे कि मिलें। लेकिन, ये वक्त है देश से एक शिक्षक की विदाई का। इस विदाई को सीख के तौर पर इस्तेमाल किया जाए। टीवी मीडिया भी समाज का शिक्षक है। एक शिक्षक के नाते अपनी जिम्मेदारी निभानी ही होगी। इसी जिम्मेदारी से छात्रों के सवालों के जवाब मिल पाएंगे। अपनी जिम्मेदारी से भागने वाला शिक्षक जैसे छात्र को जिम्मेदार नहीं बना सकता। वैसे ही अपनी जिम्मेदारी से भागने वाले टीवी भी सही समाज नहीं बना सकता। छात्र के दबाव से शिक्षक गड़बड़ाया है। ये साबित करना कब तक हो पाएगा। अगर दुनिया के सारे शिक्षक टीवी वाली लाइन ले लें तो, क्या होगा। दुनिया के सारे छात्र शिक्षकों पर दबाव बना देंगे। बड़ा गलत उदाहरण पेश कर रहा है भारतीय टेलीविजन। इस अपार संभावना वाले माध्यम की हत्या मत करिए संपादकों। 

Wednesday, July 29, 2015

खेल सिर्फ ब्राह्मण ही करता है

ये ब्राह्मण भी अजब प्रजाति है। जाति नहीं कह रहा हूं। क्योंकि, लोगों ने इसे जाति से ऊपर उठा दिया है। कई बार तर्क सुना है कि ब्राह्मण न होते तो समझ आता कि ब्राह्मण होना कितना लाभदायक है। हालांकि, मुझे तो कभी ब्राह्मण होने का कोई लाभ नहीं मिल पाया। इसलिए अज्ञानी ही रह गया। हां, नियमित तौर पर सर्वाधिक गालियां जरूर ब्राह्मणों को पाता देखता हूं। अब मुझे समझ आ रहा है कि ये ब्राह्मण जाति वाला नहीं, प्रजाति वाला है। सारी सृष्टि की हर बुराई के लिए ब्राह्मण जिम्मेदार हो गया है। कमाल तो ये कि मायावती की चरण रज से ही कुछ हासिल करने की चाह लिए लोग भी तर्क देते-देते कह जाते हैं कि मायावती भी मनुवादी हो गई है। मुसलिम, सिख, इसाई से लेकर हिंदू में हर जाति का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर सब कुछ हो चुके हैं। लेकिन, गाली खाने का संपूर्ण ठेका एकमुश्त तौर पर वही प्रजाति वाले ब्राह्मण को ही मिला हुआ है। अभी दफ्तर से लौटकर ट्विटर देखा तो, ब्राह्मण ट्रेंड कर रहा है। हमें लगा क्या हो गया। खंगाला तो समझ आया कि फिर ब्राह्मण ने एक मुसलमान को फंसाकर मार डाला है। 1993 मुंबई धमाके वाली आतंकवादी घटना के मुख्य सूत्रधार याकूब मेमन की फांसी के पीछे भी ब्राह्मण ही पाया जा रहा है। यहां तक कि पिछड़े, दलितों की लड़ाई बड़े मुकाम तक पहुंचने में भी कई लोग ब्राह्मणवादी साजिश देख लेते हैं। कभी-कभी लगता है काश मैं ऐसा वाला ब्राह्मण होता तो सबको निपटा देता। अद्भुत है ना कि यही ब्राह्मण एक ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री होना भारत में तय करता है। यही ब्राह्मण पिछड़ी जाति के नरेंद्र मोदी को भी प्रधानमंत्री बनाने की साजिश रचता है। यही ब्राह्मण क्षत्रिय चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी प्रधानमंत्री बनवाता है। फिर निपटा भी देता है। ब्राह्मण ही तो मुलायम सिंह यादव और मायावती को मुख्यमंत्री बनवाता है। पता नहीं इस प्रजाति के ब्राह्मण जयललिता को मुख्यमंत्री बनवाने की साजिश में किस हद तक शामिल हैं। इस प्रजाति वाला ब्राह्मण अनुमानों से परे है। ये धर्म, विज्ञान से परे है। ये बस ब्राह्मण है। ये साजिश इतनी तगड़ी है कि स्मार्टफोन भी इसी के कब्जे में चलता है। यहां तक कि विदेशी ट्विटर भी इसी ब्राह्मण के कब्जे में है। कुछ लोग तो कह रहे हैं कि ट्विटर पर भारत में सौ में अस्सी ब्राह्मण ही हैं। इन नव जातिशोधकों ने बहुत खोजबीन के बाद ये पाया है कि ये ब्राह्मण प्रजाति सिर्फ जाति वाले ब्राह्मणों पर ही आश्रित नहीं है। इस प्रजाति की साजिश के आगे जातीय तौर पर गैर ब्राह्मण जातियों के लोग भी प्रजाति से ब्राह्मण हो जाते हैं। वो भी बस प्रजाति के ब्राह्मणों की साजिश भर। आज इस ब्राह्मण ने फिर खेल कर दिया। अपने जाल में फंसाकर याकूब मेनन को फांसी दे दी। गजब है ये ब्राह्मण भारत में आतंकवादी हरकतों के जिम्मेदार को जाल में फंसाने के लिए इतना खेल करता है।

Monday, July 27, 2015

नई विश्व संरचना का संगठन है ब्रिक्स

ब्रिक्स देशों के बैंक ने विधिवत काम करना शुरू कर दिया है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स के इस बैंक की अहमियत बहुत ज्यादा हो जाती है। न्यू डेवलपमेंट बैंक में एक रूस को छोड़ दें तो सभी देश विकासशील देश हैं। ये बैंक विश्व बैंक के मुकाबले में काम करेगा या यूं कहें कि विश्व बैंक की कमियों को भरने की कोशिश करेगा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया में सहयोग, संगठन, संतुलन बनाने की बात की गई तो, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष और विश्व बैंक की भूमिका समझ में आई। और उम्मीद यही की गई थी कि इन संस्थाओं के जरिए दुनिया समानता लाने की कोशिश की जाएगी। कहने को तो ये संस्थाएं दुनिया भर में असमानता दूर करने के लिए बनीं। लेकिन, बाद के सालों में समझ में ये आया कि दरअसल ये संस्थाएं दुनिया की असमानता को दूर करने के बजाए उनकी ताकत बढ़ाने में ही मददगार हुईं जो, पहले से ही ताकतवर थीं। जिसका सीधा सा असर भी हुआ कि दुनिया लगभग एकध्रुवीय हो गई। अमेरिका के ही इर्द गिर्द पूरी दुनिया और ये संस्थाएं घूमने लगीं। रूस के बिखरने के बाद तो ये पूरी तरह से तय हो गया। चाहे अनचाहे दुनिया को संतुलित करने के लिए बनी संस्थाओं का पूरा एजेंडा ही अमेरिका से तय होने लगा। अस्सी के दशक में जब संगठित रूस कमजोर होने लगा। तब तो अमेरिका ने खुले तौर पर पूरी तरह से ही अपना एजेंडा चलाना शुरू कर दिया था। नब्बे के दशक की शुरुआत में ही सोवियत रूस विघटित हो गया। लेकिन, इसी समय दो महत्वपूर्ण घटनाएं आकार ले रहीं थीं। प्रधानमंत्री नरसिंहाराव ने भारत में उदारीकरण की शुरुआत कर दी थी। और, पड़ोस में चीन अपने स्पेशल इकोनॉमिक जोन के बूते तेजी से तरक्की की राह पर बढ़ते हुए अमेरिका को चुनौती देने का नया केंद्र बनता जा रहा था।

यही वो समय था जब दुनिया को अपने लिहाज से चलाने के लिए तैयार की गई अमेरिकी संस्थाएं- संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष-  आधी शताब्दी की यात्रा तय कर चुकी थीं। विश्व बैंक की स्थापना उन्नीस सौ चौवालीस में माउंट वॉशिंगटन होटल, ब्रेटन वुड्स, न्यू हैंपशायर अमेरिका में हुई। कमाल की बात ये है कि विश्व बैंक की स्थापना के मुख्य उद्देश्यों में ही ये है कि विकासशील देशों को उनकी जरूरत के लिहाज से कर्ज देना। इसी समय इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की भी स्थापना हुई। इससे भी ज्यादा कमाल की बात ये है कि विकासशील देशों को उनकी जरूरत के लिहाज से कर्ज देने के कार्यक्रम का पूरा जिम्मा अमेरिकियों पर ही थी। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष दोनों ही संस्थाओं का मुख्यालय वॉशिंगटन में ही है। विश्व बैंक के अब तक के सारे ही अध्यक्ष अमेरिकी रहे हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दरअसल विश्व बैंक किसके हितों की रक्षा की कोशिश करता रहा होगा। इसीलिए ब्रिक्स देशों के संगठन न्यू डेवलपमेंट बैंक या ब्रिक्स बैंक का महत्व समझना जरूरी है। इस बैंक की स्थापना करने वाले पांचों देश इसमें बराबर के सहयोगी हैं। यानी किसी देश या सदस्य के पास किसी तरह का वीटो पावर नहीं है। जैसा कि पश्चिम या सीधे कहें कि अमेरिकी, यूरोपीय मानसिकता से चलने वाली संस्थाओं में होता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक पूरी तरह से विकासशील देशों का बैंक है जो, विकासशील देशों की जरूरतों के लिहाज से वित्त उपलब्ध कराएगा। ये ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाता है कि यहीं ब्रिक्स के पांच देश हैं जो, दुनिया की चालीस प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या वाले देश हैं। और ये आबादी होती है तीन अरब से ज्यादा। इन देशों को अगर क्षेत्रफल के लिहाज से भी देखा जाए तो, ये देश दुनिया की एक तिहाई जमीन पर काबिज हैं। और, इन पांच देशों की जीडीपी जोड़ दी जाए तो दुनिया की जीडीपी का एक तिहाई सिर्फ ब्रिक्स देश ही हैं। फिर भी दुनिया को चलाने का काम अमेरिका और यूरोप कर रहा था। अमेरिका की अगुवाई में पश्चिम तय करता था कि पूरब के हिस्से में दुनिया के सूरज की रोशनी कितना मिलेगी। इस नए संगठन की एक सबसे बड़ी खूबसूरती मैं ये समझता हूं कि ब्रिक्स देशों का ये संगठन दुनिया में सही मायने में संतुलन लाने में मददगार होगा। भारत और चीन दोनों के बीच के तनावपूर्ण संबंध कम करने में भी ये संगठन मददगार हो रहा है। दोनों दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। चीन लगातार दस प्रतिशत तरक्की वाला देश लंबे समय तक रहा। अब जब चीन की तरक्की की रफ्तार लुढ़कती दिख रही है तो, भारत उस कमी को पूरा करता दिख रहा है। और आने वाले सालों में भारत दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार को आसानी से लंबे समय के लिए हासिल करता दिख रहा है। यानी, बाजार की ताकत का बड़ा हिस्सा इन्हीं दोनों देशों के इर्द गिर्द घूमता है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका उस बाजार की ताकत को पूरा करते हैं। और अमेरिकी अतिक्रमण का शिकार रूस नए सिरे से दुनिया की संरचना बदलने में मददगार होता दिख रहा है। भारत और चीन के बीच इस संगठन की वजह से संतुलन कितना ज्यादा है। इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्यालय शंघाई में है और इसका पहला अध्यक्ष एक भारतीय है। भारत में निजी बैंकों के लिए रास्ता बनाने वाले या कहें कि आधुनिक बैंकिंग सिस्टम को मजबूत करने वाले आईसीआईसीआई बैंक के पूर्व प्रमुख के वी कामत अब न्यू डेवलपमेंट बैंक के अध्यक्ष के तौर पर शंघाई में हैं।  


ऑस्ट्रेलिया के रेडियो एसबीएस हिंदी से इसी विषय पर बातचीत करते हुए मैंने इसी बात पर जोर दिया कि सारा फर्क समझ का है। के वी कीमत ने न्यू डेवलपमेंट बैंक के अध्यक्ष के तौर पर सबसे पहली जो बात कही। वही सारा फर्क पैदा कर देती है। के वी कामत ने साफ कहा कि ब्रिक्स देशों का ये बैंक कर्ज देने वाले के लिए नहीं कर्ज लेने वाले के लिए काम करेगा। मतलब ये कि वो साफ कह रहे हैं कि न्यू डेवलपमेंट बैंक की प्राथमिकता विश्व बैंक के उलट होगी। क्योंकि, विश्व बैंक काम ही कर्ज देने वालों के हितों की सुरक्षा के लिए करता था। अब न्यू डेवलपमेंट बैंक कर्ज लेने वालों के हित की सुरक्षा करेगा। ये बहुत बड़ा फर्क है। क्योंकि, अगर कर्ज देने वालों के हित की बात की जाएगी तो, जाहिर है कि कर्ज भले लंबे समय तक चले, ब्याज आता रहे। इस पर जोर होगा। जबकि, कर्ज लेने वालों के हित की बात होगी तो, कर्ज जिसको दिया गया है वो, अपने प्रोजेक्ट समय पर पूरा करने के साथ समय से कर्ज वापस कर सके। इस पर जोर होगा। इसका सीधा सा मतलब है कि न्यू डेवलपमेंट बैंक विकासशील देशों के विकसित देश बनने तक की यात्रा आसान करने में मदद करेगा। सूरज पूरब से निकलता है। ये अब कहावत भर या एक प्राकृतिक सच्चाई भर नहीं है। ये दुनिया की नई हकीकत है। 

Monday, July 20, 2015

कमजोर बुनियाद पर खड़ी भारत की उच्च शिक्षा

आईआईटी रुड़की से तिहत्तर छात्रों को निकालने की खबर आई तो लगा कि कोई संस्थान ये कैसे कर सकता है। बीटेक के पहले साल में ही तिहत्तर बच्चों को निकालने की खबर के बाद हर किसी को छात्रों के साथ सहानुभूति हो गई। सोशल मीडिया से लेकर लोगों के बीच से दबाव बनने लगा कि छात्रों को मौका देना चाहिए। इस तरह से तो उनका भविष्य खराब हो जाएगा। लेकिन, इन तिहत्तर छात्रों का भविष्य बनाने की चिंता किस तरह से पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था की चिंता को और बढ़ाएगी, इस पर शायद ही किसी का ध्यान जा रहा हो। या फिर कोई बहस हो रही है। सबसे पहले तो ये कि आखिर इन तिहत्तर छात्रों को बीटेक पहले साल की परीक्षा की नौबत क्यों आई। उसका जवाब ये है कि इन छात्रों ने पहले साल पांच सीजीपीए से भी कम नंबर हासिल किए हैं। आईआईटी रुड़की ने इसी आधार पर छात्रों को बाहर करने का नोटिस भेज दिया। ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी आईआईटी में छात्रों को खराब प्रदर्शन की वजह से निकाला नहीं गया है। लेकिन, बाद में उन्हें वापस ले लिया गया। मुझे लगता है कि यही छात्रों को वापस लेना भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चिंता की सबसे बड़ी वजह बनते हैं। कमाल की बात तो ये है कि भारतीय शिक्षा संस्थानों के दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों की सूची में न होने पर शर्म करने वाली भी वही हैं। और छात्रों को आरक्षण के आधार पर आईआईटी, मेडिकल में दाखिला दिलाने की पैरवी करने वाले भी वही हैं। दुनिया भर में बेहतर संस्थानों की सूची जब आती है तो, उसमें गलती से एकाध संस्थान भारत के आ जाएं तो बड़ी बात होती है। हर बार उसी समय बड़ा सपना देखा जाता है। बड़े लेख भी आते हैं। बड़ा विचार होता है। फिर से स्थगित कर दिया जाता है अगले साल सूची आने और उस पर स्यापा करने के लिए। किसी भी समाज में कमजोर तबके को दूसरे तबकों के बराबर लाने के लिए आरक्षण जरूरी होता है। भारत में भी है। लेकिन, किसी भी समाज को कमजोर करने के लिए आरक्षण का इस्तेमाल बेहद खतरनाक है। और इसीलिए आरक्षित हो या अनारक्षित, अगर छात्र तय नंबर से कम पा रहा है तो, उसे देश के उन शिक्षा संस्थानों में पढ़ने का मौका नहीं मिलना चाहिए, जिससे देश निर्माण का महत्वपूर्ण जिम्मा है। सामान्य वर्ग या आरक्षित वर्ग का छात्र अगर किसी तरह से आईआईटी, पीएमटी या आईआईएम की प्रवेश परीक्षा पास करके ये समझ लेता है कि अब ये संस्थान की महती जिम्मेदारी है कि वो उसे किसी भी तरह से अगले दो-तीन-चार सालों में डिग्री देकर ससम्मान विदा करे।

जाहिर है इस तरह डिग्री हासिल कर निकलने वाले छात्र न तो शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी कर सकते हैं। और न इस शिक्षा को पाने के बाद भारत निर्माण में बेहतर योगदान कर सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि आईआईटी रुड़की के तिहत्तर छात्रों को निकालने के फैसले को वापस लेने का दबाव न बने। बल्कि, इस बात का दबाव बने कि आखिर क्या वजह है कि आईआईटी रुड़की में दाखिला पाने वाले छात्र पांच सीजीपीए भी हासिल नहीं कर सके। और वो भी एक साल की आईआईटी रुड़की की शिक्षा के बाद। यानी शिक्षक और छात्र दोनों की ये समस्या है। और ये समस्या और गंभीर होती दिख रही है। इस चुनौती की वजह ये है कि देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में गिरावट होती जा रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए मेरिट आती है तो, लगता है जैसे देश में स्कूली शिक्षा से निकलने वाले बच्चे बेहद होनहार हैं। पंचानबे प्रतिशत के नीचे तो कोई मेरिट शुरू ही नहीं होती है। कई नामी कॉलेजों में ये मेरिट अट्ठानबे-निन्यानबे प्रतिशत तक होती है। लेकिन, ये एक पहलू है। अब जरा दूसरा पहली देखिए। आईआईटी में दाखिले के लिए जो ताजा मेरिट है, वो चौंकाने वाली है। जेईई के परीक्षा में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की मेरिट लिस्ट इस साल चौबीस दशमलव पांच प्रतिशत रही है। यानी पांच सौ चार नंबर में से सिर्फ एक सौ चौबीस नंबर। ये सामान्य वर्ग की मेरिट है। ओबीसी की मेरिट इससे थोड़ा सा ही कम करीब बाइस प्रतिशत है। हालांकि, पिछले साल से ये दोनों मेरिट कम है। पिछले साल सामान्य वर्ग की मेरिट पैंतीस प्रतिशत तक गई थी। जबकि, ओबीसी की इकतीस प्रतिशत। ये आंकड़े ही हमें निराश करने लगते हैं। और असल स्थिति बताते हैं हमारी स्कूल शिक्षा व्यवस्था की। लेकिन, इसके बाद के आंकड़े तो निराशा में और गहरे डुबो देते हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति के बच्चों की मेरिट इस बार साढ़े बारह प्रतिशत रही है। जो, पिछले साल साढ़े सत्रह प्रतिशत थी। इतने तक ही गिरावट नहीं रुकती है। देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठिक आईआईटी संस्थानों को अनुसूचित जाति, जनजाति के बच्चों को पांच सौ चार में से सिर्फ 31 नंबर लाने वाले बच्चों को भी दाखिला देना होगा। क्योंकि, सीटें खाली रह जाएंगी। ये करीब छे प्रतिशत है। पिछले साल कम से कम मेरिट भी करीब नौ प्रतिशत थी। ये वो सीटें हैं जिनमें एक साल बच्चों को तैयार किया जाएगा। उसके बाद बीटेक में दाखिला दिया जाएगा। मेरिट में ये गिरावट तब है जब आईआईटी में दाखिले के लिए ये भी जरूरी शर्त है कि जेईई एडवांस्ड की प्रवेश परीक्षा पास करने वाले छात्र के इंटरमीडिएट (बारहवीं) में कम से कम पचहत्तर प्रतिशत नंबर हों। और इस पैमाने की वजह से भी इकतीस छात्रों को प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद भी दाखिला नहीं मिल सका है।

भारतीय स्कूल शिक्षा व्यवस्था की खामी का ये अद्भुत उदाहरण है। सरकारों को इस बारे में सोचना होगा कि आखिर वो कैसे इस गुणवत्ता असंतुलन को दूर कर सकते हैं। इसका शुरुआत आईआईटी रुड़की के तिहत्तर छात्रों को एक साल की तैयारी का मौका देकर किया जा सकता है। लेकिन, उसमें शर्त कड़ी होनी चाहिए कि अगर तय पर्सेंटाइल नहीं आया तो, उसे दोबारा आईआईटी में दाखिला नहीं मिलेगा। लेकिन, लंबे समय की योजना में केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों को अपने बोर्ड की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता ठीक करने की जरूरत है। वैसे भी सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के अलावा दूसरे राज्य शिक्षा बोर्ड के प्रदर्शन में बेहतरी होने की बजाए गिरावट ही देखने को मिल रही है। और इसकी सबसे बड़ी वजह राज्यों में दसवीं-बारहवीं के नतीजे के राजनीतिक नफा-नुकसान से जुड़ जाना रहा है। उत्तर प्रदेश में नकल विरोधी अध्यादेश भी बीजेपी सरकार के दोबारा न आने में काफी मददगार रहा है। सपुस्तकीय परीक्षा प्रणाली और राज्यों में कुंजी-गाइड सिस्टम से दसवीं-बारहवीं पास करने वाले बच्चे कैसे आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए आईआईटी रुड़की के तिहत्तर छात्रों के खराब प्रदर्शन और उस आधार पर इन्हें निकालने को सिर्फ तिहत्तर छात्र और आईआईटी रुड़की के बीच का समस्या समझने के बजाए पूरी भारतीय स्कूली शिक्षा व्यवस्था की समस्या के तौर पर देखना होगा। तभी शायद इस तरह की बेहद असहज स्थिति से हमारे प्रमुख शिक्षा संस्थान बच सकेंगे। 

Saturday, July 18, 2015

ये बड़े कलाकार हैं!

 बहस अच्छी होती है। और गजेंद्र चौहान को एफटीआईआई का चेयरमैन बनाने के सरकार के फैसले पर हो रही बहस के बाद तो ये और भी साबित हो गया है। गजेंद्र चौहान को चेयरमैन बनाना चाहिआ या नहीं बनाना चाहिए। छात्रों के, फिल्म जगत के बड़े-बड़े लोगों के इतने विरोध के बाद गजेंद्र चौहान को पद पर बने रहना चाहिए या नहीं। ये सारी बहस होती रहे। लेकिन, इस बहस में एक बात जो निकलकर आई है। उस पर बात होनी बड़ी जरूरी है। बार-बार जब भी देश के प्रतिष्ठित संस्थानों की बात होती है। तो, साथ में ये बात जरूर होती है कि देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में मैनेजर, डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए सरकार कितनी रकम खर्च करती है। और क्या जनता के टैक्स की रकम में से खर्च की गई उस रकम से तैयार छात्र देश को कितना वापस दे पाते हैं। बहस ये भी होती है कि आईआईएम से निकले मैनेजर, देश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों से पढ़कर निकले डॉक्टर या फिर देश की प्रतिष्ठित आईआईटी से निकले इंजीनियर देश का कितना भला करते हैं। और वो लोगों की गाढ़ी कमाई से उनकी शिक्षा को दी गई सब्सिडी का कितना हिस्सा लोगों की सेवा करके फिर से उनको लौटाते हैं। बहस बार-बार ये होती रहती है कि आईआईएम से पढ़कर करोड़ो की सैलरी लेकर छात्र एमएनसी कंपनी की सेवा करता है या फिर विदेशों में जाकर नौकरी करते हैं। डॉक्टरों पर आरोप लगता है कि वो लोगों से महंगी फीस लेते हैं। महंगी दवाएं लिखते हैं। आखिर ये सब बहस क्यों होती। दरअसल ये सब बहस इसी आधार पर होती है कि वो जो पढ़ाई करके निकलते हैं, उस पढ़ाई के लिए सरकार जितनी बड़ी रकम खर्च करती है। वो, टैक्स की रकम का बड़ा हिस्सा होती है।
उदाहरण के लिए आईआईटी में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले एक छात्र पर सरकार सालाना करीब साढ़े तीन लाख रुपये खर्च करती है। ये उस छात्र की दी गई फीस के ऊपर खर्च होने वाली रकम है। ऐसे ही एक छात्र जब डॉक्टर बन रहा होता है तो, सरकार एक छात्र पर सालाना छे लाख रुपये से ज्यादा खर्च करती है। जबकि, देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रबंध संस्थान आईआईएम से पढ़कर निकलने वाले एक छात्र को बढ़िया प्रबंधक बनाने के लिए सरकार सालाना पांच लाख रुपये से ज्यादा खर्च करती है। इसीलिए ये बहस होती है कि आखिर देश के इन सबसे बेहतरनी संस्थानों से निकलने वाले छात्र देश के निर्माण में किस तरह से योगदान कर रहे हैं। बहस ये भी होती है कि आखिर अगर यहां से पढ़कर निकलने के बाद ये निजी संपत्ति बढ़ाने के ही काम में लग जाते हैं तो, क्या इतनी रकम इनके ऊपर खर्च करना जायज है। लेकिन, अगर इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए ये पूछा जाए कि देश के सबसे प्रतिष्ठित कलाकार तैयार करने वाले संस्थान एफटीआईआई से निकले छात्रों का देश निर्माण में क्या योगदान है। इस सवाल पर शायद बहुतायत लोग सीना तानकर खड़े हो जाएंगे कि ये कैसी बहस है। लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि कला को, कलाकार को पूरा सम्मान दिया जाए। लेकिन, यहां कलाकारों को, कला को सम्मान देने, उसे बढ़ाने पर तो कोई बहस मैं कर ही नहीं रहा। मैं तो बहस कर रहा हूं कि एफटीआईआई पुणे से निकले कलाकारों का देश के सिनेमा को आगे बढ़ाने में कितना योगदान है। अगर बड़े-बड़े कलाकारों के नाम गिनाकर इसका जवाब आ रहा है तो, किसी भी आईआईएम, आईआईटी या मेडिकल कॉलेज से निकले प्रोफेशनल के बड़े-बड़े नाम गिनाए जो सकते हैं। फिर ये बहस क्यों हो। सवाल ये भी है कि मैं आखिर एफटीआईआई पर ही ये बहस क्यों कर रहा हूं। दरअसल एफटीआईआई पर ये बहस में इसलिए कर रहा हूं कि देश प्रतिष्ठित आईआईएम, आईआईटी या फिर मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों से कहीं ज्यादा खर्च सरकार कलाकार तैयार करने में कर रही है। और ये खर्च भी जनता की गाढ़ी कमाई से ही सरकार कर पा रही है। चौंका देने वाला आंकड़ा ये है कि एफटीआईआई में पढ़ने वाले एक छात्र पर सरकार सालाना बारह लाख रुपये खर्च करती है। एफटीआईआई में साढ़े तीन सौ छात्र पढ़ते हैं। अब इस खर्च की तुलना अगर आईआईटी के छात्र से करें तो, ये करीब तीन गुना ज्यादा होता है। आईआईएम के छात्र पर सरकार के खर्च से दोगुने से भी ज्यादा और मेडिकल छात्र पर सालाना हो रहे खर्च से ठीक दोगुना है।
एफटीआईआई के छात्रों पर हो रहे खर्च की इस बहस में ये कुछ और तथ्य जोड़ने पर तो ये और भी रोचक हो जाती है। आईआईएम, आईआईटी या फिर किसी मेडिकल कॉलेज में हड़ताल की खबर कब आती है। क्योंकि, वहां के छात्र शायद ही हड़ताल करने की सोचते भी हों। लेकिन, एफटीआईआई में तैयार हो रहा हर कलाकार जैसे हड़ताल के लिए ही तैयार हो रहा होता है। गजेंद्र चौहान की काबिलियत की चर्चा इस बहस के केंद्र में नहीं है। इसलिए गजेंद्र की नियुक्ति के खिलाफ हो रही एफटीआईआई के छात्रों की इस समय की हड़ताल भी बहस में नहीं है। लेकिन, एफटीआईआई के पचास सालों में उन्तालीस से ज्यादा बार हड़ताल हो चुकी है। इसलिए ये बहस जरूरी हो जाती है कि आखिर एफटीआईआई क्या तैयार कर रहा है और किसके लिए तैयार कर रहा है।

Thursday, July 16, 2015

संघ को बदनाम करने की साजिश

@RSSorg @PMOIndia @BJP4India इस रिपोर्ट को जरूर को देखें। ये फ्रांस के न्यूज चैनल @FRANCE24 पर शनिवार को आने वाली रिपोर्ट का प्रोमो है। ये रिपोर्ट दिल्ली, बेरुत, वॉशिंगटन और लंडन में भी दिखेगी। रिपोर्ट है Forced to pray in secret - Christians in India इस प्रोमो को ही देखकर लगता है कि संघ और बीजेपी हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए इसाइयों पर इतना दमन कर रहे हैं कि वो ईसामसीह को चर्च में याद करने के बजाए घर में ही याद करते हैं। प्रोमो में जब इतना कुछ है तो, पूरी रिपोर्ट के बारे में आसानी से समझा जा सकता है। जबकि, अभी तक किसी भी चर्च पर हुए हमले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी या किसी दक्षिणपंथी संगठन का नाम दूर-दूर तक नहीं आया है। ऐसे में भारत चर्चों पर हुए हमले, चोरी की घटनाओं को संघ, बीजेपी से जोड़कर भारत की छवि खराब करने की ये बड़ी कोशिश है। ये एक घटना मेरी नजर में आई। ऐसी जाने कितनी कोशिशें, साजिशें चल रही होंगी। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...