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Sunday, April 24, 2016

आजादी का गला घोंटने की कोशिश!

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अध्यक्षों का काफी शोहरत मिलती रही है। मान लिया जाता है कि बौद्धिक तौर पर वो काफी आगे होते हैं। लेकिन, इस अध्यक्ष ने पिछले सारे अध्यक्षों की बौद्धिक सीमा से आजादी हासिल कर ली है। जवाहरलाल नेहरू छात्रसंघ अध्यक्ष #KanhaiyaKumar ने तो वो कर दिखाया है जो, अब तक कोई न कर सका था। कन्हैया कुमार ने देश के कुछ लोगों को आजादी-आजादी का नारा देकर ऐसा दिमागी कुंद कर दिया है कि वही अब उन खास लोगों को हर तरह की आजादी दिलाने वाला मसीहा नजर आ रहा है। वो नौटंकी का देश का सबसे बड़ा उस्ताद बन गया है। ताजा नौटंकी में उसे बताया कि उसे जेट एयरवेज की फ्लाइट में साथी यात्री ने मारने की कोशिश की। अब कन्हैया को मारने की कोशिश और वो भी गला दबाकर। इतना सुंदर सधी सुर्खियां बनीं। देखिए कन्हैया का गला दबाकर मारने की कोशिश। कन्हैया मतलब आजादी हो रखा है। पैर से लेकर सिर के सहारे खड़े होकर लोग कन्हैया की आजादी के साथ सुर मिला रहे हैं। इसलिए सीधे सुर्खी बन गई कि आजादी का गला दबाकर मारने की कोशिश। अब ये भी कमाल ही है ना कि कन्हैया के बगल की सीट पर एक भाजपाई को सीट मिली। मतलब कितनी बड़ी साजिश रही होगी। अब जाहिर है कि इतनी बड़ी साजिश है, तो इसमें कोई छोटे-मोटे लोग तो होंगे नहीं। तो, इसको थोड़ा और बढ़ा देते हैं। ये हुआ सरकार भी कन्हैया को मारने की साजिश में शामिल। अच्छा इतने से भी आजादी नहीं मिल पा रही है। तो इसे और एक हाथ आगे बढ़ा लो या ऐसे समझो कि ये आज के समय में सबसे मारू टाइप की लाइन है। कन्हैया को मारने की संघ की साजिश। नागपुर के इशारे पर जेट एयरवेज में सवार हुआ था यात्री।


कन्हैया कुमार ने ट्वीट किया। इसके बाद सोशल मीडिया पर और साथ ही साथ टीवी पर भी चल पड़ा कि कन्हैया कुमार को गला दबाकर मारने की कोशिश की गई। जरा सा भी पड़ताल नहीं किया गया कि आखिर कैसे ये संभव है कि घनघोर सुरक्षा वाली जगह पर कन्हैया को मारने की साजिश की जाए। और अगर की गई है तो, कम से कम उस तथाकथित तौर पर कन्हैया का गला दबाने वाले यात्री के बारे में भी पड़ताल कर लेते। पड़ताल हुई। लेकिन, तब तक तो टीवी चैनलों के स्क्रीनशॉट के हवाले से कन्हैया और कन्हैया के बहाने देश में आजादी का गला दबाने की साजिश सोशल मीडिया में वायरस की तरह फैल गई। आजादी चाहने वाले के समर्थक सोशल मीडिया पर लिखने लगे कि ये रोजगार और शिक्षा जैसे मामलों पर बात न करने देने की साजिश है। आजादी के तथाकथित समर्थक ये भी बता रहे हैं कि जनता को हिंदू मुसलमान के दायरे से बाहर न निकलने देने की ये साजिश है। कमाल है। इस तरह की बेवकूफ बनाने वाली साजिश इस देश में अद्भुत तरीके से हो रही है। लगभग समाप्त हो चुके वामपंथी ये फैला रहे हैं कि कन्हैया अकेला पड़ रहा है। और तुरंत ही ये भी बता रहे हैं कि देश कन्हैया को लेकर आंदोलित है। उसके साथ खड़े होने की जरूरत है। #StandWithJNU टाइप हैशटैग फिर झाड़पोंछकर निकाल लिया गया है। अब बताइए भला इसमें इस हैशटैग की क्या उपयोगिता है। ऐसे अपील जारी हो रही है कि जैसे देश के भीतर आजादी खतरे में है। अच्छा ये हुआ कि मीडिया ने ही थोड़ी देर से सही लेकिन, पड़ताल की। खबर लिखने से पहले सभी पक्षों से बात की जो जरूरी शर्त थी वो पूरी हुई। इससे पता चला कि कन्हैया अव्वल दर्जे का झूठा है। कोई हत्या की साजिश नहीं थी। कोई गला दबाने की कोशिश नहीं हुई। पैर लगने से सहयात्री से झगड़ा हुआ। जेट एयरवेज ने दोनों को उतार दिया। मुंबई-पुणे के हवाई जहाज में जिस सहयात्री पर कन्हैया का गला दबाने का आरोप लगा है। वो टीसीएस का कर्मचारी है। तैंतीस साल के मानस ज्योति डेका ने बताया है कि ये सिर्फ प्रचार पाने का तरीका है। अब ये भला कोई भी कैसे मान सकता है कि किसी साजिश के तहत कन्हैया का गला दबाने के लिए एक सॉफ्टवेयर कंपनी के कर्मचारी को तैयार किया जाएगा। उसे जहाज पर कन्हैया के बगल की सीट दिलाई जाएगी। और हवा में गला दबाकर इसे और ज्यादा फिल्मी बनाने की पटकथा लिखी जाएगी। दरअसल मुश्किल ये भी है कि वामपंथी ज्यादातर कलाकारी के चक्कर में फिल्मी ही हो जाते हैं। और इसका असर इस नए वामपंथी नेता की हर हरकत से साफ झलक रहा है। इसीलिए ये जुझारू वामपंथी नेता ट्वीट भी इसी अंदाज में करता है कि फिर से और इस बार एयरक्राफ्ट के अंदर एक आदमी ने मेरा गला दबाने की कोशिश की। भला गला दबाकर मारने की चाहत रखने वाला इतना मौका देगा कि वो ट्वीट कर सके। इस नौटंकी से आजादी की देश को बड़ी सख्त जरूरत है। 

Saturday, February 20, 2016

दक्षिणपन्थ की सेर भर गलती पर वामपन्थ की सवा सेर गलती!

पत्रकारों पर हुए हमले के खिलाफ प्रेस क्लब से निकला जुलूस
सुप्रीमकोर्ट पहुंचते मोदी विरोध और जेएनयू की चिंता भर रह गया 
 
सुप्रीमकोर्ट ने पटियाला हाउस से सीधे सर्वोच्च अदालत पहुंचे कन्हैया कुमार को करारा झटका दिया। साफ कहाकि जमानत की अर्जी उच्च न्यायालय में दाखिल करिए। कन्हैया के वकीलों ने भरी दुपहरिया में देश के सामने, इतने कैमरे थे कि माना जा सकता है, कन्हैया को मारने-पीटने की घटना के आधार पर ये दलील दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय जमानत याचिका पर सुनवाई करे। ये घटना पटियाला हाउस यानी निचली अदालत में हुई थी। ये शर्मनाक घटना लगातार दो बार होने और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इस शर्मनाक घटना की समझ लेने गए वकीलों के बयान ने स्थिति इतनी बिगाड़ी कि सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से जवाब तलबी कर ली। इस जवाब तलबी ने कन्हैया कुमार के समर्थकों, वकीलों को ये भरोसा दे दिया होगा कि सर्वोच्च न्यायालय पहली फुर्सत में जमानत दे देगा। लेकिन, हुआ उल्टा। दरअसल ये गलती करने की वामपन्थी बारी के शुरुआती लक्षण हैं। जवाहर लाल नेहूर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके दक्षिणपन्थ ने पहले ही बड़ी गलती कर दी है। जिसको सुधारने का रास्ता अब तक सही तरीके से शायद दक्षिणपन्थ और उनकी सरकार को नहीं सूझ रहा होगा। इसीलिए फिलहाल राष्ट्रीय ध्वज को देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में फहराने का निर्देश देकर उनमें भरोसा रखने वालों को ये भरोसा दिलाने की कोशिश की गई है कि सरकार दक्षिणपन्थ से जरा सा भी सरकने वाली नहीं है। ये भरोसा दिलाने की जरूरत शायद इसलिए पड़ गई। क्योंकि, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने दबी जुबान चल रही अफवाह को आवाज दे दी। गुलाम नबी आजाद कह रहे हैं कि जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने के लिए ही उमर खालिद और दूसरे आतंकवाद समर्थक गतिविधियां चलाने वाले छात्रों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है।

सरकार की तरफ से अनौपचारिक तौर पर ये खबरें खूब आ रही हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकवादियों के समर्थन में और भारत के खिलाफ नारे लगाने वालों को पकड़ने के लिए ढेर सारी टीमें बनाई गई हैं। लेकिन, ये भरोस कोई क्यों कर करेगा कि जिस मोदी सरकार की नजर हर जगह है। वो उमर खालिद और उसके साथियों पर नजर नहीं रख सकी। वो भी तब, जब तौर पर उमर खालिद के आतंकवाद समर्थक और भारत विरोधी नारे के आधार पर ही जेएनयू की पूरी बहस शुरू हुई है। इसी उमर खालिद की राष्ट्र विरोधी गतिविधि और उमर खालिद के साथ खड़े दिखने की वजह से तो कन्हैया को गिरफ्तार किया गया। फिर कन्हैया कुमार की राष्ट्रद्रोह में गिरफ्तारी तक हो जाना और उमर खालिद और उसके दूसरे साथियों की अब तक सरकार को भनक तक न लग पाना सिर्फ दिल्ली पुलिस की असफलता कौन मानेगा। मानना भी नहीं चाहिए। दक्षिणपन्थ की गलती ये रही कि कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके पूरे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पर जाने-अनजाने सवाल खड़ा कर दिया। हालांकि, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रेस रिलीज जारी करके साफ किया है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पर प्रतिष्ठा पर किसी तरह का कोई सवाल नहीं है। लेकिन, ये सफाई तब आई जब जेएनयू में काम करने वाले तीन विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने परिसर के माहौल में खुद को अलग-थलग देखकर परिषद से खुद को अलग कर लिया। परिषद सफाई में ये कह रहा है कि ये कार्यकर्ता बिल्कुल नए हैं। लेकिन, जब सीधे-सीधे पाले खिंच गए हों। उसमें तीन की ऐसी संख्या घटती है, तो नुकसान होता है। सरकार की कोशिश थी कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई इस आतंकवाद समर्थक और देश विरोधी घटना के बहाने पूरे वामपन्थ की देश निष्ठा पर सवाल खड़ा किया जा सके। सवाल खड़ा हो भी चुका है। बौद्धिक वर्ग में भले लड़ाई बराबरी की दिख रही हो, लेकिन जमीन पर देश विरोधी के तौर पर वामपन्थियों की पहचान साबित तौर पर होने का खतरा बढ़ गया है। ये बात और ठीक से साबित हो चुकी होती अगर, दिल्ली पुलिस ने बिना किसी पक्के सबूत के राष्ट्रद्रोह के आरोप में एआईएसएफ के कन्हैया कुमार को गिरफ्तार न कर लिया होता। इस गिरफ्तारी के बाद दोनों तरफ से जो वीडियो आए। उसमें पहले फर्जी वीडियो के जरिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए दिखाया गया। जो फर्जी साबित हुआ और राष्ट्रवाद समर्थकों ने वामपंथ के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोल दिया। लेकिन, इसके बाद जिस एक वीडियो में उमर खालिद के साथ कन्हैया के नारे लगाने को राष्ट्रद्रोही होने का सबसे बड़ा आधार माना जा रहा था। वही पूरी तरह से गलत साबित हो गया। कन्हैया कुमार जब नारे लगा रहा था, तो उसका साथ उमर खालिद दे रहा था। लेकिन, वो नारे देश विरोधी नहीं थे। वो नारे वो थे जो, वामपन्थी छात्र संगठन नियमित तौर पर लगाते ही हैं। इससे ये तो तय हुआ कि दिल्ली पुलिस ने गलत बुनियाद पर कन्हैया को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन, इसी वीडियो से ये भी तय हो रहा है कि उमर खालिद और कन्हैया कुमार का गठजोड़ तगड़ा है। यानी वामपन्थ और आतंकवाद समर्थक, देश विरोधियों का गठजोड़ तगड़ा है। अब वामपन्थ इस वीडियो को अपने नारे को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित करके सरकार को गलत साबित करने की कोशिश में लगा है। लेकिन, ये वामपन्थ के लिए बहुत बड़ी गलती साबित होती जा रही है। क्योंकि, खुद वामपन्थी नेता भी कम से कम देशद्रोह के मुद्दे पर उमर खालिद के साथ सार्वजनिक तौर पर खड़े नहीं हो रहे हैं। हुए तो बचे-खुचे भी नहीं रह जाएंगे। ये खतरा शायद वामपन्थी समझ नहीं पा रहा है। सरोकार-सरोकार चिल्लाते वामपंथी हिंदुस्तान में कब सिर्फ दिखावे भर के सरकार विरोधी भर रह गए। ये उन्हें भी नहीं पता चला। वामपंथियों को ये भी नहीं समझ आया कि वो हर बात पर मोदी का विरोध करते रहे। नरेंद्र मोदी चुपचाप देश के लोगों में ज्यादा से ज्यादा अपनी बात पहुंचाने में लगे रहे। अभी भी कई बड़े पत्रकार, लेखक दक्षिणपन्थ-वामपन्थ की इस लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पुराना हिसाब चुकता कर लेना चाह रहे हैं। जिससे ये साबित रहे कि पत्रकार चाहें, तो किसी नेता की मिट्टी पलीद कर सकते हैं। कांग्रेसी सरकार चलाने के मौके पाते रहें तो, उन्हें इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि मीडिया भ्रम फैलाए रहे कि सरकार उन्हीं की वजह से चल रही है। भाजपाई नेता ऐसा नहीं कर पाते हैं। उसकी बड़ी वजह ये होती है कि बड़ी मुश्किलों से, मेहनत से उन्हें सत्ता मिलती है। भले ही मीडिया उनके साथ रहे, तो भी। इसी फर्क की वजह से भाजपा नेता, सरकार मीडिया को ज्यादा श्रेय देने को तैयार नहीं होता। इसीलिए वामपन्थ को ये गलती कतई नहीं करनी चाहिए कि वो सिर्फ बौद्धिक लड़ाई के जरिए दक्षिणपन्थी सरकार की कमियां निकाले। अगर ये हो पाता, तो नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री ही नहीं होते। किसे नहीं याद है कि देश के बहुतायत वामपंथी पत्रकारों, लेखकों, साहित्यकारों ने चुनाव के पहले घोषित तौर पर मोदी के प्रधानमंत्री बनने का देश छोड़ने देने की चेतावनी तक विरोध किया था। भुखमरी से आजादी जैसे नारे पढ़ते वक्त तक जेएनयू और कुछ विश्वविद्यालयों में हो सकता है कि वामपन्थ की छात्र राजनीति चमकाए रहें। लेकिन, सच्चाई यही है कि विश्वविद्यालय से निकलने के बाद वही नौजवान समझ जाता है कि अपनी जेब भरी रहेगी। तभी भुखमरी से आजादी से मिल सकेगी। और वो सिर्फ नारों से नहीं होगा। इसलिए वामपन्थ को अब इस बड़ी गलती को सुधारने की जरूरत है। खोखले नारों की बुनियाद पर अब देश के नौजवान को बहकाना मुश्किल है। ये वामपन्थ को समझना होगा। वामपन्थ, कांग्रेस के साथ संसद ठप कर रहा है। नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों को निकालकर उसके होने-न होने पर जनमत तैयार करना चाहता है। लेकिन, एक ऐसा आंदोलन नहीं दिखा। जो वामपन्थ ने सरोकारों पर इस सरकार के खिलाफ चलाया हो। वामपन्थ की गलतियां बड़ी होती जा रही हैं। पहले की गलतियों ने वामपन्थ को भारत में लगभग खत्म कर दिया है। बौद्धिक जुगाली में वामपन्थ के जीवन को अगर देश में वामपन्थ के जीवित होने का अहसास मानकर वामपन्थ चाहे, तो खुश रह सकता है। वो तो दक्षिणपन्थी सरकार ने गलती कर दी कन्हैया कुमार की गिरफ्तार करके। मरी हुई सीपीआई को एक राष्ट्रीय नेता दे दिया। लेकिन, पूरी उम्मीद है कि वामपन्थ इससे बड़ी गलती करके इस मौके को खत्म कर देगा। और, दक्षिणपन्थ-वामपन्थ की ये लड़ाई सड़कों पर, विश्वविद्यालय परिसरों में अभी और बढ़ेगी। क्योंकि, दक्षिणपन्थ को ये लग रहा है कि यही मौका वामपन्थ को पूरी तरह से खत्म कर देने का। वामपन्थ को लग रहा है कि अब खोने को बचा क्या है। 
(ये लेख catchhindi पर छपा है)

Friday, February 12, 2016

देश में आपातकाल लग गया है!

आपको भले न पता हो। लेकिन, देश में आपातकाल लग गया है। आप नहीं समझ पा रहे हैं कि आपातकाल लग गया है, तो ये आपकी गैरसमझदारी हैं। क्योंकि, आप वामपंथी नहीं हैं। देश में बेहद मुश्किल में पड़े-बचे समझदार वामपंथी नहीं है। अगर आप नहीं मानते हैं, तो आप देश के नागरिक भले हों। देश के चिंता करने वाले भले हों। भले ही आप भारत को दुनिया का सबसे अच्छे देशों में शामिल कराने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हों। लेकिन, ये सब करके भी आप पिछड़े, पुरातनपंथी, संघ समर्थक, ब्राह्मणवादी या थोड़ा और साफ करें, तो मनुवादी भी ठहराए जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात ये कि अगर आप को नहीं लग रहा है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू कर दिया है। तो आप बुद्धिजीवी तो कभी हो ही नहीं सकते। फिर प्रगतिशील कैसे हो सकते हैं भला। अपना देश, अपना राष्ट्र इस तरह के विचार रखने वाले भला प्रगतिशील कैसे हो सकते हैं। प्रगतिशील होने की परिभाषा तो इस देश में देश के बाहर निकल जाने से ही शुरू होती है। गजब का वामपंथ है इस देश में, कि उसकी बुनियाद ही देश के खिलाफ से शुरू होती है। ये इस कदर कि वो कश्मीर में देश के खिलाफ खड़े लोगों को दिल्ली में बुलाकर बुद्धिजीवी जमात का हिस्सा बना देता है। और ये घोषित कर देता है कि वामपंथ ही है जो अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतिबिंब है। ऐसी अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतिबिंब कि इसी वामपंथ के एक राजनीतिक दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने देश में इंदिरा गांधी की तानाशाही तक को सही ठहरा दिया था। ये वही वामपंथ है जिसने सत्ता मिलते ही अभिव्यक्ति की आजादी तो छोड़िए दक्षिणपंथ को सामान्य व्यवहार करने की इजाजत भी नहीं दी। बंगाल और केरल का उदाहरण देख, समझ लिया जाए तो ऐसी दर्दनाक कहानियां मिल जाएंगी कि रूह कांप जाए। बंगाल और केरल में हत्या को वामपंथ ने संस्थागत बना दिया। इतना संस्थागत कि वामपंथ से जुड़े पत्रकारों ने सरोकारों की आड़ में उसको बाहर तक नहीं आने दिया।


वामपंथी भयानक तरीके से फंसते दिख रहे हैं। तो वो ये कहते घूम रहे हैं कि कुछ छात्रों के कृत्य के आधार पर पूरे जेएनयू को आतंकवादी कहा जा रहा है। जबकि, किसी ने ऐसा नहीं कहा है। हां, निश्चित तौर पर वामपंथ के खूनी और देश विरोधी मिजाज में रचा-बसा छात्रों का बड़ा वर्ग खराब हो चुका है या खराब हो रहा है। सबकुछ सामने दिख जाने के बाद भी बहस यही हो रही है कि क्या इस तरह से विरोध करने पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाएगा। बेवकूफ टाइप के वामपंथी पत्रकार ये तक दलील देने लगे हैं कि जेएनयू को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि, ये अकेला वामपंथी गढ़ बचा है। अब जरा इसी से अंदाजा लगाइए कि भगवा को सांप्रदायिक रंग साबित करने का हरसंभव प्रयास करने वाले वामपंथी कह रहे हैं कि जेएनयू उनका आखिरी गढ़ है। यानी देश का वो विश्वविद्यालय, जिसे सबसे ज्यादा सरकारी सहायता मिलती है। वहां छात्र पढ़ाई करने के बजाय सिर्फ वामपंथ पढ़ें। वामपंथ पढ़ें मतलब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशद्रोहियों के पक्ष में सभाएं करें। आतंकवादियों की स्मृति सभा करें। वामपंथियों की ख्वाहिश ये है कि उनका ये गढ़ जेएनयू इसलिए बचा रहे जिससे देश के अलग-अलग हिस्से में वो सरकारों के खिलाफ हथियारबंद आंदोलन खड़े कर सकें। वहां की स्थानीय आबादी को नक्सली बना सकें। हथियार देकर सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकें। और यहां दिल्ली के कई एकड़ में फैले विश्वविद्यालय में पढ़ने आने वाले छात्रों के मन में इतना विष भर दें कि देश के अंदर अशांति हो जाए। अभिव्यक्ति की आजादी का इन वामपंथियों का पैमाना ये है कि भारत के खिलाफ उठने वाली हर आवाज अभिव्यक्ति की आजादी है। लेकिन, वामपंथी-तानाशाह शासन वाले चीन की तानाशाही में पिस रहे तिब्बत की अभिव्यक्ति की आजादी का कोई मतलब नहीं है। ये भारतीय वामपंथ है, जो भारत छोड़ हर किसी के साथ सरोकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरोकार, प्रगतिशील होने के नाम पर खड़ा हो सकता है। भारत की बर्बादी के साथ भी ये वामपंथ खड़ा है। बस खबरदार जो, देश या राष्ट्र या भारत बोला। और इस वक्त हर बात में राष्ट्र-देश बोलने वाली सरकार है। इसलिए जब तक ये राष्ट्रवादी सरकार है। तब तक इस देश में आपातकाल ही रहेगा। इसकी शुरुआत वामपंथी छात्रनेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी से हो गई है। ये हम सरोकारी, प्रगतिशील, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक वामपंथी तय करते हैं। बाकी किसी का तय किया सिर्फ सांप्रदायिकता है और हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाने की साजिश होगी। ये भी हम लगे हाथ बता रहे हैं। 

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...