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Wednesday, November 03, 2021

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर बढ़त ले ली, अब क्या करेंगे केजरीवाल, उद्धव और पिनराई विजयन

 

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में एक बात कही जाती है कि अकसर जनता के बीच हो रही चर्चा के आधार पर नरेंद्र मोदी निर्णय ले लेते हैं। आज दीपावली से एक दिन पहले पेट्रोल पर 5 रुपये और डीजल पर 10 रुपये एक्साइज ड्यूटी घटाकर केंद्र सरकार ने जनता को राहत दे दी है। हालांकि, यह बड़ी राहत नहीं है क्योंकि इधर एक महीने से लगातार प्रतिदिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें 30-35 पैसे प्रति लीटर बढ़ रहीं थीं। पिछले करीब डेढ़ वर्षों में पेट्रोल प्रति माह करीब दो रुपये और डीजल करीब डेढ़ रुपये महंगा हुआ है और इसी की नतीजा है कि देश के लगभग सभी शहरों में पेट्रोल और डीजल 100 रुपये प्रति लीटर के पार चला गया है। दिल्ली और मुम्बई में पेट्रोल-डीजल की कीमत 110 के पार चली गई है। ऐसे में पेट्रोल 5 और डीजल 10 रुपये सस्ता होने से भी उपभोक्ता को कितनी राहत मिल पाएगी, लेकिन संदेश देने के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाजी मार ले गए।


और, वित्त मंत्रालय ने पेट्रोल डीजल सस्ता करने से जनता और किसानों को होने वाले लाभ को गिनाते हए राज्यों से भी वैट घटाने की अपील कर दी 



इससे पहले आज ही राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि काश मोदी सरकार के पास जनता के लिए संवेदनशील दिल होता


अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो संवेदनशील दिल दिखा दिया, लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों के साथ अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, पिनराई विजयन और उद्धव ठाकरे संवेदनशील दिल दिखा पाएंगे। भाजपा शासित राज्यों तुरन्त पेट्रोल और डीजल पर VAT घटा दिया। सबसे पहले त्रिपुरा की भाजपा सरकार ने भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 रुपये प्रति लीटर की कमी कर दी। त्रिपुरा के साथ ही कर्नाटक, असम, मणिपुर, सिक्किम, मिजोरम और गोवा ने भी पेट्रोल और डीजल पर वैट 7 रुपये प्रति लीटर घटा दिया। भाजपा शासित अधिकतर राज्यों ने पेट्रोल, डीजल पर वैट 7 रुपये लीटर घटा दिया। इसका मतलब इन राज्यों में पेट्रोल 12, डीज़ल 17 रुपये लीटर एक झटके में सस्ता हो गया, लेकिन ग़ैर भाजपा शासित राज्यों से पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की कोई ख़बर नहीं आ रही, सिर्फ़ बयान आ रहा है #FuelPricesSlashed उत्तर प्रदेश में पेट्रोल और डीजल अब 12 रुपये लीटर सस्ता हो गया है, उत्तराखंड सरकार ने 2 रुपया प्रति लीटर VAT घटाया है। एनडीए शासन वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार राज्य ने भी मामूली पेट्रोल पर 1.30 रुपये और डीजल पर 1.90 रुपये की कमी की है। नरेंद्र मोदी और भाजपा से लड़ रहे विपक्षी दल हमलावर तो रहते हैं, लेकिन कभी निर्णय लेने में मोदी सरकार से आगे नहीं निकल पाते और इसीलिए बार-बार जनता को नरेंद्र मोदी पर अधिक भरोसा हो जाता है। पेट्रोल-डीजल कीमतों के मामले में भी वही होता दिख रहा है। पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने पर राज्य तैयार नहीं हो रहे। हालिया बैठक में अरविंद केजरीवाल और पिनराई विजयन की सरकार ने इसका कड़ा विरोध किया था। जनता सब देखती रहती है। 

Monday, October 26, 2015

छद्म सरोकारी साहित्यकार बनाम पूर्ण बहुमत की सरकार

इतिहास ने कभी साहित्यकारों को इस तरह से दुनिया की किसी सरकार के खिलाफ लामबंद होते हुए शायद ही देखा होगा। सबसे ज्यादा चेतन, सृजन का जिम्मा रखने का दावा करने वाले साहित्यकारों के साथ हिंदुस्तान में ऐसा क्या हो गया। जो, उन्हें इस तरह से सरकार के पैसे से चलने वाली लेकिन, स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने के लिए बाध्य करने लगा। क्या सचमुच हिंदुस्तान की सरकार ने साहित्य, कला या फिर एक शब्द में कहें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली है। क्या सचमुच इस देश में ऐसा कुछ नरेंद्र मोदी की सरकार ने गलत कर दिया है, जो पहले किसी सरकार ने नहीं किया था। क्या सचमुच इस समय देश के हालात आपातकाल, सिख दंगे या फिर देश के अलग-अलग हिस्से में हुए दंगों के समय के हालात से भी ज्यादा खराब हैं। क्या सचमुच इस भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के समय में अल्पसंख्यक- ईसाई और मुसलमान ही पढ़ें- खतरे में है। इन सवालों का जवाब खोजना इसलिए जरूरी है कि यही सवाल उठाकर जवाब में कुछ साहित्यकारों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं।

अब ये भले ही सारे लोग कह रहे हैं कि उदय प्रकाश की शुरुआत को धार देने वाली नयनतारा सहगल से लेकर अशोक वाजपेयी और फिर सारे साहित्यकारों ने अलग-अलग अपनी अंतरात्मा की आवाज पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं। लेकिन, ध्यान से देखिए। सब साफ हो जाएगा। नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश खाए-पिए-अघाए का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हर तरह से इतना खाए हैं कि उल्टी करने से थोड़ा स्वास्थ्य ठीक होगा। मन हल्का रहेगा। और सबसे बड़ी बात कि आगे उससे भी अच्छा खाने का जुगाड़ होगा। ढेरों पाए तो कभी-कभी कुछ-कुछ लौटाए। जब एकदम न पाए, तो कैसे-क्या लौटाए। अब उदय प्रकाश, नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी या फिर उसके बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वालों की जन्मकुंडली खंगालें। इससे बेहतर है कि पद्मश्री पुरस्कार लौटाने वाली पंजाबी लेखिका की सुन लें। बस उनका बयान ही छद्म धर्मनिरपेक्षता और किसी भी हद तक जाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के विरोध की कहानी कह देता है। पंजाबी लेखिका दलीप कुमार तवाना ने पद्मश्री लौटाने की जो वजह बताई है। उसे सुनने-पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि क्या हो रहा है। दलीप कौर ने कहा है कि बुद्ध और गुरु नानक की धरती पर सिखों को खिलाफ 1984 में ज्यादती हुई और मुसलमानों के खिलाफ बार-बार ज्यादती हो रही है। इसकी वजह समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता है। ये तो था, जो उऩ्होंने पद्मश्री लौटाते कहा है। मतलब 1984 से लेकर 2015 तक जो सिखों, मुसलमानों पर ज्यादतियां हो रही थीं। वो शर्म का पानी अब जाकर उनके नाक में घुसने लगा था। इसलिए पिछले कई दशकों तक बेशर्म रहने के बावजूद अब वो शर्मसार साबित होना चाहती हैं। यही सच है पुरस्कार लौटाने का। समझ रहे हैं न। आजादी के बाद किसी भी धर्मनिरपेक्ष सरकार में जो कुछ भी गलत हुआ है। उस सबका हिसाब मांगने के लिए एक तय कर दी गई सांप्रदायिक सरकार मिल गई है।

मुझे याद है कि पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में ही ये समझ में आ गया कि वामपंथी पत्रकार ठोंककर कहेगा कि मैं वामपंथी हूं। फिर भी बेहतर पत्रकार, सरोकारी पत्रकार बना रहेगा। लेकिन, राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ की बात ठोंककर छोड़िए, तर्क के साथ करने वाला भी पत्रकार नहीं, सिर्फ संघी या उससे भी आगे सांप्रदायिक संघी कहलाएगा। यही इस देश के साहित्यकार और सरकार के फर्जी धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ का सच है। ये बेहद घिनौना सच है। इन साहित्यकारों को डर अब यही है कि ये सच उघड़कर सबके सामने आ जाएगा। काफी हद तक सामने भी आ चुका है। न आता तो पूर्ण बहुमत की बीजेपी की सरकार की कल्पना इस देश में कोई कर सकता था क्या।

सोचिए सारी सांसारिक तिकड़मों को आजमाकर सत्ता में आए लोग इस देश में सरोकारी, समाजवादी बने रहे। लेकिन, विशुद्ध रूप से विकास के मुद्दे पर मई 2014 में चुनाव जीतने वाली पार्टी आज भी इन साहित्यकारों के तय खांचे में सांप्रदायिक बनी रही। मई 2014 में जाति हार गई थी। अब ये 2015 में जाति जिंदा कर देना चाहते हैं। वैसे ये कहते हैं कि जातिप्रथा तो संघ और दक्षिणपंथ ने पाल रखी है। ये अभी तक ये कहते रहे कि इनको तो जनता वोट तक नहीं देती। अब जब जनता वोट देकर सत्ता दे चुकी है। तो ये कह रहे हैं कि जनता भ्रमित हो गई है। यानी हर तरह के प्रमाणपत्र का ठेका सिर्फ इन्हीं के पास है। अब ये ठेका छिन रहा है। डर लग रहा है कि ये बने रहे, तो आगे किसी तरह का पुरस्कार इन जैसे छद्म धर्मनिरपेक्षता की जमीन पर रचनाकार बने लोगों को नहीं मिलने वाला। इसलिए ये पूरा जोर लगा रहे हैं। इतना कि ठीक बिहार चुनाव के समय ये सबकुछ हो रहा है। ठीक है पांच साल की मोदी सरकार का तो अब कुछ कर नहीं सकते। बिहार में भाजपा हारी, तो मोदी पर ही ठीकरा फोड़ेंगे। इस समय साहित्यकारों के दर्द और लालू प्रसाद यादव के दर्द जोड़कर देखिए। लालू जी कह रहे हैं कि बिहार चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी को इस्तीफा देना पड़ेगा। नहीं देंगे, तो हम आंदोलन करेंगे। बताइए समाजवाद के नाम पर, जेपी के नाम पर बिहार का क्या हाल लालू प्रसाद यादव ने किया। इसको समझने के लिए देश के किसी राज्य की राजधानी से एक बार पटना जाइए। समझ में आ जाएगा बिहार को कहां टिकाए रखने की इच्छा है। मैं उन तर्कों की बात ही नहीं कर रहा कि कहां-किसकी हत्या हुई। और जवाब किस सरकार से मांगा जा रहा है। मैं तो बात बड़े षडयंत्र की बुनियाद की तरफ कर रहा है। छद्म सेक्युलर सिंडिकेट टूट रहा है। सरोकार के नाम पर दुकान चलाने वालों की ये ग्राहक तैयार करने, बचाने की आखिरी कोशिश है। इन छद्म धर्मनिरपेक्ष साहित्यकारों की चिंता ये भी है कि अभी तक सिर्फ इनके जैसे ही पुरस्कृत होते थे। ये सिर्फ अपने जैसों को ही साहित्य की विधा में बर्दाश्त कर पाते हैं।

ये नामवर सिंह और मुनव्वर राना को भी बर्दाश्त नहीं कर सके। ये कह रहे हैं कि मेरे जैसे बनो या तुम्हारा अस्तित्व ही मिटा देंगे। उदाहरण देखिए 14 अक्टूबर को मुनव्वर राना ने कहा जो पुरस्कार लौटा रहे हैं। उनको अपनी कलम पर भरोसा नहीं है। वे थक चुके हैं। हालांकि, तीन दिन बीतते-बीतते राना की भी कलम पर थकने का दबाव बन ही गया। और उन्होंने एक टीवी चैनल के लाइव शो में पुरस्कार लौटाने का एलान कर दिया। तब मैंने मुनव्वर राना के ऊपर कुछ लिखा। हालांकि, मैं वामपंथी नहीं हूं, तो ये कविता या साहित्य नहीं हो सकता।

ए राना तेरी तो बड़ी शोहरत थी 
फिर ये पुरस्कार वापसी का लाइव तमाशा क्यों किया तूने

मुनव्वर राना की रायबरेली में नालियों में बहती थी सत्ता
सड़ती रही, बदबू करती रही
राना उस सत्ता पर फक्र करता रहा, सत्ता की सड़ांध पर
इत्र डालकर खुशबू का अहसास करता रहा 

अच्छी बात ये है कि राना शायद इतने बेगैरत और नासमझ नहीं थे। जो उन्हें समझ में न आता कि देश में कितने खराब हालात हैं। और इस तरह भारतीय जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ तयकर की जा रही पुरस्कार वापसी से देश कितना बचेगा। छद्म धर्मनिरपेक्ष साहित्यकारों के पतन की कहानी जारी है। कुछ लोग पतनशील साहित्य लिखते थे। अब कुछ लोग नामवर सिंह को पतनशील साहित्यकार कह रहे हैं। वजह। अरे वही। संघियों से मिल गया लगता है। मेरे जैसे नहीं, तो नहीं चलोगे। बदनाम कर देंगे। गैरसरोकारी बना देंगे। इनका यही मूल मंत्र है। वजह सिर्फ ये नामवर सिंह ने कह दिया कि सम्मान लौटाना गलत है। क्योंकि, ये पुरस्कार सरकार नहीं साहित्यकारों की संस्था साहित्य अकादमी देती है। लेकिन, ये कोई सोए थोड़े ना हैं। जो इनको कोई जगा सकता है। ये इस अंदाज में हैं कि तुम हमारे पुरस्कार वापसी को मौकापरस्ती बताओगे, तो हम तुम्हें दंगाई कह देंगे। अब बोलो। बोलती बंद हो गई। 

Tuesday, August 11, 2015

ये उम्मीद से हैं

@narendramodi की सरकार अगले कम से कम दो कार्यकाल न हट पाने की आहट से जो, वैचारिक मैथुन करने वाले बंधु नरेंद्र मोदी में बहुतायत खूबियां देख पाए थे। अब फिर उनकी आंखों के चश्मे का नंबर बदल गया है। अब उन्हें नजदीक की मोदी सरकार धुंधली दिखने लगी है। दूर की राहुल गांधी की सरकार बहुत साफ-साफ। वजह ये कि कुछ आहट आई कि मोदी के लिए तो यही पांच साल असफलता के साबित हो जाएंगे। वैचारिकों के तर्क की टाइमलाइन सलीके से देख लीजिए। मेरी बात साबित हो जाएगी। दिक्कत उनकी आंखों की है लेकिन, वो कह रहे हैं कि आंख के चश्मे का नंबर नहीं बदलवाएंगे। जो दिख रहा है वही बदलिए।

Thursday, August 01, 2013

इंडिया फर्स्ट नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड

नरेंद्र मोदी के विरोधी और समर्थक जितने मुखर हैं उतने शायद भारतीय राजनीति में कभी किसी नेता के नहीं रहे। नरेंद्र मोदी के विरोधी ऐसे कि गलती से कोई छोटी सी बात भी मोदी के खिलाफ हो तो उसको पहाड़ बनाने में नहीं चूकते और समर्थक भी ऐसे कि देश की हर समस्या की रामबाण औषधि मोदी को ही मानते हैं। फिर कोई नरेंद्र मोदी के रास्ते में बाधा बनता दिखता है तो, उसकी मिट्टी पलीद करने से भी नहीं चूकता। फिर वो चाहे नोबल पुरस्कार विजेता, भारत रत्न अमर्त्य सेना ही क्यों न हों। यहां तक कि पत्रकार से नेता बने चंदन मित्रा जैसे लोग भी बहककर दोबारा एनडीए की सरकार आने की आशा में अमर्त्य सेन से भारत रत्न छीनने तक की बात कर बैठते हैं। हालांकि, बाद में वो माफी मांग लेते हैं। लेकिन, अभी टीवी पर जो चेहरे नरेंद्र मोदी के समर्थक के तौर पर नजर आते हैं उनकी बात ही इस सहमति के बाद शुरू होती है कि नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री बनकर देश की सारी समस्याओं को सुलझा सकते हैं। ऐसा ही नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया ब्रिगेड का है। दरअसल नरेंद्र मोदी का करिश्मा ही कुछ ऐसा है। नरेंद्र मोदी का बोलना करना उनके समर्थकों को अंधभरोसा देता है कि वो जो चाहेंगे कर देंगे। और, यही अंधडर उनके विरोधियों को देता है कि वो जो चाहेंगे कर देंगे। इसीलिए समर्थक मोदी के आने से कम कुछ नहीं बर्दाश्त कर पा रहे और विरोधी मोदी के अलावा किसी भी और पर मान जाने को तैयार बैठे हैं।

नरेंद्र मोदी ने एक काम तो कर दिया है कि गुजरात में जो स्थिति तैयार की थी। वैसी ही स्थिति देश में तैयार कर दी है। गुजरात विधानसभा के पिछले चुनाव यानी 2007 के दौरान मैं वहां कवरेज पर था। कारोबारी चैनल के लिए स्टोरी कर रहा था इसलिए कारोबारियों के संपर्क में ज्यादा था। राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद में कारोबारी नरेंद्र मोदी को राजा जैसी सत्ता दे देने के पक्ष में थे। क्योंकि, उनका मानना था कि मोदी के अलावा कोई नहीं जो इतनी आसानी से कारोबार के मौके दे सके। कुछ ऐसी ही राय गैर कारोबारियों की भी थी कि जीवन को सुखमय करने का बेहतर रास्ता मोदी ही खोज सकते हैं। लेकिन, उसी चुनाव कवरेज के दौरान भावनगर के हीरा व्यापारी और अलंग पोर्ट के कारोबारी भी मिले जिनका ये मानना था कि नरेंद्र मोदी का शासन उनके कारोबार के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। और उनके जीवन की बदहाली के रास्ते और पुख्ता कर रहा है। वजह साफ थी कि अलंग पोर्ट के कारोबारियों से नरेंद्र मोदी का संतुलन नहीं बैठ पाया था। वैसे तो किसी भी ताकतवर नेता के साथ या खिलाफ वाला फॉर्मूला तगड़े से काम करते हैं लेकिन, नरेंद्र मोदी ने मेरे साथ या मेरे खिलाफ वाली अवधारणा को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।

इतना कि लालकृष्ण आडवाणी जैसे ताकतवर नेता के घर के सामने मोदी के पक्ष में लोग नारे लगाने पहुंच गए। इतना ही नहीं लालकृष्ण आडवाणी दिल्ली में बीजेपी के अनुसूचित मोर्चे के कार्यक्रम में रिकॉर्डतोड़ नतीजे बीजेपी के पक्ष में आने का अनुमान लगा रहे थे तो, ट्विटर पर एक मोदी समर्थक महिला लिख रही थी बुड्ढा बोल रहा है शाम को टीवी पर डिबेट कराएगा। ये महिला कुछ देर पहले ही गोविंदाचार्य को भी गरिया चुकी थीं। गुजरात में नरेंद्र मोदी 5 करोड़ गुजरातियों की बात करते थे। अब इंडिया फर्स्ट की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेवजह 2002 दंगों का भूत उनके विरोधियों ने ऐसे मजबूत किया कि नरेंद्र के उत्साही समर्थकों की कतार बड़ी होती चली गई। हालांकि, अब उन्हीं समर्थकों का अतिउत्साह कई मोदी समर्थकों को विरोधी लाइन में भी खड़ा कर रहा है। 2007 विधानसभा चुनाव के दौरन मैंने वहां जो महसूस किया था कि नरेंद्र मोदी ने खुद को एक ऐसे ब्रांड के तौर पर स्थापित कर लिया था। जहां गुजरात को बेहतर तरीके से चलाने-बनाने की एकमात्र किरण मोदी दिखने लगे थे और ऐसे में फिर कोई केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला, प्रवीण तोगड़िया वाली विहिप अगर नरेंद्र मोदी के रास्ते में बाधा बनते दिख रहे थे तो, गुजराती उसे दुश्मन मानने लगते थे। यही वजह थी कि जिस 2002 के लिए नरेंद्र मोदी को अभी अभी भी सबसे ज्यादा चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं। उसके असल आधार रहे विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया भी जब नरेंद्र मोदी की राह में बाधा दिखने लगे तो, बीजेपी और संघ का खांटी कैडर भी तोगड़िया का साथ छोड़ मोदी के साथ खड़ा हो गया। यहां तक कि संघ के एक राष्ट्रीय अधिकारी के पुत्र भी नरेंद्र मोदी का विरोध करके गुजरात में काम करने की स्थिति में नहीं रहे।

राष्ट्रीय परिदृष्य में भले ही सीधे तौर पर केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला और प्रवीण तोगड़िया वाली विहिप सीधे तौर पर न दिख रही हो लेकिन, हालात कमोबेश वैसे ही बन गए हैं। फैसला लेने वाली बीजेपी की सर्वोच्च संस्था में जब तक नरेंद्र मोदी नहीं थे तब तक लालकृष्ण आडवाणी ही सबकुछ थे। यहां तक कि संघ के खांटी समर्थन से अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने भले ही बैठकों को आडवाणी के 30 पृथ्वीराज रोड के घर से उठाकर 13 तीनमूर्ति लेन ले आए लेकिन, सच्चाई यही थी कि बैठक से पहले और आडवाणी के इशारे से संसदीय बोर्ड की फैसला भी हिला रहता था या आशंकित रहता था। अब सबको गोवी की बीजेपी बैठक के समय 30 पृथ्वीराज रोड के सामने का वो दृष्य तो याद ही रहेगा जिसमें पता नहीं कौन कौन सी खांटी हिंदू सेना का दावा करने वाले लोग आडवाणी के विरोध और नरेंद्र मोदी के पक्ष में नारे लगा रहे थे। गुजरात के बापा केशुभाई की तरह बीजेपी के लौह पुरुष को नरेंद्र मोदी की तगड़ी चुनौती थी। इसके पहले भी हालांकि, मोदी ने सद्भावना उपवास और आडवाणी की भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा के समय मोदी के साथ या विरोध में रहने वाली अवधारणा को मजबूती दे दी थी। लेकिन, सबसे तगड़ी चोट दिल्ली में 30 पृथ्वीराज रोड पर ही लगी। 5 करोड़ गुजराती की बात नरेंद्र मोदी करते हैं भले ही मोदी को जो वोट मिले हैं वो इससे काफी कम हैं। लेकिन, गिरी हालत में भी एक करोड़ मुखर गुजराती मोदी के समर्थन में ऐसे बोलते हैं कि गैर मुखर उससे कई गुना गुजरातियों के नेता भी नरेंद्र मोदी ही दिखते हैं।

गुजरात को मोदी ने वाइब्रैंट गुजरात नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड बना दिया। जिसे सीईओ नरेंद्र मोदी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा दिलाया है। इसीलिए गुजरात के एक बड़े वर्ग को मोदी के खिलाफ कही गई कोई भी बात यहां के विकास में अड़ंगा जैसा लगता है। अब जैसे वाइब्रैंट गुजरात को नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड बनाने के लिए गुजरात के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (विधानसभा) में मोदी के इतने मेंबर्स शामिल करने की जरूरत थी जो, मोदी को गुजरात का मुनाफा बढ़ाने के लिए उन्हें सीईओ और चेयरमैन (मुख्यमंत्री) की कुर्सी सौंप देगा। मोदी के बाइब्रैंट गुजरात का साल दर साल प्रॉफिट 10 प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रहा है। वाइब्रैंट गुजरात में काम करने वाले कर्मचारियों (आम जनता) को हर साल अच्छा इंक्रीमेंट मिल रहा है। पूरे गुजरात में सड़कें-बिजली-पानी सब कुछ लोगों को देश के दूसरे राज्यों से अच्छे से भी अच्छा मिल रहा है। गांवों में भी कमोबेश हालात देश की दूसरी कंपनियों (राज्यों) से अच्छे हैं।
वाइब्रैंट गुजरात में हर कोई अपना इंक्रीमेंट बढ़ाने के लिए जमकर काम करने में लगा हुआ है। सीईओ की पॉलिसी ऐसी हैं कि शेयरहोल्डर्स (आम जनता, किसान), उसमें पैसा लगाने वाले इंडस्ट्रियलिस्ट और FII (NRI) सब खुश हैं। हर किसी को यहां अच्छा मुनाफा दिख रहा है। ऐसा नहीं है वाइब्रैंट गुजरात लिमिटेड में इसके पहले के सीईओज ने बहुत कुछ न किया हो। लेकिन, नया सीईओ (मुख्यमंत्री) तुरंत फैसले लेता है। यूनियन (केशूभाई पटेल, सुरेश मेहता, कांशीराम रांणा, भाजपा संगठन, विहिप) पर रोक लगा दी गई है। हर कंपनी की तरह वाइब्रैंट गुजरात में भी ऊपर के अधिकारियों की सैलरी तेजी से बढ़ी है। लेकिन, खुद को साबित करके आगे बढ़ने का मौका सबके पास है। लेकिन, कंपनी के सीईओ नरेंद्र मोदी से पंगा लेकर यूनियन (केशूभाई पटेल, सुरेश मेहता, कांशीराम रांणा, भाजपा संगठन, विहिप) के लोगों से हाथ मिलाने की कोशिश की तो, फिर मुनाफा तो छोड़िए मूल पूंजी भी जा सकती है। नरेंद्र मोदी के कंपनी हित में लिए गए कड़े फैसलों (तानाशाही) से उसमें पैसा लगाने वाले खुश हैं। क्योंकि, इस कंपनी (गुजरात राज्य) से जुड़े किसी काम के लिए सबको खुश नहीं करना पड़ता। सीईओ या फिर उनके पसंदीदा बोर्ड मेंबर्स (विधायक) और सीईओ के प्रशासनिक अधिकारियों (IAS अफसरों) के जरिए बिना किसी रोक-टोक के हो सकता है। FII’s (NRI) तो नरेंद्र मोदी को ही दुबारा सीईओ और चेयरमैन देखना चाहते हैंकांग्रेस (पहले के सीईओ) के गुजरात को मोदी (नए सीईओ) ने वाइब्रैंट गुजरात बना दिया है। नए सीईओ के परिवार के कुछ बुजुर्ग भी (भाजपा, संघ, विहिप के नेता) कह रहे हैं कि जब से इस बच्चे को कमान सौंपी गई ये फैसलों में किसी की सुनता ही नही। लेकिन, अब शेयर होल्डर्स (जनता) इनकी सुनते नहीं दिख रहे। अब यही फॉर्मूला नरेंद्र मोदी देश पर लागू करने की कोशिश में लगे हैं। काफी हद तक सफल भी हैं। इस बात का अंदाजा परिवार के बुजुर्गों (भाजपा, संघ, विहिप के नेता) को लग गया इसीलिए वो परिवार के सबसे तेज बच्चे पर दांव लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए। उन्हें पता है कि परिवार का नाम तो बढ़ेगा इसी के जरिए भले हमारी इसके बाद कम सुनी जाए लेकिन, परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ने वाली है।

अब नरेंद्र मोदी इंडिया फर्स्ट की बात करने लगे हैं। नरेंद्र ने परिवार की जमी जमाई जमीन (शाखा) से आगे बढ़कर तकनीक को पकड़ा। सोशल मीडिया के जरिए हैलो हाय करने और अपनी ऊटपटांग तस्वीरे, वीडिया साझा करने वाले उन नौजवानों को पकड़ा जिनके लिए राजनीति मतलब चवन्नी छाप बात थी। उन नौजवानों के दिमाग में ये फिट कर दिया कि ये जौ मौज की जिंदगी है ये चलने वाली नहीं अगर नरेंद्र मोदी नहीं आया। क्योंकि, नरेंद्र मोदी आएगा तो इंडिया फर्स्ट कंपनी का मुनाफा तेजी से बढ़ेगा तुम नौजवानों के हाथ में ढेर सारी नौकरियां, जेब में जमकर पैसे और जिंदगी में हर सुविधा होगी। ये नौजवान भारतीय लोकतंत्र के सोते-जागते वाले पहरेदार थे। मोदी ने इन्हें जगा दिया है। ऐसा जगाया कि अब ये हैलो हाय, तस्वीरें, वीडियो अपलोड करने से पहले नमो-नमो जपने लगे हैं। नमो मंत्र को किसी ने अशुद्ध किया तो, उसका क्रियाकर्म करने को तैयार हो जाते हैं। पुराने बीजेपी के नेता गुजरात बीजेपी के नेताओं की तरह यूनियन यहां भी बना रहे हैं। बीजेपी के ‘शत्रु’ नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुखर हो गए हैं। स्थापित हो चुके दुश्मनों से हाथ मिला रहे हैं। लेकिन, नरेंद्र मोदी ने आजमाया फॉर्मूला ऐसा पका लिया है कि नीचे से आवाज आई तो, ये क्या कर लेंगे।

बस मोदी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पुराने दमदार बीजेपी के सीईओ से ज्यादा बोर्ड डायरेक्टर्स वो कैसे चुनवा पाते हैं। खराश वाले गले से बीजेपी के पुराने सीईओ अभी भी बीजेपी के 2 से 184 वाली कहानी दोहराते रहते हैं। अब मोदी कैसे 543 वाली संसद में कम से कम 200 से ज्यादा सदस्य चुनवा पाते हैं ये सबसे बड़ी बात होगी। क्योंकि, पुराने सीईओ अब परिवार के समर्थन और परिवार के बाहर मोदी के डर से बने पक्के समर्थन के भरोसे बैठे हैं। एक मुश्किल और है वाइब्रेंट गुजरात में कब्जे के लिए जो 51 प्रतिशत हिस्सेदारी चाहिए थी उससे छिटपुट शेयरधारक नहीं थे। इंडिया फर्स्ट में कांग्रेस बीजेपी दो बड़े शेयरधारक हैं लेकिन, छोटे-छोटे शेयरधारक मिल जाएं तो इन दोनों के बड़े शेयरधारकों से भी बड़े होने का खतरा है। इसीलिए नरेंद्र मोदी वही स्मार्टफोनपर गेम खेलने वाले नौजवानों को जगा रहे हैं जो, वोट करने के अधिकारी हैं करते नहीं हैं। उन्हें समझा रहे हैं कि पूरी ताकत दोगे तभी हम सीईओ बन पाएंगे और वाइब्रेंट गुजरात की तरह इंडिया फर्स्ट नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड का मुनाफा जमकर बढ़ाएंगे। जो इंडिया फर्स्ट में अपने मुनाफे देख रहे हैं वो नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक हैं। जो इंडिया फर्स्ट में अपने अधिकारों को एकदम समाप्त होता देख रहे हैं वो मोदी के घोर विरोधी हैं। दोनों के हित पूरी तरह बनने या बिगड़ने की बात है इसीलिए वो पूरी तरह से मोदी समर्थक या विरोधी हैं। और, यही नरेंद्र मोदी का चरित्र है, ताकत है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...