Tuesday, November 16, 2021

भारत के नेतृत्व में ही पर्यावरण की चुनौती का समाधान खोजा जा सकता है



हर्ष वर्धन त्रिपाठी @MediaHarshVT

पर्यावरण की चुनौती से निपटने के लिए भारत को नेतृत्व देना होगा

विकसित होने की क़ीमत सम्पूर्ण विश्व चुका रहा है। कमाल की बात यह है कि पर्यावरण संतुलन बिगड़ा है सम्पूर्ण विश्व का, प्रदूषण फैला है सम्पूर्ण विश्व में, लेकिन विकसित विश्व के कुछ ही देश हुए हैं। अब वही विकसित चुनिंदा देश सम्पूर्ण विश्व पर दबाव बना रहे हैं कि आप लोग विकासशील ही बने रहिए, विकसित मत बनिए क्योंकि, इससे सम्पूर्ण विश्व में प्रदूषण फैलता है। और, अभी भी विकसित देश अपनी ज़िम्मेदारी समझने के लिए तैयार नहीं हैं। जिन देशों के विकास की क़ीमत सम्पूर्ण विश्व चुका रहा है, उसमें से एक चीन की लापरवाही का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तो पर्यावरण पर, कार्बन घटाने पर ग्लासगो में में हुई बैठक में हिस्सा ही नहीं लिया। विश्व नेतृत्व की ऐसी लापरवाही और गैर जवाबदेही के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को रास्ता दिखाने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो, स्कॉटलैंड में पर्यावरण संतुलन पर हुई COP-26 में पंचामृत के ज़रिये भारतीय भावनाओं को सम्पूर्ण विश्व के सामने रखा और जिस जवाबदेही के होने से पर्यावरण असंतुलन का ख़तरनाक रूप देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो में कहाकि भारत विश्व को पंचामृत की सौग़ात दे रहा है। पंचामृत में प्रथम है कि भारत 2030 तक 500 गीगावॉट ऊर्जा ग़ैर जीवाश्म श्रोतों के ज़रिये पूरा करेगा। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि ऐसे ऊर्जा स्रोत, जिसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है जैसे, हवा, सूर्य की रोशनी से ऊर्जा का उत्पादन करना। इससे पर्यावरण असंतुलन कम करने में बड़ी मदद मिलेगी। पंचामृत में भारत की दूसरी सौग़ात सम्पूर्ण विश्व को भारत की यह होगी कि 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा ज़रूरतों का आधा ग़ैर जीवाश्म श्रोतों से ही पूरा किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरे पंचामृत के बारे में कहाकि भारत अभी से 2030 तक 100 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन में करेगा। 2030 तक ही भारत अपनी कार्बन तीव्रता को 45 प्रतिशत तक कम करेगा। और, पंचामृत का आख़िरी अमृत तत्व यह कि भारत 2070 तक पूरी तरह से कार्बन उत्सर्जन से मुक्त देश होगा। 

कार्बन उत्सर्जन मुक्त होने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य कितना बड़ा है, इसका अनुमान आपको कुछ आँकड़ों से लगेगा, साथ ही विकसित देशों की ग़ैर जवाबदेही का भी कुछ अनुमान लग सकेगा। अमेरिका के एक व्यक्ति का कार्बन उत्सर्जन चीन के दो व्यक्तियों के कार्बन उत्सर्जन के बराबर है। ब्राज़ील के 7 व्यक्तियों का कुल कार्बन उत्सर्जन एक अमेरिकी के बराबर होता है और 9 भारतीय कुल उतना कार्बन उत्सर्जन नहीं करते हैं, जितना एक अमेरिकी करता है। इथियोपिया के 109 लोग मिलकर उतना कार्बन उत्सर्जन नहीं करते हैं, जितना अकेले एक अमेरिकी करता है। इसी से समझ जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह क्यों कहाकि क्लाइमेट फ़ाइनेंस को लेकर आज तक जितने भी वायदे किए गए हैं, सब खोखले साबित हुए हैं। उन्होंने कहाकि भारत जब वादा करता है कि ट्रैक रिकॉर्ड के साथ करता है। उन्होंने कहाकि मेरी बातें सिर्फ़ शब्द नहीं हैं, भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य का जयघोष हैं। विकसित देशों की जवाबदेही तय करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण संतुलन के लिए वित्तीय सहयोग पर विकसित देशों से आगे आने के लिए भी कहा। उन्होंने कहाकि विकसित देशों को एक लाख करोड़ रुपये का निवेश अक्षय ऊर्जा स्रोतों के लिए विकास के लिए करना चाहिए, जिससे पर्यावरण असंतुलन कम हो सके। इसे ऐसे समझिए कि ग्लोबल वार्मिंग, कार्बन उत्सर्जन जैसे शब्दों का प्रयोग करके विकसित देशों के नेता विकासशील देशों पर जो दबाव बनाते हैं, दरअसल सबके मूल में विकसित देशों का अनाप-शनाप संसाधनों का दोहन ही है। ग्लोबल वार्मिंग की बात करते जब ग्रीनहाउस गैस के प्रभाव की बात होती है तो हमें यह समझना होगा कि दरअसल विश्व पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक है कि कार्बन डाई ऑक्साइड के साथ ही मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी पर्यावरण के लिए हानिकारक गैसों का कम से कम उत्सर्जन हो। इसे हम सामान्य भाषा में एयर कंडीशनर के चलने पर निकलने वाली गैस से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान से समझ पाते हैं। दरअसल, कार्बन डाई ऑक्साइड से 28 गुना अधिक ख़तरनाक मीथेन और 300 गुना अधिक ख़तरनाक नाइट्रस ऑक्साइड गैस होती है। भारत ने इन ख़तरों को देखते हुए अपने देश के विकास के साथ पर्यावरण, प्रकृति के साथ संतुलन की भी पक्की योजना बना ली है। ग्लासगो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि 2030 तक भारतीय रेल को पूरी तरह से कार्बन उत्सर्जन मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया गया है।  कार्बन उत्सर्जन मुक्त का सीधा सा मतलब ऐसे समझिए कि जितना कार्बन बनेगा, उससे अधिक कार्बन समाप्त करेंगे। सम्पूर्ण विश्व की आबादी से अधिक भारतीय रेलवे से प्रतिवर्ष यात्रा करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व की सबसे बड़ी चुनौती के समाधान के लिए पंचामृत के ज़रिये भारत की ज़िम्मेदारी बताने के साथ ही विश्व को भी लाइफ़स्टाइल फ़ॉर एनवॉयरनेंट का भी मंत्र दिया। विकसित देशों ने प्रकृति, पर्यावरण के साथ संतुलन बनाने में ग़लतियाँ कीं और उसे स्वीकार भी नहीं कर रहे। क्योटो प्रोटोकॉल से लेकर पेरिस समझौते तक विकसित देशों ने सिर्फ़ विकासशील देशों पर सारी ज़िम्मेदारी थोपने की कोशिश की है। यहाँ तक कि जलवायु परिवर्तन के लिए आधार वर्ष मानने में भी यूरोपीय यूनियन ने 1992 की जगह 1990 को स्वीकारा जबकि सोवियत संघ के विघटन के बाद वहाँ औद्योगिक गतिविधियाँ कम हुईं और दुनिया में कार्बन उत्सर्जन 1990 के मुक़ाबले 1992 में कम हो गया था, लेकिन यूरोपीय संघ और दूसरे विकसित देशों ने ग़ैर जवाबदेही का सबसे बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए 1992 को आधार वर्ष नहीं माना, इससे कार्बन उत्सर्जन को तेज़ी से घटाने के लक्ष्य को प्राप्त करने में शुरुआती गड़बड़ हुई। इसके बाद भी विकसित देशों ने ईमानदारी से अपने देश में कार्बन उत्सर्जन घटाने के बजाय विकासशील देशों में अक्षय ऊर्जा की कुछ परियोजनाओं को वित्तीय मदद करके अपने कार्बन उत्सर्जन को उससे जोड़कर सम्पूर्ण विश्व में कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयास को आगे बढ़ाने की बात की, लेकिन विकसित देश यह अभी भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि विकासशील देशों में संसाधनों के विकास की अधिक आवश्यकता है, जिससे उन देशों के लोगों का जीवनस्तर बेहतर हो सके। जबकि, विकसित देशों में जीवनस्तर को बेहतर रखे हुए अक्षय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग की ओर बढ़ा जा सकता है। ग्लासगो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से भारत की ज़िम्मेदारियों के अहसास के साथ भारत की पर्यावरण संतुलन के मामले में प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का शानदार अनुभव विश्व के सामने प्रस्तुत किया है, उससे साफ़ है कि प्रकृति, पर्यावरण की चुनौती का समाधान खोजना है तो उसका नेतृत्व भारत को ही सौंपना होगा। ग़ैर जवाबदेह, कम ईमानदार नेतृत्व के साथ कभी भी बड़ा लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है। पर्यावरण सुंतुलन की चुनौती अभी विश्व के सामने सबसे बड़ा और कठिन लक्ष्य है। ऐसे कठिन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसी देश की अगुआई में चला जा सकता हो, जिसने स्वयं ईमानदारी दिखाई हो। दुर्भाग्य से विकसित देश ऐसी ईमानदारी दिखाने में पिछड़ गए हैं। भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अक्षय ऊर्जा के मामले में कमाल किया है। अक्षय ऊर्जा उत्पादन के मामले में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस के अगुआ देश के तौर पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व को वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड का सिद्धांत दिया है। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में एक बेहतर विश्व की उम्मीद बन गया है। पर्यावरण और प्रकृति संतुलन भारतीयों, हिन्दुओं के व्रत, पर्व, त्यौहार के साथ व्यवहार में है। विकास की पश्चिमी अवधारणा की वजह से भारत में भी पर्यावरण संतुलन की चुनौतियां बड़ी हो गई हैं, अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय संस्कार और संस्कृति के साथ जोड़कर विकास पथ पर बढ़ने का लक्ष्य तय कर रहे हैं। और, यह स्पष्ट दिख रहा है कि दबे मन से ही सही, लेकिन विश्व के विकसित देशों के नेताओं को यह समझ रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में ही पृथ्वी को बचाने का काम तेज़ी से किया जा सकता है।  

(यह लेख आज प्रभात खबर https://www.prabhatkhabar.com/opinion/article-by-harsh-vardhan-tripathi-on-prabhat-khabar-editorial-about-climate-in-india-srn में छपा है)

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