बड़ा
सवाल है कि आखिर अरविंद केजरीवाल का करिश्माई आप पार्टी 2014 में क्या करेगी। सवाल
इसलिए भी खड़े हो रहे हैं कि एक लंबे समय बाद कांग्रेस की एकदम से मिट्टी पलीद
होती दिख रही है। और ये साबित कर रहा है कि देश की जनता ऊब गई है कांग्रेस के
वादों और दावों से। लेकिन, सवाल इसी के साथ ये भी खड़ा होता है कि क्या नरेंद्र
मोदी इतनी ऊंचाई तक जनभावना को ले जा पाएंगे कि लोगों को मतदान केंद्र में 2014
में कांग्रेस का हाथ दिखे ही नहीं। लेकिन, अब इससे भी बड़ा सवाल 2014 को लेकर 2013
में ही खड़ा हो गया है कि आखिर 2013 की करिश्माई जीत वाली पार्टी झाड़ू का निशान
भी क्या मतदाताओं को देखने से रोक पाएंगे नरेंद्र मोदी। भारतीय राजनीति में
जनभावनाओं को अपने पक्ष में करने और रणनीति से बुरे को भी अच्छे में बदल देने वाले
दोनों नेताओं को जनता ने पसंद किया है। ये 2013 के चार राज्यों के विधानसभा चुनाव
परिणामों से साफ है कि भारतीय जनता को नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल दोनों ही
खूब भा रह हैं। और एक बात अगर आप लोगों ने गौर की हो तो नरेंद्र मोदी भी आप पर या
अरविंद केजरीवाल पर सीधा हमला करने से अब तक बचते रहे हैं और अरविंद केजरीवाल भी बीजेपी
को चाहे जितना गरियाएं। नरेंद्र मोदी को सीधे गरियाने से बचते हैं। अरविंद
केजरीवाल की तरफ से एक प्रयास हुआ था ये बताने का कि नरेंद्र मोदी गुजरात
उद्योगपतियों को बेच दे रहे हैं। अरविंद केजरीवाल की हर बात पर झंड बुलंद करने
वाली जनता गायब हो गई। अरविंद ये समझ गए। लेकिन, अब कैसे समझेंगे।
दिल्ली
में #AAP या #BJP
किसी की सरकार बन गई होती तो शायद स्थितियां थोड़ी अलग हो जातीं। लेकिन, अब अगर
किसी तरह से अल्पमत की सरकार बीजेपी के डॉक्टर हर्षवर्धन बना भी लेते हैं तो शायद
अरविंद केजरीवाल की आप के लिए हंगामा करना आसान नहीं होगा कि डॉक्टर हर्षवर्धन और
शीला दीक्षित की सरकार में फर्क नहीं है। क्योंकि, आप के हंगामे के जवाब में
बीजेपी का ये तर्क कुछ काम करेगा कि जब हमें पूर्ण बहुमत मिला नहीं तो हम दिल्ली
की भलाई के लिए उतनी बेहतरी से काम कैसे करें। आप अगर फिर चुनाव की ही बात पर अड़ा
रहता है तो फिर नरेंद्र मोदी के सामने देश के चुनावों के समय 543 लोकसभा सीटों का
मामला होगा सिर्फ दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों का नहीं। फिर सवाल ये भी है कि आप
देश में भी बीजेपी के नरेंद्र मोदी की संभावना को कितना धूमिल करेगी। मेरा हमेशा
ये मानना रहा है कि नरेंद्र मोदी की मजबूती दिल्ली में अरविंद को कमजोर करेगी। क्योंकि,
इस आंकलन का एक विरोधी तर्क ये भी है कि अरविंद केजरीवाल 2014 में दिल्ली के
मुख्यमंत्री के तौर पर लड़ेंगे या देश के प्रधानमंत्री के तौर पर। फिर सिर्फ 7
लोकसभा सीटों वाली दिल्ली और बची 536 लोकसभा सीटों वाले देश के मिजाज में फर्क भी
तो है। मान लें कि दिल्ली की तरह मुंबई, बंगलुरू, कोलकाता में कुछ आप कर भी पाए तो
बाकी देश का क्या। इसलिए सवाल ये भी खड़ा होता है कि सरकार न बनाना न बनने देना
2014 के पहले का 2013 में ये रुख देश का मिजाज किस तरह बदलेगा। फिर सवाल ये भी है
कि 2013 में अरविंद केजरीवाल का बड़ा समर्थक वर्ग (नौजवान पढ़ें) 2014 का नेता तो
सिर्फ नरेंद्र मोदी को मानता है। इसीलिए सवाल ये है कि 2014 में ‘आप’
क्या करेंगे। मुझे लगता है कि इस सवाल का जवाब इस सवाल से निकलेगा कि ‘आप’ 2013
में क्या करेंगे। इसलिए अरविंद केजरीवाल को चाहिए कि वो दिल्ली की राजनीति में ‘आप’ को
जीवित रखें, स्वस्थ रखें। राजनीति कोई साल दो साल का मसला नहीं है। इंतजार करें।
2014 के बाद 2019 भी आएगा। और अगर बीजेपी और नरेंद्र मोदी की राजनीति इतनी ही खराब
रही जितना अरविंद केजरीवाल को भरोसा है तो 2019 में अरविंद देश के हीरो होंगे।
लेकिन, अगर अरविंद को इतनी जल्दी ही कि 2013 में दिल्ली पूरी भले न जीत पाएं लेकिन,
2014 में दिल्ली और देश दोनों एक साथ चाहिए तो इतनी हड़बड़ी वाले नेता के बारे में
देश फिर से सोचने पर मजबूर हो जाएगा। मैं निजी तौर पर ये चाहूंगा कि अरविंद
केजरीवाल एक स्वस्थ लोकतंत्र वाली राजनीति को जिंदा रखें। मिसाल बनें।








