वो
औसत सा ही लड़का था। आंखों पर चश्मा। पिट्ठू बैग और दो मोबाइल। एक वही जिससे बात
करनी थी। मतलब वो फोन सिर्फ बात करने के काम आता था। दूसरा स्मार्टफोन जो, यारों-दोस्तों से यारी-दोस्ती बनाए रखने में मददगार
होता है। यानी स्मार्टली बात करने में दूसरा वाला फोन मददगार था। मंडी हाउस स्टेशन पर मेट्रो में वो तेजी से घुसा। उसके साथ एक लड़की भी
थी। लड़की थोड़ी मोटी थी। दोनों में अच्छी दोस्ती लग रही थी। उस औसत से लड़के का
चेहरा पता नहीं किस गर्व भाव से भरा हुआ था। और लड़की के चेहरे पर आसक्ति भाव था।
मेट्रो ने रफ्तार पकड़ी और गिरने से बचने के लिए लड़की ने लड़के का हाथ पकड़ लिया।
फिर लड़की ने बोला अरे सॉरी। लड़के ने बेतकल्लुफी से लड़की का हाथ छूते हुए कहा।
अरे इसमें क्या है गिरोगी तो पकड़ लिया। इसमें गलत क्या है। फिर खुद ही उसने चर्चा
छेड़ दी। अब उसने उस दिन पकड़ लिया था। लेकिन, उसने नाखूनों से पकड़ लिया था। मुझे
चोट आ गई थी। लड़की बोली अरे तुम उसके ब्वॉयफ्रेंड जो हो। पता नहीं पूछ रही थी या बता रही थी। लड़के को जैसे अपनी सारी
प्रतिभा दिखाने के लिए इसी मौके का इंतजार था। उसके तमतमाते चेहरे से लगा जैसे
किसी ने जख्म पर मिर्ची डाल दी हो। लड़का बोला थू करता है उसके जैसों पर मैं। मैं
तो उसके जैसों को जूते की नोक पर रखता हूं। लड़की के चेहरे पर अभी भी आसक्ति भाव
बरकरार था। वो लड़की को चमत्कृत कर देना चाहता था। और शायद इससे बेहतर मौका लड़के
को दोबारा न मिलता। वो बोलता रहा। वो तो किसी लायक नहीं थी। मेरे आगे पीछे तो एक
से एक लड़कियां घूमती रहती हैं। अचानक बात करने वाला साधारण वाला मोबाइल लड़के ने
जेब में डाल लिया। और उतनी ही तेजी से स्मार्टफोन जेब से निकाला। जेब से
स्मार्टफोन निकालकर व्हॉट्सएप में जल्दी जल्दी कुछ खोजने लगा। खोजकर एक सुंदर
लड़की की तस्वीर निकाली। उस मोटी अपेक्षाकृत कम सुंदर अपने साथ वाली लड़की को वो
तस्वीर दिखाई। अभी-अभी इसे छोड़ा है मैंने। फिर थोड़ा संतुलित हुआ। छोड़ा नहीं ये
कह लो म्यूचुअल ब्रेकअप है। देख इसे कित्ती सुंदर है ये। और दिखाता हूं तुझे। वो
ऐसे दूसरी तस्वीर खोजकर दिखा रहा था। जैसे कोई अपनी धन संपदा, हथियार या फिर
शारीरिक बल दिखाता है। दूसरी तस्वीर दिखाकर उसने कहा। इससे पहले वाली ये है। थोड़ा
गर्व के साथ चेहरा तमतमाते हुए उसने कहा कि ऐसी ढेरों लड़कियां मेरे आगे पीछे रही
हैं। मुझे उम्मीद थी कि लड़की कुछ तो प्रतिवाद करेगी। कहीं तो बोलेगी कि लड़कियां
भी तुमको जूते की नोक पर रखेंगी। कहीं तो कहेगी कि बहुत बोल चुके तुम। लेकिन, उस
लड़की के चेहरे पर आसक्ति भाव बरकरार था। वही आसक्ति भाव लिए लड़की सेक्टर 15 पर
लड़की उतर गई।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Friday, August 01, 2014
Sunday, November 18, 2007
अमीरों की दिल्ली पैसा, दारू और कार के पीछे भाग रही है
दिल्ली के लोग जमकर पैसा कमा रहे हैं। जमकर दारू पी रहे हैं और सड़कों पर तेज रफ्तार से कारें भगा रहे हैं। दिल्ली सरकार की ओर जारी ताजा आंकड़े ये बता रहे हैं। दिल्ली में एक व्यक्ति की औसत कमाई सालाना 61,676 रुपए हो गई है। अब दिल्ली सिर्फ गोवा से ही पीछे रह गई है। गोवा में लोगों की प्रति व्यक्ति कमाई सालाना 70,112 रुपए है।
कमाई बढ़ी तो, इसका जश्न मनाने के लिए दारू तो जरूरी है। और, दिलवालों की दिल्ली ने जमकर दारू पी। लेकिन, जश्न मनाने में थोड़ी कमी रह गई और दिल्लीवाले साल भर में एक लाख से काफी कम करीब 78,000 बोतल शराब ही पी पाए।
दिल्ली के लोगों ने इस साल करीब 16 लाख कारें खरीदी हैं। जो, पिछले साल से डेढ़ लाख ज्यादा हैं। अब दिल्ली वाले कमा ज्यादा रहे हैं तो, फिर बस या दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से क्यों यात्रा करें। अपनी कार से चलते हैं, जमकर दारू पीते हैं तो, थोड़ी बहुत दुर्घटनाएं तो हो ही जाती हैं। लेकिन, 2,167 लोग दिल्ली की इस रफ्तार के चक्कर में अपनी जान गंवा बैठे।
कमाई बढ़ी तो, इसका जश्न मनाने के लिए दारू तो जरूरी है। और, दिलवालों की दिल्ली ने जमकर दारू पी। लेकिन, जश्न मनाने में थोड़ी कमी रह गई और दिल्लीवाले साल भर में एक लाख से काफी कम करीब 78,000 बोतल शराब ही पी पाए।
दिल्ली के लोगों ने इस साल करीब 16 लाख कारें खरीदी हैं। जो, पिछले साल से डेढ़ लाख ज्यादा हैं। अब दिल्ली वाले कमा ज्यादा रहे हैं तो, फिर बस या दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से क्यों यात्रा करें। अपनी कार से चलते हैं, जमकर दारू पीते हैं तो, थोड़ी बहुत दुर्घटनाएं तो हो ही जाती हैं। लेकिन, 2,167 लोग दिल्ली की इस रफ्तार के चक्कर में अपनी जान गंवा बैठे।
Friday, November 02, 2007
ये है मुंबई मेरी जान ... जान ले रही है
आज मुंबई में एक यात्री लोकल ट्रेन के ऊपर लगे बिजली के तारों से बुरी तरह झुलस गया। 25 हजार वोल्ट का करेंट छूने के बाद वो यात्री ट्रेन के ऊपर ही गिर गया। वो, बुरी तरह जल गया। उसके शरीर से धुंआ निकल रहा था। विजुअल मिल गए थे लोगों को खींचने वाले थे इसलिए टीवी चैनल पर भी ये खबर दिखाई जा रही थी और लगातार चेतावनी भी दी जा रही थी। लेकिन, सवाल ये है कि क्या किसी को शौक हो सकता है कि लोकल ट्रेन की छत पर चढ़कर सफर करे। मुंबई मुझे रहते हुए तीन साल हो गए हैं। लेकिन, अभी भी छोटी सी दूरी के लिए भी लोकल से सफर करने की हिम्मत नहीं पड़ती। कभी हिम्मत की भी तो, ट्रेन पहुंचते-पहुंचते दुबारा लोकल पर न चढ़ने की सौगंध भी खाई। ये अलग बात है कि कई बार मजबूरी में ये सौगंध टूटती भी है। लेकिन, लोकल पर थोड़ बहुत चलने और स्टेशन पर खड़े कई लोकल गुजर जाने के अनुभव से इतना तो साफ है कि लोकल की ट्रेन पर सफर करने वाला शाकिया ये हरकत नहीं करता।
अब सवाल ये है कि अगर देश की अकेली मायानगरी में रहने वालों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी सरकार नहीं दे पा रही है तो, फिर मुंबई को देश का आर्थिक राजधानी होने का तमगा कैसे मिल सकता है। हर दूसरे दिन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाते रहते हैं। लेकिन, इस शहर मे रहने वाले लोगों को चलने के लिए लोकल ट्रेन तक की सुविधा नहीं मिल पा रही है। मैं जब 3 साल पहले इस शहर में नौकरी करने के लिए आया था तो, एक दिन बांद्रा से लोवर परेल पहुंचने पर ट्रेन से कटकर एक आदमी की जान जाते देखी। मुझे इस घटना ने झकझोर दिया था। लेकिन, उधर से गुजर रहे लोग लाश को एक नजर देखने भर की संवेदना भी नहीं जुटा पा रहे थे। ऑफिस में आकर मैंने कहा कि ये तो खबर है तो, बताया गया कि कैसी बात कर रहे हो यहां, हर रोज लोकल से कोई न कोई गिरकर या मर जाता है। या फिर किसी का हाथ पैर टूट जाता है। ये तो, सामान्य बात है। मुंबई की इस लाइफलाइन से जिंदगी जाने को इस तरह से सामान्य घटना होना सुनकर मुझे तगड़ा झटका लगा था। लेकिन, उसके बाद जब मैंने ध्यान से यहां के अखबारों को देखना शुरू किया तो, लगा कि ऑफिस के लोग सही ही कह रहे थे। अब सवाल ये है कि क्या रेलवे सिर्फ लोगों को सावधान करने भर की बात कहकर बच सकता है। प्रशासन और रेलवे आखिर लोगों को ट्रेन पर अपनी जान जोखिम में डालने से क्यों नहीं रोक पाता। मुंबई में सड़क के रास्ते से जाने की इच्छा रखने वालों को भी मायूसी ही हाथ लगती है। किसी भी सड़क से उतनी ही दूरी तय करने पर ट्रेन से दुगुना समय तो, लगता ही है। जेब भी काफी ढीली हो जाती है। अब टैक्सी-ऑटो का खर्च बर्दाश्त करना सबके बस का तो नहीं ही है।
यहां जिंदगियां कैसे जी जा रही हैं।
इसका अनुपम उदाहरण सुबह-सुबह किसी भी फ्लाईओवर के नीचे देखा जा सकता है। मैं सुबह ऑफिस जाता हूं तो, बिग बाजार से शुरू होकर एंपायर कॉम्प्लेक्स के सामने खत्म होने वाले फ्लाईओवर के नीचे सैकड़ो लोग सो रहे होते हैं। इतना ही नहीं। सड़के के किनारे खड़ी ज्यादातर टैक्सियों का दरवाजा खुला दिखता है। इन सभी टैक्सियों में कोई न कोई सो रहा होता है। इनकी भी मजबूरी है क्योंकि, इनमें से किसी के पास भी रहने के लिए एक कमरे की जगह भी नहीं है। अब क्या ये सरकार की जिम्मेदारी में शामिल नहीं है। अगर शामिल नहीं है तो, फिर सरकार क्या सिर्फ सत्ता का सुख लूटने के लिए चुनी जाती है। ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां ... जरा हटके जरा बचके ... ये है मुंबई मेरी जां ... ये लाइनें लिखते वक्त शायद ही लिखने वाले को मुंबई की इस मुश्किल का अहसास रहा होगा। लेकिन, इस शहर में रहने वाले सचमुच जरा हट के ... जरा बचके के ही अंदाज में अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। पता नहीं ये रास्ता कितना कारगर है। लेकिन, जब यहां लोगों को इस तरह से मौत के हाथों हारता हुआ देखता हूं तो, लगता है कि शिवसेना का अतिवादी सुझाव क्यों न मान लिया जाए। मुंबई शहर में बाहर से आने वालों पर रोक लगाई जाए। लेकिन, ये समस्या का सही निदान तो नहीं ही है।
वैसे, इस तरह की दुर्घटनाओं से बेखबर मुंबई अपनी रफ्तार में भाग रही है। लोकल ट्रेन के ऊपर बिजली के तार से छूकर जलने वाले का किस्सा 2-4 दिन लोकल में चलने वालों का टाइमपास बनेगा और कुछ दिन बाद डिब्बे की दमघोंटू भीड़ से बचने के लिए लोकल की छत पर चढ़ेगा। और, फिर से खबर भर बनकर रह जाएगी। लेकिन, संवेदना खोते लोग इसे मुंबई की जिंदादिली कहकर भुला देना चाहेंगे। जबकि ये कहने वाले भी जानते हैं कि ये जिंदादिली सिर्फ मजबूरी की ही है।
अब सवाल ये है कि अगर देश की अकेली मायानगरी में रहने वालों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी सरकार नहीं दे पा रही है तो, फिर मुंबई को देश का आर्थिक राजधानी होने का तमगा कैसे मिल सकता है। हर दूसरे दिन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाते रहते हैं। लेकिन, इस शहर मे रहने वाले लोगों को चलने के लिए लोकल ट्रेन तक की सुविधा नहीं मिल पा रही है। मैं जब 3 साल पहले इस शहर में नौकरी करने के लिए आया था तो, एक दिन बांद्रा से लोवर परेल पहुंचने पर ट्रेन से कटकर एक आदमी की जान जाते देखी। मुझे इस घटना ने झकझोर दिया था। लेकिन, उधर से गुजर रहे लोग लाश को एक नजर देखने भर की संवेदना भी नहीं जुटा पा रहे थे। ऑफिस में आकर मैंने कहा कि ये तो खबर है तो, बताया गया कि कैसी बात कर रहे हो यहां, हर रोज लोकल से कोई न कोई गिरकर या मर जाता है। या फिर किसी का हाथ पैर टूट जाता है। ये तो, सामान्य बात है। मुंबई की इस लाइफलाइन से जिंदगी जाने को इस तरह से सामान्य घटना होना सुनकर मुझे तगड़ा झटका लगा था। लेकिन, उसके बाद जब मैंने ध्यान से यहां के अखबारों को देखना शुरू किया तो, लगा कि ऑफिस के लोग सही ही कह रहे थे। अब सवाल ये है कि क्या रेलवे सिर्फ लोगों को सावधान करने भर की बात कहकर बच सकता है। प्रशासन और रेलवे आखिर लोगों को ट्रेन पर अपनी जान जोखिम में डालने से क्यों नहीं रोक पाता। मुंबई में सड़क के रास्ते से जाने की इच्छा रखने वालों को भी मायूसी ही हाथ लगती है। किसी भी सड़क से उतनी ही दूरी तय करने पर ट्रेन से दुगुना समय तो, लगता ही है। जेब भी काफी ढीली हो जाती है। अब टैक्सी-ऑटो का खर्च बर्दाश्त करना सबके बस का तो नहीं ही है।
यहां जिंदगियां कैसे जी जा रही हैं।
इसका अनुपम उदाहरण सुबह-सुबह किसी भी फ्लाईओवर के नीचे देखा जा सकता है। मैं सुबह ऑफिस जाता हूं तो, बिग बाजार से शुरू होकर एंपायर कॉम्प्लेक्स के सामने खत्म होने वाले फ्लाईओवर के नीचे सैकड़ो लोग सो रहे होते हैं। इतना ही नहीं। सड़के के किनारे खड़ी ज्यादातर टैक्सियों का दरवाजा खुला दिखता है। इन सभी टैक्सियों में कोई न कोई सो रहा होता है। इनकी भी मजबूरी है क्योंकि, इनमें से किसी के पास भी रहने के लिए एक कमरे की जगह भी नहीं है। अब क्या ये सरकार की जिम्मेदारी में शामिल नहीं है। अगर शामिल नहीं है तो, फिर सरकार क्या सिर्फ सत्ता का सुख लूटने के लिए चुनी जाती है। ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां ... जरा हटके जरा बचके ... ये है मुंबई मेरी जां ... ये लाइनें लिखते वक्त शायद ही लिखने वाले को मुंबई की इस मुश्किल का अहसास रहा होगा। लेकिन, इस शहर में रहने वाले सचमुच जरा हट के ... जरा बचके के ही अंदाज में अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। पता नहीं ये रास्ता कितना कारगर है। लेकिन, जब यहां लोगों को इस तरह से मौत के हाथों हारता हुआ देखता हूं तो, लगता है कि शिवसेना का अतिवादी सुझाव क्यों न मान लिया जाए। मुंबई शहर में बाहर से आने वालों पर रोक लगाई जाए। लेकिन, ये समस्या का सही निदान तो नहीं ही है।
वैसे, इस तरह की दुर्घटनाओं से बेखबर मुंबई अपनी रफ्तार में भाग रही है। लोकल ट्रेन के ऊपर बिजली के तार से छूकर जलने वाले का किस्सा 2-4 दिन लोकल में चलने वालों का टाइमपास बनेगा और कुछ दिन बाद डिब्बे की दमघोंटू भीड़ से बचने के लिए लोकल की छत पर चढ़ेगा। और, फिर से खबर भर बनकर रह जाएगी। लेकिन, संवेदना खोते लोग इसे मुंबई की जिंदादिली कहकर भुला देना चाहेंगे। जबकि ये कहने वाले भी जानते हैं कि ये जिंदादिली सिर्फ मजबूरी की ही है।
Saturday, September 29, 2007
मुंबई रहने के लिहाज से सबसे अच्छा शहर नहीं है
रहने के लिहाज से दिल्ली देश का सबसे अच्छा शहर है। इसका मतलब ये है कि आधुनिक सुविधा, जीने-रहने की आसानी दिल्ली में सबसे ज्यादा है। सड़कें अच्छी हैं। सड़कों पर जाम कम है और जरूरी सुविधाओं के मामले में बहुत खराब मुंबई से अभी भी सस्ता है। ये बात कह रही है शहरी विकास मंत्रालय की हाल ही में मुंबई में जारी रिपोर्ट।
दिल्ली रहने के लिए देश का सबसे अच्छा शहर है। इसके लिए तो, ढेर सारे तर्क हैं। दिल्ली- देश की राजधानी है। दिल्ली- देश के सारे नेता-बड़े अधिकारी यहीं रहते हैं। विदेशों से आने वाले प्रतिनिधिमंडल-नेताओं को यहीं रुकाया जाता है। इन सब छोटी-बड़ी वजहों से दिल्ली को बुनियादी सुविधाओं यानी सड़क, बिजली, पानी के लिहाज से बेहतर होना ही पड़ता और, वो है। दिल्ली सरकार के साथ ही केंद्र की सरकार भी इस शहर/राज्य को सजाने-संवारने की हर संभव कोशिश करती रहती है।
दिल्ली रहने के लिहाज से सबसे अच्छा है, इसके पक्ष में ऐसे सैकड़ो तर्क हैं। लेकिन, ऐसे ही सैकड़ो तर्क होने के बाद भी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को रहने लायक देश के सबसे अच्छे शहर का खिताब नहीं मिल सका। आपको लगेगा कि इसमें क्या बात हुई ये तो, चलता रहता है। दरअसल मुंबई के इसी, चलता है वाले, अंदाज से ही सारी काबिलियत होने के बाद भी मुंबई रहने के लिहाज से देश का सबसे अच्छा शहर नहीं बन पा रहा है।
मुंबई रहते हुए मुझे भी तीन साल हो गए हैं। सच बात ये है कि अभी भी मुझे दिल्ली के मुकाबले मुंबई कम ही अच्छी लगती है। इसके पीछे कोई ऐसी वजह नहीं है जो, अभी के सर्वे में निकली है। लेकिन, तीन साल पहले और अब जब मुझे हाल में दिल्ली जाने का मौका मिला था तो, दिल्ली में जमीन-आसमान का अंतर दिखा। लेकिन, इन तीन सालों में मुंबई एयरपोर्ट की बदली सूरत को छोड़ दें तो, कुछ भी नहीं बदला। यहां तक कि नवंबर 2004 में सुबह-सुबह मुंबई एयरपोर्ट पर उतरने के बाद से बांद्रा के एक होटल में पहुंचने तक जिस तरह झुग्गियों की लाइन, सड़क पर सुबह चारपाई डालकर सोते लोग, जाम, भीड़ भाड़ दिखा था, वो आज भी वैसे का वैसा है।
सड़क के दोनों तरफ करीब 6-6 फीट रास्ता रोके झुग्गियों में अभी भी लाखों लोग रह रहे हैं। 2004 में बनकर पूरा होने वाला बांद्रा वर्ली सी लिंक अगले साल अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। बांद्रा वर्ली सी लिंक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का पहला हिस्सा है जो, 5.6 किमी का है। दूसरा हिस्सा वर्ली से कोलाबा का 12 किमी से ज्यादा का है जो, अभी शुरू भी नहीं हुआ है। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के अलावा कोई ऐसी सड़क नहीं दिखती जो, देश के सबसे अमीर लोगों के शहर होने का भरोसा दिला सके।
मुंबई में लोकल रेलवे इतनी भरी होती हैं कि सांस लेना भी मुश्किल होता है। अब ऐसा तो है नहीं कि ऐसी दमघोंटू रेल में कोई खुशी से सफर करना चाहता है। लोकल मुंबई की जान इसलिए है कि दम घुटते हुए भी सफर जरा जल्दी पूरा हो जाता है और, दम निकलने से बच जाता है। रेल के बराबर की ही दूरी सड़क के रास्ते तय करने में मुंबई में दोगुना समय लग जाता है। और, सड़कों का ये हाल तब है जब, मुंबई का सिर्फ म्युनिसिपल कॉरपोरेशन इतना बजट पाता है। जितने में कई राज्य अपना बजट बना लेते हैं। आपको शायद भरोसा नहीं होगा- BMC यानी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का बजट 7000 करोड़ रुपए का है।
मुंबई में टाटा-अंबानी-गोदरेज-बजाज जैसे जाने कितने तुर्रमखां उद्योगपति रहते हैं। जो, इस समय दिल्ली दरबार में अलग से पूरा शहर (SEZ) बनाने के लिए अर्जी पे अर्जी दे रहे हैं। ये उद्योगपति कह रहे हैं कि ये शहर ऐसे होंगे जहां, बाहर से कुछ जरूरत नहीं होगी। बिजली, पानी, सड़क, एयरपोर्ट सबकुछ शहर में होगा। हेडक्वार्टर होने की वजह से इन्हें अक्सर ही मुंबई रहना, एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना पड़ता है। लेकिन, दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति बनने की कतार में लगे उद्योगपति अपने शहर में कुछ खास करने की इच्छा भी नहीं जताते। हां, अपने प्रोजेक्ट में जरा सी ऊंच-नीच होने पर किसी भी सरकार से भिड़ने को तैयार रहते हैं।
दिल्ली में रिंग रोड तो पूरी तरह से रेड सिग्नल फ्री है। इसके साथ ही दूसरी कई ऐसी सड़कें भी बन गई हैं जिसमें, 10-15 किलोमीटर तक ब्रेक लगाने की जरूरत नहीं होती। मेट्रो की सहूलियत तो दुनिया को पता है। मुंबई भी मेट्रो दौड़ाना चाहता है लेकिन, सी लिंक की ही तरह मेट्रो के काम में भी देरी शुरुआत से होनी शुरू हो गई है। लेकिन, रेड सिग्नल फ्री सड़कों की बात तो अभी मुंबई चलाने वाले सोच भी नहीं रहे हैं। जबकि, मुंबई में जिस तरह से छोटी (कम चौड़ी) सड़कों पर चलने वाली गाड़ियां बढ़ रही हैं, पूरी मुंबई में दो मंजिला सड़क की जरूरत दिखती है।
मैं मुंबई को लेकर निराश नहीं हूं। लेकिन, इतना जरूर सोचता हूं कि देश में सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर लोग मुंबई में रहते हैं। उन्हें विश्व स्तरीय सुविधा न मिलने की कोई वजह नहीं है। मोनो रेल, मेट्रो रेल, ढेर सारे फ्लाईओवर, सी लिंक, नई खूबसूरत-ज्यादा सुविधाओं-रफ्तार वाली लोकल और ऐसी ही दूसरी योजनाएं हैं जो, भरोसा दिलाती हैं कि मुंबई देश का सबसे ज्यादा सुविधाओं वाला शहर आसानी से बन सकता है। मुंबई एयरपोर्ट पर नए टर्मिनस पर उतरने पर ये अहसास होता भी है। मैंने बचपन में मुंबई के बारे में सुन रखा था कि वहां तो, कई-कई लेन वाली सड़कें हैं। तेज रफ्तार वाली गाड़ियों के लिए अलग-अलग लेन है। लंबी दूरी, चंद मिनटों में तय हो जाती है।
तीन साल पहले दिल्ली से हवाई सफर तय करने के बाद जमीन पर उतरा तो, खराब सुविधाओं को देखकर मेरे नीचे की जमीन ही खिसक गई। लेकिन, उम्मीद करता हूं कि मेरे बाद कोई और जब मायानगरी में सपने पूरे करने आएगा तो, उसे मुंबई देश में ही नहीं दुनिया में रहने के लिए सबसे अच्छे शहरों में शामिल मिले। उसे सिर्फ ये कहकर न बहलाया जाए कि मुंबई की खूबी यही है कि मुंबई कभी रुकती नहीं। बल्कि, यहां नया आने वाला मुंबई की तेज रफ्तार देखकर कहे कि हम दुनिया से आगे निकल गए हैं।
दिल्ली रहने के लिए देश का सबसे अच्छा शहर है। इसके लिए तो, ढेर सारे तर्क हैं। दिल्ली- देश की राजधानी है। दिल्ली- देश के सारे नेता-बड़े अधिकारी यहीं रहते हैं। विदेशों से आने वाले प्रतिनिधिमंडल-नेताओं को यहीं रुकाया जाता है। इन सब छोटी-बड़ी वजहों से दिल्ली को बुनियादी सुविधाओं यानी सड़क, बिजली, पानी के लिहाज से बेहतर होना ही पड़ता और, वो है। दिल्ली सरकार के साथ ही केंद्र की सरकार भी इस शहर/राज्य को सजाने-संवारने की हर संभव कोशिश करती रहती है।
दिल्ली रहने के लिहाज से सबसे अच्छा है, इसके पक्ष में ऐसे सैकड़ो तर्क हैं। लेकिन, ऐसे ही सैकड़ो तर्क होने के बाद भी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को रहने लायक देश के सबसे अच्छे शहर का खिताब नहीं मिल सका। आपको लगेगा कि इसमें क्या बात हुई ये तो, चलता रहता है। दरअसल मुंबई के इसी, चलता है वाले, अंदाज से ही सारी काबिलियत होने के बाद भी मुंबई रहने के लिहाज से देश का सबसे अच्छा शहर नहीं बन पा रहा है।
मुंबई रहते हुए मुझे भी तीन साल हो गए हैं। सच बात ये है कि अभी भी मुझे दिल्ली के मुकाबले मुंबई कम ही अच्छी लगती है। इसके पीछे कोई ऐसी वजह नहीं है जो, अभी के सर्वे में निकली है। लेकिन, तीन साल पहले और अब जब मुझे हाल में दिल्ली जाने का मौका मिला था तो, दिल्ली में जमीन-आसमान का अंतर दिखा। लेकिन, इन तीन सालों में मुंबई एयरपोर्ट की बदली सूरत को छोड़ दें तो, कुछ भी नहीं बदला। यहां तक कि नवंबर 2004 में सुबह-सुबह मुंबई एयरपोर्ट पर उतरने के बाद से बांद्रा के एक होटल में पहुंचने तक जिस तरह झुग्गियों की लाइन, सड़क पर सुबह चारपाई डालकर सोते लोग, जाम, भीड़ भाड़ दिखा था, वो आज भी वैसे का वैसा है।
सड़क के दोनों तरफ करीब 6-6 फीट रास्ता रोके झुग्गियों में अभी भी लाखों लोग रह रहे हैं। 2004 में बनकर पूरा होने वाला बांद्रा वर्ली सी लिंक अगले साल अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। बांद्रा वर्ली सी लिंक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का पहला हिस्सा है जो, 5.6 किमी का है। दूसरा हिस्सा वर्ली से कोलाबा का 12 किमी से ज्यादा का है जो, अभी शुरू भी नहीं हुआ है। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के अलावा कोई ऐसी सड़क नहीं दिखती जो, देश के सबसे अमीर लोगों के शहर होने का भरोसा दिला सके।
मुंबई में लोकल रेलवे इतनी भरी होती हैं कि सांस लेना भी मुश्किल होता है। अब ऐसा तो है नहीं कि ऐसी दमघोंटू रेल में कोई खुशी से सफर करना चाहता है। लोकल मुंबई की जान इसलिए है कि दम घुटते हुए भी सफर जरा जल्दी पूरा हो जाता है और, दम निकलने से बच जाता है। रेल के बराबर की ही दूरी सड़क के रास्ते तय करने में मुंबई में दोगुना समय लग जाता है। और, सड़कों का ये हाल तब है जब, मुंबई का सिर्फ म्युनिसिपल कॉरपोरेशन इतना बजट पाता है। जितने में कई राज्य अपना बजट बना लेते हैं। आपको शायद भरोसा नहीं होगा- BMC यानी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का बजट 7000 करोड़ रुपए का है।
मुंबई में टाटा-अंबानी-गोदरेज-बजाज जैसे जाने कितने तुर्रमखां उद्योगपति रहते हैं। जो, इस समय दिल्ली दरबार में अलग से पूरा शहर (SEZ) बनाने के लिए अर्जी पे अर्जी दे रहे हैं। ये उद्योगपति कह रहे हैं कि ये शहर ऐसे होंगे जहां, बाहर से कुछ जरूरत नहीं होगी। बिजली, पानी, सड़क, एयरपोर्ट सबकुछ शहर में होगा। हेडक्वार्टर होने की वजह से इन्हें अक्सर ही मुंबई रहना, एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना पड़ता है। लेकिन, दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति बनने की कतार में लगे उद्योगपति अपने शहर में कुछ खास करने की इच्छा भी नहीं जताते। हां, अपने प्रोजेक्ट में जरा सी ऊंच-नीच होने पर किसी भी सरकार से भिड़ने को तैयार रहते हैं।
दिल्ली में रिंग रोड तो पूरी तरह से रेड सिग्नल फ्री है। इसके साथ ही दूसरी कई ऐसी सड़कें भी बन गई हैं जिसमें, 10-15 किलोमीटर तक ब्रेक लगाने की जरूरत नहीं होती। मेट्रो की सहूलियत तो दुनिया को पता है। मुंबई भी मेट्रो दौड़ाना चाहता है लेकिन, सी लिंक की ही तरह मेट्रो के काम में भी देरी शुरुआत से होनी शुरू हो गई है। लेकिन, रेड सिग्नल फ्री सड़कों की बात तो अभी मुंबई चलाने वाले सोच भी नहीं रहे हैं। जबकि, मुंबई में जिस तरह से छोटी (कम चौड़ी) सड़कों पर चलने वाली गाड़ियां बढ़ रही हैं, पूरी मुंबई में दो मंजिला सड़क की जरूरत दिखती है।
मैं मुंबई को लेकर निराश नहीं हूं। लेकिन, इतना जरूर सोचता हूं कि देश में सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर लोग मुंबई में रहते हैं। उन्हें विश्व स्तरीय सुविधा न मिलने की कोई वजह नहीं है। मोनो रेल, मेट्रो रेल, ढेर सारे फ्लाईओवर, सी लिंक, नई खूबसूरत-ज्यादा सुविधाओं-रफ्तार वाली लोकल और ऐसी ही दूसरी योजनाएं हैं जो, भरोसा दिलाती हैं कि मुंबई देश का सबसे ज्यादा सुविधाओं वाला शहर आसानी से बन सकता है। मुंबई एयरपोर्ट पर नए टर्मिनस पर उतरने पर ये अहसास होता भी है। मैंने बचपन में मुंबई के बारे में सुन रखा था कि वहां तो, कई-कई लेन वाली सड़कें हैं। तेज रफ्तार वाली गाड़ियों के लिए अलग-अलग लेन है। लंबी दूरी, चंद मिनटों में तय हो जाती है।
तीन साल पहले दिल्ली से हवाई सफर तय करने के बाद जमीन पर उतरा तो, खराब सुविधाओं को देखकर मेरे नीचे की जमीन ही खिसक गई। लेकिन, उम्मीद करता हूं कि मेरे बाद कोई और जब मायानगरी में सपने पूरे करने आएगा तो, उसे मुंबई देश में ही नहीं दुनिया में रहने के लिए सबसे अच्छे शहरों में शामिल मिले। उसे सिर्फ ये कहकर न बहलाया जाए कि मुंबई की खूबी यही है कि मुंबई कभी रुकती नहीं। बल्कि, यहां नया आने वाला मुंबई की तेज रफ्तार देखकर कहे कि हम दुनिया से आगे निकल गए हैं।
फिर एक दिल्ली वाले ने आग लगा दी!
इंडियन आइडल प्रतियोगिता से कौन बाहर हुआ। कौन अंदर आया। इस पर हर बार की तरह इस बार भी खूब विवाद हुआ। लेकिन, इस बार जब फाइनल मुकाबला प्रशांत तमांग और अमित पॉल के बीच हुआ तो, एक जो सबसे अच्छी बात दिखी वो ये कि इंडियन आइडल के बहाने पूरा पूर्वोत्तर भारत, भारत में खुशी-खुशी शामिल हो गया था। पूर्वोत्तर भारत के कई शहर प्रशांत तमांग और अमित पॉल के पोस्टरों से लदे पड़े थे। सबको लग रहा था पूर्वोत्तर भारत का भाई, बेटा, पूरे भारत का हीरो बनने जा रहा है। ये पहली बार हो रहा था।
वैसे इससे पहले भी असम के देबोजीत उर्फ देबू इंडियन आइडल बन चुके हैं। और, देबोजीत की प्रतिभा पर भी किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन, पिछली बार मीडिया में बार-बार ये बात आती रही कि असम के उग्रवादी संगठन उल्फा ने कहा है कि अगर देबोजीत नहीं जीता तो, वो हिंसा फैला देंगे। उल्फा की ओर से देबोजीत के समर्थन में एक फरमान जारी करने की भी खबर थी। इस बार के इंडियन आइडल की दौड़ में लगे सुर के सरताजों के लिए न तो किसी ने फरमान जारी किया और न ही इस बार कहीं से किसी क्षेत्रवाद या भाषावाद की बदबू आई।
पिछले जाने कितने सालों से भारत से कटे होने का दर्द झेल रहे पूर्वोत्तर भारत के लोग इंडियन आइडल के बहाने भारत से जुड़कर खुश थे। लेकिन, रेडियो पर बकबक के लिए पैसे लेने वाले एक RJ को पूर्वोत्तर भारत के लोगों की ये खुशी बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपने शो में हंसी-मजाक में कह दिया कि अगर चौकीदार इंडियन आइडल बनने लगेंगे तो, चौकीदारी कौन करेगा। बस फिर क्या था। हफ्ते भर पहले इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के पोस्टरों के साथ रैली वाली सड़क पर आग जल रही थी। खुशी मनाने वाले चेहरों पर गुस्सा था। मिठाइयां बांटने वाले लोग तोड़फोड़ कर रहे थे।
लेकिन, अगर आपको ये लग रहा है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के दिलों में जो आग लगी है वो, सिर्फ दिल्ली के एक RJ के बर्ताव की वजह से है तो, आप गलत हैं। दरअसल ये गुस्सा दिल्ली में बैठी सरकार की उस मानसिकता के खिलाफ है जो, पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ एक सा बर्ताव नहीं करते। ये उस बर्ताव के खिलाफ है जो, पिछले कई दशकों से दिल्ली की सरकार पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ कर रही है। दिल्ली में सत्ता में रहने वाले नेताओं के भाषणों में ही भारत का हिस्सा बनकर रह गए हैं, पूर्वोत्तर भारत के लोग। कश्मीर में जेहाद के लिए पाकिस्तान से मदद मिलती है, इसका हल्ला बार-बार होता है। और, घाटी का आतंकवाद सुर्खियों में भी बना रहता है। लेकिन, क्या असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में सामान्य जिंदगी के लिए सेना और उग्रवादियों के बीच पिस रहे लोगों की बात पूरे भारत तक पहुंच पाती है। अगर पहुंच पाती तो, वहां की महिलाओं को निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन न करना पड़ता।
पूर्वोत्तर भारत बारे में भारत के दूसरे हिस्से में रहने वालों की राय का अंदाजा इस एक बात से ही लगाया जा सकता है। देश की सबसे प्रतिष्ठित (रुतबेदार) परीक्षा IAS पास होने के बाद भी लोग पूर्वोत्तर का कैडर नहीं लेना चाहते। वो, दिल्ली, अपने राज्य या फिर किसी दूसरे नजदीक के राज्य में SDM, DSP बन जाना पसंद करते हैं। लेकिन, असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के किसी जिले में DM, SP नहीं बनना चाहते। दरअसल देश में सरकार चलाने वालों ने जिस संवेदनहीन तरीके से पूर्वोत्तर के मामले को खराब किया है। उससे पूर्वोत्तर के लोग मुश्किल से ही भारत के साथ जुड़ पाते हैं। यही वजह है कि चुनावों में भारत विरोध वहां वोट बटोरने का जरिया बन जाता है।
आजादी के इतने सालों के बाद भी अगर कोई सर्वे कराया जाए कि देश के लोगों का सामान्य ज्ञान पूर्वोत्तर भारत के बारे में कितना है तो, चौंकाने वाले आंकड़े सुनने को मिल सकते हैं। इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के बारे में (गोरखाओं को चुभने वाली टिप्पणी) शर्मनाक टिप्पणी करने वाले RJ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी इसलिए भी जरूरी है कि देश में जुड़ने की पूर्वोत्तर भारत के लोगों की कोशिश फिर एक दिल्ली वाली मानसिकता की वजह से बेकार न हो जाए।
वैसे इससे पहले भी असम के देबोजीत उर्फ देबू इंडियन आइडल बन चुके हैं। और, देबोजीत की प्रतिभा पर भी किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन, पिछली बार मीडिया में बार-बार ये बात आती रही कि असम के उग्रवादी संगठन उल्फा ने कहा है कि अगर देबोजीत नहीं जीता तो, वो हिंसा फैला देंगे। उल्फा की ओर से देबोजीत के समर्थन में एक फरमान जारी करने की भी खबर थी। इस बार के इंडियन आइडल की दौड़ में लगे सुर के सरताजों के लिए न तो किसी ने फरमान जारी किया और न ही इस बार कहीं से किसी क्षेत्रवाद या भाषावाद की बदबू आई।
पिछले जाने कितने सालों से भारत से कटे होने का दर्द झेल रहे पूर्वोत्तर भारत के लोग इंडियन आइडल के बहाने भारत से जुड़कर खुश थे। लेकिन, रेडियो पर बकबक के लिए पैसे लेने वाले एक RJ को पूर्वोत्तर भारत के लोगों की ये खुशी बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपने शो में हंसी-मजाक में कह दिया कि अगर चौकीदार इंडियन आइडल बनने लगेंगे तो, चौकीदारी कौन करेगा। बस फिर क्या था। हफ्ते भर पहले इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के पोस्टरों के साथ रैली वाली सड़क पर आग जल रही थी। खुशी मनाने वाले चेहरों पर गुस्सा था। मिठाइयां बांटने वाले लोग तोड़फोड़ कर रहे थे।
लेकिन, अगर आपको ये लग रहा है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के दिलों में जो आग लगी है वो, सिर्फ दिल्ली के एक RJ के बर्ताव की वजह से है तो, आप गलत हैं। दरअसल ये गुस्सा दिल्ली में बैठी सरकार की उस मानसिकता के खिलाफ है जो, पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ एक सा बर्ताव नहीं करते। ये उस बर्ताव के खिलाफ है जो, पिछले कई दशकों से दिल्ली की सरकार पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ कर रही है। दिल्ली में सत्ता में रहने वाले नेताओं के भाषणों में ही भारत का हिस्सा बनकर रह गए हैं, पूर्वोत्तर भारत के लोग। कश्मीर में जेहाद के लिए पाकिस्तान से मदद मिलती है, इसका हल्ला बार-बार होता है। और, घाटी का आतंकवाद सुर्खियों में भी बना रहता है। लेकिन, क्या असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में सामान्य जिंदगी के लिए सेना और उग्रवादियों के बीच पिस रहे लोगों की बात पूरे भारत तक पहुंच पाती है। अगर पहुंच पाती तो, वहां की महिलाओं को निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन न करना पड़ता।
पूर्वोत्तर भारत बारे में भारत के दूसरे हिस्से में रहने वालों की राय का अंदाजा इस एक बात से ही लगाया जा सकता है। देश की सबसे प्रतिष्ठित (रुतबेदार) परीक्षा IAS पास होने के बाद भी लोग पूर्वोत्तर का कैडर नहीं लेना चाहते। वो, दिल्ली, अपने राज्य या फिर किसी दूसरे नजदीक के राज्य में SDM, DSP बन जाना पसंद करते हैं। लेकिन, असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के किसी जिले में DM, SP नहीं बनना चाहते। दरअसल देश में सरकार चलाने वालों ने जिस संवेदनहीन तरीके से पूर्वोत्तर के मामले को खराब किया है। उससे पूर्वोत्तर के लोग मुश्किल से ही भारत के साथ जुड़ पाते हैं। यही वजह है कि चुनावों में भारत विरोध वहां वोट बटोरने का जरिया बन जाता है।
आजादी के इतने सालों के बाद भी अगर कोई सर्वे कराया जाए कि देश के लोगों का सामान्य ज्ञान पूर्वोत्तर भारत के बारे में कितना है तो, चौंकाने वाले आंकड़े सुनने को मिल सकते हैं। इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के बारे में (गोरखाओं को चुभने वाली टिप्पणी) शर्मनाक टिप्पणी करने वाले RJ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी इसलिए भी जरूरी है कि देश में जुड़ने की पूर्वोत्तर भारत के लोगों की कोशिश फिर एक दिल्ली वाली मानसिकता की वजह से बेकार न हो जाए।
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