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केंद्र और बंगाल की लड़ाई में संवैधानिक संकट खड़ा हो रहा है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी


ममता बनर्जी ने साफ़ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार की कोई बात नहीं मानेंगी। केंद्र सरकार को स्पष्ट चुनौती देते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव आलापन बंदोपाध्याय ने त्यागपत्र दे दिया। अब वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी नहीं रह गए। दरअसल, 31 मई को ही आलापन की सेवानिवृत्ति की तारीख़ भी थी, लेकिन राज्य सरकार के आग्रह पर उन्हें तीन महीने का सेवा विस्तार मिला था और इसी बीच यास तूफ़ान प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की समीक्षा बैठक में आलापन के जाने से सेवा शर्तों के उल्लंघन का गम्भीर मामला सामना गया और उस पर सफ़ाई देने के लिए उन्हें सोमवार 31 मई 2021, सुबह 10 बजे, केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग में उपस्थित होना था।उनसे पूछा जाना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पश्चिम बंगाल दौरे के समय मुख्य सचिव ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की सेवा शर्तों का उल्लंघन क्यों किया। देश के प्रधानमंत्री किसी राज्य में जाते हैं तो राज्य के मुख्यमंत्री के साथ मुख्य सचिव और संबंधित ज़िले/विभाग के प्रमुख अधिकारियों का उपस्थित रहना सामान्य सेवाशर्तों के तहत आता है, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार से हर मोर्चे पर लगातार लड़ रही ममता बनर्जी ख़ुद समय से पहुँची और ही मुख्य सचिव को जाने दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क़रीब आधे घंटे तक प्रतीक्षा करते रहे। इसके बाद आलापन बंदोपाध्याय पर कार्रवाई तय मानी जा रही है। यहाँ एक और बात महत्वपूर्ण है कि आलापन बंदोपाध्याय को 24 मई को ही राज्य सरकार के अनुरोध पर तीन महीने का सेवा विस्तार मिला है वरना आलापन 31 मई 2021 को ही सेवानिवृत्त हो जाते। ज़ाहिर है आलापन पश्चिम बंगाल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, सेवानिवृत्ति की दहलीज़ पर है और उन्हें सेवा विस्तार भी ममता बनर्जी की कृपा से मिला है तो उन्हें प्रधानमंत्री की अनदेखी करने का निर्णय लेने में ज़्यादा सोचना नहीं पड़ा होगा क्योंकि ममता बनर्जी जिस तरह से अपने नज़दीकी अधिकारियों के बचाव में उतरती हैं, उसमें आलापन को ज़्यादा नुक़सान नहीं दिख रहा होगा, लेकिन इससे केंद्र-राज्य के बीच संवैधानिक दायरे की लक्ष्मण रेखा को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। 

पश्चिम बंगाल की सरकार ने यह पहली बार नहीं किया है कि इससे पहले भी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को केंद्र भेजने से ममता बनर्जी की सरकार ने स्पष्ट इनकार कर दिया था। ममता बनर्जी की सरकार तीसरी बार प्रचंड बहुमत से पाँच वर्षों के लिए चुनकर गई है, उसमें किसी अधिकारी के ख़िलाफ़ केंद्र के कड़े से कड़े निर्णय के बावजूद उस अधिकारी को राज्य सरकार की लाभ की छतरी लगाकर ममता बनर्जी बचाने की स्थिति में हैं और आलापन बंदोपाध्याय के मामले में ममता बनर्जी सरकार ने वही अप्रत्याशियत निर्णय लेते हुए उन्हें राज्य सरकार का विशेष सलाहकार नियुक्त कर दिया है। केंद्र-राज्य संबंधों में कड़वाहट के बीच किसी राज्य सरकार का किसी अधिकारी की इस तरह से नियुक्ति का यह पहला मामला ध्यान में आता है। अब सवाल यह है कि केंद्र सरकार आलापन बंदोपाध्यायन के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई कर सकती है? कार्मिक विभाग आलापन के तीन माह के सेवा विस्तार को रद्द कर सकता था, लेकिन इस संभावना को आलापन ने त्यागपत्र ख़त्म कर दिया। हालाँकि, केंद्र सरकार का कार्मिक विभाग आलापन की सेवा पर अभी भी प्रतिकूल प्रविष्टि दे सकता है, जिससे आलापन की पेंशन और दूसरे सेवानिवृत्ति के बाद वाले लाभ पर प्रभाव पड़ सकता है और सबसे अतिरेकी निर्णय यह हो सकता है कि आलापन के ख़िलाफ़ अनुशासनहीनता का मामला दर्ज कराया जाए, लेकिन इस सबमें यह बात भी ध्यान देने की है कि भले ही भारतीय प्रशासनिक सेवा की नियमावली भारतीय प्रशासनिक सेवा कैडर नियम, 1954 की धारा 6 के तहत केंद्र को किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को बुलाने का अधिकार है, यह भी सच है कि राज्य का कार्मिक विभाग, जिसकी मुखिया ममता बनर्जी हैं, अधिकारी को अपरिहार्य कारणों से रोक सकती हैं और यही हुआ भी है। पश्चिम बंगाल कार्मिक विभाग की सचिव बागबती प्रसाद गोपालिका ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हवाले से साफ़ कर दिया कि आलापन को दिल्ली नहीं भेजा जा सकता और उसकी वजह राहत, पुनर्वास कार्यों को तेज़ी से लागू करने के लिए मुख्य सचिव का मुख्यमंत्री के साथ लगातार बैठकों में रहना बताया गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को और फिर से प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इसे राजनीति से प्रेरित बताते हुए और राज्य की ज़रूरतों के लिहाज़ से मुख्य सचिव आलापन बंदोपाध्याय को छोड़ने में असमर्थता ज़ाहिर की है। 

अब केंद्र सरकार को इस पर आख़िरी निर्णय लेना है क्योंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा की नियमावली के मुताबिक़, आख़िरी निर्णय केंद्र ही लेगा। हालाँकि, इसमें यह भी शामिल होता है कि राज्य में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तैनाती या उ्हें केंद्र में बुलाने का निर्णय लेने से पहले केंद्र सरकार संबंधित राज्य सरकार के साथ परामर्श करेगी। अब राज्य-केंद्र के बीच विमर्श की प्रक्रिया थम गई हो और दोनों एक दूसरे को चुनौती देने की मुद्रा में हैं तो यह मामला गम्भीर हो गया है और दोनों के अपने पक्ष हैं, लेकिन केंद्र सरकार को इस पर कड़ा निर्णय लेना इसलिए भी आवश्यक हो गया है कि इससे भारतीय प्रशासनिक सेवा का पूरा ढाईं चरमरा सकता है और भारतीय प्रशासनिक, पुलिस सेवा के अधिकारी संबंधित राज्य सरकारों के राजनीतिक हितों को साधने का ज़रिया भर बनकर रह सकते हैं जो संवैधानिक तौर पर बार-बार ख़तरनाक स्थिति उत्पन्न करेगा। पश्चिम बंगाल के सन्दर्भ में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के राजनीतिक दबाव में होने का ही परिणाम है कि राज्य में राजनीतिक हिंसा का सामान्यीकरण हो गया है। राज्य में लोगों को अपना घर-परिवार-जमीन छोड़कर भागना पड़ा है। राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस प्रमुख राज्यपाल तक के आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं। और, अब आलापन के विशेष सलाहकार नियुक्त होने के बाद राज्य में तैनात भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी केंद्र सरकार की सलाह या बात को मानने को क़तई तैयार होंगे, इस पर बड़ा संदेह खड़ा हो गया है। अब केंद्र सरकार को संघीय ढाँचे  की मज़बूती के लिए संवैधानिक दायरे के तहत कड़ा संदेश देना होगा।  

(यह लेख https://hindi.moneycontrol.com/news/politics/alapan-bandyopadhyay-and-mamata-banerjee-vs-narendra-modi-reason-behind-this-tension-emerged-constitutional-crisis_267835.html पर छपा है)

Comments

  1. बिलकुल सही लिखा है आपने।

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  2. Modi insan hai bhagwan nhi, lekin Chapluso ne ose bhagwan bna dia, desh pahle bhi tha, aage bhi rahega, ham sda nhi rahenge, ithas gvahi dega, hamare kite karma di

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  3. Departmental enquiry should be start immediately and suspend him. Stop all the benifits

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