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सिर्फ विज्ञापनों में उत्तम है उत्तर प्रदेश

सरकारें भूल जातीं हैं कि विज्ञापन अगर सिर्फ विज्ञापन है और धरातल पर वैसा नहीं है। जैसा सरकार विज्ञापन में जनता को बताने की कोशिश कर रही है तो, फिर सरकारें नहीं रहती हैं। सरकारों के लिए अच्छी बात ये हो सकती है कि जनता की याददाश्त बहुत लंबी नहीं होती है। लेकिन, सरकारों को को कम से कम पुरानी गलतियों से सबक तो लेना ही चाहिए। तब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री हुआ करते थे। और महानायक अमिताभ बच्चन अगर किसी एक राज्य के लिए समर्पित थे। तो, वो राज्य था उत्तर प्रदेश। अमिताभ बच्चन तब के विज्ञापन में पर्दे पर आते थे। और मुस्कुराते हुए कहते थे। यूपी में दम है, क्योंकि, जुर्म यहां कम है। अब अमिताभ बच्चन बोल रहे थे तो, जनता ने और गंभीरता पूर्वक देखना शुरू कर दिया कि आखिर जुर्म कितना कम है। जब जनता पता लगाने लगी तो, उसके साथ घटी घटनाओं ने बता दिया कि जुर्म तो कम नहीं यहां सबसे ज्यादा है। अब सरकार बदल चुकी है। हालांकि, सरकार फिर से समाजवादी पार्टी की ही है। लेकिन, अब पिता की जगह पुत्र अखिलेश यादव ने ले ली है। नौजवान मुख्यमंत्री से लोगों को बड़ी अपेक्षाएं थीं। लगा कि ये नौजवान मुख्यमंत्री पहले की समाजवादी पार्टी के हर बार के बुरे अनुभव को इस बार बदल देगा। लेकिन, इस नौजवान मुख्यमंत्री ने भी वहा रास्ता अपनाया जो, उनके पिता ने अपनाया था। समाजवादी सरकार उत्तर प्रदेश में चल रही है। लेकिन, विज्ञापन का तरीका अखिलेश ने बदल दिया है। मुलायम ने बुजुर्ग अमिताभ की साख का विज्ञापन में इस्तेमाल करना चाहा था। अब नौजवान अखिलेश नौजवानों की भावना अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाह रहे हैं। रेडियो पर बजते सुमधुर गानों के बीच अचानक एक लड़की की आवाज आती है। हम कहीं वॉशिंगटन में तो नहीं आ गए हैं। फिर दूसरी आवाज बताती है कि नहीं हम उत्तर प्रदेश में हैं। फिर वो सवाल करती है कि फिर ये आधुनिक इनोवा कारें हमारी पुलिस के पास। जवाब आता है। हमारी सरकार ने पुलिस को अतिआधुनिक बना दिया है। इंटरनेट पर ही एफआईआर लिखी जा रही है। और ऐसे ढेर सारे दावे जिससे लगने लगता है कि उत्तर प्रदेश तो लगभग अपराध शून्य हो गया है। फिर विज्ञापन में ये भी आता है कि नौजवान मुख्यमंत्री के काम करने की तरीका सबसे अलग है।

ये तो यूपी में दम है क्योंकि, जुर्म यहां कम है कि तर्ज पर विज्ञापन की बात थी। अब जरा सच्चाई की तरफ बढ़ें। उत्तर प्रदेश में ऑनलाइन एफआईआर तो छोड़िए। थाने में जाकर अपने साथ हुई घटना की शिकायत दर्ज कराना कितना मुश्किल काम है। ये उत्तर प्रदेश के लोगों से समझा जा सकता है। पत्रकारों की हत्या से लेकर दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं जो, उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था का हाल बताते हैं। लेकिन, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े ज्यादा भयावह तस्वीर पेश करते हैं। यहां ये समझना बेहद जरूरी है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो भले ही गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। लेकिन, ये रिपोर्ट राज्यों के दिए उनके आंकड़े के आधार पर ही तैयार होती है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि देश में अपराध के मामले में सबसे खराब है उत्तर प्रदेश। 2012 में अखिलेश सिंह यादव की सरकार आने के बाद अपराध तेजी से बढ़े हैं। एनसीआरबी के ताजा आंकड़े 2013 तक के हैं। इससे ये साफ है कि उत्तर प्रदेश में हर तरह के अपराध बढ़े हैं। सामान्य अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरा सबसे ज्यादा अपराध वाला राज्य है, देश भर के अपराधों के साढ़े आठ प्रतिशत से ज्यादा अपराध सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुए हैं। देश के किसी एक शहर में सबसे ज्याद अपराध बढ़े हैं तो वो है हमारे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ। हिंसक अपराधों के मामले में देश में सबसे बुरे हाल में उत्तर प्रदेश ही है। उत्तर प्रदेश में 2013 में 38779 मामले दर्ज हुए हैं। देश में सबसे ज्यादा हत्याएं भी उत्तर प्रदेश में ही हुई हैं। देश भर में कुल 33201 हत्याएं हुईं जिसमें से 5259 हत्याएं सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुई हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का हाल कितना बुरा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपहरण, बंधक बनाने के मामले में सबसे बुरा हाल उत्तर प्रदेश का ही है। 2012 में अखिलेश यादव की सरकार आने के साल भर में ही प्रदेश में कानून का राज पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार आने के एक साल बाद अपहरण, बंधक बनाने के मामले में करीब बीस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अपहरण, बंधक बनाने के 9737 मामले दर्ज हुए हैं। महिलाओं की सुरक्षा के मामले में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार पूरी तरह से नाकाम है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के 32546 मामले दर्ज किए गए हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ 2013 में 2335 दहेज हत्या के मामले सामने आए हैं।

महिलाओं की सुरक्षा का हाल बुरा है। तो बच्चे भी समाजवादी पार्टी के जंगलराज में डरकर जी रहे हैं। देश में सबसे ज्यादा बुरे हाल में बच्चे उत्तर प्रदेश में ही हैं। बच्चों के खिलाफ सबसे अपराध उत्तर प्रदेश में ही हो रहे हैं। अखिलेश यादव के राज में जाति संघर्ष किस तरह से समाज में जहर घोल रहा है ये सब जानते हैं। लेकिन, अखिलेश सरकार के सत्ता में आते ही अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामले किस तेजी से बढ़े इसका अंदाजा शायद ही आप लोगों को हो। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में 2013 में अनुसूचित जाति के खिलाफ सबसे ज्यादा अत्याचार उत्तर प्रदेश में ही हुआ है। देश भर में कुल 39408 मामले हुए। इसमें से 7078 मामले सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुए। इस सरकार में गंभीर अपराधों के मामले में हमारे प्रदेश का नाम खराब हुआ है। हत्या, अपहरण, दहेज हत्या, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, बलात्कार जैसे मामलों में तो पुलिस जैसे अनदेखा ही कर देती है। गाड़ियों की चोरी के मामले में भी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। 2013 में 23916 गाड़ियां चोरी हुई हैं। यानी हर दिन करीब सत्तर गाड़ियां यूपी में चोरी हो जाती हैं। इसको ऐसे समझें कि शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब उत्तर प्रदेश के किसी जिले में एक भी गाड़ी चोरी ना होती हो। ऑटो चोरी के भी सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में ही हुए हैं। अखिलेश सरकार आने के बाद चोरों-डकैतों के हौसले खूब बढ़ गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2013 में यानी अखिलेश सरकार के आने के तुरंत बाद अपराध तेजी से बढ़े। उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला सबसे ज्यादा डकैती वाला जिला रहा। जिले में 317 डकैती के मामले सामने आए। मतलब लगभग हर रोज जिले में कहीं न कहीं डकैती हो जाती है।

विज्ञापन के लिए अखिलेश सरकार नए-नए तरीके इस्तेमाल कर रही है। लेकिन, हकीकत बदलने के लिए शायद ही कुछ हो रहा है। एक निजी एफएम चैनल के साथ यूपी सरकार ने हाथ मिलाया है। इस समझौते में उस रेडियो स्टेशन पर अलग-अलग कहानियों के जरिये यूपी की छवि सुधारने की कोशिश हो रही है। यूपी की कहानियां सुनते आपको कतई नहीं लगेगा कि ये पूरी तरह से प्रायोजित है। लेकिन, अगर आप लगातार कहानियां सुनते रहे तो, कहीं न कहीं आपको यूपी की हकीकत और इन मायावी कहानियों के बीच का फासला साफ दिख जाएगा। अखिलेश यादव से उम्मीद थी कि वो कुछ धरातल बदलेंगे लेकिन, आसमानी तस्वीर बदलकर ही यूपी पर राज करने की जुगत में लगे हैं। यूपी में जुर्म कम है से लेकर इंडिया शाइनिंग तक के विज्ञापनों का इतिहास गवाह है कि ऐसा हो नहीं पाता है।



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