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किसान आंदोलन की आड़ ख़त्म हो चुकी है

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी



किसानों के हितों के नाम पर चल रहे आंदोलन का पाँचवा महीना चल रहा है। दुनिया में किसी भी आंदोलन के इतने समय तक लगातार चलने के कम उदाहरण हैं। ऐसा भी उदाहरण ध्यान में नहीं आता है कि इतने लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं को घेरकर कोई भी वर्ग बैठा हो। इससे दिखता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के इरादे कितने मज़बूत हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही आंदोलन है, उनके जीवन-मरण के प्रश्न जैसा दिख रहा है, लेकिन प्रश्न यह खड़ा होता रहा है कि आख़िर इतने मज़बूत आंदोलन और आंदोलन करने वालों के साथ देश भर का किसान क्यों खड़ा नहीं हो रहा है। इसकी वजह समझने की कोशिश करते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ध्यान में आते हैं

किसान नेताओं ने आंदोलन की शुरुआत ही धमकी से की थी और किसानों को भी धमकाकर ही दिल्ली की सीमाओं तक लाया गया था। यहाँ तक कि गाँवों से लोग नहीं रहे थे तो पंजाब में स्थानीय गुरुद्वारों और पंचायतों के ज़रिये लोगों को दिल्ली जाने के लिए दबाव बनाया गया। इससे भी बात नहीं बनी तो हरियाणा और पंजाब की कुछ पंचायतों ने प्रति परिवार पाँच हज़ार रुपये तक का जुर्माना लगाने की बात भी कही। जब दिल्ली में ट्रैक्टर परेड की तैयारी हुई तो साथ ही यह ख़बरें भी आईं कि, पंजाब के गाँवों में किसानों को विकल्प दिया गया है कि अपना ट्रैक्टर लेकर दिल्ली चलो या फिर एक ट्रैक्टर के दिल्ली जाने की रक़म दो। दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे आंदोलन में लगातार एनजीओ के सदस्यों के बने रहने की ख़बरें भी आती रहीं। कमाल की बात थी कि किसी भी मुद्दे पर काम करने वाले एनजीओ के लिए कृषि क़ानून पर आंदोलन में शामिल होना ज़रूरी शर्त जैसा हो गया था। इससे आगे बढ़कर किसान आंदोलन को कनाडा से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधी संगठनों से समर्थन मिल रहा था। पंजाब में निजी कंपनियों के टावर तोड़ दिए गए। भारतीय कंपनियों को नुक़सान करने की भावना भड़काने की कोशिश की गई और अनायास ही नहीं रहा होगा कि किसानों के नाम पर हो रहे इस आंदोलन में पर्यावरणवादियों से लेकर विदेशी सितारों और अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी तक चिंताग्रस्त हो गईं और ट्वीट करके शामिल भी हुईं। कनाडा में किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन को समर्थन देने की आड़ में भारत विरोधी प्रदर्शन किए गए। 

किसानों के हित बचाने के लिए चल रहे आंदोलन की ज़मीनी पड़ताल करते इन बिंदुओं को ध्यान से देखने पर इस बड़े प्रश्न का जवाब मिल गया कि आख़िर इतने मज़बूत आंदोलन और आंदोलन करने वालों के साथ देश भर का किसान क्यों खड़ा नहीं हो रहा है। और, अब जब किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन के टेंट ख़ाली हो चुके हैं। टिकरी-सिंघु और ग़ाज़ीपुर सीमाओं पर बैठे किसानों को काजू-किशमिश-बादाम वाले दूध और छप्पन भोग व्यंजनों की जगह सूखी रोटी और दाल-चावल ही मिल पा रहा है तब जाकर समझ आया कि दरअसल यह आंदोलन पूरी तरह से आढ़तियों और बड़े किसानों के अवांछित लाभ को बनाए रखने के लिए यह आंदोलन हो रहा है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण तब सामने आया जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कहाकि, फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और दूसरी एजेंसियाँ सरकारी ख़रीद की रक़म किसानों के खाते में सीधे देंगी। पंजाब की अमरिंदर सरकार पहले तो आढ़तियों के ज़रिये ही किसानों को सरकारी ख़रीद की रक़म देने पर अड़ी रही, लेकिन जब केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि सीधे किसान के खाते में रक़म देने की व्यवस्था राज्य सरकार नहीं करेगी तो सरकारी ख़रीद नहीं शुरू होगी, इसके बाद पंजाब की कांग्रेस सरकार ने आढ़तियों को बीच में डाल दिया और सरकारी ख़रीद के सॉफ़्टवेयर का हिस्सा पे नाऊ बटन को बना दिया, आढ़तिये के यह बटन दबाने के बाद ही किसान को भुगतान जाएगा। हालाँकि, केंद्र सरकार की तरफ़ से आढ़तियों के लिए बाध्यता की गई है कि 48 घंटे में किसान को रक़म देने की स्वीकृति दें और ऐसा नहीं करने पर 72 घंटे में स्वचालित तरीक़े से किसान के खाते में पूरी रक़म चली जाएगी, लेकिन इसके बाद आने वाली ख़बरों ने किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन की पूरी आड़ ख़त्म कर दी है। 

पंजाब में आढ़तियों ने किसानों को उपज सरकारी ख़रीद में बेचने के लिए एक ऐसी शर्त लगा दी है जो स्पष्ट तौर पर किसानों को आर्थिक तौर पर बंधक बनाने की कोशिश है। पंजाब के कई ज़िलों से ऐसी ख़बरें रही हैं कि आढ़तियों ने किसानों से ख़ाली चेक पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश शुरू कर दी है और, किसान को मिलने वाली सरकारी ख़रीद की रक़म में से तय रक़म हासिल करने का दबाव बना रहा है। पंजाब में किसान कितना डरा हुआ इसका अनुमान इसी से लगता है कि किसान खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि क़रीब 5 महीने से किसानों के नाम पर चल रहा आंदोलन किसानों के हितों को नहीं बल्कि किसानों की आड़ में सरकारी ख़रीद के ज़रिये अवांछित लाभ कमाने वालों आढ़तियों, दलालों के हितों को बचाने की कोशिश है। इसीलिए किसान अब इस आंदोलन का हिस्सा क़तई नहीं रह गए हैं। किसान आंदोलन के नाम पर जमावड़ा करने के लिए बनाए गए टेंट ख़ाली हो गए हैं। किसान संगठनों के अस्तित्व पर अब बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है क्योंकि किसानों को आढ़तियों के बंधन से मुक्त कराने की लड़ाई संगठन नहीं दिखे तो किसान संगठनों का बचा-खुचा प्रभाव भी ख़त्म हो सकता है। किसान आंदोलन की किसान हितों के लिए आंदोलन वाली आड़ ख़त्म हो चुकी है।

 (यह लेख https://hindi.moneycontrol.com/news/country/farmers-protest-have-lost-charm-what-will-next-punjab-captain-amrinder-singh_262449.html में छपा है)

Comments

  1. If some one say Harsh Vardhan Tripath is dead and it is his bhoot speaking against farmers then how will you feel ???
    Same is the case with you . You are eating the food produced or grown by farmers and wishing him bad luck or predicting his doom ?? Actually it will be a doom for those , who eat the food produced by farmers. If farmers started to produced
    only for his family, millions like you will perish in two years whereas a farmer can survive for decades Shame on you Maha Andh bhagat

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    1. Dude i m IT, if i dont work you would nt be able to do anything over the internet, If a Doc goes offline then you may reach your friends for surgery. Dude, everyone is important on earth including farmers. If they stop growing food they would also perish like others. Btw I don't like Modi regime cause its too soft on law and order , congress was faaar better in that.

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    2. Kisan apne family k liye jo ugayega
      Wo kudal hal tractor triller ,fertiliser irrigation system available karanewale ko ignore karna bewbkufi hai

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  2. ऐसे ही बिजली बनाने वाले कहे कि हम बिजली नही बनाते,खाद वाले कहे कि हम नही बनाते,नमक वाले कहे हम नही बनाते,भाई कुदरत ने सबको अपना अपना कार्य के लिए बनाया है ,बात हो रही है बिचौलियों से किसान को बचाने की,क्या किसान के खातों में सीधे रकम नहीं जानी चाहिये?हाँ आढ़तियों को उनके हिस्से की वाजिब तय शुदा राशि मिलनी चाहिये पर यह क्या की ब्लेक चैक पर हस्ताखर करा लिए जाए इससे तो लगता है कि विचौलियों/आढ़तियों को किसान वर्ग पर विश्वास नही है,जब किसान पूरी तरह समझ जाएगा तो क्या होगा!

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    1. Farmers are being exploited at every level by every one ,he has to deal with as a farmer is a very simple person, he knows nothing about laws of economics or trade / busines, the end result is that everyone dealing with him benefits and only a kisan suffers a loss. And a loss making unit is locked by a business man but a kisan is so simple that he even don't know this and keep on running a loss making farming ,and becomes heavily debited which he cannot pay without selling his property .So as businessman locks a loss making unit similarly a kisan declare a lockdown and stop production for market. And produce only for his family and not for market and you can survive without each and every thing but can't survive without water ,air and food . where first two are free in nature but food has to be produced and there is no food in market ,how one can survive who don't produce it so it is right that millions and millions will perish if farmers decide lockdown , don't exploit the farmers , their due benefits must be given and don't laugh on thek

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  3. अरे बीजेपी के दलाल अंधभक्ति बन्द कर वरना लोग तुम्हे सर्को पर पीटेंगे।

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    1. O chamcho road par pitnewale loktantra ki duhai mat do
      Sena ko gher lo kahnewale v loktantra ki duhai de rhe
      Mamta k pairokaro

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  4. Why all kissan sangathan doesn't say anything when ahrtiya are demanding blank checks ,why they are quite on this issue. They are protesting because they know after the implementation of these law they can't sell wheat on price of 1900 by buying on 1000 per quintal from the bihar up farmers . They are doing 700 crore scam now . They will not be able to do that scam .saying anything against ahrtiyas is not equal to against farmers . We sell wheat on 900 per quintal to ahrtiya in jammu . If we sell it mills directly illegally we get 1300 per quintal . We know how these laws are important for us

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक ।
    --
    ऐसे लेखन से क्या लाभ? जिस पर टिप्पणियाँ न आये।
    ब्लॉग लेखन के साथ दूसरे लोंगों के ब्लॉगों पर भी टिप्पणी कीजिए।
    तभी तो आपकी पोस्ट पर भी लोग आयेंगे।

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  6. It's a real good blog which reveals real truth behind this false agitation. We all love our Farmers and once you really see these laws from an unbiased perspective, we will come to know that these are going to benefit Farmers in Long run.
    Specially if Punjab and Haryana some farmers don't want these laws that's fine as these laws are optional and not mandatory so this shows it's a false narrative built on name of our loved farmers

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  7. Unknown has lot of time in this world due to remote working. He has no knowledge of kisan.

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