Skip to main content

बाबा रे बाबा

14 सितंबर 2015 को रामपाल के समर्थन में जुटे भक्त
चौदह सितंबर को जंतर मंतर पर गजब की भीड़ थी। रामपाल के समर्थन में। पता नहीं आपमें से कितने लोगों को रामपाल याद होगा। हालांकि, ये मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है कि किसी के लिए ऐसे अपमानजनक तरीके से लिखा जाए। लेकिन, मुझे लगता है ये जरूरी है। जरूरी है कि रामपाल जैसे लोगों को अपमान ही मिले। अब मुझे ये नहीं पता कि ऐसे लोगों का सम्मान करने वाले लोग किस मानसिकता से जीते हैं। या फिर ऐसे लोगों को रामपाल जैसे लोग क्या दे देते हैं जिसके चक्कर में ये उमस भरी गर्मी में सरकार को चेताने जंतर-मंतर तक चले आते हैं। और ये लोग देश के अलग-अलग हिस्से से आए हैं। जैसा इनके हाथों में बैनर-तख्ती देखकर समझ में आता है। रामपाल के समर्थन में आए लोगों की भीड़ में हर उम्र के लोग हैं। अब पता नहीं समाज के किस वर्ग की भागीदारी इसमें ज्यादा है। ये सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं। अब तो आपको इस रामपाल का ध्यान अच्छे से आ गया होगा। ये रामपाल वही है, जो खुद को संत कहता है। ये वही रामपाल है, जो लंबे समय से संत के लबादे में अपना गुंडों का साम्राज्य चला रहा है। जिस रामपाल को पकड़ने में पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हरियाणा में किसी आतंकवादी को पकड़ने जैसी घेरेबंदी करनी पड़ी थी। सरकार घुटनों पर खड़ी दिखने लगी थी। बाकायदा हथियारों से लैस तथाकथित संत के भक्त मरने-मारने पर उतारू थे। अच्छा हुआ कि बंदबुद्धि भक्तों की आस्था पर देश का कानून मानने वाले नागरिकों का भरोसा भारी पड़ा। और सरकार ने रामपाल को गिरफ्तार किया।

सिर्फ गिरफ्तार नहीं किया। बल्कि, रामपाल पर राज्य के खिलाफ लड़ाई छेड़ने का मामला भी दर्ज किया। लेकिन, इससे भी रामपाल के भक्तों की बंदबुद्धि खुली नहीं। या यूं कहें कि और बंद हो गई है। रामपाल के भक्त जंतर मंतर पर बैनर लेकर खड़े थे। कह रहे थे कि देशद्रोही वो है जिन्होंने विदेशों में धन जमाकर रखा है। अब इन्हें कौन समझाए कि विदेश में गलत तरीके से जमा धन हो या देश में दोनों गलत हैं। लेकिन, इससे रामपाल के ठीक होने का आधार कहां से तैयार हो जाएगा। भक्त सीधे धमकी के अंदाज में लिखे रखे हैं कि भक्तों के सब्र का इम्तहान न ले प्रशासन। कबीर भी इन भक्तों के देखकर क्या सोच रहे होंगे।

भक्त कबीर साहेब के साथ रामपाल को पूर्ण संत बताने वाले पोस्टर लिए घूम रहे थे। रामपाल एकदम सबको आशीर्वाद देने वाली मुद्रा में तस्वीर खिंचाए थे। खैर, लोकतंत्र है। और लोकतंत्र में जंतर मंतर है। सबको पूरा मौका है कि अपनी बात कहे। हम न्यायालय तो हैं नहीं कि कोई फैसला सुनाएं। और वैसे भी रामपाल के भक्त न्यायालय को भी बुरा भला कहने में कोई कसर नहीं छोड़े हैं। इस दिन जंतर मंतर से गुजरते यही अहसास हुआ कि कितने न्याय की आस में गुहार लगाते कब से जंतर मंतर पर पड़े हैं। ये सरकार से न्याय मांग नहीं रहे हैं। इनके पैमाने वाले न्याय के न मिलने पर धमकी दे रहे हैं। लेकिन, जंतर मंतर है तो, लोकतंत्र का ही ना। इसलिए भीड़तंत्र भी काम कर रहा है। गुलामी तो हमारे खून में गजब घुसी है। बाबा मिल जाए गुलामी के लिए तो क्या बात है। अच्छा बाबा नहीं उपलब्ध है, तो बुरा बाबा ही सही। नेताओं की गुलामी से थोड़ा आगे का मामला दिखता है।

Comments

Popular posts from this blog

किसान राजनीति के बीच सरकार आधुनिक किसान नेता बनाने में जुटी है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी दिल्ली की सीमा पर तीन तरफ़ सिंघु , टिकरी और ग़ाज़ीपुर पर कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन बैठे हुए हैं और फ़िलहाल कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। सरकार और किसानों के नाम आंदोलन कर रहे संगठनों के बीच में वार्ता भी पूरी तरह से ठप पड़ गयी है। किसानों के नाम पर संगठन चला रहे नेताओं ने अब दिल्ली सीमाओं पर स्थाई प्रदर्शन के साथ रणनीति में बदलाव करते हुए देश के अलग - अलग हिस्सों में किसान पंचायत , बंद और प्रदर्शन के ज़रिये सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना शुरू किया है , लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार कृषि क़ानूनों को लेकर ज़्यादा दृढ़ होती जा रही है। चुनावी सभाओं से लेकर अलग - अलग कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को आधुनिक कृषि व्यवस्था से जोड़कर उनकी आमदनी दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को बार - बार दोहरा रहे हैं , लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि आख़िर किसानों को यह बात समझाने में सरकार कैसे कामयाब हो पाएगी , जब

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दम तोड़ेगी यूनियनबाज किसानों की “अराजकता”

भारतीय संविधान निर्माताओं ने जब संविधान बनाया था तो स्पष्ट तौर पर उसमें यह व्यवस्था स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि किसी भी हाल में विधायिका , न्यायापालिका और कार्यपालिका के बीच किसी तरह का टकराव न हो। हालाँकि , इसमें लोकतंत्र की मूल भावना का ख्याल रखते हुए विधायिका और न्यायपालिका को एक दूसरे पर इस नज़रिये से नज़र रखने का बंदोबस्त किया गया कि किसी भी हाल में निरंकुश व्यवस्था न हावी हो जाए , लेकिन सबके मूल में लोकतंत्र को ही सर्वोच्च भावना के साथ स्थापित करना था , इसीलिए कई बार भारतीय लोकतंत्र में इस बात की भी चर्चा होने लगती है कि भारत में अतिलोकतंत्र की वजह से सरकारें निर्णय नहीं ले पाती हैं। पहले नागरिकता क़ानून के विरोध में चले शाहीनबाग और अब कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहे सिंघु - टिकरी - गाजीपुर के आंदोलन को लेकर अतिलोकतंत्र की बहस फिर से छिड़ गई है और इसी अतिलोकतंत्र की बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि क़ानूनों को नि

पिंजरा या भारत तोड़ने की कोशिश ?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मुख्य परिसर से सटा हुआ या यूं कह लें कि मुख्य परिसर में ही महिला छात्रावास है। और, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं, महिला छात्रावास से निकलकर सीधे परिसर में आ जातीं थीं, लेकिन यह रास्ता पूरी तरह से उन्हीं छात्राओं के लिए था जो महिला छात्रावास में रहती थीं। महिला छात्रावास में छात्रों या किसी को भी जाने के लिए मुख्य द्वार से ही जाना होता था और इसके लिए बाकायदा सुरक्षा में लगे जवानों के पास नाम वगैरह दर्ज कराकर ही जाया जा सकता था। 90 के दशक तक 3 महिला छात्रावास हुआ करते थे और उन तीनों के पहले छात्रावास अधीक्षिका का कक्ष, छात्रावास कार्यालय होता था, वहीं तक जाकर छात्राओं से मुलाकात होती थी। वर्ष में एक बार विश्वविद्यालय के छात्रों को महिला छात्रावास के अंदर जाने का अवसर मिलता था और वह अवसर होता था छात्रसंघ चुनाव के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद अनोखे मशाल जुलूस वाले दिन। हर प्रत्याशी अपने जुलूस के साथ महिला छात्रावास में जाता था, जहां छात्राएं, छात्रसंघ प्रत्याशियों के ऊपर फूल फेंकती थीं और जिस नेता के ऊपर ज्यादा गुलाब गिरे, उसकी जीत पक्की मान