Skip to main content

उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा के विधायक, नेता सिर्फ गुंडागर्दी कर रहे हैं

उत्तर प्रदेश में मायाराज के दरबारी सत्ता के मद में पगला गए हैं। 5 साल के लिए मायावती को प्रदेश की जनता ने सत्ता दी थी कि वो स्थिरता के साथ प्रदेश को उसकी खोई प्रतिष्ठा वापस लौटाए। मायावती ने सत्ता में आने के बाद प्रदेश से गुंडाराज, जंगलराज खत्म करने का भरोसा दिलाया। लेकिन, अब हाल ये है कि मायाराज में सत्ता में शामिल लोगों के अलावा किसी की भी इज्जत सुरक्षित नहीं है।

मायावती की बसपा के 3 नेताओं के काले कारनामे की वजह से प्रदेश के लोगों का डर अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि एक और विधायक ने बसपा के जंगलराज को और पुख्ता कर दिया। इस बार मामला और संगीन है। वाकया बनारस का है। एक महिला का पति दूसरी शादी कर रहा था। उसे रोकने के लिए महिला कुछ पत्रकारों को साथ लेकर शादी में पहुंच गई। लेकिन, महिला को अंदाजा नहीं था कि मायाराज में लोकतंत्र खत्म हो चुका है।

महिला के पति की दूसरी शादी में बसपा के विधायक शेर बहादुर सिंह भी मौजूद थे। पहले महिला को स्टेज से धक्का दिया गया। और, जब पता चला कि महिला पत्रकारों को लेकर आई है, शेर बहादुर सिंह के अहम को चोट लग गई। विधायक और उनके आदमियों ने पत्रकारों को पकड़कर पीटना शुरू किया। कैमरामैन, रिपोर्टर सबको 5-6 आदमी एक साथ मिलकर पीट रहे थे। राइफल, पिस्तौल के बट से पत्रकारों को पीटा गया पत्रकारों के शरीर पर खून के जमे हुए निशान बता रहे हैं कि उनकी किस बेरहमी से पिटाई की गई है।

लेकिन, मायाराज में बसपा विधायक की गुंडागर्दी इतने पर ही खत्म नहीं हुई। विधायिका बेलगाम थी तो, फिर सत्ता चलाने वालों के लिए ही कानून की रखवाली करने वाले पुलिस वाले कैसे पीछे रहते। थाने में विधायक के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने पहुंचे पत्रकारों को फिर से पुलिस ने दौड़ाकर पीटना शुरू कर दिया। लेकिन, मायावती के अपने गुंडाराज, जंगलराज में आतंक के काले कारनामे अभी और बाकी थे। चोट खाए, गुस्साए पत्रकारों ने मायावती का पुतला फूंकने की कोशिश की। तो, मायावती की निजी पुलिस की तरह काम कर रही उत्तर प्रदेश पुलिस आपे से बाहर हो गई। फिर से पत्रकारों को पीटा गया।

यहां सवाल सिर्फ पत्रकारों के पिटने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या बसपा के राज में बसपा के नेताओं विधायकों और पुलिस वालों को कानून को ठेंगे रखने का हक मिल गया है। कानूनन कोई भी व्यक्ति एक महिला से शादी करने के बाद दूसरी महिला से शादी नहीं कर सकता जब तक कि उसको तलाक न मिल जाए। लेकिन, बसपा विधायक के प्रिय व्यक्ति पहली बीवी से बिना तलाक के ही दूसरी शादी कर रहे थे। इस तरह से विधायक शेर बहादुर सिंह भी कानून तोड़ने को दोषी हुए। उसके बाद तो विधायक ने कानून की ऐसी धज्जियां उड़ाईं जो, उत्तर प्रदेश के इतिहास में काले कारनामे में दर्ज हो गया है। लेकिन, पता नहीं अब इन घटनाओं को काला कारनामा माना भी जाता है या नहीं।

इसके बाद सरकारी खानापूरी करने के लिए विधायक शेर बहादुर सिंह, सीओ संसार सिंह और इंस्पेक्टर के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। लेकिन, साथ ही पत्रकारों के खिलाफ भी कई मामले दर्ज कर दिए गए। अब जब पत्रकारों के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया गया है तो, साफ है विधायक और दूसरे आरोपियों पर कोई कार्रवाई क्यों की जाएगी। 3 साल के शासन के बाद मुलायम राज में रहना दूभर हुआ था। अब बसपा का हाथी तो पूरे उत्तर प्रदेश को ही जंगल बनाकर उसे बरबाद करने पर जुटा गया है। उत्तर प्रदेश का अब राम भला करें।

Comments

  1. पहले वाला भी करा रहा था। ये वाली के बन्दे भी कर रहे हैं।
    अत: आप गुण्डागर्दी कराने/करने पर न लिख कर गुण्डागर्दी के तुलनात्मक अध्ययन पर शोध करें! :-)

    ReplyDelete
  2. देखिये नेता और पत्रकार दोनों का चरित्र बदला है. राजनेता गुंडा नही बना . गुंडा राज नेता बना है . स्वार्थ और चाटुकारिता पत्रकारिता पर भी हावी है अतः अब पत्रकार से डर नही पैदा होता . आम और ख़ास मे अन्तर केवल
    सुरक्षा कर्मी साथ होने से ही पता चलता है . ग़लत के साथ भी पत्रकार सही के साथ भी पत्रकार का होना पत्रकार को कमजोर करता जा रहा है . लेकिन अपनी कमजोरी का एहसास न होने के कारण ही ऐसी घटना उनके साथ घटित होती है .

    ReplyDelete
  3. आज आपने तस्वीर का दूसरा रुख पेश किया. कल कुछ भ्रम हो गया था इसलिए टिपण्णी वैसी लिखी.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

किसान राजनीति के बीच सरकार आधुनिक किसान नेता बनाने में जुटी है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी दिल्ली की सीमा पर तीन तरफ़ सिंघु , टिकरी और ग़ाज़ीपुर पर कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन बैठे हुए हैं और फ़िलहाल कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। सरकार और किसानों के नाम आंदोलन कर रहे संगठनों के बीच में वार्ता भी पूरी तरह से ठप पड़ गयी है। किसानों के नाम पर संगठन चला रहे नेताओं ने अब दिल्ली सीमाओं पर स्थाई प्रदर्शन के साथ रणनीति में बदलाव करते हुए देश के अलग - अलग हिस्सों में किसान पंचायत , बंद और प्रदर्शन के ज़रिये सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना शुरू किया है , लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार कृषि क़ानूनों को लेकर ज़्यादा दृढ़ होती जा रही है। चुनावी सभाओं से लेकर अलग - अलग कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को आधुनिक कृषि व्यवस्था से जोड़कर उनकी आमदनी दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को बार - बार दोहरा रहे हैं , लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि आख़िर किसानों को यह बात समझाने में सरकार कैसे कामयाब हो पाएगी , जब

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दम तोड़ेगी यूनियनबाज किसानों की “अराजकता”

भारतीय संविधान निर्माताओं ने जब संविधान बनाया था तो स्पष्ट तौर पर उसमें यह व्यवस्था स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि किसी भी हाल में विधायिका , न्यायापालिका और कार्यपालिका के बीच किसी तरह का टकराव न हो। हालाँकि , इसमें लोकतंत्र की मूल भावना का ख्याल रखते हुए विधायिका और न्यायपालिका को एक दूसरे पर इस नज़रिये से नज़र रखने का बंदोबस्त किया गया कि किसी भी हाल में निरंकुश व्यवस्था न हावी हो जाए , लेकिन सबके मूल में लोकतंत्र को ही सर्वोच्च भावना के साथ स्थापित करना था , इसीलिए कई बार भारतीय लोकतंत्र में इस बात की भी चर्चा होने लगती है कि भारत में अतिलोकतंत्र की वजह से सरकारें निर्णय नहीं ले पाती हैं। पहले नागरिकता क़ानून के विरोध में चले शाहीनबाग और अब कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहे सिंघु - टिकरी - गाजीपुर के आंदोलन को लेकर अतिलोकतंत्र की बहस फिर से छिड़ गई है और इसी अतिलोकतंत्र की बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि क़ानूनों को नि

पिंजरा या भारत तोड़ने की कोशिश ?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मुख्य परिसर से सटा हुआ या यूं कह लें कि मुख्य परिसर में ही महिला छात्रावास है। और, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं, महिला छात्रावास से निकलकर सीधे परिसर में आ जातीं थीं, लेकिन यह रास्ता पूरी तरह से उन्हीं छात्राओं के लिए था जो महिला छात्रावास में रहती थीं। महिला छात्रावास में छात्रों या किसी को भी जाने के लिए मुख्य द्वार से ही जाना होता था और इसके लिए बाकायदा सुरक्षा में लगे जवानों के पास नाम वगैरह दर्ज कराकर ही जाया जा सकता था। 90 के दशक तक 3 महिला छात्रावास हुआ करते थे और उन तीनों के पहले छात्रावास अधीक्षिका का कक्ष, छात्रावास कार्यालय होता था, वहीं तक जाकर छात्राओं से मुलाकात होती थी। वर्ष में एक बार विश्वविद्यालय के छात्रों को महिला छात्रावास के अंदर जाने का अवसर मिलता था और वह अवसर होता था छात्रसंघ चुनाव के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद अनोखे मशाल जुलूस वाले दिन। हर प्रत्याशी अपने जुलूस के साथ महिला छात्रावास में जाता था, जहां छात्राएं, छात्रसंघ प्रत्याशियों के ऊपर फूल फेंकती थीं और जिस नेता के ऊपर ज्यादा गुलाब गिरे, उसकी जीत पक्की मान