भारतीय समाज में कुछ मिथक ऐसे स्थापित हो जाते हैं कि आगे चलकर वो तथ्यों की तरह इस्तेमाल होते हैं। जैसे- कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष पार्टी है, भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक है और वामपंथ समाजवादियों से भी ज्यादा समाजवादी है। जैसे- मायावती दलितों के हितों की सबसे बड़ी चिंतक हैं। ऐसे ही अब एक नया तथ्य लगभग स्थापित होता जा रहा है। वो, जुड़ा है जनगणना से। जनगणना में अलग-अलग जातियों की संख्या जानने का कोई कॉलम नहीं है और लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि पिछड़ों की जाति गणना अलग से होनी ही चाहिए जिससे ये साबित हो सके कि पिछड़ों को मिल रहा 27 प्रतिशत आरक्षण उनकी जनसंख्या के लिहाज से काफी कम है। बस इसके बाद तो, उसी सुर में ये भी आवाज तेज होने लगी कि देश के 90 प्रतिशत संसाधनों पर सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों (सवर्ण जातियों) का कब्जा है और ये सवर्ण ही हैं जो, नहीं चाहते कि किसी भी तरह से जातियों की असल संख्या सामने आए। क्योंकि, इससे उनके प्रभुत्व पर खतरा दिखता है।
अब सवाल ये है कि जाति गणना को जरूरी बताने वाले लोग कौन हैं। क्या ये लोग सचमुच जाति गणना इसलिए चाहते हैं कि दबी-कुचली या फिर आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर जातियों को उनके अधिकार मिल सकें। इस सवाल का जवाब निश्चित रूप से ना में मिलेगा। जाति गणना की वकालत करने वाले हों या फिर जाति गणना का विरोध करने वाले दोनों ही पक्षों में से ज्यादातर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने या फिर न खिसकने देने की मंशा से जाति गणना के पक्ष में या विरोध में खड़े हैं।
मैं जाति से उच्च कुल का ब्राह्मण हूं और मैं इस जनगणना में जाति के कॉलम को शामिल करने के पक्ष में हूं। लेकिन, ये जाति गणना सिर्फ पिछड़े, दलित या फिर आदिवासियों की नहीं होनी चाहिए। इस जनगणना में हर उस जाति के आंकड़े सामने आने चाहिए जिसके आधार पर समाज में रोटी-बेटी के संबंध बन रहे हैं। जब किसी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी में किसी नेता का राजनीतिक भविष्य इसी से तय हो रहा है कि आखिर उसकी जाति क्या है तो, फिर जनगणना में जाति का कॉलम जुड़ने भर से जातिवाद तेज होने की बात कैसे संभव हो सकती है। क्योंकि, जितना जातिवाद होना है वो, तो बिना जाति बताए भी हो रहा है।
मैं मीडिया में हूं और 12 साल इसमें गुजारने के बाद मेरे मन में एक धारणा मजबूत हो गई है कि जातिवाद जाति बताने से नहीं जाति जताने से बढ़ता है। बल्कि, जाति बताकर तो, जातिवाद कम किया जा सकता है। एक धारणा ये भी है कि दो जातियों के बीच अंतर्जातीय संबंध जातिवाद को तेजी से कम कर सकते हैं। देश के सबसे बड़े गांधी परिवार के बारे में ध्यान करके बताइए ना कि इतने ढेर सारे अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक विवाहों के होने के बाद भी गांधी परिवार को मनुस्मृति के लिहाज से स्थापित सर्वोच्च जाति में ही क्यों माना जाता है। बस इसी बात को अच्छे से समझने की जरूरत है कि आखिर कश्मीरी ब्राह्मण नेहरू के परिवार में गांधी जैसा तटस्थ सरनेम और ढेर सारे गैरब्राह्मण संबंधों के बाद भी प्रियंका-राहुल तक को इस देश में जाति के लिहाज से सर्वोच्च वर्ग अपना मानता है।
अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब बिहार कांग्रेस की लिस्ट में लोकसभा अध्यक्ष के नाम मीरा कुमार के आगे जातिसूचक शब्द छप गया था। मीरा कुमार अपने नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं लगातीं लेकिन, कांग्रेस को राजनीति करनी है और राजनीति इसी समाज के साथ करनी है इसलिए वो, मीरा कुमार की जाति के लिहाज से ही उनको बढ़ाकर कोटा पूरा कर रही है। मायावती का अपने वारिस के तौर पर खास चमार जाति से एक नौजवान को चुनने का एलान भी मुझे लगता है सबको याद ही होगा। मायावती भी जातिसूचक शब्द नहीं लगाती हैं। लेकिन, मायावती की पूरी राजनीति जातिवाद पर खड़ी है ये कहने से किसे संकोच होगा। राष्ट्रीय पार्टी और सभी जातियों की होने का दम भरने वाली कांग्रेस-बीजेपी से लेकर सिर्फ जाति के आधार पर खड़ी हुई पार्टियों के मुलायम प्रसाद यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती जैसे लोग भी टिकट देने में जाति की बात सबसे पहले करते हैं। और, इसमें इन पार्टियों या इन नेताओं का दोष मैं कैसे दे दूं हम और आप यानी हमारा पूरा समाज वोट भी तो इसी आधार पर करता है कि उसकी जाति का प्रत्याशी किस पार्टी से हैं।
एक जमाने में मुलायम सिंह यादव ने ब्राह्मणों पूज्य बताया तो, ब्राह्मणों की जाति की बड़ी जमात मुलायम के पीछे हो ली। वही जब अमर सिंह ताकतवर हुए तो, ठाकुर समाजवादी पार्टी के माने जाने लगे। जबकि, पार्टी सिर्फ यादव नेतृत्व की थी। फिर बसपा के सोशल इंजीनियरिंग में मायावती के चरण स्पर्श के लिए बड़े टीकाधारी ब्राह्मणों की लाइन तो, मीडिया में सर्वाधिक चर्चा का विषय रही ही। ये जाति बताने की नहीं जाति जताने की लड़ाई चल रही है। समाजवादी पार्टी परशुराम सम्मेलन कराती है तो, मायावती हर जाति की अलग कमेटी बनाकर मॉनिटरिंग करती हैं। बीजेपी-कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि गड़बड़ ज्यादा हो रही है तो, वो मायावती की जाति के लोगों के घर खाना खाकर-रात गुजारकर संतोष कर ले रहे हैं।
जाट पिछड़े हैं लेकिन, हरियाणा में जरा कोई ब्राह्मण अपनी जाति जताकर उनसे ऊपर बैठकर दिखाए। इटावा, एटा में कोई ब्राह्मण अपनी जाति जताकर यादवों से ऊपर बैठकर दिखाए। साफ है देश में पूरी तरह से राजनीतिक ताकत किसी जाति के सर्वोच्च या नीच होने की बात तय कर रही है। लेकिन, सब कुछ चल जाति के पैमाने पर ही रहा है। ये गलतफहमी है कि इस जाति को अंतर्जातीय संबंधों ने मात दे दी है। ज्यादातर मौकों पर अंतर्जातीय विवाह दो जातियों के बीच विद्वेष बढ़ा रहे हैं या फिर मजबूत जाति के सिर के ताज में दो मोती और जड़ रहे हैं। हो सकता है कहीं-कहीं इससे कुछ बात बन रही हो लेकिन, अगर जाति को सचमुच मात दी है तो, वो पैसे ने। जाति को मात दी है तो, बाजार की चमक ने।
लेकिन, जाति की खिलाफत करने वाला उससे तगड़ा कोई सिस्टम अब तक ये समाज दे ही नहीं पाया है। इसलिए धीरे-धीरे ये काम हो रहा है। और, इस धीरे-धीरे होने में किसी के नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगे होने या जनगणना के आंकड़ों में किसी जाति की संख्या का पता होने से जातिवाद का बढ़ना-घटना नहीं होने वाला। मैं ब्राह्मण हूं और ब्राह्मणों में भी उच्च कुल से। हमारी नात-रिश्तेदारी भी उतने में ही घूम फिरकर होती रही है। लेकिन, अब प्रभाव और पैसे के महत्व ने धीरे-धीरे उच्च कुलीन ब्राह्मणों को अपने से नीच ब्राह्मणों के यहां भी बेटी देने के लिए तैयार करना शुरू कर दिया है। हमारी नात-रिश्तेदारी में एकाध अपवादों को छोड़ दें तो, अभी कोई दूसरी बिरादरी में शादी-ब्याह करने का साहस नहीं कर पाया है। लेकिन, अब इस पर बात-बहस घरों में होने लगी है।
अच्छा होगा कि इस जनगणना में हर जाति की सही संख्या निकलकर आए और निश्चित मानिए कि जनगणना में सभी जातियों के अलग-अलग आंकड़े आए तो, किसी एक जाति समूह को निशाना बनाकर जातिवादी राजनीति करना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा। महादलित और पिछड़ों में भी अतिपिछड़े की राजनीति दरअसल इसी संकट से उपजी थी कि उस खास जाति के नेता का काम सिर्फ अपनी जाति से नहीं चल रहा था। और, इस जनगणना में जातियां जितनी बंटी पता चलेंगी इस समाज से जातिवाद उतना ही कम होगा। शायद ये भी मिथक टूटे कि 90 प्रतिशत संसाधनों पर 10 प्रतिशत लोग (वो भी सिर्फ सवर्ण जातियों के) कब्जा करके बैठे हैं।
जाति के साथ आर्थिक हालात का भी पता लगता चले तो, समझ में आए कि कितने ब्राह्मणों की धोती में पैबंद लगे हैं फिर भी वो, सुबह-सुबह नहा धोकर, कुर्ता-धोती में टीनोपाल देकर, टीका लगाकर चमकता चेहरा लेकर दूसरों की दशा सुधारने का दावा करते घूम रहे हैं और कितने ठाकुर किसी रजवाड़े से खुद को जोड़कर बस खोखली शान बनाए-बचाए पड़े हैं। पता ये भी चल सकता है कि देश में दलितों-आदिवासियों का हाल तो, अब भी बहुत बुरा है लेकिन, आरक्षण के नाम पर असली मलाई खाने वाले तथाकथित पिछड़ों के घर दूध-दही की नदियां हमेशा बहती रहीं। शायद पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण के लिए सुप्रीमकोर्ट को दखल देने की जरूरत भी न पड़े। हर जाति की असल संख्या पता लगी तो, जाति बताने वाले भले ज्यादा दिखेंगे लेकिन, जाति जताने वालों के मन में डर बढ़ेगा। और, असली जातिवाद जाति बताने वालों से नहीं जाति जताने वालों से है। इसलिए मैं हर्षवर्धन त्रिपाठी (सोहगौरा), शांडिल्य गोत्र, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत जाति जनगणना के पक्ष में हूं।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Monday, June 28, 2010
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