लगभग हर रोज इनसे पार्क में मुलाकात हो जाती थी। इनके सामने से कोई आ रहो वो इनसे बच जाए, संभव ही नहीं है। उसे रोककर ऊं नम: शिवाय बोलकर अभिवादन करेंगे और प्रयास ये कि वो भी यही अभिवादन करके आगे बढ़े। दूध का एक डब्बा इनके हाथ में होता है। वेशभूषा से मुझे हमेशा यही लगा कि किसी बगल के गांव के होंगे और सामने की किसी सोसायटी में दूध देने जा रहे होंगे। खैर, ये न पूछना बनता था। न मैंने कभी पूछा। और ये गजब के शिव भक्त हैं। एक दिन तो मैंने देखा एक मोहतरमा अपने कुत्ते के साथ टहल रहीं थीं। उस कुत्ते को भी इन्होंने ऊं नम: शिवाय बोला। मोहतरमा ने भी मुस्कुराते हुए सकुचाते हुए ऊं नम: शिवाय बोला। एक दिन मैं अपने सामने की सोसायटी में गया। अमोली वहां ओडिशी नृत्य सीख रही है। नीचे लॉबी में वो फिर मिल गए। मेरे साथ छोटी बिटिया नवेली भी थी। उन्होंने मुझे ऊं नम: शिवाय कहा मैंने भी वही अभिवादन किया। फिर वो नवेली से ऊं नम: शिवाय का अभिवादन कर रहे थे। नवेली ने ऊं नम: शिवाय नहीं बोला तो, उन्होंने कहाकि बिटिया को घर में मंत्र सिखाइए। मैंने कहा घर में सीखती है। उन्होंने कहा कि ये बड़ी मुश्किल है आजकल के बच्चे इस सबको समझते ही नहीं। उनके मां बाप भी नहीं समझते। हम तो रोज कम से कम सौ लोगों को ऊं नम: शिवाय का जाप करा देते हैं। मैंने पूछा आपका नाम क्या है। उन्होंने कहा ऊं नम: शिवाय नाम से ही सब जानते हैं। मैंने कहा फिर भी कुछ तो नाम होगा। उन्होंने नाम बताया। लेकिन, मैं भू गया। बात करते पता चला कि वो मेरे सामने की सोसायटी में रहते हैं। बेटा इंजीनियर है। उसी के साथ रहते हैं। मूलत: गाजीपुर के यादव जी है। उन्होंने कहा गााजीपुर बनारस की सीमा पर गांव है। अब लगभग पूरा परिवार यहीं आ गया है। दूसरा बेटा नैनीताल में पंप इंजीनियर है।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Saturday, May 23, 2015
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जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव
सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...
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हमारे यहां बेटी-दामाद का पैर छुआ जाता है। और, उसके मुझे दुष्परिणाम ज्यादा दिख रहे थे। मुझे लगा था कि मैं बेहद परंपरागत ब्राह्मण परिवार से ह...
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आप लोगों में से कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है। यानी, मां-बाप अपनी बेटी से पैर छुआते नहीं हैं। बल्कि, खुद उनका पैर छूते हैं...
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पुरानी कहावतें यूं ही नहीं बनी होतीं। और, समय-समय पर इन कहावतों-मिथकों की प्रासंगिकता गजब साबित होती रहती है। कांग्रेस-यूपीए ने सबको साफ कर ...
