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Tuesday, December 18, 2007

बिना ‘कॉकस’ बनाए ‘बहुत बड़ा’ बनना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है

मैं रविवार को ओम शांति ओम देखकर आया। पूरी मसाला फिल्म है। मुझे जो सबसे अच्छा लगा वो इस फिल्म का साफ-साफ संदेश। संदेश ये है कि सफलता तो अकेले मिल सकती है। लेकिन, बहुत सफल होने के लिए या फिर बहुत बड़ा बनने के लिए हर किसी को एक कॉकस तैयार करना ही होता है। बिना इसके बात एक जगह पर जाकर रुक जाती है।

बेहद घिसी-पिटी पुनर्जन्म पर बनी ओम शांति ओम में कुछ भी ऐसा खास नहीं है। जिसे देखने के लिए दर्शक सिनेमा हॉल तक जाए। लेकिन, फिल्म में मायानगरी का हर स्टार नजर आ रहा है(भले ही एक झलक ही)। इसमें एक चीज जो बड़े अच्छे से फिल्माई गई है वो, है मायानगरी के अंदर की माया। बस इसी माया की झलक दर्शकों को कहीं भी बोर नहीं करती। कहानी कहीं-कहीं भौंडी कॉमेडी भले ही दिखे लेकिन, दर्शक उसमें उलझा रहता है।

शाहरुख खान एक और कोशिश में काफी सालों से लगे हुए हैं। वो, ये कि जिस तरह से तीस सालों से भी ज्यादा की पूरी पीढ़ियां अमिताभ को हीरो मानती हैं। वैसे ही आगे आने वाली पीढ़ी हर तरह के रोल में सिर्फ एक नाम ही जाने। वो, फिर DDLJ से निकला रोमांटिक हीरो शाहरुख हो या फिर ‘YO’ जेनरेशन का SRK। पुरानी पीढ़ी पान खाए गले में स्कार्फ बांधे अमिताभ को डॉन मानती होगी। लेकिन, आज के जमाने के बच्चे तो, चमड़े की जैकेट में जहाज में उड़ते शाहरुख को ही डॉन मानते हैं। कुल मिलाकर शाहरुख पुराने अभिनेताओं की छाप को हल्का करके अपनी छाप छोड़ने के अभियान में सफल हो रहे हैं। ओम शांति ओम उसी को आगे बढ़ाती कहानी है।

इस काम में शाहरुख की मदद करते करण जौहर और फराह खान जैसे लोग। जिन्हें अपना बनाया ब्रांड (SRK) खुद को ब्रांड नंबर वन बनाने के लिए चाहिए। ओम शांति ओम में करण जौहर का डायलॉग कि हीरे की समझ जौहरी को हाती है लेकिन, हीरो-हीरोइन की समझ तो जौहर ही कर सकते है। बताया ना फिल्म मायानगरी की अंदरूनी कहानी है तो, अपने एक खास ‘चरित्र’ की वजह से राजू श्रीवास्तव की बिरादरी के लिए आइटम बनने वाले करण ये मौका कैसे छोड़ सकते थे।

फिल्म में जो भी अभिनेता-अभिनेत्री जिस खेमे में हैं। उन्हें एकदम उसी तरह दिखाने का साहस करण-शाहरुख-फराह की सफलतम तिकड़ी ही कर सकती है। फिल्म में पुराने जमाने के ज्यादा अभिनेताओं का मजाक उड़ाया गया है। फिल्म में मनोज कुमार जिस तरह से पिटे वही, शायद उन्हें ज्यादा अपमानजनक लगा होगा। लेकिन, फिल्म ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस तिकड़ी में भी ये दुस्साहस नहीं है कि वो अमिताभ की हैसियत पर हमला कर सकें। शायद यही वजह थी कि फिल्म में अमिताभ का ‘WHO O.K.’ पूछना भी इन्हें अच्छा लगा। इस तिकड़ी ने अभिषेक बच्चन और अक्षय कुमार को इंडस्ट्री का नंबर दो की रेस में लगा हीरो भी बता दिया है। ठीक उसी तरह जैसे किसी राजनीतिक पार्टी में बड़े नेता नंबर एक की कुर्सी पाते ही नंबर दो की मजबूत लाइन खड़ी कर देते हैं जिससे उनकी सत्ता को जल्दी चुनौती न मिल सके। तो,बहुत सफल होना है तो, अपना कॉकस तैयार करना शुरू कर दीजिए।

Sunday, December 02, 2007

‘आजा नच ले’, इट्स अ बेस्ट एवर इंडियन म्यूजिकल ड्रामा

दस साल पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों और डेलीगेसीज में लड़कों के कमरे में (शायद देश भर के छात्रावासों के कमरों में) एक साथ 3 पोस्टर नजर आते थे। ब्लैक एंड व्हाइट पोस्टर मधुबाला का, जिसमें मधुबाला के माथे से एक लट आंखों से थोड़ा बगल से होकर लटक रही होती थी। उससे सटकर एक कलर्ड पोस्टर होता था। काफी कुछ मधुबाला जैसी दिखने वाली माधुरी दीक्षित का। माधुरी दीक्षित का अंदाज भी काफी कुछ मधुबाला जैसा ही होता था। और, उसी से सटा नीली आंखों वाली विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय का। मधुबाला एक पीढ़ी पुरानी, माधुरी उस दौर की और ऐश्वर्या आने वाली पीढ़ी की सबसे खूबसूरत और सबसे ज्यादा लोगों की पसंद वाली हीरोइन की पहचान जैसी थीं।

नंबर एक अभिनेत्री माधुरी ने आज से 5 साल पहले जब संजय लीला भंसाली की देवदास में ऐश्वर्या के साथ काम किया तो, दोनों के एक साथ थिरकने वाले गाने पर पूरा देश थिरका था। साथ ही एक चर्चा ये भी चल पड़ी थी कि माधुरी दीक्षित की नंबर वन की विरासत को संभालने के लिए ऐश्वर्या पूरी तरह तैयार हैं। फिर माधुरी ने परिवार बसा लिया। पति के साथ न्यूयॉर्क में बस गईं। 5 सालों तक मीडिया, मायानगरी से किनारा सा कर लिया। दो प्यारे बच्चों की मां बन गईं और लगा कि माधुरी का दौर पूरी तरह खत्म हो गया। लेकिन, कमाल ये था कि इन 5 सालों में कई प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों के आने के बावजूद एक भी अभिनेत्री ऐसी नहीं आई जिसे बिना किसी बहस के नंबर एक कहा जा सके।

और, माधुरी दीक्षित की 5 साल बाद बड़े परदे पर वापसी के साथ दो बातें हो गईं। एक तो ये कि देश की नंबर वन हीरोइन की सीट खाली नहीं है। माधुरी से ये ताज छीनने के लिए दूसरी अभिनेत्रियों को अभी बहुत दम लगाना पड़ेगा। दूसरी ये कि हॉलीवुड से मुकाबला करते बॉलीवुड में आने वाले दिनों में बिना गाने की सफल फिल्में बनाना अभी बहुत दूर की कौड़ी है। मनमोहिनी मुस्कान वाली माधुरी की ‘आजा नचले’ भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे अच्छी म्यूजिकल ड्रामा फिल्म बन गई है।

मेरे नजरिए से ‘आजा नचले’ के बारे में मैं पहले साफ कर दूं कि ये फिल्म अभिनय के लिहाज से बहुत अच्छी नहीं है। ऐसा नहीं है कि अभिनय करने वाले कमजोर है। फिल्म की कहानी ही कुछ ऐसी है। हां, अच्छा हुआ कि माधुरी को नृत्य सिखाने वाले गुरुजी फिल्म में बहुत कम देर के लिए थे। वरना फिल्म की कलेक्शन बरबाद करने में उनका योगदान बढ़ जाता। गुरुजी के दुनिया से ऊपर उठने के बाद ही फिल्म चलनी (दर्शकों को अच्छी लगनी) शुरू हुई। इरफान जैसे अभिनेता के पास फिल्म में करने के लिए कुछ खास नहीं है। रणवीर-विनय ने अपनी भूमिका अच्छे से निभाई है। लेकिन, भेजा फ्राई से आगे निकलने के लिए किसी बहुत बेहतरीन स्क्रिप्ट की उन्हें सख्त दरकार होगी। कोंकणासेन ने भी अपने हिस्से का बेहतर काम किया है।

‘आजा नचले’ मैं उन लोगों को खास तौर पर देखने को कहूंगा जो, माधुरी, माधुरी की मुस्कान, माधुरी के नृत्य के चाहने वाले हैं। पूरी फिल्म माधुरी के आसपास ही घूमती है। माधुरी का हर अंदाज कुछ खास दिखता है। एकाध नजदीक के दृश्यों को छोड़ दें तो, ये समझ पाना मुश्किल होगा कि ये 2 बच्चों की 42 साल की माधुरी है। और, माधुरी थिरकना शुरू करती हैं तो, शायद किसी के लिए भी ये याद करना असंभव सा हो जाता होगा।

खैर, मैं फिर से लौटता हूं आज के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों और डेलीगेसीज में लड़कों के कमरे में। अलग-अलग कमरे में मधुबाला, माधुरी जमी हैं। लेकिन, ऐश्वर्या की फोटो हर दूसरे कमरे में बदल रही है। कहीं ऐश्वर्या की जगह प्रीती जिंटा हैं, कहीं करीना कपूर, कहीं सुष्मिता सेन, कहीं लारा दत्ता, कहीं, प्रियंका चोपड़ा, कहीं बिपाशा बसु, कहीं ... । लिस्ट लंबी है। अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन महानायक हो गए। इस बेरहम इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा समय तक नंबर एक अभिनेता बने रह गए। अभी भी नए जमाने के अभिनेताओं की तुलना उन्हीं के बाद शुरू होती है। फिर भी, शाहरुख खान ने अब नंबर एक का खिताब लगभग छीन ही लिया है। अब सवाल ये है कि क्या अभिनेत्रियों में एक भी अभिनेत्री नहीं है जो, 5 साल खाली रहने के बाद भी नंबर एक अभिनेत्री का खिताब ले सके। आप भी ‘आजा नचले’ देखकर आइए। फिर बात करते हैं।

Sunday, October 14, 2007

भूलभुलैया से कुछ लोगों की प्रेत बाधा तो दूर हुई ही होगी

अच्छा हुआ प्रियदर्शन ने इस बार सिर्फ कॉमेडी नहीं बनाई। ज्यादातर फिल्म समीक्षक भूलभुलैया को एक ऐसी फिल्म बता रहे हैं जो, कॉमेडी और थ्रिलर के बीच फंसी है। किसी ने इसे 2 से ज्यादा रेटिंग देना भी ठीक नहीं समझा। लेकिन, मुझे लगता है कि लोगों को हंसाने की गारंटी देने वाली प्रियदर्शन की फिल्मों में भूलभुलैया एक अलग किस्म की सार्थक फिल्म की श्रेणी में शामिल हो जाएगी।
फिल्म की कहानी की अच्छी बात ये है कि शुरुआत से आप इस फिल्म की कहानी का बहुत साफ-साफ अंदाजा नहीं लगा सकते। फिल्म दर्शकों को अच्छे से बांधे रखती है। कहीं हंसाती है, कहीं-कहीं डराती भी है। फिल्म के कई चरित्रों पर दर्शकों का संदेह बार-बार पुख्ता करती रहती है। लेकिन, फिल्म की जो, सबसे अच्छी बात मुझे लगी, वो ये कि फिल्म ने बड़े सलीके से भूत-प्रेत-ओझा-बाबा को खारिज किया है।
शाइनी आहूजा और विद्या बालन के महल में पहुंचने से लेकर महल के भूत को भगाने के लिए आने वाले आचार्य तक हर जगह फिल्म ने वहम को दूर करने की कोशिश की है। अंधविश्वास को तोड़ने की कोशिश की है। कहानी में हर मोड़ पर लगता था कि ये कहानी किसी राजमहल में सत्ता हासिल करने के लिए रची गई साजिश की कहानी भर रह जाएगी। लेकिन, प्रियदर्शन सबको बार-बार चौंकाते रहे।
विद्या बालन को मानसिक बीमारी और उसके इलाज के लिए आचार्य की मदद, अनूठा प्रयोग सिर्फ फिल्म में अक्षय कुमार ने ही नहीं किया है। उससे बड़ा प्रयोग प्रियदर्शन ने इस विषय पर फिल्म बनाकर की है। परेश रावल और असरानी को महल में भूत दिखने से लेकर फिल्म के अंत तक सब साफ-साफ दिख रहा था कि कम से कम भूत प्रेत तो कुछ होते ही नहीं हैं। भूत भगाने आए आचार्य भी मनोचिकित्सा पर अमेरिका में लंबे-चौड़े भाषण देकर लौटे हैं।
कुल मिलाकर भूलभुलैया अंधविश्वास पर एक तगड़ी चोट है। साथ ही इस फिल्म में परंपरा-आस्था बचाते हुए ये सब प्रियदर्शन ने किया है जो, ज्यादा बड़ी चुनौती थी। ढोल जैसी पकाऊ कॉमेडी के बाद प्रियदर्शन का ये अच्छा प्रयास है। मैं तो, सभी को ये सलाह दूंगा कि ये फिल्म जरूर देखकर आएं। क्योंकि, मुझे पूरी उम्मीद है कि इस फिल्म को देखने के बाद अंधविश्वास कुछ तो कम होगा ही। भूत-प्रेत मानने वाले कई लोगों की प्रेत बाधा भी दूर होगी।

Sunday, September 30, 2007

प्रियदर्शन की ही ढोल बज गई

आज मैं प्रियदर्शन की एक और फिल्म ढोल देखकर आया। सुबह अखबारों में रिव्यू और रेटिंग देखकर गया था। तो, लगा था कि फिल्म अच्छी ही होगी। खैर, मैं इस फिल्म को कॉमेडी समझने की गलती करके देखने गया था। कुछ जगहों पर राजपाल यादव की चिरपरिचित कॉमेडी को छोड़ दें तो, कहानी ने कहीं नहीं हंसाया। लेकिन, राजपाल यादव भी अब एक जैसा ही मुंह बनाकर लोगों को हंसाने की कोशिश करते दिखे।

कुल मिलाकर पूरी फिल्म में प्रियदर्शन की ही ढोल बजती नजर आई। एक भी चरित्र ऐसा नहीं था जो, भूमिका पर खरा उतर सका हो। ओमपुरी जैसा शक्तिशाली अभिनेता भी फिल्म में किसी काम का नहीं दिखा। प्रियदर्शन की पुरानी फिल्मों की ही तरह इस फिल्म में भी लोगों को हंसाने के लिए चरित्रों को हर दस मिनट पर बुरी तरह पिटवाया। एक-दो रहस्य भी थे। जो, दर्शकों को पहले से ही पता था कि कुछ खास नहीं निकलने वाला।
प्रियदर्शन ने अपने पुराने फॉर्मूले के तहत चरित्रों को खूब भगाया। इतना कि ढोल भी कहीं-कहीं पर भागमभाग होने का भ्रम देने लगती है। फिल्म में मासूम हीरोइनें कॉमेडी का हिस्सा नहीं थी। प्रियदर्शन की फिल्मों से दर्शक हमेशा यही उम्मीद लेकर जाते हैं कि वो कुछ हल्की-फुल्की ऐसी स्क्रिप्ट पर चरित्रों को नचाएंगे कि दर्शकों को हंसी आएगी, मन थोड़ा हल्का होगा। लेकिन, ढोल देखने के बाद दर्शक के दिमाग का भी ढोल बज गया। और, प्रियदर्शन की कॉमेडी फिल्मों की एक जो सबसे खराब बात सामने आ रही है कि हर फिल्म में बेकार-लफंगे चरित्रों को हीरो बनाया जाता है। जो, अंत में हराम की कमाई को बड़ी ईमानदारी से पाकर मस्त हो जाते हैं।
अब उम्मीद यही की जा रही है कि प्रियदर्शन अपनी अगली फिल्म भूलभुलैया में दर्शकों को कुछ नया देंगे। चरित्रों को एक दूसरे के पीछे भगाने, काली कमाई को फिल्म के हीरो के हाथ लगने से अलग हटकर कुछ कहानी लेकर आएंगे। जिससे सचमुच दर्शक प्रियदर्शन का नाम एक अच्छे फिल्म बनाने वाले के तौर पर याद रखेंगे।

Sunday, May 13, 2007

किधर ले जाएगा ये ‘मेट्रो’ का रास्ता

मैं पहली बार किसी फिल्म पर लिख रहा हूं। ऐसा नहीं है कि इसके पहले ऐसी अपील वाली कोई फिल्म नहीं देखी हो। फिल्म बहुत अच्छी है। लेकिन, पेज-3 के बाद 'मेट्रो' की कहानी ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर 'मेट्रो' का रास्ता किधर जाएगा। इसीलिए मैं ये लिख रहा हूं और ये फिल्म की समीक्षा बिल्कुल नहीं है।

कहानी बंबई नगरिया की है। ज्यादातर उन्हीं लोगों की कहानी है जो, छोटे शहरों से 'मेट्रो' में कमाई करने के लिए आते हैं। कमाई इतनी हो सके कि उनके अपने छोटे शहर में रूतबा कायम हो सके और 'मेट्रो' में किसी तरह दो बेडरूम का फ्लैट लिया जा सके। इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत ये है कि छोटे शहरों से आकर महानगरों में बसने वाले (या कुछ समय के लिए रहने वाले ) लोगों में से चालीस प्रतिशत को ये अपनी कहानी लगती है या फिर साठ प्रतिशत मेरे जैसे लोगों को इस कहानी के पात्र अपने आसपास नजर आते हैं। फिल्म है इसलिए मजबूरी है कि एक साथ ही सारे पात्रों को जोड़कर दिखाना पड़ता है।

फिल्म की कहानी पेज-3 की कहानी को ही आगे बढ़ाती है। एक हैंडसम-स्मार्ट रेडियो जॉकी के गे होने को कहानी का हिस्सा बनाने से कुछ पुरानी बात को ही दुहराने जैसा लगता है लेकिन, शायद ये हमारे समाज में इतनी जगह बना चुके हैं कि हम इन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते । लेकिन, फिल्म में कोंकणासेन का वो डायलॉग इस गे समाज को ध्यान में रखना होगा कि आपकी जिंदगी और आपकी मर्जी है कि आप कैसे जियें लेकिन, किसी की जिंदगी खराब करने का अधिकार नहीं मिल सकता ।
फिल्म में शिल्पा शेट्टी यानी शिखा की भूमिका और कहानी के अंत में पति की सारी काली करतूतों के बाद शिखा के पति को ही अपनाने की कहानी चुभती है। लेकिन, फिल्म में दिखा बदलाव साफ संदेश देता है कि शिखा अपने पति को नहीं अपनाती वो अपनी बच्ची के उस पिता को अपनाती है जो, इसकी बच्ची को बहुत प्यार करता है।

फिल्म में शरमन जोशी यानी राहुल का किरदार शायद आज की भागती-दौ़ड़ती 'मेट्रो' की जिंदगी का सबसे व्यवहारिक चरित्र है। जो, अपनी सफलता के लिए कुछ भी करने को तैयार है। लेकिन, खुद उस गंदगी से उतना ही दूर है। लेकिन, जब दूसरों की गंदगी खुद उसी के हिस्से में आ जाती है तो, फिर जिस तरह से वो सबकुछ छोड़ देने को तैयार हो जाता है। वो 'मेट्रो' में रह रहे लोगों के उस छोटे शहर के आदमी के बचे हुए जमीर की वजह से है जो, मेट्रोज में जिंदगी की जद्दोजहद में चुक जाने के बाद भी कभी-कभी जाग उठता है।

कंगना रनाउत यानी निशा इस फिल्म का अकेला ऐसा चरित्र है जो मुझे किसी भी जगह पर सही नहीं लगा। निशा एक ऐसी लड़की है जो, मेट्रोज के ज्यादातर ऑफिसेज में मिल जाएगी। हो, सकता है कि इतना फिल्मी चरित्र न हो। ऐसा ही कुछ मिलता-जुलता चरित्र है शाइनी आहूजा का। जो, ये जानते हुए भी शिल्पा शेट्टी को प्रोवोक करने की कोशिश करता है कि वो शादीशुदा है। फिल्म में इसे शिल्पा की बदतर हुई जिंदगी से सही साबित करने की कोशिश की गई है।

फिल्म की जान है इरफान का चरित्र। जो, कहता है कि चांस तो लेना ही पड़ेगा। कोंकणा को ये समझाने वाला डायलॉग कि सड़क पर गाड़ी निकालोगे ही नहीं तो, रेड-ग्रीन सिग्नल कहां है इसका पता कैसे चलेगा। इरफान यानी मोंटी की ये बात भी संदेश देती है शादियों में होती देर के बाद क्या-क्या मुश्किलें आ सकती हैं। 35 साल का ऐसा आदमी जिसने किसी लड़की को छुआ न हो, उसका व्यवहार तो ऐसा ही होगा न जैसे परदे में रहने वाली चीज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की इच्छा। ये कहीं से भी किसी व्यक्ति के चरित्र को आंकने का पैमाना नहीं हो सकता कि वो कैसे विपरीत लिंग के लोगों को देखता है।

फिल्म में के के का चरित्र खांटी पुरुष का चरित्र है जो, ये तो चाहता है कि वो बार-बार दूसरी लड़की-महिला के बिस्तर में खुशी तलाशकर लौटे और उसकी बीवी हर बार उसके साथ नई शुरुआत के लिए राजी हो जाए। लेकिन, जब बीवी उसी की वजह से किसी जगह भावनात्मक आश्रय तलाशने लगे तो, उसके पुरुष मन को ये डंक लग जाए कि मेरी बीवी किसी दूसरे के बिस्तर पर सोई, भले ही वो उस पति की तरह अपना जमीन बेचकर न आ रही हो। ऐसा नहीं है कि मैं बीवी के किसी दूसरे के साथ जाने को सही ठहराने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन, अगर कोई पति इस तरह का व्यवहार करे तो, बीवी से अच्छे व्यवहार की उम्मीद तो नही करे।

अब मेरी परेशानी की बात कि आखिर ये 'मेट्रो' का रास्ता जाता किधर है। फिल्म संवेदनशील थी, फिल्म में अच्छे-बुरे पहलू दिखाकर लोगों को संवेदना जगाने और उसे सही दिशा में ले जाने की कोशिश है। लेकिन, मैं जिस हॉल में फिल्म देख रहा था। वहां, बड़ा दर्शक वर्ग फिल्म के हर ऐसे दृश्य में जहां संवेदना जगाने की कोशिश थी, वहां वो छिछली टिप्पणियां कर रहे थे। यानी साफ है कि समाज को अपने बीच में ऐसी घटनाएं आसानी से पचने लगी हैं। यहां तक कि टूटते परिवारों की बात भी उन्हें संवेदनशील नहीं बनाती। मेट्रो में रह रहा ये नौजवान एक शादीशुदा आदमी के अलग-अलग लड़कियों से संबंध पर न सिर्फ हंस रहे थे बल्कि, इच्छा जाहिर कर रहे हैं कि काश मुझे भी ऐसा मौका मिलता।

फिल्म में के के मेनन यानी शिल्पा के पति जैसे चरित्र वाले लोग समाज में बढ़ रहे हैं तो, कंगना रनाउत यानी निशा जैसी चरित्र वाली लड़कियां भी बढ़ी हैं। शायद इसीलिए जब इनके ऊपर बीतती है तो, ये खुद रोते हैं अपनी संवेदना के साथ खिलवाड़ होने पर समाज को दोष भी देते हैं- आत्महत्या करने की कोशिश करते हैं। लेकिन, बगल में ऐसी घटना पर वो हंसते हैं कि ये तो, हर रोज की बात है।

बस मुझे यही डर लगता है कि सारे बड़े-छोटे शहर अगर 'मेट्रो' की राह पर ही चल निकले तो, येरास्ता किधर जा रहा है। क्योंकि, 'मेट्रो' तो फिल्म थी, उसे दर्शक जुटाने थे फिल्म चलानी थी। इसलिए फिल्म खत्म होते-होते सब अच्छा हो गया। लेकिन, 'मेट्रो' में रह रहे लोगों की जिंदगी कोई तीन घंटे की फिल्म तो है नहीं। जिंदगी एक बार 'मेट्रो' के तैयार किए रास्ते पर चल निकली तो, हाल बेहतर मुश्किल से ही हो पाता है। इसलिए चिंता यही है कि आखिर किधर जाएगा 'मेट्रो' का ये रास्ता। फिर भी उम्मीद के लिए फिल्म में मोंटी यानी इरफान का वही डायलॉग याद करता हूं कि चांस तो लेना ही पड़ेगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...