Friday, July 11, 2014

हम सभ्य रहे बेहूदा तो बस ड्राइवर था!

मुश्किल होती है अगर मैं अपनी बेटी के साथ हूं। क्योंकि, खाली भी है रास्ता लेकिन, बत्ती लाल है तो सड़क पार करने पर बहुत कड़ाई से सुनना पड़ता है। उसे मैंने ही सिखाया था शुरू में नर्सरी के लिए स्कूल छोड़ते वक्त। बताया था कि लाल बत्ती मतलब रुकना, हरी बत्ती मतलब चलना। अब कई बार तो ऐसा भी होता है कि हरी बत्ती रही आखिरी 3-4 सेकेंड में गाड़ी निकालने की कोशिश की और बीच चौराहे पर दूसरी कारों से गुंथ गया। बिटिया मुझे ही समझा देती है कि लाल बत्ती थी गाड़ी क्यों निकाली। अगर उसकी गवाही हो तो मेरा चालान कटना पक्का। आमतौर पर मैं भी लाल बत्ती को अनदेखा नहीं करता। लेकिन, आज सुबह दफ्तर आते समय एक चौराहे पर लाल बत्ती पर मैं रुका। तेजी से आती बस के 'बेहूदे' ड्राइवर ने जैसे कुछ देखा ही नहीं। सीधे चौराहा पार करा दिया। उसकी बहुत बड़ी बस के सामने छोटी-बड़ी कारें चुपचाप हरी बत्ती पर भी रुक गईं। और उस 'बेहूदे' ड्राइवर की बड़ी बस की आ़ड़ में हम जैसे लोग भी अपनी सभ्यता छिपाए चौराहा पार कर गए। उसकी 'बेहूदगी' दिख गई हमारी 'सभ्यता' बच गई।

No comments:

Post a Comment

नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार जो हो न सका

Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी काशी से तीसरी बार सांसद बनने के लिए नामांकन पत्र दाखिल करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2004-10 तक ...