Saturday, December 29, 2007

जाति प्रथा से बची हुई है सभ्यता!

जाति प्रथा सभ्यता बचाने में मदद कर रही है। ये सुनकर अटपटा लगता है। जाति प्रथा को ज्यादातर सामाजिक बुराइयों के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है। लेकिन, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मानव शास्त्र विभाग के अध्यक्ष और प्रसिद्ध समाज मानवशास्त्री प्रोफेसर वीएस सहाय का एक शोध कह रहा है कि जाति प्रथा की वजह से ही भारतीय सभ्यता इतने समय तक बची रही है। वो कहते हैं कि भारत और चीन को छोड़कर दूसरी सारी सभ्यताएं इसीलिए नष्ट हो गईं। लेकिन, वो जिस जाति प्रथा की बात करते हैं वो, पिता से बेटे को तभी मिलती थी जब बेटा पिता के ही कर्म करता था। वो, पेशा आधारित जाति प्रथा की वजह से सभ्यता बचने की बात खोजकर लाए हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें

9 comments:

  1. मैं ने यह लेख पढ़ा। यह तो एक सचाई है कि तमाम बुराइयों के बावजूद भी जातिप्रथा ने संस्कृति को बचाया और संरक्षित किया है।

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  2. Anonymous11:25 AM

    अगर संस्कृति को बचाने की कीमत करोड़ों मनुष्यों को जानवर से कम दर्जे का जीवन देने की है, तो निश्चित ही यह बचाने योग्य नहीं है. जाति प्रथा हिन्दु धर्म पर एक कलंक है और कोई भी तर्क उसको धो नहीं सकते. तर्क हवा में हैं, और नतीजे हमारे सामने.

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  3. जाति और जनपद इस देश की वास्तविकता है. इस बारे में साफ मन से सोचने की जरूरत है.

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  4. harsh bhai, kisi blog per yeh meri pehli tippani hai, bhul chuk ko nazarandaz kar dain. Hairani hoti jab koi kahta hai ki jati pratha se sabhyata bachi hai. Iska matlab to yahi hai hamlogo se bada koi asabhay hai hi nahi, kyonki jati ke naam per jitne hum khun bahayan hain, shaayad hi duniya ke kisi desh main aisa hua ho. Yahin nahi jati ke chalte paschimi uttar pradesh ya bihar main jis tarah log apni bahan betiyon ki hatya karte hain, kya woh sabhy samaj ki nishani hai. mujhe lagta hai ki jaati pratha na ho to shayaad shabhayata jayda samay tak bani rahegi.

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  5. एकदम सही है। जाति प्रथा में मुझे भी ज्यादातर बुराइयां ही दिखती हैं। लेकिन, सवाल ये है कि समाज को चलाने के लिए किस व्यवस्था को किस संदर्भ में आत्मसात करना है ये भी देखना होगा। और सवाल सिर्फ जाति का ही नहीं होता। ज्यादा अमीर कम अमीर को बड़ा अफसर छोटे अफसर के साथ, ज्यादा पढ़ा लिखा- कम पढ़े लिखे के साथ और दूसरे ऐसे किसी भी तरह से श्रेष्ठजन (पता नहीं ये शब्द कितना सहीं है?) अपने से कमतर समझे जाने वाले हर व्यक्ति के साथ जो व्यवहार करते हैं। वो, जाति प्रथा से कम खतरनाक तो नहीं होता है। खैर अच्छा है बहस आगे बढ़ाइए।

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  6. अटपटा क्या है? जाति व्यवस्था की विकृतियां दूर हों। बाकी तो मानव सदैव जातियों में रहते और प्रगति करते रहे हैं। यह परस्पर एक दूसरे के स्पेशलाइजेशन का लाभ लेने का सामाजिक विधान है।

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  7. सिरिल से सहमति है।
    पोस्‍ट पढ़ी और संदर्भित लेख भी, फिर भी लगता है कि जाति के चले जाने से भी हम बचे रहेंगे। और अगर नहीं बचे रहें तो भी सभ्‍यता और जाति दोनों जाएं तो भी जाने देना चाहिए।

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  8. कोई भी जाति अपने जातिगत स्वाभाव , संस्कार उसके आतंरिक गुणों से कोसो दूर ही. अतः केवल दोष ही दोष
    दृष्टिगत होता रहा है . दोष बड़ा जल्दी परख मे आता है . किसी चीज़ का विनाश से सुधार कैसे हो सकता है. जबकि कोबरा खतरनाक होते हुए भी हमारे लिए दवा का जुगाड़ करता है . जो जीवन दे जाता है .

    हर्षवर्धन जी की टिपण्णी उनके पोस्ट से कहीं ज्यादा सारगर्भित है . जाति मे भी वर्ग है जाति के नष्ट होने पर भी
    वर्गवाद जिंदा रहेगा . वर्गवाद मे भी गुण और दोष दोनों समाहित है . मानव को मानव हर जातिगत संविधान, जातिगत संस्कार मे बताया गया है .छुआछूत बेकार की बातें हैं .पर अपनी औकाद की परख हमेशा रखनी होगी . मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे चर्च के लिए अगर लड़ाई हो और आप इन सबको ध्वस्त कर भी दे तो भी
    लड़ाई जारी रहेगी .फस्साद तो अन्दर के विकार से होता है . जो आपके अन्दर भी होगा . आप क्यों न अपने आप को नष्ट करते . इलाहाबाद मे शोध हुआ है इसलिए भाजपाई बू आ रही है क्या ?

    अंगूठे पर खड़ा होकर बराबरी नही किया जा सकता बुधिमतापूर्ण सही दिशा मे मेहनत करके ही कोई आगे बढे
    मैदान साफ है .जो चला है सो पाया है . कबीर बाल्मीकि रैदास नानक साई बाबा को इस जातिगत समाज
    मे जो समान मिला या मिलता है वो काफ़ी है किसी भी जाति का जातिगत संविधान का गुण बताने को .
    अतः जाति बकवास नही .सोंच अच्छा रखिये .

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  9. एक क्षण के लिए विचार कर देखिए- क्या सचमुच हम जाति प्रथा का ही विरोध करते हैं या जाति प्रथा के दुष्परिणामों का। ज़हरीला तो सांप भी होता है, लेकिन कहते हैं कि वो श्वास में नाइट्रोजन लेता है और वायुमंडल में इस ज़हरीली गैस की मात्रा नियंत्रित करता है। ज़हर तो केवल दांत में है न। उसे अगर तोड़ दें, तो फिर। इसी तरह यदि जाति प्रथा दंभ और घृणा निकाल दें, तो फिर? अस्पृश्यता तो किसी भी तरह एक सामाजिक अपराध है और इतिहास गवाह है कि वैदिक भारत में अछूत नाम का कोई वर्ग नहीं था। बिहार में आचार्य कुणाल ने एक महान प्रयोग किया है, जिसमें दलित कहे जाने वाले समाज के पवित्र आचरण वाले वेदपाठी पुरुषों को मंदिरों में पुजारी के पद पर आसीन किया गया है। महत्वपूर्ण तो आचरण है। मैं ब्राह्णण हूं। कभी संध्या करता नहीं, मुंह से गालियां झड़ती हैं, पर नारी पर हमेशा कुदृष्टि ही डालता हूं, हफ्तें में कम से कम एक बार शराब न मिले तो सब सूना, लेकिन फिर भी छाती तान कर ब्राह्णण होने का दंभ भरता हूं। कोई एक चर्मकार है जो चमड़े का काम करता है। पवित्र जीवन जीता है, भगवान की भक्ति करता है, सच बोलता है। और फिर भी चर्मकार होने के कारण वो नीच है। ऐसा नहीं हो सकता। हिंदू समाज अगर अपना अस्तित्व बचाना चाहता है, तो उसे इस विसंगति को ठीक करना ही होगा।

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