Tuesday, August 09, 2022

वर्धा, नागपुर यात्रा और शोधार्थियों से भेंट

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi



लंबे अंतराल के बाद इस बार की वर्धा यात्रा का सबसे बड़ा हासिल रहा, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के जागरुक, चैतन्य शोधार्थियों से मुलाकात। यह मेरी इच्छा रहती है कि, किसी भी शहर में जाऊं तो वहां के विश्वविद्यालय केंद्र पर जाने का अवसर निकाल सकूं। 2 अगस्त की शाम वर्धा पहुंचा और 4 अगस्त की दोपहर वापसी हो गई। हमारा एक सत्र जनसंचार पर 3 अगस्त की सुबह का पहला सत्र ही था और दूसरा सत्र नीति निर्माण पर पूर्व नियोजित नहीं था, लेकिन उसमें भी शामिल हुआ। महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में प्रवासी भारतीय और जनसंचार विषय पर अपनी बात रखी। प्रवासी भारतीयों से जुड़े विषयों पर त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीभारतीय डायस्पोरा का वैश्विक परिप्रेक्ष्य: जीवन और संस्कृतिप्रवासियों को समझने, सहेजने में मददगार होगी। दोनों सत्रों के बाद विश्वविद्यालय के शोधार्थी अश्विनी मौर्या ने कहा- भैया, विश्वविद्यालय के छात्र, छात्राएं आपसे मिलना चाहते हैं तो मैंने कहा, इससे सुखद भला क्या हो सकता है। शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद रात 10:30 बजे नागार्जुन अतिथि गृह के कमरे में ही सबको बुला लिया। देर हो जाने की वजह से फिर शाम छात्राओं से मिलना रह गया। शाम को आए लगभग सभी छात्र किसी किसी दौर में प्रयाग से होकर गुजरे थे, उसमें से कई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़े भी। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के नागार्जुन अतिथि गृह में संगम संवाद हुआ। अलग-अलग विषयों में शोध कर रहे छात्रों में शोध की गंभीरता देखकर अच्छा लगा। हर छात्र अपने शोध पत्र को बेहतर बनाने के लिए कुछ जानना चाह रहा था। राष्ट्रीय विमर्श को मजबूत करने की इच्छा हर शोध छात्र में बलवती दिख रही थी। इससे देश में हुए वातावरण परिवर्तन का आभास महात्मा गांधी और विनोबा भावे की कर्मस्थली में स्पष्ट दिख रहा था। 





सुबह की सैर के लिए विश्वविद्यालय की पहाड़ियाँ अधिक प्रेरित कर रहीं थीं, इसलिए वर्धा में रहने के दौरान दोनों ही सुबह मेरी सैर छूटी नहीं। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पहाड़ी का पूरा एक चक्कर चार किलोमीटर से कुछ कम का है। 4 अगस्त को ही मेरी वापसी थी। इस सुबह सैर के लिए निकलने से पहले ही अश्विनी मौर्या का फोन गया कि, भैया बिरसा मुंडा छात्रावास में छात्र आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मुझे याद आया कि, कल रात तय हुआ था कि, सुबह की चाय छात्रावास के कमरे में पी जाएगी। जाने कितने बरस बाद छात्रावास के कमरे में चाय पीने का सुखद संयोग बन रहा था। छात्रों के साथ से मिलने वाली ऊर्जा तो अमूल्य थी ही। सैर पूरी करके विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार से बाहर निकलकर हाइवे पर बने अंडरपास को पार करके बिरसा मुंडा छात्रावास पहुँच गया। देश के हर विश्वविद्यालय के छात्रावास एक जैसे ही होते हैं और छात्रों के मन में बेहतर करने की इच्छा भी एक जैसी ही होती है। शानदार चाय पर ढेर सारी चर्चा में एक बात स्पष्ट हुई कि, हम लोग अक्सर भारत के भविष्य, नौजवानों को लेकर चर्चा करते रहते हैं कि, अब पहले जैसे मेधावी, जिज्ञासु, उत्सुक छात्र नहीं निकल रहे हैं। सुबह बिरसा मुंडा छात्रावास में हुई चाय पर चर्चा ने मेरे मन मस्तिष्क में लगने वाले इस तरह के विचारों के जाले को फिर से साफ कर दिया। मैंने शोधार्थियों को कहाकि, मैं विदेशी लोगों के हवाले से अब विश्वविद्यालय परिसरों में कम ही बात रखता हूँ। इसके पीछे मूल वजह यही कि, भारतीय छात्रों के मन में भारतीय सन्दर्भों के साथ चीजों को जानने समझने का भाव बलवती हो। मैंने कहाकि, आप लोगों को बेहतर शाधार्थी बनना है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में जाएँगे, लेकिन यह शोधकार्य आपके लिए जीवन भर की थाती बनेगा। 




महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में बुनियादी ढाँचे का अधिकतर कार्य वीएन राय के कुलपति रहते ही शुरू हुआ था। विश्वविद्यालय के बुनियादी ढाँचे के कार्यों में अभी के कुलपति डॉ रजनीश शुक्ला के कार्यकाल में बेहतरी स्पष्ट दिख रही थी। डॉक्टर रजनीश शुक्ला के कार्यकाल में विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय विमर्श को मजबूत करने की गति तेज हुई है। गालिब सभागार भवन के ठीक सामने तुलसी जयंती के दिन गोस्वामी तुलसीदास जी की भव्य प्रतिमा का अनावरण और अटल बिहारी वाजपेयी भवन में लगी शानदार प्रदर्शनी इसका साक्षात प्रमाण रही। गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती के अवसर सुखद संयोग बना कि, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में भव्य तुलसी प्रतिमा लोकार्पण का साक्षी बना। भारतीय साहित्य के महान हस्ताक्षर तुलसी बाबा को प्रणाम। अवधी में लिखा रामचरितमानस सबके मानस को दिशा दिखाने वाला ग्रंथ बना। त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में विषय चयन और वक्ताओं, शोधार्थियों की सहभागिता भी बेहतर थी। नागपुर लौटते कई लोगों से मुलाक़ात तय थी, लेकिन हमारे पास समय की कमी से भेंट नहीं हो सकी। हाँ, प्रयागराज में हमारे मोहल्ले दारागंज के राज कुमार पांडेय जी कई वर्षों से अब नागपुर रहते हैं। उनका आग्रह था कि, घर आना है, लेकिन मैंने समय की कमी बताई तो राज कुमार पांडेय जी स्वयं हवाई अड्डे पर मिलने गए। छोटी सी मुलाक़ात, लेकिन स्नेह ऐसा था कि, लगा बरसों से जानते हैं। यात्राएँ होती रहें तो जीवन, जीवंत रहता है। 




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