Sunday, August 07, 2022

भारत के आर्थिक सुधारों की यात्रा के नायक हैं नरसिंहाराव, वाजपेयी और मोदी

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब भारतीय कृषि क्षेत्र में तीन बड़े सुधारों को लागू किया तो देश भर में हंगामा मच गया। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यही रही कि, जिन कृषि कानूनों को लागू करने की बात आज की विपक्षी कांग्रेस से लेकर देश के सभी राजनीतिक दलों ने औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कही थी, अचानक सभी उस कानून के विरोध में गए। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने तो उसे लागू करके उस कानून की प्रति विधानसभा में फाड़ी तो पंजाब में और केंद्र सरकार में भाजपा की सहयोगी अकाली दल सरकार से बाहर होने के साथ गठजोड़ भी तोड़कर चली गयी। देश में ऐसा बवाल मचा कि, अच्छे भले कृषि अर्थशास्त्री भी कहने लगे कि, ऐसे तेजी से इतने बड़े कानूनों को लागू करने की क्या आवश्यकता थी। कृषि कानूनों को लागू करने और उसे वापस लेने की इस घटना से अनुमान लगाना सहज हो सकता है कि, भारतवर्ष में आर्थिक सुधारों की गति धीमी क्यों रही और प्रधानमंत्री नरसिंहाराव, अटल बिहारी वाजपेयी और आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सुधार के साहसिक निर्णयों के लिए जमकर प्रशंसा क्यों की जानी चाहिए। दरअसल, स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक समाजवादी सरकार की संकल्पना के साथ आगे बढ़ना तय किया और, सरकारी कंपनियों के इर्द गिर्द इतने विशाल देश की विकास की योजना को लागू करने को सरकारी सिद्धांत के तौर पर स्थापित कर दिया। उसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गांधी आर्थिक सुधारों को आगे ले जाने के बजाय पीछे ले गईं और बैंकों का सरकारी कर दिया, लेकिन जब नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के पामुलपर्ती वेंकट नरसिंहाराव को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की अवसर मिला तो उनकी जीर्ण-शीर्ण काया की ही तरह देश की आर्थिक काया भी जीर्ण-शीर्ण थी। देश लाइसेंस राज के तले दबा कराह रहा था। उस समय पीवी नरसिंहाराव ने एक विशाल संप्रभु राष्ट्र भारत की आर्थिक विकास की नई यात्रा की शुरुआत की और देश से लाइसेंस राज खत्म कर दिया। उदारीकरण के साथ ही सब सरकार करेगी वाली मानसिकता से देश को बाहर लाने के साथ ही पीवी नरसिंहाराव ने देश की रेंगती अर्थव्यवस्था को ऐसा आधार दे दिया कि, इस कठिन समय में जब विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ घिसट रही हैं तो भारत सरपट भाग रहा है। 

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जब पीवी नरसिंहाराव बैठे तो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उन्हें क़रीब 14 प्रतिशत की महंगाई दर, 18 प्रतिशत की कर्ज की ब्याज दर के साथ आधे भारत को गरीबी रेखा के नीचे छोड़ गए थे। वित्तीय घाटा क़रीब 10 प्रतिशत था। इसको आज के सन्दर्भ में समझना चाहें तो तब का भारत आज के श्रीलंका जैसे हालात में था। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा 20 टन सोना बेच चुके थे और, 47 टन सोना बेचने के लिए स्वीकृति दे चुके थे। ऐसे कठिन समय में 1991 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव सरकार की औद्योगिक नीति ने 51 प्रतिशत विदेशी निवेश का रास्ता खोला। लाइसेंस राज खत्म किया। नरसिंहाराव की सरकार ने सिर्फ सरकार के लिए आरक्षित 18 औद्योगिक क्षेत्रों को घटाकर 8 कर दिया। राव सरकार ने बजट में टैक्स सुधारों के साथ ही कस्टम और आयात शुल्क को भी घटाने का निर्णय लिया। भारत का बाजार विश्व की कंपनियों के लिए खुल गया और, मजबूरी में ही सही, लेकिन भारतीय कंपनियाँ विश्व बाजार के मुकाबले के लिए तैयार होने लगीं। यह नरसिंहाराव सरकार की आर्थिक दूरदृष्टि और साहसिक निर्णय ही था कि, आज भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। और, भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के तौर पर पाँच वर्ष प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने नरसिंहाराव के आर्थिक सुधार के निर्णयों को पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ाया। 


अटल जी के समय में शुरु की गई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना ने  दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई को जोड़ने वाली सड़क बनाई तो उसी पर चलकर बड़ी कंपनियाँ बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों तक पहुँच गईं। एजाज गनी, आरती गोस्वामी और विलियम केर के एक शोध हाइवे टू सक्सेस बताता है कि, हाइवे के दस किलोमीटर के क्षेत्र में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि और उत्पादकता तेज़ी से बढ़ती है। आसपास के शहरों की कुल उत्पादकता कम से कम पचास प्रतिशत बढ़ जाती है। विनिवेश मंत्रालय बनाकर निजीकरण की रफ्तार तेज़ की और भारत अल्युमीनियम (बाल्को), हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल कॉर्पोरेशन, वीएसएनएल सहित 28 सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में देने का क्रांतिकारी, साहसपूर्ण निर्णय लिया। फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एक्ट के जरिये वित्तीय घाटे को नियंत्रित किया गया और इसका परिणाम रहा कि, 2000 में सार्वजनिक क्षेत्र की बचत शून्य से नीचे दशमलव आठ प्रतिशत से बढ़कर 2005 में दो दशमलव तीन प्रतिशत हो गई। टेलीकॉम क्रांति और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने गाँव और शहर का अंतर बहुत कम कर दिया था। वाजपेयी सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में सचिव रहे एन के सिंह कहते हैं कि, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी में दूरदृष्टि थी और उनके लिए निर्णयों की वजह से  वाजपेयी जी इतिहास में सही पक्ष में खड़े दिख रहे हैं। पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कितने शानदार तरीके से सरकार चलाई थी, इसे समझने के लिए कुछ आँकड़े ध्यान में रहना जरूरी है। 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री का कार्यकाल पूरा करके हटे तो देश की अर्थव्यवस्था बेहद शानदार अवस्था में थी। भारत की विकास की रफ्तार आठ प्रतिशत से ऊपर थी। महंगाई दर चार प्रतिशत से नीचे थी और, देश में विदेशी मुद्रा भंडार भरा हुआ था। ऐसी अर्थव्यवस्था एक कवि, पत्रकार, राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को दी थी, लेकिन डॉक्टर मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री होते हुए भी आर्थिक सुधारों का कोई भी बड़ा निर्णय नहीं ले सके। विशेषकर, सरकार के कारोबार से बाहर रहने के मूल आर्थिक सुधार के निर्णय पर भी उनके कार्यकाल में विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका। 


जीएसटी को लागू करने का साहस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाया, लेकिन इस योजना की शुरुआत अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई थी और, कहा जाता है कि, जीएसटी का प्रारूप तैयार करने के लिए 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को निजी आग्रह किया था कि, बंगाल के वित्त मंत्री असीमदास गुप्ता को इस कार्य को प्राथमिकता पर करने दें। अटल जी की टैक्स सुधारों पर बनाई गई समिति के अध्यक्ष सीपीएम नेता असीमदास गुप्ता बने और इस समिति में रिजर्व बैंक के तीन पूर्व गवर्नर आईजी पटेल, बिमल जालान और सी रंगराजन शामिल थे। यह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ही थे, जिन्होंने उत्तर पूर्व के विकास को समग्रता में देखना शुरू किया और इसके लिए अलग से मंत्रालय बनाया। पूर्वोत्तर के राज्यों में कई स्वायत्त परिषद बनाकर वहाँ के आर्थिक विकास को सामाजिक मान्यता के साथ आगे बढ़ाया। ऐतिहासिक निर्णय अटल बिहारी वाजपेयी ने लिया कि, सभी मंत्रालयों के बजट का दस प्रतिशत पूर्वोत्तर में विकास कार्यों के लिए खर्च किया जाएगा। इतिहास में डॉक्टर मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के कार्यकाल के बाद नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना दर्ज रहेगा, लेकिन आर्थिक सुधारों के इतिहास के लिहाज से देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, पीवी नरसिंहाराव की शुरू की गई और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में मजबूती से आगे बढ़ी आर्थिक विकास यात्रा को  10 वर्षों के विराम के बाद, नई ऊँचाई पर पहुँचाया है। और, यह विकास यात्रा अभी जारी है, कई नए प्रतिमान गढ़ने के लिए इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी याद किए जाएँगे। 

(यह लेख दैनिक जागरण में 7 अगस्त 2022 को छपा)

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