Tuesday, December 18, 2012

फांसी!


ये मांग पहले भी उठी थी। लेकिन, दिक्कत तो ये है कि अतिमानवतावादी लोग तो, अब मृत्युदंड की सजा के ही खिलाफ दुनिया में मोर्चा मजबूत कर पा रहे हैं। ऐसे में ये मांग कितनी सफल हो पाएगी, पता नहीं लेकिन, इतना तो, तय है कि दिल्ली में जिस तरह से एक लड़के के साथ रहते कुछ कुकर्मियों ने उस लड़की के साथ दुष्कर्म किया उसके बाद निजी तौर पर मुझे लगता है कि सरकार को और न्यायपालिका को इस बारे में कुछ सोचना चाहिए कि इसकी सजा क्या मौत की सजा से कम हो सकती है। न्यायपालिका भी इसलिए जोड़ रहा हूं कि सरकार कैसे सोचती/करती है। वो, तो इसी से साफ हो जाता है कि दिल्ली में हुए दुष्कर्म के मुद्दे को बीजेपी ने सदन में उठाया तो, कांग्रेसी मंत्री राजीव शुक्ला की हंसी के साथ जवाब देने की कोशिश करते जो, तस्वीरें दिखीं उसने फिर ऐसा अहसास कराया कि हमारी सरकार तो, हर समय हमारे साथ दुष्कर्म कर रही है। और, ऐसा किया ये बताने पर हंस रही है।

इसी साल जुलाई में कुछ इसी किस्म की गुवाहाटी की घटना पता नहीं कितने लोगों को याद है। बड़ा हंगामा हुआ था। लेकिन, क्या सरकार की हनक वो बन रही है कि ऐसी घटनाएं न हों। मुंबई में 2007 की आखिरी रात की पार्टी के बाद की घटना तो, क्या लोगों को याद होगी। इसमें राजनीति ऐसी जुड़ी थी कि लगा कि मराठी मानुष ऐसे क्यों सोचता है।  वैसे, बड़ी विचित्र स्थिति होती है। दुष्कर्मी पुरुषों के पौरुष की पीड़ा उनको सत्कर्मी मानकर शादी के बंधन में बंधने वाली महिलाओं या प्राकृतिक संयोग से रिश्ते में आई महिलाओं को भी उतनी ही झेलनी होती है।

Wednesday, December 12, 2012

12 साल में कितना बदल गया हिंदू!

विश्व हिंदू परिषद याद है ना। अरे, वही इलाहाबाद वाले अशोक सिंघल जी जिसके अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। अपना घर भी एक शोध संस्थान को दे दिया है। गजब के समर्पित व्यक्ति हैं। सिंघल  साहब के बाद गुजरात के एक डॉक्टर प्रणीण तोगड़िया उसकी कमान संभाल रहे थे। जरूरत से ज्यादा उग्रता लिए तोगड़िया साहब की अगुवाई में विहिप सबसे पहले तो, गुजरात से ही गायब हो गया। कहा जाता है कि गुजरात में हुए दंगों में मोदी सरकार से ज्यादा भूमिका विश्व हिंदू परिषद की थी। खैर, ये नरेंद्र मोदी का कमाल था। मोदी ने सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों को ही नहीं। अपने विचार से जुड़े संगठनों को भी सत्ता के रास्ते में रोड़ा बनने पर उखाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, ये अचानक मैं क्यों याद कर रहा हूं। दरअसल एक समय में राम मंदिर आंदोलन या देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीतिक हावी हुई तो, विहिप, बजरंग दल में काम करने वाले बीजेपी से भी ज्यादा उसकी राजनीति में प्रभावी दिखने लगे। कई भगवाधारी बाबा विहिप के प्रभाव से लोकसभा, विधानसभा का टिकट पाकर वहां भी धर्म ध्वजा फहराने लगे।


महाकुंभ 2013 का प्रतीक चिन्ह
दरअसल ये अचानक मुझे याद इसलिए आया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद महाकुंभ 2013 का लोगो जारी किया है। हालांकि, इसमें महाकुंभ होने जैसा कहीं से भी दिख नहीं रहा है। क्योंकि, कुंभ तो, हर साल होता है। जबकि, महाकुंभ हर 12 साल पर होता है। प्रयाग के 2001 वाले महाकुंभ से मैं शुरुआती दिनों  वाले पत्रकार के तौर पर जुड़ा था। और, मुझे याद है कि सुबह के स्नान से रात की लीला के कवरेज करने के अलावा एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। विश्व हिंदू परिषद का पंडाल। उसी पंडाल में 2001 के महाकुंभ में धर्म संसद हुई थी। बड़ी महत्वपूर्ण धर्म संसद थी। मुझे याद है कि मैंने धर्म संसद पर दूसरे पत्रकारों की तरह नजर गड़ा कर रखी थी। महत्वपूर्ण साधु-संतों महंतों का जमावड़ा विश्व हिंदू परिषद के पंडाल में लगा रहता था। लेकिन, 2013 के महाकुंभ में शायद ही किसी को विहिप के पंडाल की उतनी फिक्र बने। शायद ही कोई धर्म संसद हो और अगर हो भी तो, शायद ही उसका कुछ असर प्रदेश, देश की राजनीति पर बन पाए। वजह क्या हो सकती है। 12 साल में इतनी जबरदस्त अप्रासंगिकता। कहा जाता है कि समय के साथ सबको चलना ही होता है अगर, समय के साथ याद रहना है तो। नरेंद्र मोदी से बेहतर उदाहरण शायद ही इस बात का कोई हो। नरेंद्र मोदी हिंदू हृदय सम्राट थे। 11-12 सालों में मोदी विकास के प्रतीक बन गए। इसका चुनावी परिणाम तो, 20 दिसंबर को ही पता चलेगा। लेकिन, सर्वे-संकेत तो, मोदी की शानदार जीत की बात कह रहे हैं। और, इलाहाबाद के अखबारों में विहिप की खबर कहीं नहीं हैं। हां, नए महामंडलेश्वरों के अलग नगर बसाने की खबर जरूर है। सही है गंगा, यमुना, सरस्वती में 12 साल में बड़ा पानी बह गया।

Tuesday, December 11, 2012

रिश्वत लेने-देने में बुराई क्या है?

कौशिक बसु किसी को याद हैं क्या? अरे वही वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार जो, अब विश्व बैंक में यही काम कर रहे हैं। उन्होंने एक प्रस्ताव दिया था कि रिश्वत देने को कानूनी कर दिया जाए। उस समय उनके प्रस्ताव का बड़ा मजाक बना था। लेकिन, अब लग रहा है कि मल्टीब्रांड रिटेल में #FDI लाने में लगी सरकार वॉलमार्ट के बहाने देश में ये पुण्य कार्य भी कर ही डालेगी। खैर, सरकार मुझे लगता है कि एक हाथ आगे जाएगी। कौशिक बसु का प्रस्ताव ये था कि रिश्वत देने को कानूनी कर दो। लेकिन, रिश्वत लेने वाले को पकड़ो इसमें मदद ये होगी कि रिश्वत देने वाला कानूनी छूट मिलने से रिश्वत लेने वाले को पकड़वाने में मदद करेगा। इसी प्रस्ताव का समर्थन इंफोसिस के चेयरमैन नारायणमूर्ति ने भी किया था। अब ये अलग बात है कि इसका खतरा ये कि काम बन गया तो, रिश्वत देने वाला किसी को बताएगा नहीं। और, काम कुछ गड़बड़ हुआ तो, पुलिस में रपट। खैर, सरकार मुझे लगता है कि विकसित होने का ये अवसर छोड़ेगी नहीं।

अमेरिका और वॉलमार्ट दोनों ये बता चुके हैं कि उनके कानून के मुताबिक, लॉबीइंग या रिश्वत गलत नहीं है। भले ही इस आरोप में जांच भी वही लोग कर रहे हैं। इंडिया CFO भी निलंबित कर दिया है। अपनी सरकार अपमानित सा महसूस कर रही है। लग रहा है कि क्या बात है हम ऐसे कैसे विकसित हो पाएंगे अगर विकसित देशों जैसे कानून भी हमारे यहां लागू नहीं हुए। तो, माना जाए कि नॉर्थ ब्लॉक से भले देश की नीति बदलने में कौशिक बसु का प्रस्ताव उपहास बन गया। अब विश्वबैंक में बैठकर बसु को मुस्कुराने का मौका मिलने ही वाला है। कानून न जाने के बाद ये तय हो जाएगा कि रिश्वत लेना-देना बुरा नहीं है। बस उसका हिसाब संसद में और कमीशन बाहर सलीके से दे दो। #BRIBE #WALMART #RETAIL

Saturday, December 01, 2012

संपादकीय सत्ता!

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी मीडिया के हित में है या लंबे समय में सरकार इसे ही 'आधार' (वो, वाला आधार नहीं जिससे सब्सिडी सीधे खाते में मिलेगी, वो, वाला आधार जिससे मीडिया को सब्सिडाइज्ड करने में मदद मिलेगी) बनाकर संपादक, संपादकीय सत्ता, मीडिया को निपटाने का प्रयास करेगी। सुधीर चौधरी के कृत्य पहले से इतने जगजाहिर हैं कि चाहकर भी कोई पत्रकार उधर खड़ा शायद ही दिखे। फिर BMW से चलने वाला संपादक बनने के बाद शायद सुधीर ने दूसरे पत्रकारों-संपादकों को कुछ अजीब किस्म का जंतु भी समझ लिया होगा। उसका भी दुष्परिणाम है कि एक भी व्यक्ति कम से कम सुधार के पक्ष में बात करने से रहा।

अपुष्ट खबरें ये भी आ रही हैं कि जिस सौदे को 100 करोड़ ले जाने के चक्कर में ये जेल चले गए। उस खबर पर कहीं-कहीं 20-25 करोड़ बन भी गए। इस सवाल का बस जवाब मिलना मुश्किल हो रहा है कि अभी सफाई कितनी और कैसे हो कि संपादक, प्रेस की व्यक्ति हित नहीं देश हित वाली सत्ता की छवि लौट पाए। एक विकल्प ये था कि जी ग्रुप विचारे और साफ सुथरी छवि वाले संपादक लाए। लेकिन, मुश्किल तो, ये है कि अगर खुद जी के लिए ही ये दोनों रणबांकुरे संपादक सारी कसरत कर रहे थे। तो, जी किनारा कैसे कर लेगा। डर है तो, बस इसी बात का कि छोटी दलाली के लिए छुटभैये चैनलों की कुछ दिनों की दलाली और फिर बंदी से पहले ही मीडिया की विश्वसनीयता खतरें में थी। और, मीडिया में भी अजीब सा ठहराव है। पत्रकार पूरी तरह से नौकरी ही करने लगे हैं। ऐसे में अगर कहीं जी जैसा बड़ा ग्रुप खबर छोड़ कुछ और करने लगा या फिर निपट गया तो, वैश्विक मंदी के दौर में क्या हो सकता है। ढेर सारे सवाल हैं जिसका जबाव खोजना, समझना मुश्किल है। सुधीर के जेल जाने की खबर पर कुछ प्रतिक्रिया मैंने फेसबुक पर दी थी उसको भी यहां चिपका रहा हूं। शायद कुछ और साफ हो सके


Gd news for media. Sudheer chaudhari & sameer ahluwalia arrested. Hope now zee find out any credible editor. #yellowjournalism #media #Coal

बिकने वाले या बिके हुए ये तो, बड़े कम पत्रकार अभी भी हैं। अभी एक दिन एकदम से इलाहाबाद से दिल्ली आया एक पत्रकार मिला। जिसे मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में किसी पढ़ाया भी था। उसने कहा कि सर अब मैं यहां काम कर रहा हूं तो, समझ में आ रहा है कि ...जैसा मीडिया दिखता है वैसा है नहीं। सच्चाई भी यही है। लेकिन, मैंने उससे यही कहाकि तुम कम से कम ये मत सोचो डेढ़ दशक के बाद मुझमें ये वृत्ति या मुझसे वरिष्ठों में ये वृत्ति आए तो, समझ में आती है लेकिन, कम से कम तुम लोग इस वृत्ति को पीट के पटरा कर दो। पत्रकारिता चल रही है चलेगी जब ज्यादा दलाल बढ़ेंगे तो, ऐसे ही पुलिस उनके चेहरे लाल करेगी तो, मेरा और हर सही पत्रकार का चेहरा खुशी से लाल होगा। और, ये बेहूदगी की बात है कि जिसे मौका नहीं मिला वही ईमानदार है। दूसरों पर ईमानदारी का दबाव बनाने में भले धीरे-धीरे कमी आती हो लेकिन, ज्यादातर पत्रकार अभी भी दमदार हैं। कम से कम मैं जितने भी लोगों के साथ अखबार-टीवी में काम करके आया हूं। उस अनुभव के आधार पर।


एक समय में हिंदी में विश्वसनीय खबरों और सिर्फ खबरों का चैनल जी न्यूज और ग्रुप का दूसरा जी बिजनेस आज ब्लैकमेलिंग मामले में अपने संपादकों की गिरफ्तारी पर सफाई के लिए मीडिया के सामने एक ढंग से विश्वास के साथ हिंदी बोलने वाला व्यक्ति नहीं खोज पाया। सफाई के लिए मीडिया के सामने आए आलोक अग्रवाल जो, पता चला CEO हैं। हिंदी पत्रकारों के सवालों के जवाब या जी की सफाई मांगने पर दाएं-बाएं देखने लगे। फिर अनुवादित हिंदी में पक्ष रखा। लेकिन, पत्रकारों को ये हिदायत की भरोसा अंग्रेजी वाली रिलीज पर ही करना। वाह रे हिंदी ..... मीडिया में ... #ZEENEWS #YELLOWJOURNALISM #MEDIA #COALGATE #MEDIAGATE


और, कोई वजह होती तो, सरकारी दमन के खिलाफ अपने संपादकों के साथ किसी मीडिया हाउस का खड़े होना पत्रकारीय मानदंडों को और ऊपर उठाता। लेकिन, अभी जी ग्रुप अगर इसी तरह अड़ा रहा तो, शायद पत्रकारीय मनदंड धव्स्त ही हो जाएंगे। #zeenews #yellowjournalism #media


मैं निजी तौर पर बेहद खुश हूं कि दलाली के जरिए पत्रकारिता में किस ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता है और वहां क्या हश्र होता है ये साफ हुआ है। क्योंकि, हम तो सीधे पत्रकारिता करके ही कितनी भी ऊंचाई तक जा सकते हैं और शायद दलाल पत्रकारिता के दौर में थोड़ा मुश्किल हो रहा था हमारे जैसों का ज्यादा ऊंचा जाना। मुझे अपने ऊंचे-नीचे जाने से कोई खास परेशानी नहीं है। परेशानी ये है कि मीडिया के शिखर पर दलालों का समूह सम्मान पाने लगा है। शायद ये खत्म होगा या थोड़ा तो, कम होगा ही। #yellowjournalism #media #Coal



 

Tuesday, November 27, 2012

पैसा देकर वोट जुटाने का जुगाड़

यही आधार कार्ड बनेगा सरकारी रकम पाने का आधार
भारत में आम जनता गजब बेवकूफ बनती है। पहले से कम पैसा, कम लोगों को पैसा लेकिन, सीधे खाते में #directcashsubsidy से जानकार उम्मीद जताने लगे हैं कि MNREGA (मनरेगा)की तरह #directcashsubsidy से यूपीए 3 हो सकती है।

माना जा रहा है कि करीब 10 करोड़ गरीब परिवारों को ये सब्सिडी सीधे खाते में मिलेगी। आगे इसमें सब्सिडी के साथ वजीफा, पेंशन या फिर दूसरी सरकारी योजनाओं का फायदा भी जोड़ दिया जाएगा। 10 करोड़ परिवार मतलब 40 करोड़ लोगों को सीधे खाते में रकम आने का भ्रम। और, भारतीय लोकतंत्र में जिस तरह मतदान होता है। उसमें 10-12 करोड़ वोट अगर मिले तो, पार्टी सत्ता में। बस यही फॉर्मूला है यूपीए 2 का यूपीए 3 बनाने के लिए। इसीलिए वित्त मंत्री पी चिदंबरम इस योजना  का एलान करते हुए इसे खुलेआम गेम चेंजर कह रहे हैं। अब वोट के लिए नोट देने के लिए ये चुनाव आयोग के कानूनी दायरे में भी नहीं आएगा। और, सब्सिडी घटाने पर रोज सवाल करने वाली जनता भी शांत रहेगी।

महंगाई, भ्रष्टाचार यूपीए 2 के लिए मुसीबत बन रहे हैं। उसका जवाब ये #directcashsubsidy है। सरकार कह रही है ये अलादीन का चिराग है। इससे सारे रोग दूर हो जाएंगे। देश के भी, सरकार के भी, लोगों के भी। बिचौलिए खत्म हो जाएंगे। सिस्टम की लीकेज खत्म हो जाएगा। फिर जाहिर है भ्रष्टाचार भी नहीं होगा। और, इसी अलादीन के चिराग से फिर ये यूपीए 2 की सरकार एक और इच्छा जाहिर कर देगी कि यूपीए 3 बना दो। और, चिराग का जिन्न ये मांग भला क्यों नहीं मानेगा।

सवाल यही है कि क्या सरकार फिर जनता को बेवकूफ बना सकेगी? पैसा बांटू राजनीति भारत में कब तक वोट बटोरने में मददगार होगी। ये तो अभी तक का अनुभव रहा है कि ये राजनीति वोट बटोरकर सरकार बनाने में भले मददगार हो। चलाने में तो बिल्कुल नहीं होती है। वरना हर क्षण देश, देश के लोगों की रेटिंग गिरने का खतरा बना ही रहता है। #directcashsubsidy

Wednesday, November 21, 2012

मीडिया का परिपक्व व्यवहार

बाल ठाकरे के निधन के बाद फेसबुक टिप्पणी की वजह से
इन दोनों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था 
मुंबई के पालघर की दो बहादुर कन्याओं Shaheen Dhada और Rinu Shrinivasan ने वो कर दिखाया जो, न होता तो, बाल ठाकरे का असल चरित्र उनके मरने के साथ दफन हो जाता। दरअसल यही सारे जीवन बाल ठाकरे रहे। विवादित, दबंग, अपने खिलाफ खड़े लोगों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले और मृत्यु के बाद कम से कम हिंदू संस्कार में तो, किसी को बुरा कहने का रिवाज नहीं है। सो, मीडिया ने भी नहीं कहा। इसमें गलत भी क्या था। अब जब Shaheen Dhada और Rinu Shrinivasan की फेसबुक पोस्ट के बाद शिवसैनिक मूल चरित्र में आए तो, मीडिया फिर फॉर्म में आ गया। कतार में लगे अनुशासित, आंसू बहाते शिवसैनिकों को भी अगर कोई मीडिया से गालूी खिलाना चाहता था तो, अच्छा हुआ वो, मंशा पूरी न हुई। मीडिया जाने-अनजाने खुद ही परिपक्व हो रहा है। दुखी होने वाले दुखी होते रहें।

Wednesday, October 31, 2012

निजी कंपनियों को रियायत के रास्ते में रोड़ा थे रेड्डी

कहते हैं बदलाव हमेशा अच्छे के लिए होता है। शायद यही सोचकर यूपीए सरकार के अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कैबिनेट में कई बड़े बदलाव कर डाले। लेकिन, इस बदलाव के बाद अच्छे की कौन कहे। सरकार के खिलाफ माहौल और खराब हो गया है और इस माहौल को खराब करने में सबसे बड़ी वजह बन रहा है पेट्रोलियम मंत्रालय से जयपाल रेड्डी से बाहर जाना। पेट्रोलियम मंत्रालय छिनने से रेड्डी खुद खफा हैं ये उन्होंने साबित भी कर दिया। रेड्डी वीरप्पा मोइली को मंत्रालय सौंपने नहीं आए। अरविंद केजरीवाल के ट्वीट और मीडिया में रेड्डी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को रियायत के रास्ते में रुकावट की खबर ने सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही सरकार के लिए ये एक और बड़ी मुश्किल हो गई है कि आरोप साफ लग रहे हैं कि रेड्डी की विदाई सिर्फ इस वजह से हुई है क्योंकि, रेड्डी रिलायंस को उसकी मनचाही शर्तें सरकार पर लादने की छूट नहीं दे रहे थे।

पेट्रोलियम मंत्रालय से जब मुरली देवड़ा की विदाई हुई और जयपाल रेड्डी ने पेट्रोलियम मंत्रालय का जिम्मा संभाला तो, एक संदेश साफ गया कि अब रिलायंस इंडस्ट्रीज को शर्तों के मुताबिक ही काम करना होगा। दरअसल तेल महकमे के गलियारों में ये चर्चा आम रही है कि जनवरी 2006 से जनवरी 2011 के दौरान जब मुरली देवड़ा ये महकमा संभाल रहे थे तो,रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए मनचाही नीतियां तैयार करवाने जैसा माहौल था। हालांकि,मुरली देवड़ा इस बात को सिरे से नकारने की कोशिश करते रहे। जब सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट मीडिया में लीक हो गई थी जिसमें रिलायंस को दिए गए तेल-गैस खोज के केजी डी 6 ठेके में अनियमितता की खबरें आईं थी। तो, देवड़ा ने ये कोशिश की थी कि मीडिया में ये खबरें रेड्डी के मुंह से आएं कि मुरली देवड़ा ने ही पेट्रोलियम मंत्री रहते 2007में सीएजी को रिलायंस केजी डी 6 बेसिन की ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने को कहा था। रेड्डी ने ये बात नहीं मानी और रेड्डी ने कुछ ऐसे फैसले लिए जिसे रिलायंस के करोबारी हितों के सख्त खिलाफ देखा जा रहा है।

जयपाल रेड्डी ने रिलायंस के ऊपर शर्तों को पूरा नहीं करने और उत्पादन घटने के एवज में सात हजार करोड़ रुपए की जुर्माना लगा दिया। इतना ही नहीं जब रिलायंस ने दुनिया की बड़ी तेल कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम के साथ 7.2बिलियन डॉलर का सौदा किया तो, जयपाल रेड्डी ने पेट्रोलियम मंत्रालय से इसे मंजूरी देने के बजाए इसे सौदे को कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेज दिया। जबकि, रिलायंस बीपी को केजी डी 6 में हिस्सा बेचकर अपने विस्तार के लिए रकम की जरूरत को पूरा करना चाह रहा था। रेड्डी इतने पर ही नहीं माने उन्होंने रिलायंस केजी डी 6 बेसिन के दूसरे ऑडिट के लिए सीएजी को इजाजत दे दी। जबकि, रिलायंस नहीं चाहता था कि उसके बजट को पहले मंजूरी दे दी जाए। लेकिन, पेट्रोलियम मंत्रालय ने निवेश को मंजूरी नहीं दी। रेड्डी ने 2014 के पहले रिलायंस की गैस कीमत बढ़ाने की मांग को भी नामंजूर कर दिया।

जयपाल रेड्डी के ये फैसले सीधे तौर पर रिलायंस के खिलाफ गए लेकिन, आमतौर पर ये धारणा बनी कि काफी समय के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय में कॉर्पोरेट लॉबी कमजोर हुई है और नियमों से काम हो रहा है। क्योंकि, रेड्डी ने देवड़ा के समय के कई अधिकारियों को,खासकर रिलायंस के नजदीकी माने जाने वाले अधिकारियों को कम महत्वपूर्ण जगहों या दूसरा जगहों पर भेज दिया था। माना ये भी जाता है कि जयपाल रेड्डी पेट्रोलियम मंत्री के तौर पर सरकारी आर्थिक सुधार- जिसका सीधा मतलब इस सरकार में सब तय करने की इजाजत निजी हाथों में देना है- की रफ्तार भी तेज होने में रुकावट थे। बहुत समय से तेल कंपनियों के दबाव के बावजूद जयपाल रेड्डी डीजल के दाम पांच रुपए बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। जबकि, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आर्थिक सुधारों की रफ्तार में किसी तरह की रुकावट नहीं चाह रहे थे। अब जयपाल रेड्डी की विदाई सरकारी फैसले से इतर राजनीतिक मसला भी बन गई है।

भारतीय जनता पार्टी ने रिलायंस के दबाव की जांच की मांग कर दी है। अरविंद केजरीवाल साफ कह रहे है कि जयपाल रेड्डी को रिलायंस के हितों में बाधा बनने की सजा मिली है। और, ये सब ऐसे समय हो रहा है जब सरकार पहले से ही ढेर सारे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी हुई है। देश की अर्थव्यवस्था मे करीब दो प्रतिशत की हिस्सेदारी रिलायंस इंडस्ट्रीज की है। और, रिलायंस येन केन प्रकारेण अपने इस साम्राज्य को और बढ़ाना चाहेगा ये स्वाभाविक है। ये भी सच है कि कारोबार करने में मुनाफा बढ़ाने-बनाने की चाह में कंपनियां गलत तरीके भी अपना सकती हैं। अपने मनमुताबिक काम कराने के लिए लॉबी भी बनाती हैं। अपने मनचाहे अधिकारियों को उन जगहों पर तैनात कराती हैं। ये कारोबारियों के लिए कभी-कभी शायद बेहद जरूरी भी होता होगा। लेकिन, सत्ता-सरकार किसी भी कीमत पर आम जनता के हितों की रक्षा के लिए होती है। नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिससे कारोबारी सरकारी खजाने को चोट न पहुंचा सके।

आम लोगों के, समाज के हक को न खा जाए। लेकिन, यूपीए-2 में आर्थिक सुधारों के नायक मनमोहन सिंह के इस बदलाव में जो, सबसे दुखद बात है वो, यही कि जिस तरह से ईमानदार छवि वाले जयपाल रेड्डी को हटाया गया वो, गले नहीं उतर रहा। भले ही वीरप्पा मोइली पूरी ईमानदारी से पेट्रोलियम मंत्रालय संभाले लेकिन, एक संदेश ये गलत चला गया कि सरकार रिलायंस के दबाव में है। और, ये सरकार कॉर्पोरेट दबाव के आगे टिक नहीं पाती। या यूं कहें कि सरकार समय आर्थिक सुधारों में रुकावट बनने वाले किसी को भी पसंद नहीं कर पाएगी। फिर चाहे वो कोई भी हो। और, सरकार की सुधारों की परिभाषा सब कुछ निजी हाथों में या कहें कि बाजार के हाथों में तय करने की ताकत देना है। इसलिए यूपीए-2 का ये बदलाव अच्छे के बजाय बुरे के संकेत ज्यादा देता दिख रहा है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...